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चार दशक बाद पर्यटकों के लिए खुलेगा इंद्रावती टाइगर रिजर्व, 1 नवंबर से शुरू होगा पर्यटन

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बीजापुर- छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के लिए बड़ी खुशखबरी है। बीजापुर जिले में स्थित इंद्रावती टाइगर रिजर्व करीब चार दशक लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर पर्यटकों के स्वागत के लिए तैयार है। रिपोर्टों के मुताबिक, रिजर्व को 1 नवंबर 2026 से पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी है। लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों के कारण यहां पर्यटन प्रभावित रहा, लेकिन क्षेत्र में सुरक्षा और शांति की स्थिति बेहतर होने के बाद वन विभाग ने ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

2,799 वर्ग किलोमीटर में फैला है टाइगर रिजर्व

इंद्रावती टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में शामिल है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 2,799 वर्ग किलोमीटर है। इंद्रावती नदी के नाम पर इसका नाम पड़ा है। यह क्षेत्र 1981 में राष्ट्रीय उद्यान और 1983 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत टाइगर रिजर्व का दर्जा प्राप्त कर चुका है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अनुसार, इंद्रावती देश के आधिकारिक टाइगर रिजर्वों में शामिल है।

बाघ के साथ वनभैंसा और दुर्लभ वन्यजीवों का बसेरा

इंद्रावती का जंगल जैव-विविधता की दृष्टि से बेहद समृद्ध है। यहां बाघ, जंगली भैंसा, सांभर, चीतल और विभिन्न प्रजातियों के पक्षी सहित कई वन्यजीव पाए जाते हैं। बीजापुर जिला प्रशासन के अनुसार, यह क्षेत्र दुर्लभ वनभैंसे की आबादी के लिए भी महत्वपूर्ण है। घने जंगल, पहाड़ी भू-भाग और इंद्रावती नदी इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से बेहद आकर्षक बनाते हैं।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र से पर्यटन के नए केंद्र की ओर

इंद्रावती क्षेत्र लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों के कारण आम पर्यटकों की पहुंच से दूर रहा। अब सुरक्षा स्थिति में सुधार के साथ यहां पर्यटन की संभावनाएं फिर से दिखाई देने लगी हैं। फरवरी 2026 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी बस्तर में दशकों से चली आ रही माओवादी हिंसा के कारण पर्यटन और जनजीवन पर पड़े प्रभाव का उल्लेख किया था।

इसी बदलते माहौल के बीच इंद्रावती को ईको-टूरिज्म के नक्शे पर लाने की तैयारी को बस्तर के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

पर्यटकों को मिल सकता है जंगल सफारी का अनुभव

पर्यटन शुरू होने के बाद आगंतुकों को इंद्रावती के घने जंगलों और प्राकृतिक परिवेश को करीब से देखने का अवसर मिलेगा। अप्रैल 2026 की रिपोर्टों में कुटरू–फरसेगुड़ा और भोपालपट्नम–मट्टेमरगा क्षेत्र से प्रवेश की व्यवस्था की योजना का उल्लेख किया गया था। यहां पर्यटकों को बाघ, वनभैंसा और अन्य वन्यजीवों को देखने के साथ-साथ बस्तर के प्राकृतिक वातावरण का अनुभव मिल सकता है।

वन्यजीव संरक्षण के साथ पर्यटन पर जोर

इंद्रावती को पर्यटन के लिए खोलने के साथ वन्यजीवों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण चुनौती होगी। हाल के महीनों में रिजर्व की सीमाओं पर निगरानी मजबूत करने के लिए भी कदम उठाए गए हैं। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से लगी लगभग 100 किलोमीटर लंबी अंतरराज्यीय सीमा पर करीब हर 7 किलोमीटर पर पेट्रोलिंग कैंप स्थापित करने की योजना बनाई गई है, ताकि शिकार, अवैध कटाई और वन्यजीव तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।

बस्तर के पर्यटन को मिलेगी नई पहचान

इंद्रावती टाइगर रिजर्व का दोबारा खुलना केवल वन्यजीव पर्यटन के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय रोजगार, होम-स्टे, गाइड सेवाओं, परिवहन और स्थानीय हस्तशिल्प जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है। केंद्र सरकार ने भी बस्तर में वन एवं वन्यजीव आधारित पर्यटन की व्यापक संभावनाओं को रेखांकित किया है।

बस्तर पहले से ही अपने घने जंगलों, झरनों, गुफाओं और आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व के पर्यटन मानचित्र पर आने से क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यटन और वन्यजीव पर्यटन को नई गति मिलने की उम्मीद है।

नोट: पर्यटकों के प्रवेश, सफारी रूट, बुकिंग प्रक्रिया, शुल्क और सुरक्षा संबंधी अंतिम दिशा-निर्देश वन विभाग की आधिकारिक घोषणा के अनुसार लागू होंगे।

रायपुर के पास तेंदुए की दहशत, 5 बकरियों का किया शिकार; खेत में बैठा रहा तेंदुआ

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वन विभाग की टीम मौके पर, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी; तेंदुए को ट्रैंक्विलाइज कर सुरक्षित पकड़ने की तैयारी

रायपुर- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के आसपास एक बार फिर तेंदुए की मौजूदगी से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। रायपुर के पास एक खेत में घुसे तेंदुए ने 5 बकरियों का शिकार कर दिया। बकरियों के शिकार के बाद तेंदुआ खेत में ही बैठा रहा, जिसके चलते आसपास के इलाके में लोगों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ गई है।

खेत में घुसकर बकरियों का किया शिकार

जानकारी के मुताबिक, तेंदुआ खेत में पहुंचा और वहां मौजूद बकरियों को अपना शिकार बनाया। इस घटना के बाद ग्रामीणों में भय का माहौल बन गया। तेंदुए के खेत में ही मौजूद होने की जानकारी मिलते ही आसपास के लोगों को सतर्क किया गया और मौके से दूर रहने की अपील की गई।

वन विभाग ने शुरू किया रेस्क्यू ऑपरेशन

घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग सक्रिय हो गया। रायपुर से विशेष रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और तेंदुए को सुरक्षित पकड़ने के लिए ऑपरेशन शुरू किया गया है।

वन विभाग की टीम तेंदुए को ट्रैंक्विलाइज यानी बेहोश कर सुरक्षित तरीके से पकड़ने की तैयारी कर रही है। इसके बाद तेंदुए को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

ग्रामीणों से सतर्क रहने की अपील

तेंदुए की मौजूदगी को देखते हुए वन विभाग और प्रशासन ने लोगों से घटनास्थल के आसपास नहीं जाने और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील की है। रेस्क्यू टीम के ऑपरेशन के दौरान भी लोगों को मौके से दूर रहने की सलाह दी गई है, ताकि तेंदुआ घबराकर किसी व्यक्ति पर हमला न करे।

वन्यजीव और इंसानी बस्तियों के बीच बढ़ता संपर्क

रायपुर के आसपास तेंदुए की इस तरह मौजूदगी एक बार फिर वन्यजीवों के प्राकृतिक क्षेत्र और मानव बस्तियों के बीच बढ़ते संपर्क की ओर ध्यान खींचती है। ग्रामीण इलाकों में पशुओं पर वन्यजीवों के हमले से स्थानीय लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ जाती है।

फिलहाल वन विभाग का मुख्य उद्देश्य तेंदुए को बिना नुकसान पहुंचाए सुरक्षित रेस्क्यू करना है। टीम की निगरानी में पूरा ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

लोगों के लिए जरूरी अपील

  • तेंदुए को देखने या उसका वीडियो बनाने के लिए उसके करीब न जाएं।

  • खेत या झाड़ियों वाले इलाकों में अकेले जाने से बचें।

  • बच्चों और पालतू पशुओं को सुरक्षित स्थान पर रखें।

  • रेस्क्यू टीम के काम में बाधा न डालें।

  • तेंदुआ नजर आने पर तुरंत वन विभाग या स्थानीय प्रशासन को सूचना दें।

फिलहाल इलाके में तेंदुए को सुरक्षित पकड़ने के लिए वन विभाग की टीम तैनात है और ट्रैंक्विलाइजेशन की तैयारी की जा रही है।

रेलवे सुरंग में बेखौफ घूमता दिखा तेंदुआ, लोको पायलट की सतर्कता से टला बड़ा हादसा

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में बिलासपुर-कटनी रेलमार्ग के खोंगसरा-भनवारटंक रेलखंड की एक रेलवे सुरंग में तेंदुआ दिखाई देने से रेल कर्मचारियों और आसपास के लोगों में हलचल मच गई। सुरंग के भीतर रेलवे ट्रैक पर तेंदुए के बेखौफ घूमने का वीडियो भी सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

जानकारी के अनुसार, तेंदुआ रेलवे ट्रैक के बीचों-बीच चलता हुआ सुरंग के अंदर जाता दिखाई दिया। इसी दौरान रेलकर्मियों की नजर उस पर पड़ी। बाद में वहां से गुजर रहे लोको पायलट ने भी तेंदुए को देखा और सावधानी बरतते हुए ट्रेन की गति कम कर दी। इस सतर्कता के चलते वन्यजीव के साथ संभावित टक्कर टल गई।

सुरंग में तेंदुए की मौजूदगी से बढ़ी चिंता

वन क्षेत्र से सटे इस रेलमार्ग पर जंगली जानवरों की आवाजाही कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन रेलवे ट्रैक और विशेषकर सुरंग के भीतर तेंदुए की मौजूदगी ने वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रेन और वन्यजीव के बीच अचानक आमना-सामना होने की स्थिति दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

सामने आए वीडियो में तेंदुआ रेलवे पटरी के बीच आराम से चलता हुआ दिखाई दे रहा है। वीडियो सामने आने के बाद रेल कर्मचारियों तथा आसपास के लोगों के बीच इस घटना को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

लोको पायलट की सूझबूझ से बची वन्यजीव की जान

घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लोको पायलट की सतर्कता रही। तेंदुए को ट्रैक पर देखकर ट्रेन की रफ्तार कम करना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आने से वन्यजीव की मौत हो सकती थी, लेकिन समय रहते सावधानी बरते जाने से संभावित दुर्घटना टल गई।

रेलवे और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत

यह घटना एक बार फिर बताती है कि जंगलों और वन्यजीव क्षेत्रों से गुजरने वाले रेलमार्गों पर अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता है। ऐसे संवेदनशील रेलखंडों पर वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी, ट्रेन चालकों को सतर्क करने की व्यवस्था और रेलवे तथा वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय से ऐसी घटनाओं में वन्यजीवों और यात्रियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

तेंदुए का सुरंग में दिखाई देना जहां प्रकृति और वन्यजीवों की मौजूदगी का प्रमाण है, वहीं यह मानव गतिविधियों और वन्यजीव आवास के बीच बढ़ते संपर्क की ओर भी संकेत करता है। ऐसे में विकास के साथ-साथ वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।

संदेश साफ है—रेल की रफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण है जीवन की सुरक्षा। लोको पायलट की सतर्कता ने न केवल एक संभावित हादसा टाला, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी का भी उदाहरण पेश किया।

वैश्विक बाघ दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी शुभकामनाएं, बाघ संरक्षण के प्रति दोहराई प्रतिबद्धता

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 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक बाघ दिवस (Global Tiger Day) के अवसर पर सभी वन्यजीव प्रेमियों को शुभकामनाएं दी हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि विश्व की लगभग 70 प्रतिशत बाघ आबादी भारत में निवास करती है।

उन्होंने कहा कि भारत के बाघ संरक्षण प्रयास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की हमारी सदियों पुरानी संस्कृति से प्रेरित हैं और देशवासियों की सामूहिक इच्छाशक्ति से संचालित होते हैं।

मोदी ने विज्ञान-आधारित संरक्षण, जनभागीदारी तथा सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जो बाघ संरक्षण को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

प्रधानमंत्री ने बाघों की सुरक्षा में वन कर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के समर्पण एवं योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

एक्स (X) पर अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा:

“वैश्विक बाघ दिवस पर सभी वन्यजीव प्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएं। भारत के लोगों को इस बात पर गर्व है कि विश्व के लगभग 70 प्रतिशत बाघ हमारे देश में हैं। भारत के बाघ संरक्षण के प्रयास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की हमारी सदियों पुरानी संस्कृति से प्रेरित हैं और हमारे लोगों की सामूहिक इच्छाशक्ति से सशक्त होते हैं। हम विज्ञान-आधारित संरक्षण, जनभागीदारी और सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराते हैं, जो बाघ संरक्षण को और मजबूत बनाते हैं।”

“हमारे वन कर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के अथक प्रयास तथा समर्पण ने भी बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी भावना के साथ भारत स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस: बाघ संरक्षण में भारत बना वैश्विक अग्रणी, दुनिया के 70% जंगली बाघ भारत में

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नई दिल्ली- हर वर्ष 29 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस बाघ संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने का अवसर है। भारत के लिए यह दिन विज्ञान आधारित संरक्षण, मजबूत नीतियों और जनभागीदारी के माध्यम से हासिल की गई उल्लेखनीय उपलब्धियों का प्रतीक है। आज दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण का अग्रणी देश बनकर उभरा है।

भारत में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन-2022 के अनुसार देश में बाघों की संख्या 3,682 पहुंच गई है। वर्ष 2006 के बाद से भारत ने वैज्ञानिक आकलन के आधार पर अपनी बाघ आबादी को दोगुने से अधिक बढ़ाने में सफलता हासिल की है। यह उपलब्धि दीर्घकालिक संरक्षण नीतियों, वैज्ञानिक प्रबंधन और प्रभावी निगरानी का परिणाम है।

भारत में बाघ संरक्षण की आधारशिला प्रोजेक्ट टाइगर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा टाइगर संरक्षण योजनाओं पर आधारित है। वर्तमान में देश के 18 राज्यों में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जो लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

बाघों की निगरानी के लिए भारत ने अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाया है। एम-एसटीआरआईपीईएस (M-STrIPES), कैमरा ट्रैप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित विश्लेषण और CaTRAT जैसी प्रणालियों के माध्यम से बाघों की सटीक गणना और उनके आवास की निगरानी की जा रही है। इससे संरक्षण योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाया गया है।

भारत वैश्विक स्तर पर भी बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नेपाल, भूटान, रूस, म्यांमार और अन्य देशों के साथ सहयोग के अलावा भारत इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) और ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF) जैसी पहलों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों को मजबूत कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख संरक्षक हैं। बाघों का संरक्षण जंगलों, नदियों, जैव विविधता और लाखों लोगों की आजीविका की सुरक्षा से भी जुड़ा है। इसी उद्देश्य के साथ भारत विज्ञान आधारित संरक्षण, आधुनिक तकनीक और वैश्विक सहयोग के जरिए बाघों के सुरक्षित भविष्य की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।

’उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दिखा दुर्लभ जंगली कुत्तों (ढोल) का झुंड’

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’वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में संरक्षण प्रयासों को मिली बड़ी सफलता, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के मजबूत होने का मिला संकेत’

’अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) 2026 के कैमरा ट्रैप में पहली बार रिकॉर्ड हुआ चार ढोलों का संगठित झुंड’

रायपुर- वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) 2026 के दौरान उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में लगाए गए कैमरा ट्रैप में चार दुर्लभ भारतीय जंगली कुत्तों (ढोल) का संगठित झुंड रिकॉर्ड हुआ है। वन विभाग ने इसे जंगल के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और बेहतर वन्यजीव संरक्षण का महत्वपूर्ण संकेत बताया है।

’दुर्लभ वन्यजीव की मौजूदगी से मजबूत हुआ संरक्षण का भरोसा’

ढोल (भारतीय जंगली कुत्ता) देश के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त मांसाहारी वन्यजीवों में शामिल है। इनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि टाइगर रिजर्व में शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ी है और प्राकृतिक आवास पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हुआ है। इससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलित और स्वस्थ होने का संकेत मिलता है।

’संरक्षण के लिए उठाए गए प्रभावी कदम’

वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देश पर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इनमें वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कर प्राकृतिक स्वरूप में विकसित करना, वन्यजीव अपराधियों और शिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, एंटी-पोचिंग अभियान को मजबूत करना तथा कैमरा ट्रैप और आधुनिक तकनीक से लगातार निगरानी करना शामिल है। इन प्रयासों में स्थानीय ग्रामीणों की भी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई।

’956 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से हुई मुक्त’

वन विभाग ने रिजर्व क्षेत्र की लगभग 956 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया। इससे वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास और आवागमन के मार्ग फिर से उपलब्ध हुए। साथ ही 550 से अधिक वन्यजीव अपराधियों और अवैध शिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर वन्यजीव संरक्षण को और मजबूत किया गया।

’ढोल क्यों हैं जंगल के लिए महत्वपूर्ण’

ढोल झुंड में रहने वाले सामाजिक और अनुशासित वन्यजीव हैं। ये चीतल, सांभर और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों की संख्या को संतुलित रखते हैं, जिससे जंगल का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। यही कारण है कि इनकी मौजूदगी किसी भी वन क्षेत्र के स्वस्थ और समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है।

’जैव विविधता संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि’

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप संचालक ने बताया कि ढोल के संगठित झुंड का रिकॉर्ड होना यह प्रमाणित करता है कि रिजर्व की खाद्य-श्रृंखला मजबूत हुई है और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित वातावरण विकसित हुआ है। यह उपलब्धि वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में किए गए वैज्ञानिक प्रबंधन, कड़ी सुरक्षा और प्रभावी संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।

’वन्यजीव संरक्षण का उभरता मॉडल बन रहा छत्तीसगढ़’

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दुर्लभ वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी यह दर्शाती है कि छत्तीसगढ़ वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता संवर्धन के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। राज्य सरकार के संरक्षण प्रयासों से यह रिजर्व मध्य भारत में वन्यजीवों के सुरक्षित और समृद्ध आवास के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है।

बारनवापारा के देवपुर जंगल में दिखी दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी,वन मंत्री केदार कश्यप ने दी बधाई

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जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को मिली बड़ी सफलता

रायपुर- छत्तीसगढ़ के बारनवापारा क्षेत्र ने एक बार फिर अपनी समृद्ध जैव विविधता से प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। बलौदाबाजार वनमंडल के अंतर्गत देवपुर जंगल में आयोजित देवपुर समर कैंप 2026 के दौरान दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी (जायंट मालाबार स्क्विरल) दिखाई दी। इस दुर्लभ वन्यजीव के दिखने से वन विभाग, प्रकृति प्रेमियों और वैज्ञानिकों में उत्साह है।

वन मंत्री केदार कश्यप ने इस उपलब्धि पर वन विभाग की टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह छत्तीसगढ़ सरकार की वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन की योजनाओं का सकारात्मक परिणाम है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार जंगलों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है, जिससे दुर्लभ प्रजातियों के लिए सुरक्षित आवास विकसित हो रहे हैं।

देवपुर समर कैंप में दिखी दुर्लभ प्रजाति

बलौदाबाजार वनमंडल द्वारा 16 मई से 22 मई 2026 तक देवपुर समर कैंप का आयोजन किया गया था। कैंप के पहले दिन 16 मई को आयोजित बर्डिंग ट्रेल के दौरान इस दुर्लभ गिलहरी को देखा गया। इसकी पहचान प्रकृति प्रेमी एवं साइबर रिस्क एक्सपर्ट हेमंत वर्मा ने की।

विशाल भारतीय गिलहरी की खासियत

विशाल भारतीय गिलहरी, जिसका वैज्ञानिक नाम रेटूफा इंडिका  (Ratufa indica) है, भारत की सबसे बड़ी वृक्षवासी गिलहरियों में से एक है। इसकी पूंछ सहित लंबाई लगभग तीन फीट तक होती है। इसके शरीर पर गहरे लाल, भूरे, काले और क्रीम रंगों का सुंदर मिश्रण होता है। यह अपना अधिकांश जीवन पेड़ों पर ही बिताती है और एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लंबी छलांग लगाने में सक्षम होती है।

कानूनी संरक्षण प्राप्त दुर्लभ प्रजाति

यह प्रजाति वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-2 के तहत संरक्षित है। इसका शिकार या व्यापार करना कानूनन अपराध है। स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है। वनमंडलाधिकारी धम्मशील गणवीर ने कहा कि बारनवापारा अभ्यारण्य और आसपास का वन क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है। देवपुर जंगल में इस दुर्लभ गिलहरी का दिखना इस बात का प्रमाण है कि यहां का वन पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ और सुरक्षित है।

बच्चों में बढ़ी प्रकृति संरक्षण की जागरूकता

वनमंडलाधिकारी धम्मशील गणवीर ने बताया कि देवपुर समर कैंप का आयोजन किया गया जिसमें शामिल बच्चों और युवाओं के लिए यह अनुभव बेहद खास रहा। वन विभाग का मानना है कि ऐसे दुर्लभ वन्यजीवों के दर्शन से नई पीढ़ी में प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है। यह आयोजन राज्य सरकार की पर्यावरण संरक्षण और जन-जागरूकता आधारित योजनाओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।


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