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छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय आम महोत्सव का शुभारंभ, मैंगो टूरिज्म और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा पर जोर

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भारतीय संस्कृति, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है आम 

छत्तीसगढ़ में मैंगों टूरिज्म की है अपार संभावनाएं - रमेन डेका

रायपुर- आम केवल एक फल नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। किसानों को पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाकर आम उत्पादों को बडे रूप में विकसित करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

राज्यपाल रमेन डेका आज इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में आयोजित राष्ट्रीय आम महोत्सव के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने की।

राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि भारत विश्व में आम उत्पादन में अग्रणी है और देश में एक हजार से अधिक किस्मों के आम पाए जाते है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के स्थानीय आमों की विशेषताओें का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश के किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के उत्पादन से अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए।

राज्यपाल ने कहा कि इस प्रकार की प्रदर्शनियां और महोत्सव देश के विभिन्न राज्यों से आए आम उत्पादकों को एक-दूसरे की उन्नत खेती पद्धतियों, नई किस्मों और नवाचारों की जानकारी प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि बस्तर, कोण्डागांव, कांकेर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में आम उत्पादन की बहुत संभावनाएं है। महिला स्व-सहायता समूहों के लिए भी इस क्षेत्र में रोजगार और उद्यमिता के व्यापक अवसर मौजूद है। मैंगों टूरिज्म की भी छत्तीसगढ़ में अपार संभावनाएं है।

राज्यपाल ने कहा कि आम उत्पादन के साथ-साथ इसके वैल्यू एडिशन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम को मिलकर कार्य करना चाहिए। डेका ने कहा कि हमारे जीवन को ईको फैंडली बनाना आज की आवश्यकता है। जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उपायों को अपनाना होगा। उन्होंने एक पेड़ मां के नाम पर लगाने और रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर विशेष जोर दिया। 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि आम फलों का राजा है। आम की पत्तियों और लकड़ियों का भी हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व है। हमारे घरों में मांगलिक कार्य होने पर हम आम की पत्तियों से तोरण बनाते है एवं आम की सूखी लकड़ियों का उपयोग हवन एवं पूजा में करते है।

इस महोत्सव में 250 से अधिक किस्मों के आम प्रदर्शित किए गए है। मुख्यमंत्री साय ने प्रदेशवासियोें को इस महोत्सव का लाभ लेने हेतु प्रेरित किया। प्रदर्शनी मे बेर के आकार से लेकर बीजापुर के हाथीझुल जैसे बड़े किस्मों के आम भी उपलब्ध है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी के मंशानुरूप किसानों की आय दुगुनी करने के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है और आम की खेती भी इस संकल्प को पूरा करने के लिए सहायक सिद्ध होगी।

आम महोत्सव के उद्घाटन पश्चात राज्यपाल डेका और मुख्यमंत्री साय ने आम उत्पादकों द्वारा लगाए गए प्रदर्शनी में आम के विभिन्न किस्मों का अवलोकन किया । 

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष चंद्रहास चंद्राकर, छत्तीसगढ़ राज्य कृषक कल्याण परिषद के अध्यक्ष सुरेश चंद्रवंशी एवं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल, निदेशक अनुसंधान सेवाएं डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी सहित अन्य विश्वविद्यालयों के कुलपति, अधिष्ठाता, प्राध्यापकगण, किसान एवं बड़ी संख्या में दर्शकगण उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय करेंगे 515 नई पैक्स समितियों का कल करेंगें वर्चुअल शुभारंभ

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सहकारिता से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था- मंत्री केदार कश्यप

रायपुर- छत्तीसगढ़ में सहकारिता को नई दिशा देने और किसानों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सहकारिता विभाग द्वारा 515 नई प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों (पैक्स) का गठन किया गया है। इन समितियों का वर्चुअल शुभारंभ कल 15 अप्रैल को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा मंत्रालय महानदी भवन, नवा रायपुर अटलनगर से किया जाएगा।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे, जबकि सहकारिता मंत्री केदार कश्यप कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। कार्यक्रम का शुभारंभ सहकारिता विभाग के सचिव डॉ. सी.आर. प्रसन्ना के स्वागत उद्बोधन से होगा एवं अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए सहकारिता मंत्री केदार कश्यप प्रदेश में सहकारिता विस्तार की रूपरेखा एवं उसके लाभों पर प्रकाश डालेंगे।

सहकारिता मंत्री केदार कश्यप ने कहा है कि नई पैक्स समितियों के गठन से किसानों को ऋण, खाद, बीज तथा अन्य कृषि सुविधाएं अब स्थानीय स्तर पर सहज रूप से उपलब्ध होंगी। इससे हमारे अन्नदाता किसानों को अब दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और समय व संसाधनों की बचत भी होगी। साथ ही किसानों को शासकीय योजनाओं का सीधा लाभ मिल सकेगा। उन्होंने बताया कि इस पहल से शासकीय योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा तथा उनका लाभ सीधे ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचेगा। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और गांवों के समग्र विकास को गति मिलेगी। सहकारिता मंत्री श्री कश्यप ने कहा कि केंद्र सरकार की यह पहल छत्तीसगढ़ में सहकारिता तंत्र को सुदृढ़ करते हुए आत्मनिर्भर ग्रामीण-अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपने उद्बोधन में राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों और सहकारिता आधारित विकास मॉडल को रेखांकित करेंगे। छतीसगढ़ के सहकारी जनप्रतिनिधिगण, अपेक्स बैंक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, पैक्स सोसाइटी के प्रतिनिधि, सहकारिता विभाग के सम्भागीय संयुक्त पंजीयक, जिला उप पंजीयक तथा सहायक पंजीयक, अपेक्स बैंक व जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के अधिकारीगण वर्चुअल रूप से सीधे शुभारंभ कार्यक्रम से जुड़ेंगे।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संकल्पना को साकार करने सहकार से समृद्धि की पहल अंतर्गत छत्तीसगढ़ में 515 नवीन पैक्स का गठन किया गया है। केंद्रीय गृह व सहकारिता मंत्री अमित शाह तथा मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ में सहकारिता की योजनाओं को अधिक सुगमता से लोगों में पहुँचाने के लिए बहुउद्देश्यीय पैक्स सोसायटी का पुनर्गठन किया गया है। प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति (पैक्स) का पुनर्गठन कर नवीन 515 पैक्स बनाये गए हैं। यह 515 पैक्स में बहुउद्देश्यीय सेवाएं दी जाएगी। 2058 बहुउद्देशीय पैक्स एवं नवीन गठित 515 पैक्स को मिलाकर छत्तीसगढ़ में कुल 2573 पैक्स सोसायटी हो जाएंगे।

स्पेशल स्टोरी-छत्तीसगढ़ में मखाना उत्पादन को प्रोत्साहन,योजना का तेजी के साथ हो रहा है क्रियान्वयन

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धमतरी, बालोद, महासमुंद और गरियाबंद जिलों में शुरू हुई मखाना विकास योजना, 178 लाख की राशि स्वीकृत

रायपुर- छत्तीसगढ़ में पारंपरिक फसलों के साथ अब किसान नकदी फसलों की ओर भी तेजी से रुख कर रहे हैं l इसी कड़ी में मखाना की खेती किसानों के लिए एक नया और लाभकारी विकल्प बनकर सामने आ रही है l

छत्तीसगढ़ राज्य में मखाना उत्पादन की अपार संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए केन्द्र सरकार की सेंट्रल सेक्टर स्कीम फॉर डेवलपमेंट ऑफ मखाना का क्रियान्वयन तेजी के साथ किया जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा राज्य को राष्ट्रीय मखाना बोर्ड में शामिल करने की ऐतिहासिक घोषणा के उपरांत राज्य में मखाना की खेती एवं प्रसंस्करण कार्य की गतिविधियों में तेजी आई है l

उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि राज्य में वर्ष 2025-26 से उक्त योजना का क्रियान्वयन प्रारंभ किया गया है। इसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य के लिए 178 लाख 11 हजार  रूपए की स्वीकृति प्राप्त हुई है। योजना के क्रियान्वयन हेतु धमतरी, बालोद, महासमुंद एवं गरियाबंद जिलों का चयन किया गया है।

मखाना की बाजार में अच्छी मांग

मखाना की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसान अगर केवल कच्चे बीज न बेचकर, बीज को प्रोसेस कर मखाना बनाकर बाजार में बेचें, तो उन्हें कहीं अधिक लाभ मिलता है l बीज को सुखाकर, भूनकर और प्रोसेस कर मखाना तैयार किया जाता है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है 

मखाना उत्पादन में कृषकों की रुचि 

योजना अंतर्गत मखाना उत्पादन एवं मखाना बीज उत्पादन की गतिविधियाँ प्रस्तावित हैं। कृषकों के पूर्व से निर्मित तालाबों में 96.438 हेक्टेयर तथा किसानों की भूमि पर 37.424 हेक्टेयर, इस कुल 133.862 हेक्टेयर क्षेत्र में मखाना उत्पादन किया जाएगा। साथ ही कृषि एवं उद्यानिकी विश्वविद्यालय तथा विभागीय रोपणियों में 15 हेक्टेयर क्षेत्र में बीज उत्पादन कार्यक्रम संचालित किया जाएगा।

मखाना उत्पादन में धमतरी जिले के 43 कृषक सम्मिलित

वर्तमान में धमतरी जिले में महिला स्व-सहायता समूहों का चयन कर मखाना उत्पादन प्रारंभ कर दिया गया है। इनमें शैल पुत्री स्व-सहायता समूह, नई किरण स्व-सहायता समूह, जय माँ नव ज्योति महिला स्व-सहायता समूह एवं प्रगतिशील कृषक समूह प्रमुख हैं। जिले में 55 एकड़ क्षेत्र में तालाबों में मखाना बीज की बुवाई पूर्ण की जा चुकी है तथा 15 एकड़ में तैयारी प्रारंभ है, जिसमें 43 कृषक सम्मिलित हैं। भूमि पर मखाना उत्पादन हेतु चयनित 55 एकड़ क्षेत्र में भी बुवाई की तैयारी प्रारंभ की गई है, जिसमें 20 कृषक शामिल हैं।

2026-27 हेतु रुपये 2 करोड़ रूपए की कार्ययोजना प्रस्तावित

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2026-27 हेतु रुपये 2 करोड़ रूपए की कार्ययोजना प्रस्तावित की गई है, जिसके अंतर्गत 75 हेक्टेयर में तालाबों में तथा 30 हेक्टेयर भूमि पर मखाना उत्पादन, 10 नवीन तालाबों का निर्माण तथा 5 हेक्टेयर में अतिरिक्त मखाना उत्पादन प्रस्तावित है।

मखाना उत्पादन के लिए किसानों को प्रशिक्षण

पिछले पांच वर्षों से मखाना की खेती कर रही ओजस फार्म की संचालक मनीषा चंद्राकर ने बताया कि छत्तीसगढ़ की जलवायु एवं मिट्टी मखाना उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है। राज्य में सर्वप्रथम आरंग विकासखंड के ग्राम लिंगाडीह में स्वर्गीय कृष्ण कुमार चंद्राकर द्वारा व्यावसायिक मखाना उत्पादन प्रारंभ किया गया था तथा दिसंबर 2021 में पहला मखाना प्रसंस्करण केंद्र स्थापित हुआ। वर्तमान में उनकी संस्था न केवल उत्पादन एवं प्रसंस्करण कर रही है, बल्कि राज्य एवं राज्य के बाहर के किसानों को प्रशिक्षण भी प्रदान कर रही है।

स्वयं उत्पादन कर प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग करने पर अधिकतम लाभ

मनीषा चंद्राकर ने बताया कि एक किलोग्राम मखाना बीज से लगभग 200 से 250 ग्राम पॉप प्राप्त होता है, जिसकी कीमत 700 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है। यदि किसान स्वयं उत्पादन कर प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग करता है, तो प्रति एकड़ अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

सहकारिता से आत्मनिर्भरता की ओर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा

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साल 2025 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया गया है।जिसका मुख्य उद्देश्य "सहकारिताएँ एक बेहतर दुनिया का निर्माण करती हैं" (Cooperatives Build a Better World) है, और यह वर्ष गरीबी उन्मूलन, समावेशी विकास और संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में सहकारी समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है l

भारत सरकार ने सहकारिता आंदोलन को गांव-गांव तक पहुँचाने के लिए वर्ष 2021 में स्वतंत्र सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में देश के हर ग्राम पंचायत तक सहकारी समितियों का विस्तार किया जा रहा है, ताकि किसानों, पशुपालकों और ग्रामीणों को सहकारिता से लाभ मिल सके। सहकारिता के माध्यम से एक बेहतर और समृद्ध ग्रामीणों का निर्माण करना है।

छत्तीसगढ़ में सहकारिता का प्रसार

छत्तीसगढ में 6063 सहकारी समितियाँ कार्यरत

छत्तीसगढ़ राज्य में कुल 11,650 ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें 2,058 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियाँ (पैक्स), 1,949 दुग्ध, 1,002 मत्स्य और 1,054 लघु वनोपज सहकारी समितियाँ कार्यरत हैं। 

760 नई समितियाँ गठित

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और सहकारिता मंत्री केदार कश्यप के निर्देश पर अब तक छत्तीसगढ़ में 310 मत्स्य, 297 दुग्ध और 153 लघु वनोपज समितियाँ नई गठित की जा चुकी हैं।

सहकारिता के माध्यम से रोजगार और सशक्तिकरण

राज्य गठन के समय केवल 1,333 सहकारी समितियाँ सक्रिय थीं, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 2573 हो गई है। किसानों को ऋण, बीज, खाद, कीटनाशक और विपणन की सुविधा सुगमता से उपलब्ध हो रही है।

राज्य में 515 नई प्राथमिक कृषि साख समितियाँ भी शामिल हैं। छत्तीसगढ़ में सहकारी समितियों के कुल सदस्य अब 30.26 लाख हैं, जिनमें से 19.38 लाख किसान क्रेडिट कार्ड धारक हैं।

राज्य में सहकारी केंद्रीय बैंक की 345 शाखाएँ संचालित

कृषि ऋण और वित्तीय सुदृढ़ता

राज्य में 6 जिला सहकारी केंद्रीय बैंक हैं, जिनकी 345 शाखाएँ संचालित हो रही हैं। इनमें से 262 शाखाएँ कम्प्यूटरीकृत हैं। राज्य के 2058 पैक्स समितियों में प्रधानमंत्री किसान सेवा केंद्र भी स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र किसानों को खाद, बीज, कीटनाशक, कृषि उपकरण और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं।

किसानों के लिए 5 लाख रुपए तक ब्याज मुक्त आसान कृषि ऋण की सुविधा

राज्य सरकार और नाबार्ड के सहयोग से किसानों को सस्ती ब्याज दर पर अल्पकालीन ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। सहकारी बैंकों के माध्यम से किसानों को 5 लाख रुपए तक का कृषि ऋण शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर दिया जा रहा है।

पशुपालन, मत्स्य पालन और लघु उद्योगों के लिए भी 1% से 3% ब्याज दर पर ऋण सुविधा दी जा रही है। वर्ष 2025-26 में अब तक 15.56 लाख किसानों को 6,936 करोड़ रुपए का कृषि ऋण वितरित किया जा चुका है।

डिजिटलीकरण और पारदर्शिता

राज्य में सहकारी समितियों के डिजिटलीकरण का कार्य वर्ष 2022-23 से आरंभ हुआ। अब तक 2,028 समितियाँ ई-पैक्स मोड में परिवर्तित की जा चुकी हैं। डिजिटलीकरण से किसानों के खाते, ऋण विवरण और ब्याज गणना पारदर्शी और रियल टाइम हो गए हैं।

धान खरीद और किसानों को लाभ

वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य सरकार द्वारा 25 लाख किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कुल 149 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई। इसके लिए 34,349 करोड़ रुपए की राशि किसानों के बैंक खातों में सीधे जमा की गई।

इसके अलावा, मुख्यमंत्री किसान उन्नति योजना के तहत 11,928.59 करोड़ रुपए की राशि किसानों के खातों में सीधे हस्तांतरित की गई। कुल 46276 करोड़ रुपए किसानों के खाते में अंतरित किया गया।

धान खरीदी (खरीफ विपणन) वर्ष 2025-26 के  तहत दिनांक 12 दिसंबर 2025 तक 6.94 लाख किसानों से 35.43 लाख मेट्रिक टन धान की खरीदी समितियों के माध्यम से किया जा चुका है, जिसकी लगभग राशि  7201 करोड़ रुपए का भुगतान किसानों को खरीदी के 48 घंटे के अंदर भुगतान किया गया है।  इस वर्ष एग्रीस्टेग से पंजीकृत किसान से  धान खरीदी की जा रही है। एग्रीस्टेग पोर्टल के पंजीकृत किसानों को संख्या 26.86 लाख है।

एग्रीस्टेग पोर्टल के माध्यम से किसान आईडी (Farmer ID) के ज़रिए भूमि, फसल, बैंक, बीमा और योजनाओं से जुड़ी सभी जानकारी एक जगह होती है, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे, बिचौलियों को हटाया जा सके और डेटा-आधारित नीतियां बनाई जा सकें l

बिहार में सहकार से समृद्धि: पैक्स सशक्तिकरण से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती

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सरकार ने सहकारी समितियों को सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए देशभर में, विशेषकर बिहार में, अनेक कदम उठाए हैं। किसानों को ऋण, भंडारण और विपणन की सुविधाएं सुगम बनाने के उद्देश्य से 2 लाख नई बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (एम-पैक्स), डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियां स्थापित करने की योजना को स्वीकृति दी गई है। 15 नवंबर 2025 तक बिहार में 4,518 नई सहकारी समितियों का गठन हो चुका है।

बिहार, केंद्र प्रायोजित पैक्स कंप्यूटरीकरण परियोजना में भी सक्रिय भागीदारी कर रहा है। राज्य की 4,495 पैक्स में से 4,460 पैक्स को ईआरपी आधारित राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर से जोड़ा जा चुका है, जिससे कार्यकुशलता, पारदर्शिता और जिला एवं राज्य सहकारी बैंकों के साथ समन्वय में सुधार हुआ है। पैक्स के लिए मॉडल उपविधियों को अपनाया गया है, जिससे वे कृषि इनपुट आपूर्ति, भंडारण, खरीद, डेयरी, मत्स्य और अन्य ग्रामीण सेवाओं सहित 25 से अधिक विविध व्यावसायिक गतिविधियां कर सकती हैं।

पैक्स को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र, ब्याज अनुदान, उर्वरक-बीज वितरण, पीडीएस, एलपीजी/पेट्रोल/डीजल डीलरशिप, कस्टम हायरिंग, प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र, कॉमन सर्विस सेंटर आदि योजनाओं के लाभ वितरण केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। बिहार में पैक्स को बहु-सेवा केंद्रों में बदलने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।

राज्य योजना के तहत बिहार में 7,221 गोदामों का निर्माण कर 17.14 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता सृजित की गई है। वर्ष 2025-26 में 278 गोदामों (2.49 लाख मीट्रिक टन क्षमता) को स्वीकृति दी गई है। विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना के तहत 36 पैक्स (1.33 लाख मीट्रिक टन क्षमता) चिन्हित की गई हैं। 5,256 पैक्स कॉमन सर्विस सेंटर के रूप में कार्य कर रही हैं। 2,271 पैक्स के पास उर्वरक लाइसेंस है, जिनमें से 1,681 को प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र के रूप में उन्नत किया गया है।

वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए नाबार्ड और बिहार राज्य सहकारी बैंक द्वारा माइक्रो-एटीएम और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों हेतु अनुदान स्वीकृत किए गए हैं। राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस के अनुसार, देश में कस्टम हायरिंग सेंटर के रूप में कार्यरत 7,398 पैक्स में से 2,661 बिहार में हैं।

राष्ट्रीय सहकारी प्रशिक्षण परिषद (NCCT) के माध्यम से प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। बिहार में आरआईसीएम, पटना द्वारा अब तक 43,290 प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया है। पैक्स सचिवों को सीएससी पोर्टल के माध्यम से 300 ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करने हेतु विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।

कृषि अवसंरचना निधि, कृषि विपणन अवसंरचना और कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन जैसी योजनाओं के तहत दी जा रही सब्सिडी से पैक्स स्तर पर गोदाम, कस्टम हायरिंग सेंटर और प्रसंस्करण इकाइयों का विकास हो रहा है, जिससे अनाज की बर्बादी कम होगी और किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा।

सहकारिता मंत्रालय द्वारा ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन के तहत राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 लागू की गई है, जिसमें अगले दस वर्षों के लिए वित्तीय पहुंच, बहु-क्षेत्रीय विस्तार और तकनीक आधारित पारदर्शिता पर जोर दिया गया है। कर रियायतें, पैक्स के लिए लेन-देन सीमाओं में वृद्धि, कंप्यूटरीकरण के लिए 2,925.39 करोड़ रुपये का प्रावधान और एनसीडीसी के माध्यम से वित्तीय सहायता जैसे उपाय किए गए हैं।

इन सभी कदमों से सहकारी समितियों की वित्तीय स्थिरता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थायित्व सुनिश्चित करने का लक्ष्य है। यह जानकारी केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में दी।

2026 सीज़न के लिए कोपरा का MSP बढ़ा: किसानों को मिलेगा अधिक लाभकारी मूल्य

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक कार्यों पर मंत्रिमंडल समिति (CCEA) ने 2026 सीज़न के लिए नारियल कोपरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मंज़ूर कर लिया है।

किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार ने 2018-19 के केंद्रीय बजट में घोषित किया था कि सभी अधिदेशित फसलों का MSP, उनकी ऑल-इंडिया वेटेड औसत उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना निर्धारित किया जाएगा।

2026 सीज़न के लिए नया MSP

  • मिलिंग कोपरा (FA Q): ₹12,027 प्रति क्विंटल

  • बॉल कोपरा: ₹12,500 प्रति क्विंटल

MSP में बढ़ोतरी

पिछले सीज़न की तुलना में:

  • मिलिंग कोपरा: ₹445 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी

  • बॉल कोपरा: ₹400 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी

2014 के मार्केटिंग सीज़न से अब तक MSP में भारी वृद्धि हुई है:

  • मिलिंग कोपरा: ₹5,250 → ₹12,027 (129% वृद्धि)

  • बॉल कोपरा: ₹5,500 → ₹12,500 (127% वृद्धि)

लाभ

  • किसानों को बेहतर और लाभकारी मूल्य मिलेगा।

  • कोपरा उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन मिलेगा।

  • घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नारियल उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी।

खरीद एजेंसियाँ

  • NAFED

  • NCCF
    ये दोनों ही प्राइस सपोर्ट स्कीम (PSS) के तहत कोपरा खरीदने वाली केंद्रीय नोडल एजेंसियाँ बनी रहेंगी।

नाबार्ड RECSS सर्वेक्षण: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार और सकारात्मक बदलाव

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नाबार्ड के ग्रामीण आर्थिक स्थिति और भावना सर्वेक्षण (RECSS) के आठवें चरण ने पिछले वर्ष में ग्रामीण मांग, बढ़ती आय और समग्र रूप से बेहतर घरेलू कल्याण में व्यापक सुधार के सबसे स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। RECSS एक उच्च-आवृत्ति, द्वैमासिक मूल्यांकन है, जिसे नाबार्ड द्वारा सितंबर 2024 से संचालित किया जा रहा है।

अब यह सर्वेक्षण एक समृद्ध, वर्षभर का डेटासेट प्रदान करता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हुए परिवर्तनों का यथार्थवादी मूल्यांकन संभव बनाता है—चाहे वह पिछड़े स्थितियों से संबंधित हो या भविष्य की घरेलू भावनाओं से।

पिछले एक वर्ष में ग्रामीण आर्थिक आधार स्पष्ट रूप से मजबूत हुए हैं। मजबूत उपभोग, बढ़ती आय, नियंत्रित मुद्रास्फीति और बेहतर वित्तीय व्यवहार के साथ ग्रामीण भारत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहा है। निरंतर कल्याणकारी समर्थन और मजबूत सार्वजनिक निवेश इस गति को और सशक्त कर रहे हैं।

मुख्य निष्कर्ष: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय मजबूती (सितंबर 2024 – नवंबर 2025)

1. वास्तविक क्रय शक्ति से संचालित उपभोग में उछाल

  • लगभग 80% ग्रामीण परिवार पिछले एक वर्ष में लगातार अधिक उपभोग की रिपोर्ट कर रहे हैं—यह बढ़ती समृद्धि का संकेत है।

  • मासिक आय का 67.3% उपभोग पर खर्च हो रहा है—सर्वेक्षण शुरू होने के बाद से यह सबसे अधिक है, जिसे GST दरों के तर्कसंगठन ने भी समर्थन दिया है।

  • यह दर्शाता है कि मांग मजबूत और व्यापक है—न कि सीमित या किसी एक क्षेत्र में केंद्रित।

2. आय वृद्धि सर्वेक्षण शुरू होने के बाद सबसे अधिक

  • 42.2% ग्रामीण परिवारों ने आय में वृद्धि दर्ज की—सभी सर्वेक्षण चरणों में यह सर्वोत्तम प्रदर्शन है।

  • केवल 15.7% ने किसी भी प्रकार की आय में कमी की रिपोर्ट की—जो अब तक का सबसे कम स्तर है।

  • भविष्य को लेकर आशावाद सर्वोच्च: 75.9% परिवारों को उम्मीद है कि अगले वर्ष आय बढ़ेगी—सितंबर 2024 के बाद से सबसे ऊँचा स्तर।

3. ग्रामीण निवेश गतिविधि में तेज़ सुधार

  • 29.3% परिवारों ने पिछले वर्ष पूंजी निवेश बढ़ाया—सभी दौरों में सबसे अधिक, जो कृषि और गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों में परिसंपत्ति निर्माण का संकेत देता है।

  • यह निवेश क्रेडिट तनाव के कारण नहीं बल्कि मजबूत उपभोग और आय वृद्धि से प्रेरित है।

4. औपचारिक स्रोतों से ग्रामीण ऋण की पहुँच सर्वोच्च स्तर पर

  • 58.3% ग्रामीण परिवारों ने केवल औपचारिक स्रोतों से ही ऋण लिया—सितंबर 2024 के 48.7% की तुलना में यह सर्वाधिक है।

  • हालांकि, लगभग 20% ऋण अभी भी अनौपचारिक स्रोतों से लिया जाता है, जो अधिक औपचारिक वित्तीय पहुँच की आवश्यकता दर्शाता है।

5. सरकारी हस्तांतरण मांग को समर्थन देते हैं, निर्भरता नहीं बनाते

  • औसतन मासिक आय का 10% कल्याणकारी योजनाओं (रियायती खाद्य, बिजली, पानी, गैस, उर्वरक, स्कूल समर्थन, पेंशन, परिवहन लाभ आदि) से मिलता है।

  • कुछ परिवारों के लिए ये हस्तांतरण कुल आय के 20% से अधिक होते हैं, जो उपभोग को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

6. मुद्रास्फीति धारणा एक वर्ष में सबसे नीचे

  • औसत मुद्रास्फीति धारणा 3.77% है—सर्वेक्षण शुरू होने के बाद पहली बार 4% से नीचे।

  • 84.2% लोग मुद्रास्फीति को 5% या उससे कम मानते हैं, और लगभग 90% को उम्मीद है कि निकट भविष्य में भी यह 5% से नीचे रहेगी।

  • इस मुद्रास्फीति में कमी ने वास्तविक आय बढ़ाई, क्रय शक्ति में सुधार किया और समग्र कल्याण को बढ़ावा दिया।

7. ऋण चुकौती क्षमता और पूंजी निवेश की स्थिति में सुधार

  • कम मुद्रास्फीति और ब्याज दरों में नरमी के कारण आय का वह हिस्सा घटा है जो ऋण चुकाने में जाता था।

  • 29.3% ग्रामीण परिवार पिछले वर्ष में बढ़ा हुआ पूंजी निवेश कर चुके हैं—सर्वेक्षण के सभी दौरों में सबसे अधिक।

8. ग्रामीण अवसंरचना और बुनियादी सेवाओं को मजबूत समर्थन

ग्रामीण परिवारों ने इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार की उच्च संतुष्टि व्यक्त की है:

  • सड़कें

  • शिक्षा

  • बिजली

  • इसके बाद पेयजल और स्वास्थ्य सेवाएँ

ये सुधार बढ़ती आय और दीर्घकालिक समृद्धि को समर्थन देते हैं।

RECSS सर्वेक्षण के बारे में

नाबार्ड का ग्रामीण आर्थिक स्थिति और भावना सर्वेक्षण हर दो महीने में पूरे भारत में किया जाता है। यह आय, उपभोग, मुद्रास्फीति, ऋण, निवेश और घरेलू अपेक्षाओं से जुड़े मात्रात्मक संकेतकों और धारणाओं को दर्ज करता है।


राजकुमार भगत ने नारायणपुर धान खरीदी केंद्र में बेचा धान

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ऑनलाइन टोकन जारी होने से किसानों को मिल रही बड़ी सुविधा

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देशानुसार राज्यभर के सभी धान खरीदी केंद्रों में खरीदी प्रक्रिया सुचारू और व्यवस्थित रूप से जारी है। इसी क्रम में आज जशपुर जिले के कुनकुरी विकासखंड के ग्राम नारायणपुर धान खरीदी केंद्र में किसान राजकुमार भगत अपने धान की बिक्री के लिए पहुँचे। उन्होंने बताया कि उनका ऑनलाइन टोकन आसानी से कट गया और उन्हें किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा।

राजकुमार भगत ने कहा कि वे हर वर्ष इसी केंद्र में धान बेचते हैं और इस बार भी सभी व्यवस्थाएँ बेहद सुव्यवस्थित हैं। उन्होंने खरीदी केंद्र में उपलब्ध सुविधाओं जैसे—ऑनलाइन टोकन जारी व्यवस्था, माइक्रो एटीएम, पर्याप्त बारदाना, पेयजल और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं पर संतोष प्रकट किया।

प्रशासन द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुरूप सभी प्रबंध किसानों की सुविधा को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन का लक्ष्य है कि प्रत्येक किसान को धान खरीदी की प्रक्रिया सहज, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से उपलब्ध हो। इसके लिए प्रशासनिक टीमें लगातार निगरानी कर रही हैं।

क्या है माइक्रो एटीएम सुविधा?

धान उपार्जन केंद्रों में किसानों की त्वरित जरूरतों को पूरा करने हेतु छत्तीसगढ़ सरकार ने माइक्रो एटीएम सुविधा उपलब्ध कराई है। इस सुविधा के माध्यम से किसान 2,000 रुपये से 10,000 रुपये तक की राशि तुरंत प्राप्त कर सकते हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की इस पहल से किसानों को बैंक की शाखाओं में लंबी कतारों में लगने की आवश्यकता नहीं पड़ती, और धान बेचने के तुरंत बाद आवश्यक राशि आसानी से मिल जाती है।

यह सुविधा किसानों की तत्काल आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में अत्यंत मददगार साबित हो रही है और संपूर्ण धान खरीदी प्रक्रिया को और अधिक सुविधाजनक, सुगम एवं किसान-फ्रेंडली बना रही है।

झारखंड में जीएसटी सुधारों का प्रभाव: उद्योग, कृषि और पर्यटन को बढ़ावा

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परिचय

सन् 2000 में गठित झारखंड भारत का एक पूर्वी राज्य है, जो अपनी प्रचुर प्राकृतिक संपदाओं, सुदृढ़ इस्पात और भारी इंजीनियरिंग उद्योगों, तथा विशाल लौह अयस्क भंडारों के लिए जाना जाता है। राज्य के लगभग 29% क्षेत्र पर वन और वनों से आच्छादित भूमि है, जो भारत में सबसे अधिक है। जनजातीय बहुल यह राज्य कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर भी काफी निर्भर है, जो इसकी बड़ी आबादी के आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं।

हाल के जीएसटी सुधारों से राज्य की अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। प्रमुख उद्योगों में कर दरों में भारी कमी के कारण लागत घटने, उपभोक्ता वहनशीलता बढ़ने, और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार हुआ है। इससे कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि हुई है।

इस्पात एवं भारी इंजीनियरिंग उत्पाद

झारखंड के औद्योगिक विकास की रीढ़ इस्पात और भारी इंजीनियरिंग क्षेत्र है, जो भारत के कुल इस्पात उत्पादन का लगभग 20–25% योगदान देता है। जमशेदपुर (टाटा स्टील) और बोकारो (सेल-बोकारो स्टील प्लांट) जैसे प्रमुख औद्योगिक केंद्र यहां स्थित हैं। सिंहभूम और बोकारो जिलों में फैले इस उद्योग ने 1 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार दिया है (2022–23 के अनुसार, 1,04,309 व्यक्ति)।

राज्य के इस्पात उत्पादों के प्रमुख उपभोक्ता घरेलू निर्माण, अवसंरचना, ऑटोमोबाइल और पूंजीगत वस्तु उद्योग हैं। साथ ही, अमेरिका, चीन, जापान, नेपाल, बांग्लादेश और यूरोप जैसे देशों में मूल्य संवर्धित इस्पात उत्पादों का निर्यात भी होता है।

जीएसटी सुधारों के तहत इस्पात उपभोक्ता क्षेत्रों में कर में कमी की गई है —

  • 350cc तक की दोपहिया गाड़ियों और छोटे कारों पर कर 28% से घटाकर 18% किया गया।

  • 1800cc से कम क्षमता वाले ट्रैक्टरों पर कर 12% से घटाकर 5% किया गया।

  • ट्रैक्टर पार्ट्स पर 18%/12% से घटाकर 5%।

  • वाणिज्यिक वाहनों पर 28% से 18% और ऑटो पार्ट्स पर 28% से 18%।

इन कटौतियों से कुल लागत में लगभग 7.8%–11.0% तक की कमी आती है, जिससे वाहनों और मशीनरी की मांग बढ़ती है। इससे इस्पात और भारी इंजीनियरिंग उद्योगों में उत्पादन और रोजगार में वृद्धि होती है तथा राज्य की एमएसएमई और विनिर्माण श्रृंखलाओं को सशक्त बनाती है।

लोहा (Iron)

झारखंड भारत के कुल लौह अयस्क भंडार का लगभग 26% हिस्सा रखता है। राज्य के लौह उद्योगों में चूल्हे, रसोई के बर्तन, दूध के कनस्तर, और सजावटी वस्तुएं बनाई जाती हैं। यह उद्योग मुख्यतः पश्चिम सिंहभूम (नौमुण्डी, गुआ), सिंहभूम बेल्ट और कोल्हान क्षेत्र में केंद्रित है।

यहां लगभग 1 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से कार्यरत हैं, जिनमें से कई जनजातीय और वन-आश्रित समुदाय हैं। झारखंड का लौह उद्योग घरेलू इस्पात संयंत्रों (विशेष रूप से ओडिशा और झारखंड के) को आपूर्ति करता है और साथ ही चीन, जापान, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया को निर्यात भी करता है।

जीएसटी सुधारों के तहत लोहे पर कर दर 12% से घटाकर 5% कर दी गई है, जिससे औसतन 6.25% लागत में कमी आई है। इससे उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ी है, लाभांश में सुधार हुआ है और रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है।

कृषि एवं खाद्यान्न

झारखंड की कृषि मुख्य रूप से लघु एवं सीमांत किसानों द्वारा संचालित है, जिनमें अधिकांश जनजातीय समुदायों से हैं। 2021–22 में कृषि क्षेत्र का राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में योगदान 18.2% रहा, जबकि 50.4% जनसंख्या कृषि एवं उससे जुड़ी गतिविधियों में कार्यरत है।

रांची, हजारीबाग, पलामू और लातेहार जिले कृषि क्षेत्र के प्रमुख केंद्र हैं। राज्य की कृषि उपज का प्रमुख विपणन घरेलू मंडियों, प्रसंस्करण उद्योगों और सरकारी खरीद एजेंसियों के माध्यम से होता है।

जीएसटी सुधारों में प्रसंस्कृत खाद्यान्नों पर कर दर 12% से घटाकर 5% की गई है, जिससे 3–8% तक इनपुट लागत में कमी आई है। यह किसानों की लाभप्रदता बढ़ाने, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहन देने, और ग्रामीण आय में स्थिरता लाने में मदद करेगा।

वन उत्पाद

‘झारखंड’ शब्द का अर्थ ही है “वनों की भूमि” — और यह राज्य अपने समृद्ध जैव-विविधता और वन संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। हजारीबाग, लातेहार और पश्चिम सिंहभूम जिले व्यापक वन क्षेत्र वाले हैं, जहां की बड़ी जनजातीय आबादी गैर-लकड़ी वन उपज (NTFP) जैसे लाख, तेंदूपत्ता और शहद पर निर्भर है।

वन-आधारित उद्योग लगभग 20 लाख गरीब और जनजातीय श्रमिकों को आजीविका प्रदान करते हैं। प्रमुख खरीदारों में झारखंड राज्य वन विकास निगम (JSFDC), स्थानीय एग्रो-प्रोसेसर और निर्माण उद्योग शामिल हैं। निर्यात बाजारों में बांग्लादेश, अमेरिका, यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व प्रमुख हैं।

जीएसटी सुधारों के तहत —

  • तेंदूपत्ते पर कर 18% से घटाकर 5%,

  • और बांस पर 12% से घटाकर 5% कर दिया गया है।

इससे लागत में लगभग 6.25%–11.01% की कमी आई है, जिससे उत्पादों की कीमत प्रतिस्पर्धी हुई है और वन-आश्रित समुदायों की आय स्थिरता बढ़ी है।

पर्यटन

पहाड़ियों, घने वनों और झरनों से भरपूर झारखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। राज्य में मंदिर, संग्रहालय और अभयारण्य पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। प्रमुख स्थलों में देवघर (बैद्यनाथ धाम), पारसनाथ (जैन तीर्थ), राजरप्पा मंदिर, और रांची का जगन्नाथ मंदिर शामिल हैं।

राज्य का पर्यटन क्षेत्र होटल, होमस्टे, गाइड, ड्राइवर, हस्तशिल्पी, स्थानीय व्यापारी और समुदाय-आधारित पर्यटन उद्यमों पर आधारित है।

जीएसटी सुधारों के तहत ₹7,500 तक के होटल कमरों पर कर दर 12% से घटाकर 5% की गई है, जिससे ठहरने की लागत में लगभग 6.25% की कमी आई है। इससे पर्यटकों के लिए यात्रा सस्ती हुई है और छोटे-मंझोले पर्यटन व्यवसायों को राहत मिली है।

निष्कर्ष

प्राकृतिक संपदाओं, खनिजों और वनों से समृद्ध झारखंड के लिए जीएसटी सुधार एक बड़ा अवसर हैं। इस्पात, लोहा, कृषि, वन उत्पाद और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में कर दरों में कमी से औद्योगिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है। ये सुधार उत्पादन, निवेश और रोजगार को बढ़ावा देते हुए झारखंड को एक अधिक प्रतिस्पर्धी और निवेश-अनुकूल राज्य के रूप में स्थापित करते हैं।


छत्तीसगढ़ में जूट की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी

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 जूट की खेती पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण सह किसान सम्मेलन आयोजित

रायपुर- छत्तीसगढ़ में जूट की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने हेतु विगत दिवस इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, में एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण सह वैज्ञानिक किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण छत्तीसगढ़ में जूट की उन्नत खेती और उत्पादन विधियों पर आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण जूट की खेती परियोजना के तहत आईबीआईटीएफ द्वारा वित्त पोषित और आईआईटी भिलाई के सहयोग से आयोजित किया गया। 

इस प्रशिक्षण में राष्ट्रीय जूट बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. नीलेन्दु भौमिक और तकनीकी सहायक ने जूट से यांत्रिक फाइबर निष्कर्षण पर व्याख्यान दिया है। उन्होंने बारीक निष्कर्षण को आसान बनाने के लिए एक रिबनर मशीन का प्रदर्शन किया है। आईआईटी भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान संचालक डॉ. विवेक त्रिपाठी ने प्रशिक्षण को और अधिक प्रभावी बनाया। डॉ. राजीव प्रकाश ने रेशेदार फसलों के पारिस्थितिक महत्व के बारे में जानकारी देते हुए किसानों को संबोधित किया। उन्होंने रेशे की गुणवत्ता पर रेटिंग प्रक्रिया के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों से छत्तीसगढ़ में पूर्व की तरह जूट की खेती फिर से शुरू करने का आह्वान किया। डॉ. विवेक त्रिपाठी ने किसानों से खरीफ के लिए चावल के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करने को कहा। उन्होंने कहा कि किसान खरीफ में चावल उगाने से पहले ग्रीष्मकालीन फसल के रूप में जूट की खेती कर सकते हैं। इससे किसानों को पारिश्रमिक मिलेगा और उनकी आजीविका में सुधार होगा। 

जूट परियोजना की सह अन्वेषक डॉ. प्रज्ञा पांडे ने जूट की उन्नत खेती की पद्धतियों पर व्याख्यान दिया। डॉ. अरुण उपाध्याय ने एंजाइमेटिक रेटिंग तकनीक पर व्याख्यान दिया। इस सम्मेलन में धमतरी और रायपुर के 30 किसानों ने कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लिया और व्याख्यान, मशीन प्रदर्शन और जूट के अवलोकन के माध्यम से जूट उत्पादन के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस खरीफ मौसम में धमतरी जिले में 4 एकड़ भूमि पर जूट की खेती चल रही है। किसानों ने आगामी वर्ष में जूट का क्षेत्र विस्तार करने पर सहमति व्यक्त की।


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