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भारत की ब्लू इकॉनमी को नई उड़ान: अंडमान सागर में देश की पहली ओपन-सी मरीन फिश फार्मिंग परियोजना का शुभारंभ

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डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज अंडमान सागर से भारत की पहली ओपन-सी मरीन फिश फार्मिंग परियोजना का शुभारंभ किया। यह परियोजना अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के नॉर्थ बे, विजयपुरम में खुले समुद्र में आयोजित एक फील्ड कार्यक्रम के दौरान लॉन्च की गई।

इस अवसर पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा परिकल्पित ब्लू इकॉनमी को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम है। उन्होंने कहा कि भारत के महासागर, हिमालय और मुख्य भूमि संसाधनों की तरह ही अपार आर्थिक संभावनाओं से भरपूर हैं, लेकिन दशकों तक इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

मंत्री ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद लगभग 70 वर्षों तक भारत के समुद्री संसाधन largely अनछुए रहे, लेकिन वर्ष 2014 के बाद राष्ट्रीय सोच में एक बुनियादी परिवर्तन आया है। अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि भारत का समुद्री क्षेत्र भी आर्थिक विकास के समान अवसर प्रदान करता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत के पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी समुद्री तटों की अपनी-अपनी विशिष्टताएं हैं, जो देश के विकास में अलग-अलग योगदान दे सकती हैं।

यह परियोजना पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, उसकी तकनीकी इकाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (NIOT) तथा अंडमान एवं निकोबार प्रशासन के सहयोग से क्रियान्वित की जा रही है। पायलट परियोजना के अंतर्गत खुले समुद्र की प्राकृतिक परिस्थितियों में मरीन फिनफिश और समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती की जा रही है, जिससे वैज्ञानिक नवाचार के साथ-साथ स्थानीय आजीविका को भी बढ़ावा मिलेगा।

फील्ड विजिट के दौरान दो प्रमुख आजीविका आधारित पहलें शुरू की गईं। समुद्री वनस्पति घटक के तहत स्थानीय मछुआरा समुदायों को खुले समुद्र में सीवीड खेती के लिए बीज प्रदान किए गए। वहीं समुद्री जीव घटक के अंतर्गत फिनफिश के बीज वितरित किए गए, जिन्हें NIOT द्वारा विकसित विशेष ओपन-सी केज सिस्टम के माध्यम से पाला जाएगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि फिलहाल ये परियोजनाएं सरकारी सहयोग से संचालित की जा रही हैं, लेकिन भविष्य में इनके अनुभव और व्यवहार्यता के आधार पर पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के माध्यम से इन्हें बड़े स्तर पर विस्तारित किया जा सकता है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और भारत की ब्लू इकॉनमी को मजबूती मिलेगी।

अपने दौरे के दौरान मंत्री ने वांडूर के पास स्थित महात्मा गांधी मरीन नेशनल पार्क का भी भ्रमण किया। वर्ष 1983 में स्थापित यह देश के पहले समुद्री पार्कों में से एक है, जो 15 द्वीपों में फैला हुआ है। यहां उन्होंने प्रवाल भित्तियों, मैंग्रोव, कछुओं और विविध समुद्री जीवों से युक्त समृद्ध और आत्मनिर्भर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का अवलोकन किया।

नॉर्थ बे से इस परियोजना का शुभारंभ इस बात का प्रतीक है कि भारत सरकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सीधे जमीनी स्तर तक ले जाकर तटीय और द्वीपीय समुदायों को देश के महासागर-आधारित आर्थिक विकास का सक्रिय भागीदार बना रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किए तीन क्रांतिकारी स्वदेशी नवाचार — QSIP, क्वांटम चिप और CAR-T सेल थेरेपी

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माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को भेंट की तीन अभूतपूर्व नवाचार उपलब्धियां — QSIP: भारत की अपनी क्वांटम सुरक्षा चिप, 25-क्यूबिट QPU: भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग चिप और CAR-T सेल थेरेपी: भारत की पहली स्वदेशी कैंसर सेल थेरेपी

चल रहे Emerging Science, Technology & Innovation Conclave (ESTIC 2025) के दौरान माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को तीन ऐतिहासिक नवाचार उपलब्धियां समर्पित कीं —

  1. QSIP (Quantum Security in Package) : भारत की अपनी क्वांटम सुरक्षा चिप।
  2. 25-क्यूबिट QPU (Quantum Processing Unit) : भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग चिप, जो भविष्य की कंप्यूटेशन शक्ति का प्रतीक है।
  3. CAR-T सेल थेरेपी : भारत की पहली स्वदेशी कैंसर सेल थेरेपी, जिसे भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किया है।

इनमें से NexCAR19, जो विश्व की पहली humanised CAR-T therapy है, भारत में ImmunoACT द्वारा विकसित की गई है — यह वास्तव में “Made in India, for the World” नवाचार का उदाहरण है। इस परियोजना को Department of Biotechnology (DBT) और BIRAC द्वारा समर्थन प्राप्त हुआ है।

CAR-T सेल थेरेपी (Chimeric Antigen Receptor T-cell therapy) कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति बनकर उभरी है। विश्वभर में किए गए क्लिनिकल ट्रायल्स ने दर्शाया है कि यह थेरेपी Acute Lymphocytic Leukemia जैसे गंभीर कैंसर रोगियों में अत्यंत प्रभावी साबित हुई है।

NexCAR19, भारत की पहली living drug, ने जीन थेरेपी को न केवल किफायती बल्कि सुलभ भी बनाया है, जबकि वैज्ञानिक गुणवत्ता और रोगी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया गया है।

ImmunoACT, जो IIT बॉम्बे की एक स्पिन-ऑफ स्टार्टअप है, को BIRAC के BioNest Initiative के तहत वित्तीय सहायता, मार्गदर्शन और संसाधन प्रदान किए गए, जब यह Society for Innovation and Entrepreneurship (SINE), IIT बॉम्बे के Technology Business Incubator में इनक्यूबेट की जा रही थी।

वर्ष 2021 में, भारत की पहली CAR-T थेरेपी के Lentivirus manufacturing और clinical trial के लिए DBT और BIRAC ने National Biopharma Mission के तहत आंशिक सहायता प्रदान की। यह परीक्षण ACTREC Centre, टाटा मेमोरियल अस्पताल में TMC-IIT Bombay Team द्वारा किया गया, जिसमें ImmunoACT निर्माण भागीदार के रूप में कार्यरत है।

हाल ही में, DBT ने BioE3 Policy के तहत Biomanufacturing initiative के माध्यम से ImmunoACT को 200-लीटर GMP lentiviral vector and plasmid प्लेटफॉर्म स्थापित करने हेतु वित्त पोषण प्रदान किया है। इस प्लेटफॉर्म से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और थेरेपी की लागत कम होगी। अनुमान है कि यह GMP ग्रेड gene delivery vector प्रति वर्ष कम से कम 1000 रोगियों की मदद कर सकेगा।

DBT प्रारंभिक एवं उन्नत translational research को भी बढ़ावा दे रहा है ताकि देश में CAR-T आधारित थेरेप्यूटिक्स विकसित कर विभिन्न प्रकार के कैंसर जैसे Multiple Myeloma (MM), Acute Lymphocytic Leukemia, B-cell Acute Lymphoblastic Leukemia, glioblastoma आदि का उपचार किया जा सके।

यह पहल भारत को कैंसर उपचार में आत्मनिर्भर और वैश्विक अग्रणी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का तिरुवनंतपुरम में सफल आयोजन

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नीति आयोग द्वारा “अनुसंधान एवं विकास को सुगम बनाने” (Ease of Doing Research and Development) विषय पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन 30–31 अक्टूबर, 2025 को तिरुवनंतपुरम स्थित नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज (NCESS) में किया गया। इस दो दिवसीय परामर्श बैठक में विभिन्न संस्थानों के प्रमुखों, कुलपतियों, तथा वैज्ञानिक मंत्रालयों एवं विभागों के प्रतिनिधियों ने भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक की शुरुआत प्रो. एन. वी. चैलपति राव, निदेशक, NCESS द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुई। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान नवाचार-आधारित विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके बाद प्रो. विवेक कुमार सिंह, नीति आयोग ने बैठक की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए ROPE Framework — Removing Obstacles, Promoting Enablers — का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह रूपरेखा नीति आयोग की “Ease of Doing R&D” पहल का मार्गदर्शक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष आने वाली संस्थागत और नीतिगत चुनौतियों की पहचान कर उन्हें दूर करना तथा सहयोग, लचीलापन और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना है।

डॉ. एम. रवीचंद्रन, सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने अनुसंधान की प्रभावशीलता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ठोस सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों के अनुभव का लाभ लिया जाए, University–Industry–Government (UIG) साझेदारी को मजबूत किया जाए, डेटा-साझाकरण को प्रोत्साहित किया जाए और विज्ञान संचार को अधिक सुलभ व समाज से जुड़ा बनाया जाए।

डॉ. वी. के. सारस्वत, सदस्य, नीति आयोग ने कहा कि Ease of Doing R&D दो प्रमुख आयामों — आंतरिक और बाह्य — पर निर्भर करता है। आंतरिक आयाम संस्थानों की संरचना, शासन और कार्यप्रणाली से जुड़ा है, जबकि बाह्य आयामों में नियामक अड़चनें, वित्त पोषण तंत्र और अंतर-विभागीय समन्वय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आयामों पर समान रूप से ध्यान देना भारत को वैश्विक अनुसंधान और नवाचार नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाएगा।

बैठक में केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि Ease of Doing R&D का उद्देश्य अंततः Ease of Living यानी नागरिकों के जीवन को सरल और बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनकल्याण से जोड़ना आवश्यक है और संस्थानों, उद्योगों तथा सरकार के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि “राज्य का विकास ही राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।”

दो दिवसीय बैठक का समापन अकादमिक संस्थानों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई विचार-विमर्श सत्रों के साथ हुआ, जिसमें भारत में एक सक्षम, कुशल और सहयोगात्मक R&D पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई।

अब समुद्र से मिलेगा पीने का पानी!

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 नया साइफ़न-आधारित थर्मल डीसैलिनेशन सिस्टम : खारे समुद्र के पानी से सस्ता और तेज़ पीने का पानी

एक नया साइफ़न-आधारित थर्मल डीसैलिनेशन सिस्टम अब खारे समुद्री पानी को पीने योग्य मीठे पानी में बदल सकता है—मौजूदा तरीकों की तुलना में तेज़, सस्ता और अधिक भरोसेमंद।

पारंपरिक सोलर स्टिल्स जो प्रकृति के जलचक्र की नकल करते हैं, लंबे समय से जल शोधन के सरल उपकरण माने जाते रहे हैं। लेकिन इनमें दो प्रमुख चुनौतियाँ आती हैं:

  • नमक जमना – वाष्पीकरण सतह पर परत जम जाती है, जिससे जल प्रवाह रुक जाता है।

  • सीमा बाधाएँ – विकिंग (wicking) सामग्री पानी को केवल 10–15 सेमी तक ही खींच सकती है, जिससे उत्पादन सीमित रहता है।

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के शोधकर्ताओं ने इन दोनों चुनौतियों को एक सरल सिद्धांत—साइफ़न प्रक्रिया (siphonage)—से हल किया है।

कैसे काम करता है यह सिस्टम?

सिस्टम के केंद्र में है एक कंपोज़िट साइफ़न:

  • कपड़े की विक सतत रूप से खारे पानी को खींचती है।

  • गुरुत्वाकर्षण पानी को निरंतर प्रवाहित करता है।

  • नमक जमने से पहले ही बहकर निकल जाता है, जिससे सतह साफ़ रहती है।

खारा पानी एक गर्म धातु सतह पर पतली परत में फैलता है, वाष्पित होता है और पास ही ठंडी सतह पर (सिर्फ़ 2 मिमी की दूरी पर) संघनित होकर मीठे पानी में बदल जाता है। यह अत्यंत संकीर्ण एयर-गैप दक्षता को बढ़ाता है और सूर्य की रोशनी में प्रति वर्ग मीटर प्रति घंटे 6 लीटर से अधिक साफ़ पानी उपलब्ध कराता है—जो पारंपरिक सोलर स्टिल्स से कई गुना अधिक है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • बहु-स्तरीय डिज़ाइन: गर्मी का पुन: उपयोग करके अधिकतम उत्पादन।

  • कम लागत और टिकाऊ: केवल एल्युमिनियम और कपड़े जैसे साधारण पदार्थों से निर्मित।

  • ऊर्जा लचीला: सौर ऊर्जा या अपशिष्ट ऊष्मा से संचालित।

  • नमक प्रतिरोधी: 20% तक खारे पानी को भी बिना अवरुद्ध हुए शुद्ध कर सकता है।

संभावित उपयोग

  • दूरदराज़ और ऑफ-ग्रिड समुदाय

  • आपदा प्रभावित क्षेत्र

  • शुष्क तटीय इलाके

  • द्वीप देश

यह शोध पत्रिका Desalination में प्रकाशित हुआ है और भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा समर्थित है।

शोधकर्ताओं के शब्दों में, यह तकनीक है—“स्केलेबिलिटी, नमक-प्रतिरोध और सरलता”—एक प्यासे विश्व के लिए समाधान।


चंडीगढ़ में इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल 2025 की तैयारियों की समीक्षा

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यहाँ आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी; पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने चंडीगढ़ में होने वाले इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF) 2025 की तैयारियों की समीक्षा की। यह महोत्सव पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित किया जाएगा।

बैठक के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने लॉजिस्टिक योजनाओं, प्रदर्शनी लेआउट और विभिन्न एजेंसियों के कार्यक्रम एकीकरण की समीक्षा की और सभी विभागों को निर्देश दिया कि वे विद्यालयों और अभिभावकों को लक्षित करते हुए सतत जन-जागरूकता अभियान चलाएँ, ताकि महोत्सव में अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी संबद्ध मंत्रालयों को हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन के साथ मिलकर स्कूल विज्ञान मेले, मोबाइल प्रदर्शनी, क्षेत्रीय रोड शो और स्थानीय मीडिया प्रचार जैसे कार्यक्रम पहले से शुरू करने होंगे।

तैयारियों के हिस्से के रूप में मंत्री ने नोडल विभाग को प्रत्येक जिले में “विज्ञान संचार केंद्र” (Science Communication Hubs) स्थापित करने और युवा एंबेसडरों को नियुक्त कर शहर के सार्वजनिक स्थलों पर प्रारंभिक टीज़र इंस्टॉलेशन लगाने का निर्देश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि स्टार्टअप बूथ और नागरिक-विज्ञान प्रदर्शनी को महोत्सव स्थल के डिज़ाइन में शामिल किया जाए, जिसमें छात्र नवाचार क्षेत्र, इंटरैक्टिव प्रदर्शनी और जन-भागीदारी ट्रैक भी हों।

डॉ. सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि स्टार्टअप्स को केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि महोत्सव के मुख्य आकर्षण के रूप में प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने विज्ञान सचिवों से शीघ्र स्वीकृतियाँ, मंत्रालयों के बीच समन्वय और मीडिया साझेदारियाँ सुनिश्चित करने का आग्रह किया, ताकि कार्यक्रम का सफल आयोजन हो सके।

बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि यह महोत्सव केवल वैज्ञानिक प्रगति का प्रदर्शन भर न होकर एक भागीदारीपूर्ण जन-उत्सव बने, जो विज्ञान, छात्रों और समाज के बीच सेतु का काम करे। जागरूकता अभियानों पर जोर इस बात का संकेत है कि केंद्र सरकार इस बार इसे आमजन, विशेषकर स्कूली बच्चों और अभिभावकों के लिए भी एक अनिवार्य आयोजन बनाने को प्रतिबद्ध है।

बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो IISF देश के सबसे बड़े विज्ञान जन-जागरूकता मंचों में से एक बन चुका है, जिसमें प्रदर्शनी, युवा मंच, स्टार्टअप मंडप और इंटरैक्टिव साइंस थियेटर जैसे कार्यक्रमों का समावेश है। चंडीगढ़ में होने वाला 2025 का आयोजन तभी सफल होगा जब प्रदर्शनी के साथ-साथ जमीनी स्तर पर जागरूकता और स्कूल समुदाय की भागीदारी भी सुनिश्चित हो।

बैठक में उपस्थित प्रमुख अधिकारियों में प्रो. अजय कुमार सूद (भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार), डॉ. एम. रविचंद्रन (सचिव, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय), डॉ. अजीत कुमार मोहंती (सचिव, परमाणु ऊर्जा विभाग), प्रो. अभय करंदीकर (सचिव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग), डॉ. राजेश गोखले (सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग) और डॉ. एन. कलैसेल्वी (सचिव, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग और महानिदेशक, सीएसआईआर) शामिल थे। विज्ञान भारती के प्रतिनिधि भी बैठक में उपस्थित रहे।


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