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संयुक्त सैन्य अभ्यास 'एकुवेरिन' का 14वां संस्करण तिरुवनंतपुरम में शुरू: भारत–मालदीव रक्षा सहयोग को नई मजबूती

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भारतीय सेना और मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स (MNDF) के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘एकुवेरिन’ का 14वां संस्करण आज तिरुवनंतपुरम, केरल में आरंभ हुआ। यह अभ्यास 02 से 15 दिसंबर 2025 तक आयोजित किया जाएगा। भारतीय सेना की ओर से गढ़वाल राइफल्स बटालियन के 45 सैनिक भाग ले रहे हैं, जबकि समान संख्या में MNDF के सैनिक भी शामिल हैं।

‘एकुवेरिन’ धिवेही भाषा में ‘दोस्त’ का अर्थ रखता है, जो भारत और मालदीव के बीच गहरे मित्रतापूर्ण संबंधों, आपसी विश्वास और सैन्य सहयोग को दर्शाता है। वर्ष 2009 से यह अभ्यास बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित होता आ रहा है और यह भारत की पड़ोसी प्रथम नीति (Neighbourhood First Policy) का उत्कृष्ट उदाहरण है।

अभ्यास के प्रमुख उद्देश्य

यह दो सप्ताह लंबा प्रशिक्षण कार्यक्रम निम्नलिखित क्षेत्रों में संयुक्त क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित है:

  • जंगल, अर्ध-शहरी और तटीय क्षेत्रों में काउंटर-इंसर्जेंसी और काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशंस

  • दोनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी और ऑपरेशनल तालमेल

  • सर्वोत्तम सैन्य प्रथाओं का आदान-प्रदान

  • सामरिक अभ्यास, संयुक्त योजना और प्रशिक्षण

यह अभ्यास भारत–मालदीव के बढ़ते रक्षा सहयोग और हिंद महासागर क्षेत्र में क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के प्रति दोनों देशों की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ करता है।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने तिरुवनंतपुरम स्थित चित्रा तिरुनाल चिकित्सा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (SCTIMST) का दौरा किया

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भारत के उपराष्ट्रपति,सी. पी. राधाकृष्णन ने आज तिरुवनंतपुरम स्थित प्रतिष्ठित चित्रा तिरुनाल चिकित्सा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (SCTIMST) का दौरा किया। यह संस्थान भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है, जो चिकित्सा विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं के एकीकृत दृष्टिकोण में अपने अग्रणी योगदानों के लिए प्रसिद्ध है।

अपने दौरे के दौरान, उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने चित्रा तिरुनाल चिकित्सा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (SCTIMST) और उसके स्टार्ट-अप्स द्वारा विकसित चिकित्सा उपकरणों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। यह प्रदर्शनी अच्युत मेनन स्वास्थ्य विज्ञान अध्ययन केंद्र (AMCHSS), तिरुवनंतपुरम में आयोजित की गई थी।

संस्थान में अपने संबोधन के दौरान, उपराष्ट्रपति ने संस्थान की चिकित्सा विज्ञान और बायोमेडिकल प्रौद्योगिकी के समन्वय से राष्ट्र की सेवा के 40 वर्षों से अधिक की विरासत की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह संस्थान एक आदर्श मॉडल है, जिसकी सफलता को देश के अन्य संस्थान अपनाने की आकांक्षा रखते हैं। उन्होंने संस्थान की स्वदेशी चिकित्सा उपकरण विकास में उपलब्धियों की प्रशंसा की — जैसे कम लागत वाली चित्रा हृदय वाल्व, चित्रा ब्लड बैग, और क्षय रोग की त्वरित निदान जांच (spot diagnostic tests for TB), जिन्हें वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई है।

राधाकृष्णन ने संस्थान की पेटेंट आवेदन, डिजाइन पंजीकरण और सफल तकनीकी हस्तांतरण (technology transfer) की सराहना करते हुए कहा कि अनुसंधान और नवाचार (Research & Innovation) भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक प्रमुख स्तंभ हैं, जैसा कि “विकसित भारत @2047” की परिकल्पना में अभिव्यक्त है। उन्होंने शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे अपने अनुसंधान का दायरा बढ़ाएँ, ताकि समाज के वंचित वर्गों तक भी इसका लाभ पहुँचे और सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हो।

सी. पी. राधाकृष्णन ने हाल ही में उद्घाटित प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) के तहत निर्मित नौ-मंजिला अस्पताल ब्लॉक का भी निरीक्षण किया। उन्होंने इस नए अस्पताल भवन की सराहना की, जिसमें उच्च स्तरीय चिकित्सा अवसंरचना जैसे आधुनिक ऑपरेशन थियेटर, कैथ लैब, सीटी स्कैनर और विस्तारित आईसीयू सुविधाएँ सम्मिलित हैं।

इस अवसर पर केरल के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ अर्लेकर, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस एवं पर्यटन राज्य मंत्री सुरेश गोपी , केरल सरकार के वित्त मंत्री के. एन. बालगोपाल, SCTIMST के निदेशक डॉ. संजय बिहारी, तथा संस्थान के कुलपति, निदेशकगण और वैधानिक निकायों के सदस्य उपस्थित रहे।


नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का तिरुवनंतपुरम में सफल आयोजन

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नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” (Ease of Doing Research and Development) विषय पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन 30–31 अक्टूबर, 2025 को तिरुवनंतपुरम स्थित नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज (NCESS) में किया गया। इस दो दिवसीय परामर्श बैठक में विभिन्न संस्थानों के प्रमुखों, कुलपतियों, तथा वैज्ञानिक मंत्रालयों एवं विभागों के प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चैलपति राव, निदेशक, NCESS द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए ROPE Framework — Removing Obstacles, Promoting Enablers — का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह रूपरेखा नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष आने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान कर उन्हें दूर करना तथा सहयोग, लचीलापन और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रवीचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की प्रभावशीलता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ठोस सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का लाभ लिया जाए, University–Industry–Government (UIG) साझेदारी को मजबूत किया जाए, डेटा-साझाकरण को प्रोत्साहित किया जाए और विज्ञान संचार को अधिक सुलभ व समाज से जुड़ा बनाया जाए।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने कहा कि Ease of Doing R&D दो प्रमुख आयामों — आंतरिक और बाह्य — पर निर्भर करता है। आंतरिक आयाम संस्थानों की संरचना, शासन और कार्यप्रणाली से जुड़ा है, जबकि बाह्य आयामों में नियामक अड़चनें, वित्त पोषण तंत्र और अंतर-विभागीय समन्वय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आयामों पर समान रूप से ध्यान देना भारत को वैश्विक अनुसंधान और नवाचार नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाएगा।

बैठक में केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि Ease of Doing R&D का उद्देश्य अंततः Ease of Living यानी नागरिकों के जीवन को सरल और बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकल्याण से जोड़ना आवश्यक है और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकार के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।”

दो दिवसीय बैठक का समापन अकादमिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई विचार-विमर्श सत्रों के साथ हुआ, जिसमें भारत में एक सक्षम, कुशल और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने तिरुवनंतपुरम में “लाइब्रेरीज़ एम्पावरिंग कम्युनिटीज़ – ग्लोबल परस्पेक्टिव्स” अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित किया

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तिरुवनंतपुरम के कनक्काकुन्नू पैलेस में आज पी. एन. पनिक्कर फाउंडेशन द्वारा आयोजित “लाइब्रेरीज़ एम्पावरिंग कम्युनिटीज़ – ग्लोबल परस्पेक्टिव्स” अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित किया।

यह आयोजन केरल में संगठित पुस्तकालय आंदोलन के 80 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया जा रहा है। यह आंदोलन भारत के पुस्तकालय और साक्षरता आंदोलन के प्रणेता माने जाने वाले पी. एन. पनिक्कर की प्रेरणा से प्रारंभ हुआ था।

अपने संदेश में उपराष्ट्रपति ने पी. एन. पनिक्कर फाउंडेशन के निरंतर योगदान की सराहना की, जिसने पठन संस्कृति, डिजिटल साक्षरता और ज्ञान के प्रसार के माध्यम से समुदाय सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि फाउंडेशन का आदर्श वाक्य “वायिचु वलरुका” (पढ़ो और बढ़ो) समाज को आज भी ज्ञान और समावेशिता की दिशा में प्रेरित कर रहा है।

राधाकृष्णन ने पुस्तकालयों को “ज्ञान के मंदिर” बताया — ऐसे स्थान जो आलोचनात्मक सोच को पोषित करते हैं और व्यक्तियों व समुदायों को सशक्त बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य ने भारत भ्रमण कर आध्यात्मिक चेतना जगाई और विविध विचारों को एकीकृत किया। अनेक ऋषि-मुनियों और विचारकों ने अपने ज्ञान, करुणा और दूरदृष्टि से हमारी सभ्यता को समृद्ध किया है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा — महाकाव्यों से लेकर आधुनिक पुस्तकालयों तक — देश को निरंतर प्रबुद्धता और सामाजिक प्रगति की दिशा में प्रेरित करती रही है।

डिजिटल युग की चुनौतियों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तकालय आज भी “ज्ञान केंद्र” के रूप में कार्य कर रहे हैं — जो प्रामाणिक जानकारी तक पहुँच सुनिश्चित करते हैं और गलत सूचनाओं का मुकाबला करते हैं। जहाँ तकनीक सूचनाओं की आसान पहुँच देती है, वहीं पुस्तकालय गहराई, चिंतन और सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करते हैं।

उन्होंने केरल की शिक्षा और साक्षरता की विशिष्ट परंपरा की भी सराहना की और श्री पी. एन. पनिक्कर को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनकी दृष्टि ने पुस्तकालयों को सक्रिय सामुदायिक केंद्रों के रूप में विकसित किया।

अंत में उपराष्ट्रपति ने कहा कि पुस्तकालय गतिशील ज्ञान, समावेशन और नवाचार के केंद्र हैं। उन्होंने पूरे देश में सार्वजनिक और सामुदायिक पुस्तकालयों के नेटवर्क को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि लोगों को ज्ञान के माध्यम से सशक्त किया जा सके।

सम्मेलन के बारे में:

“लाइब्रेरीज़ एम्पावरिंग कम्युनिटीज़ – ग्लोबल परस्पेक्टिव्स” विषय पर यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन पी. एन. पनिक्कर फाउंडेशन द्वारा 2 से 3 नवम्बर, 2025 तक तिरुवनंतपुरम के कनक्काकुन्नू पैलेस में आयोजित किया जा रहा है। इसमें विशेषज्ञ, नीति-निर्माता, पुस्तकालय पेशेवर, शिक्षाविद और डिजिटल नवाचारक शामिल हो रहे हैं।

सम्मेलन का उद्देश्य केरल के पुस्तकालय आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत का उत्सव मनाना और सामुदायिक भागीदारी, डिजिटल पहुँच तथा सतत ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने की रणनीतियों पर विचार करना है।

नीति आयोग द्वारा तिरुवनंतपुरम में “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का सफल आयोजन

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“अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन नीति आयोग द्वारा राष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान अध्ययन केंद्र (NCESS), तिरुवनंतपुरम में 30–31 अक्टूबर 2025 को किया गया। इस परामर्श बैठक में संस्थागत प्रमुखों, कुलपतियों तथा विभिन्न वैज्ञानिक मंत्रालयों और विभागों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चेलापथी राव, निदेशक, NCESS के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सक्षम वातावरण की आवश्यकता पर जोर दिया और यह रेखांकित किया कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग, ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की और ROPE Framework – Removing Obstacles, Promoting Enablers का परिचय दिया, जो नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है। उन्होंने बताया कि इस रूपरेखा का उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान करना तथा उन्हें कम करने के लिए लचीलापन, अंतःसंस्थागत सहयोग और क्षमता वृद्धि जैसे सहायक तंत्रों को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रविचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की दक्षता और प्रभाव बढ़ाने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का उपयोग करने, विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार (UIG) पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने, संस्थानों के बीच डेटा साझाकरण को प्रोत्साहित करने और विज्ञान संचार को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि अनुसंधान के परिणाम समाज के लिए अधिक प्रासंगिक बन सकें।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने अपने संबोधन में कहा कि “Ease of Doing R&D” दो प्रमुख तत्वों — आंतरिक और बाह्य कारकों — पर निर्भर करता है। आंतरिक कारक संस्थानों की संरचना, प्रशासन और कार्यप्रणाली से संबंधित हैं, जबकि बाह्य कारक नियामक अवरोधों, वित्त पोषण तंत्र और अंतःक्षेत्रीय समन्वय से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि भारत को अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करने के लिए इन दोनों पहलुओं को समानांतर रूप से संबोधित करना आवश्यक है।

इस बैठक में केरल के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “Ease of Doing R&D” सीधे तौर पर नागरिकों के “Ease of Living” से जुड़ा हुआ है। उन्होंने रेखांकित किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकेंद्रित विकास के साथ संरेखित होना चाहिए और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकारों के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का आधार है,” और क्षेत्रीय स्तर पर नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

दो दिवसीय इस बैठक का समापन शैक्षणिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई संवादात्मक चर्चाओं और परामर्शों के साथ हुआ, जिसमें सभी ने मिलकर भारत में एक सक्षम, प्रभावी और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए अपने सामूहिक संकल्प को दोहराया।

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