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वैज्ञानिकों ने मैग्नेटिक सेमीकंडक्टर्स में ऊष्मा प्रवाह का रहस्य सुलझाया

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वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि मैग्नेटिक सेमीकंडक्टर्स में ऊष्मा (हीट) किस प्रकार प्रवाहित होती है। यह खोज स्पिन्ट्रॉनिक्स, मैग्नेटिक मेमोरी और क्वांटम डिवाइस जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस अध्ययन ने ठोस अवस्था भौतिकी (Condensed Matter Physics) में लगभग एक दशक पुराने रहस्य को सुलझाया है और उच्च प्रदर्शन वाले इलेक्ट्रॉनिक तथा मैग्नेटिक सिस्टम में उन्नत थर्मल प्रबंधन की नई संभावनाएँ खोली हैं।

सामान्य सेमीकंडक्टर्स में तापमान बढ़ने के साथ थर्मल कंडक्टिविटी घटती है, क्योंकि ऊष्मा को वहन करने वाले लैटिस कंपन (फॉनॉन) अधिक बिखरने लगते हैं। लेकिन कुछ मैग्नेटिक सेमीकंडक्टर्स इस नियम का पालन नहीं करते और अपने मैग्नेटिक ट्रांज़िशन तापमान से ऊपर थर्मल कंडक्टिविटी में असामान्य वृद्धि दिखाते हैं। क्रोमियम नाइट्राइड (CrN) ऐसा ही एक मैग्नेटिक सेमीकंडक्टर है, जिसका उपयोग कोटिंग और इलेक्ट्रॉनिक अनुप्रयोगों में किया जाता है। अब तक इस असामान्य व्यवहार का सूक्ष्म कारण स्पष्ट नहीं था।

जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), बेंगलुरु के प्रोफेसर बिवास साहा के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने इस रहस्य को सुलझाने में सफलता प्राप्त की है। यह संस्थान विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। अध्ययन में यह प्रमाणित किया गया कि फॉनॉन और मैग्नेटिक स्पिन फ्लक्चुएशन्स के बीच मजबूत युग्मन (coupling) मैग्नेटिक सेमीकंडक्टर्स में ऊष्मा परिवहन को नियंत्रित करता है।

शोधकर्ताओं ने उन्नत तापमान-निर्भर इनएलास्टिक एक्स-रे स्कैटरिंग तकनीक का उपयोग करते हुए उच्च गुणवत्ता वाले CrN थिन फिल्म्स में फॉनॉन के जीवनकाल को मापा। इससे यह समझने में मदद मिली कि जैसे-जैसे पदार्थ क्रमबद्ध मैग्नेटिक अवस्था से अव्यवस्थित अवस्था में परिवर्तित होता है, वैसे-वैसे लैटिस कंपन और मैग्नेटिक उत्तेजनाओं के बीच किस प्रकार अंतःक्रिया होती है।

अध्ययन में पाया गया कि ध्वनिक फॉनॉन (Acoustic Phonons), जो ऊष्मा के मुख्य वाहक होते हैं, नील तापमान (Néel Temperature) के आसपास मैग्नेटिक स्पिन फ्लक्चुएशन्स के साथ मजबूत अंतःक्रिया के कारण अत्यधिक प्रभावित होते हैं। लेकिन तापमान और बढ़ने पर जब मैग्नेटिक क्रम कमजोर होने लगता है, तब फॉनॉन का जीवनकाल असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप उच्च तापमान पर भी थर्मल कंडक्टिविटी बढ़ जाती है, जो सामान्य नियमों के विपरीत है।

इसके विपरीत ऑप्टिकल फॉनॉन सामान्य तापमान-निर्भर व्यवहार का पालन करते पाए गए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि ऊष्मा परिवहन में स्पिन फ्लक्चुएशन्स की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन निष्कर्षों की पुष्टि उन्नत एटोमिस्टिक स्पिन-डायनामिक्स सिमुलेशन और फर्स्ट-प्रिंसिपल कैलकुलेशन से भी हुई, जिससे मैग्नेटिक फ्लक्चुएशन्स और असामान्य ऊष्मा संचरण के बीच स्पष्ट सूक्ष्म तंत्र स्थापित हुआ।

प्रोफेसर बिवास साहा ने कहा कि यह अध्ययन पहली बार प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक प्रमाण प्रस्तुत करता है, जो मैग्नेटिक सेमीकंडक्टर्स में स्पिन फ्लक्चुएशन्स और बढ़ी हुई थर्मल कंडक्टिविटी के बीच संबंध को दर्शाता है। इससे स्पिन्ट्रॉनिक्स, मैग्नेटिक और क्वांटम उपकरणों में बेहतर हीट मैनेजमेंट के नए रास्ते खुल सकते हैं।

इस खोज के व्यापक तकनीकी प्रभाव हो सकते हैं, क्योंकि उच्च शक्ति वाले स्पिन्ट्रॉनिक उपकरणों, मैग्नेटिक मेमोरी और भविष्य की क्वांटम तकनीकों के विश्वसनीय संचालन के लिए प्रभावी ऊष्मा प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। मैग्नेटिक गुणों के माध्यम से थर्मल ट्रांसपोर्ट को नियंत्रित करने की क्षमता भविष्य में अधिक तेज और ऊर्जा-कुशल उपकरणों के विकास में मदद कर सकती है।

यह शोध JNCASR, IISER तिरुवनंतपुरम, लिंकॉपिंग यूनिवर्सिटी (स्वीडन) तथा अंतरराष्ट्रीय सिंक्रोट्रॉन सुविधाओं SPring-8 (जापान) और DESY (जर्मनी) के सहयोग से किया गया। यह अध्ययन हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Science Advances में प्रकाशित हुआ है, जो उन्नत सामग्री अनुसंधान में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

भारत के पहले क्वांटम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विश्वविद्यालय परिसर की स्थापना हेतु NIELIT और आंध्र प्रदेश सरकार के बीच MoU

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इंडिया AI इम्पैक्ट समिट के दौरान, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अधीन राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (NIELIT) ने 20 फरवरी 2026 को आंध्र प्रदेश सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

इस समझौते के तहत अमरावती में भारत का पहला समर्पित क्वांटम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विश्वविद्यालय परिसर स्थापित किया जाएगा।

यह सहयोग भारत के डीप-टेक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और आंध्र प्रदेश क्वांटम मिशन के माध्यम से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी क्वांटम नवाचार केंद्र विकसित करने के राज्य के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
अमरावती, राज्य की महत्वाकांक्षी क्वांटम वैली पहल का केंद्र बनने के लिए तैयार है।

समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर

MoU पर हस्ताक्षर निम्न गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में किए गए:

  • एन. चंद्रबाबू नायडू, मुख्यमंत्री, आंध्र प्रदेश

  • एस. कृष्णन, सचिव, MeitY

  • डॉ. एम. एम. त्रिपाठी, महानिदेशक, NIELIT

  • सी. वी. श्रीधर, मिशन निदेशक, APSQM, अमरावती क्वांटम वैली

प्रमुख वक्तव्य

🔹 डॉ. एम. एम. त्रिपाठी, महानिदेशक, NIELIT

उन्होंने कहा कि यह साझेदारी भारत की डीप-टेक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
अमरावती में NIELIT का क्वांटम और AI परिसर क्वांटम तकनीकों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अनुसंधान, शिक्षा और नवाचार का राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र बनेगा।

🔹 सी. वी. श्रीधर, मिशन निदेशक, APSQM

उन्होंने कहा कि NIELIT क्वांटम-AI विश्वविद्यालय, क्वांटम विज्ञान, AI और उद्योग-आधारित कौशल विकास को एकीकृत करके वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करेगा।

प्रस्तावित विश्वविद्यालय परिसर की प्रमुख विशेषताएं

प्रमुख अध्ययन एवं अनुसंधान क्षेत्र

  • क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम एल्गोरिदम

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग

  • क्वांटम संचार और साइबर सुरक्षा

  • क्वांटम हार्डवेयर और सिस्टम इंजीनियरिंग

  • हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग

  • AI–क्वांटम समन्वय अनुसंधान

शैक्षणिक और अनुसंधान ढांचा

परिसर में निम्न सुविधाएं होंगी:

  • स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी कार्यक्रम

  • उन्नत अनुसंधान प्रयोगशालाएं

  • उद्योग से जुड़े उत्कृष्टता केंद्र (CoEs)

  • डीप-टेक इनक्यूबेशन और उद्यमिता समर्थन

  • वैश्विक शैक्षणिक और R&D सहयोग

पहल का महत्व

यह पहल भारत की क्वांटम तकनीक और AI क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से मजबूत करेगी और देश को अगली पीढ़ी के नवाचार और डीप-टेक शिक्षा में वैश्विक अग्रणी बनाने में मदद करेगी।

NIELIT के बारे में

राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (NIELIT), MeitY के अधीन एक स्वायत्त वैज्ञानिक संस्था है, जो शिक्षा, कौशल विकास, प्रशिक्षण, अनुसंधान और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देती है।

NIELIT के पास देशभर में 56 केंद्र, 750+ मान्यता प्राप्त संस्थान और 9000+ प्रशिक्षण केंद्र हैं और इसने लाखों छात्रों को उभरती तकनीकों में प्रशिक्षित और प्रमाणित किया है।

NIELIT को शिक्षा मंत्रालय द्वारा डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया है, जिसका मुख्य परिसर रोपड़ (पंजाब) में और अन्य परिसर आइजोल, अगरतला, औरंगाबाद, कालीकट, गोरखपुर, इम्फाल, ईटानगर, अजमेर, कोहिमा, पटना और श्रीनगर में स्थित हैं।


भारत की क्वांटम साइबर सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम

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क्वांटम कंप्यूटिंग से उत्पन्न होने वाले नए साइबर खतरों से निपटने के लिए भारत की साइबर सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। दूरसंचार विभाग (DoT) के तहत भारत सरकार की प्रमुख दूरसंचार अनुसंधान एवं विकास संस्था सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (C-DOT) ने Synergy Quantum India Private Limited के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह कंपनी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों क्षेत्रों में पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी समाधान प्रदान करती है।

इस समझौते का उद्देश्य एक स्वचालित टूल विकसित करना है, जो उपकरणों में उपयोग होने वाले क्रिप्टोग्राफिक एल्गोरिदम की पहचान करेगा, उन्हें वर्गीकृत करेगा और क्वांटम-संवेदनशील एल्गोरिदम की रिपोर्ट तैयार करेगा। यह टूल किसी डिवाइस को स्कैन करके उसके सुरक्षा तंत्र और एल्गोरिदम का पता लगाएगा, क्वांटम-सुरक्षित और क्वांटम-संवेदनशील एल्गोरिदम के बीच अंतर करेगा और विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा ताकि भविष्य में क्वांटम-सुरक्षित सुरक्षा प्रणाली में संक्रमण की योजना बनाई जा सके।

इस समाधान के तीन मुख्य मॉड्यूल होंगे:

  1. वेब एप्लिकेशन: नेटवर्क ट्रैफिक, कमजोरियों और क्वांटम जोखिमों का बाहरी स्कैनिंग।

  2. सिक्योरिटी स्कैनर एजेंट: डिवाइस के अंदर लाइब्रेरी और एंडपॉइंट सुरक्षा का आंतरिक स्कैन।

  3. कंट्रोल सॉफ्टवेयर: एजेंट इंस्टॉलेशन, स्कैन संचालन और सभी कमजोरियों की रिपोर्ट तैयार करना।

यह सहयोग रक्षा, दूरसंचार, बैंकिंग और सरकारी क्षेत्रों सहित महत्वपूर्ण नेटवर्क और उपकरणों में क्रिप्टोग्राफिक कमजोरियों का प्रारंभिक पता लगाने में मदद करेगा और संस्थानों को पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की ओर संक्रमण में सहायता करेगा।

यह साझेदारी “आत्मनिर्भर भारत” पहल के अनुरूप स्वदेशी अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देगी और भारत को क्वांटम सुरक्षा तकनीक में वैश्विक अग्रणी बनाने में मदद करेगी।

C-DOT के सीईओ डॉ. राजकुमार उपाध्याय ने कहा कि क्वांटम कंप्यूटिंग के विकास के साथ पारंपरिक क्रिप्टोग्राफी प्रणालियों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और यह सहयोग भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए स्वदेशी समाधान विकसित करने की प्रतिबद्धता दर्शाता है।

Synergy Quantum के सह-संस्थापक और सीईओ जय ओबेरॉय ने कहा कि यह साझेदारी भारत की क्वांटम-सुरक्षित सुरक्षा यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और यह टूल सरकारी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को क्वांटम जोखिमों का आकलन करने और उन्हें कम करने में सक्षम बनाएगा।

समझौता हस्ताक्षर समारोह में C-DOT और Synergy Quantum के वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिनिधि उपस्थित थे।

C-DOT के बारे में:

C-DOT भारत सरकार के संचार मंत्रालय के अंतर्गत एक प्रमुख दूरसंचार अनुसंधान एवं विकास संस्था है, जिसने क्वांटम-सुरक्षित तकनीकों और क्वांटम की वितरण (QKD) प्रणालियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

Synergy Quantum के बारे में:

Synergy Quantum एक संप्रभु क्वांटम सुरक्षा कंपनी है, जो राष्ट्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा संचालकों को क्वांटम युग में सुरक्षित डिजिटल प्रणालियाँ बनाए रखने में सक्षम बनाती है।


ठंडे परमाणुओं की रियल-टाइम और गैर-विनाशकारी माप के लिए नई तकनीक विकसित

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वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से ठंडे परमाणुओं (Cold Atoms) की स्थानीय घनत्व (Local Density) को वास्तविक समय (Real Time) में मापा जा सकता है, वह भी बिना उन्हें उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किए। यह उपलब्धि क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम सेंसिंग जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां परमाणुओं और उनकी क्वांटम अवस्था की सटीक और त्वरित पहचान अनिवार्य होती है।

RDSNS एक गैर-आक्रामक (नॉन-इनवेसिव) मापन तकनीक है, जो हमें परमाणु बादल को उच्च समयिक और स्थानिक विभेदन (हाई टेम्पोरल व स्पैशियल रेज़ोल्यूशन) के साथ जांचने में सक्षम बनाती है।

परंपरागत कोल्ड एटम प्रयोगों में, लेज़र कूलिंग और ट्रैपिंग तकनीकों के माध्यम से परमाणुओं की गतिज ऊर्जा को लगभग परम शून्य तापमान तक कम किया जाता है। इस अवस्था में परमाणुओं के क्वांटम गुण अधिक स्पष्ट रूप से सामने आते हैं और इन्हें क्वांटम कंप्यूटर व क्वांटम सेंसर्स के संसाधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

हालांकि, इन परमाणुओं की क्वांटम अवस्था को मापने के लिए प्रचलित एब्जॉर्प्शन इमेजिंग और फ्लोरेसेंस इमेजिंग जैसी तकनीकों की अपनी सीमाएं हैं। घने परमाणु बादलों में एब्जॉर्प्शन इमेजिंग प्रभावी नहीं होती, जबकि फ्लोरेसेंस इमेजिंग में अधिक समय लगता है और दोनों ही विधियां अक्सर परमाणुओं की अवस्था को प्रभावित कर देती हैं।

RDSNS तकनीक से मिली बड़ी सफलता

इन्हीं चुनौतियों का समाधान करते हुए, रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI)—जो कि भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक स्वायत्त संस्थान है—के वैज्ञानिकों ने रमन ड्रिवन स्पिन नॉइज़ स्पेक्ट्रोस्कोपी (RDSNS) नामक एक नवीन तकनीक का प्रदर्शन किया है।

यह तकनीक स्पिन नॉइज़ स्पेक्ट्रोस्कोपी पर आधारित है, जिसमें परमाणुओं के स्पिन में होने वाले प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को लेज़र प्रकाश के ध्रुवीकरण में आने वाले सूक्ष्म बदलावों के माध्यम से मापा जाता है। इसके साथ ही दो अतिरिक्त लेज़र बीम्स का उपयोग कर परमाणुओं को दो समीपवर्ती स्पिन अवस्थाओं के बीच कोहेरेंट रूप से संचालित किया जाता है।

इन रमन बीम्स के कारण संकेत (सिग्नल) में लगभग दस लाख गुना तक वृद्धि होती है। इस तकनीक में जांच का क्षेत्र मात्र 0.01 घन मिलीमीटर का होता है, जिसे 38 माइक्रोमीटर तक फोकस किए गए प्रोब लेज़र से हासिल किया गया। यह परमाणु बादल के एक अत्यंत छोटे हिस्से में मौजूद लगभग 10,000 परमाणुओं की सटीक स्थानीय घनत्व जानकारी प्रदान करता है, न कि केवल कुल परमाणु संख्या।

प्रयोग और परिणाम

शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का उपयोग मैग्नेटो-ऑप्टिकल ट्रैप (MOT) में पोटैशियम परमाणुओं के अध्ययन के लिए किया। उन्होंने पाया कि परमाणु बादल का केंद्रीय घनत्व मात्र एक सेकंड में संतृप्त हो गया, जबकि फ्लोरेसेंस माप के अनुसार कुल परमाणु संख्या को स्थिर होने में लगभग दोगुना समय लगा।

यह अंतर दर्शाता है कि जहां फ्लोरेसेंस तकनीक वैश्विक परमाणु संख्या बताती है, वहीं RDSNS स्थानीय स्तर पर यह दिखाती है कि परमाणु कितनी सघनता से पैक हुए हैं।

QuMIX लैब की रिसर्च असिस्टेंट्स बर्नाडेट वर्षा एफ.जे. और भाग्यश्री दीपक बिडवाई के अनुसार,

“यह तकनीक गैर-विनाशकारी है, क्योंकि प्रोब लेज़र बहुत कम शक्ति पर और फ्रीक्वेंसी से काफी दूर संचालित होती है। माइक्रोसेकंड स्तर की माप में भी कुछ प्रतिशत की सटीकता हासिल की जा सकती है।”

अध्ययन की प्रमुख लेखिका और RRI की पीएचडी शोधार्थी सायरी ने कहा,

“रियल-टाइम और गैर-विनाशकारी इमेजिंग क्वांटम सेंसिंग और कंप्यूटिंग के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह सूक्ष्म घनत्व उतार-चढ़ाव को पकड़कर कई-कणीय (Many-body) गतिकी को उजागर करती है।”

क्वांटम तकनीकों के लिए व्यापक महत्व

RDSNS की वैधता जांचने के लिए, टीम ने इसके परिणामों की तुलना फ्लोरेसेंस इमेजिंग पर आधारित इनवर्स एबेल ट्रांसफॉर्म से की, जिसमें दोनों विधियों के बीच उल्लेखनीय समानता पाई गई। खास बात यह है कि जहां एबेल ट्रांसफॉर्म को अक्षीय सममिति की आवश्यकता होती है, वहीं RDSNS असममित और गतिशील परमाणु बादलों में भी प्रभावी ढंग से काम करती है।

इस तकनीक का महत्व ग्रैविमीटर, मैग्नेटोमीटर और अन्य उच्च-सटीकता वाले क्वांटम सेंसर्स के लिए अत्यधिक है, जहां परमाणु घनत्व की सटीक जानकारी आवश्यक होती है। माइक्रॉन स्तर पर बिना किसी हस्तक्षेप के माप संभव होने से डेंसिटी वेव प्रोपेगेशन, क्वांटम ट्रांसपोर्ट और नॉन-इक्विलिब्रियम डायनेमिक्स जैसे विषयों के अध्ययन के नए रास्ते खुलते हैं।

QuMIX लैब के प्रमुख प्रो. सप्तऋषि चौधुरी ने कहा,

“हमें उम्मीद है कि यह तकनीक कोल्ड एटम प्रयोगों में रियल-टाइम डायग्नॉस्टिक्स के लिए व्यापक रूप से उपयोगी होगी, विशेष रूप से न्यूट्रल एटम आधारित क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम सिमुलेशन के क्षेत्र में।”

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत समर्थन

भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के अंतर्गत समर्थित यह शोध RRI को क्वांटम मापन और सटीकता के क्षेत्र में अग्रणी संस्थानों की पंक्ति में खड़ा करता है। यह खोज इस बात को भी रेखांकित करती है कि वैज्ञानिक प्रगति हमेशा अधिक तीव्रता से देखने से नहीं, बल्कि अधिक कोमल और बुद्धिमत्तापूर्ण तरीकों से देखने से संभव होती है।


राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत आईआईटी बॉम्बे ने विकसित किया देश का पहला स्वदेशी क्वांटम डायमंड माइक्रोस्कोप

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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) के तहत, आईआईटी बॉम्बे के पी-क्वेस्ट समूह ने देश का पहला स्वदेशी क्वांटम डायमंड माइक्रोस्कोप (QDM) विकसित किया है। यह एक क्रांतिकारी उपलब्धि है जिसने क्वांटम सेंसिंग के क्षेत्र में भारत को पहला पेटेंट दिलाया है।

हाल ही में आयोजित इमर्जिंग साइंस टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ESTIC 2025) के दौरान इस तकनीक की औपचारिक घोषणा की गई। यह उपकरण न्यूरोसाइंस, मटेरियल्स रिसर्च तथा सेमीकंडक्टर चिप्स के नॉन-डिस्ट्रक्टिव मूल्यांकन में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखता है, क्योंकि यह चिप्स के भीतर 3D परतों में चुंबकीय क्षेत्रों का सटीक मानचित्र तैयार कर सकता है।

इस अवसर पर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय के. सूद, DST सचिव प्रो. अभय करंदीकर सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक और अधिकारी उपस्थित थे।

आईआईटी बॉम्बे की प्रोफेसर कस्तूरी साहा के नेतृत्व में पी-क्वेस्ट समूह द्वारा विकसित यह माइक्रोस्कोप डायमंड में नाइट्रोजन-वैकेंसी (NV) केंद्रों पर आधारित है। ये एटॉमिक स्तर की संरचनाएं कमरे के तापमान पर भी अत्यंत स्थिर क्वांटम कोहेरेंस दिखाती हैं, जिससे वे चुंबकीय, विद्युत और तापीय परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील बन जाती हैं।

इन केंद्रों से उत्पन्न स्पिन-निर्भर फ्लोरेसेंस को ऑप्टिकली डिटेक्टेड मैग्नेटिक रेजोनेंस (ODMR) तकनीक द्वारा पढ़ा जा सकता है, जिससे स्थानीय चुंबकीय क्षेत्रों का सटीक मानचित्र तैयार होता है। उच्च NV घनत्व वाले पतले डायमंड लेयर का उपयोग कर, QDM नैनोस्केल पर त्रि-आयामी चुंबकीय इमेजिंग की क्षमता प्रदान करता है।

उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, 3D चिप आर्किटेक्चर, क्रायोजेनिक प्रोसेसर और स्वायत्त प्रणालियों के बढ़ते उपयोग के साथ, पारंपरिक उपकरण अब बहु-स्तरीय सर्किट्स और विद्युत प्रवाह का प्रत्यक्ष अवलोकन नहीं कर पाते। QDM इस चुनौती का समाधान प्रदान करता है, जिससे इंटीग्रेटेड सर्किट्स, बैटरियों और माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उच्च-रिज़ॉल्यूशन 3D मैग्नेटिक मैपिंग संभव हो सकेगी।

प्रोफेसर कस्तूरी साहा और उनकी टीम अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) आधारित कम्प्यूटेशनल इमेजिंग के साथ QDM को एकीकृत कर उन्नत चिप डायग्नोस्टिक्स, जैविक इमेजिंग और भू-चुंबकीय अध्ययन के लिए एक पूर्ण क्वांटम इमेजिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने पर कार्य कर रही है।

यह सफलता भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के उस लक्ष्य को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसका उद्देश्य वैश्विक क्वांटम तकनीक क्षेत्र में भारत को अग्रणी बनाना है।

भारत ने प्रदर्शित किया पहला 500 किमी लंबा क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) नेटवर्क : राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत क्वांटम-सुरक्षित संचार में ऐतिहासिक उपलब्धि

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम) के तहत समर्थित 8 स्टार्टअप्स में से एक ने भारत का पहला व्यापक क्वांटम की डिस्ट्रिब्यूशन (QKD) नेटवर्क सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया है, जो 500 किलोमीटर से अधिक लंबाई तक फैला हुआ है।

New design of rack of Quantum Suraksha Kavach launched

यह ऐतिहासिक उपलब्धि बेंगलुरु स्थित क्वांटम टेक्नोलॉजी कंपनी, QNu Labs Pvt. Ltd. द्वारा हासिल की गई है, जिसने मौजूदा ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क पर यह क्वांटम-सुरक्षित संचार नेटवर्क विकसित किया। यह भारत में क्वांटम-सुरक्षित संचार (Quantum Secure Communication) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

क्वांटम की डिस्ट्रिब्यूशन (QKD) नेटवर्क के इस प्रदर्शन की औपचारिक घोषणा एमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ESTIC 2025) के दौरान की गई। इस अवसर पर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय के. सूद, राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के मिशन गवर्निंग बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. अजय चौधरी, और डीएसटी के सचिव प्रो. अभय करंडिकार सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

QKD system installed in the QSK rack


नए ‘क्वांटम सुरक्षा कवच (Quantum Suraksha Kavach)’ रैक डिज़ाइन का शुभारंभ

कार्यक्रम के दौरान क्वांटम सुरक्षा कवच (QSK) रैक में स्थापित QKD प्रणाली का नया डिज़ाइन भी लॉन्च किया गया।

यह प्रदर्शन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृष्टिकोण के अनुरूप है जिसमें वे भारत को उभरती हुई प्रौद्योगिकियों और सुरक्षित डिजिटल बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अग्रणी के रूप में देखते हैं। यह भारत को “सेकंड क्वांटम रेवोल्यूशन” में एक प्रमुख भागीदार के रूप में स्थापित करता है और सुरक्षित डिजिटल संचार एवं उन्नत साइबर सुरक्षा के नए आयाम खोलता है।

यह परियोजना आई-हब क्वांटम टेक्नोलॉजी फाउंडेशन (I-Hub QTF) के माध्यम से वित्तपोषित की गई, जो राष्ट्रीय मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स (NMICPS) के अंतर्गत आईआईएसईआर पुणे में स्थित है।

भारतीय सेना का महत्वपूर्ण योगदान

भारतीय सेना के सदर्न कमांड सिग्नल्स ने इस क्षमता प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस QKD परीक्षण के लिए विशेष रूप से राजस्थान सेक्टर में एक ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क टेस्ट-बेड तैयार किया गया। इस नेटवर्क में कई नोड्स शामिल थे, जिनमें से दो को “ट्रस्टेड नोड्स” के रूप में उपयोग किया गया ताकि पूरे 500 किलोमीटर के प्रभावी क्षेत्र में क्वांटम की एक्सचेंज संभव हो सके।

यह उपलब्धि भारत में क्वांटम-सुरक्षित संचार प्रणाली को सशक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम है और राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के उद्देश्यों को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। यह तकनीक, अनुसंधान, उद्योग और रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र (STRIDE) के बीच उत्कृष्ट सहयोग का उदाहरण है।

QSIP तकनीक का प्रदर्शन प्रधानमंत्री के समक्ष

उसी स्टार्टअप QNu Labs द्वारा विकसित क्वांटम रैंडम नंबर जनरेटर सिस्टम-इन-पैकेज (QSIP) को ESTIC 2025 के उद्घाटन सत्र के दौरान केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रदर्शित किया। यह तकनीक क्वांटम-प्रमाणित रैंडमनेस प्रदान करती है, जो क्रिप्टोग्राफिक एल्गोरिद्म्स में उपयोग की जाती है, और मौजूदा साइबर खतरों व भविष्य के क्वांटम हमलों से सबसे मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

यह प्रदर्शन भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने राइडेबर्ग एटम्स में खोजी नई क्वांटम रहस्य

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रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) की टीम ने अत्यधिक ठंडे रूबिडियम परमाणुओं को लेजर और चुंबकीय क्षेत्र में फंसाकर राइडेबर्ग स्थिति में उत्तेजित किया। 100वें ऊर्जा स्तर से ऊपर जाने पर परमाणु अब स्वतंत्र नहीं रहे, बल्कि सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया देने लगे।

फंसाए गए ठंडे परमाणु सेटअप में राइडेबर्ग उत्तेजना का कलात्मक चित्रण

इस पहले वैश्विक प्रदर्शन ने दिखाया कि उच्च ऊर्जा राइडेबर्ग एटम्स में इंटरैक्शन-ड्रिवन विसंगतियाँ कैसे होती हैं। यह खोज क्वांटम कंप्यूटर, अल्ट्रा-सटीक सेंसर और भविष्य की संचार तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रो. संजुक्ता रॉय और उनकी टीम ने संवेदनशील डिटेक्शन सिस्टम की मदद से अत्यधिक ऊर्जा वाले राइडेबर्ग एटम्स का अध्ययन किया और क्वांटम दुनिया में भारत की मजबूती को साबित किया।

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