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रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मृत्यु कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्यशाला

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पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के प्रोजेक्ट एलीफेंट डिवीजन ने वन्यजीव संस्थान, देहरादून (Wildlife Institute of India – WII) के सहयोग से 10-11 मार्च 2026 को देहरादून में “रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मृत्यु को कम करने हेतु नीति कार्यान्वयन” विषय पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यक्रम में लगभग 40 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें MoEFCC के प्रोजेक्ट एलीफेंट डिवीजन, रेल मंत्रालय, हाथी क्षेत्र वाले राज्यों के वन विभागों और प्रमुख संरक्षण वैज्ञानिकों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल थे। कार्यशाला में ईस्ट सेंट्रल रेलवे, ईस्ट कोस्ट रेलवे, नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे, नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे, नॉर्दर्न रेलवे, साउथ ईस्टर्न रेलवे, साउदर्न रेलवे और साउथ वेस्टर्न रेलवे के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

भारत में विश्व की कुल एशियाई हाथी आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पाया जाता है। इनके प्रमुख आवास पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी और मध्य भारत में फैले हुए हैं। लेकिन आवासों के खंडित होने और हाथी क्षेत्रों में रेलवे नेटवर्क के विस्तार के कारण कई राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़ और झारखंड—में रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मृत्यु के मामलों में वृद्धि हुई है। इस कार्यशाला का उद्देश्य संरक्षण और अवसंरचना क्षेत्रों के बीच समन्वय को मजबूत करना तथा वैज्ञानिक आधार पर समाधान विकसित करना था।

वन्यजीव मृत्यु की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए MoEFCC ने WII और रेल मंत्रालय के सहयोग से हाथी क्षेत्रों में 110 संवेदनशील रेलवे खंड तथा दो बाघ क्षेत्रों में 17 अतिरिक्त खंडों की पहचान की है। प्रोजेक्ट एलीफेंट, WII, राज्य वन विभागों और भारतीय रेल की संयुक्त टीमों द्वारा किए गए विस्तृत फील्ड सर्वेक्षणों में प्रत्येक स्थान की पारिस्थितिक परिस्थितियों का अध्ययन कर स्थान-विशिष्ट समाधान सुझाए गए।

कुल 127 रेलवे खंडों (3,452.4 किमी) के विस्तृत आकलन के आधार पर 14 राज्यों में 77 खंड (1,965.2 किमी) को प्राथमिकता दी गई है, जहां वन्यजीवों की आवाजाही और दुर्घटना जोखिम को देखते हुए विशेष उपाय किए जाएंगे। इन प्राथमिक खंडों के लिए 705 शमन संरचनाओं की सिफारिश की गई है, जिनमें 503 रैंप और लेवल क्रॉसिंग, 72 पुलों का विस्तार या संशोधन, 39 फेंसिंग/ट्रेंच संरचनाएं, 4 एग्जिट रैंप, 65 नए अंडरपास और 22 ओवरपास शामिल हैं, ताकि वन्यजीव सुरक्षित रूप से रेलवे लाइन पार कर सकें।

कई नई रेलवे परियोजनाओं और ट्रैक विस्तार योजनाओं में भी वन्यजीव-अनुकूल संरचनाएं शामिल की गई हैं। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ के अचनाकमार-अमरकंटक हाथी कॉरिडोर से गुजरने वाली गेवरा रोड–पेंड्रा रोड रेलवे लाइन, महाराष्ट्र की दरेकासा–सालेकासा ट्रैक ट्रिपलिंग परियोजना, नागभीड–इतवारी गेज परिवर्तन परियोजना और वडसा–गडचिरोली रेलवे लाइन (जो कान्हा–नवेगांव–ताडोबा–इंद्रावती टाइगर कॉरिडोर को काटती है) में ऐसे प्रावधान किए गए हैं।

असम के अजारा–कामाख्या रेलवे खंड के 3.5 किमी लंबे संवेदनशील हिस्से में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रस्तावित है। यह हिस्सा रानी–गढ़भंगा–दीपोर बील हाथी कॉरिडोर से गुजरता है, जहां पहले कई हाथियों की मृत्यु हुई है। इस क्षेत्र में रेलवे लाइन को ऊंचा (एलीवेटेड) बनाया जाएगा ताकि हाथी सुरक्षित रूप से कॉरिडोर पार कर सकें।

तकनीकी समाधानों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में Distributed Acoustic System (DAS) आधारित Intrusion Detection System (IDS) लगाया जा रहा है, जो हाथियों की गतिविधि का पता लगाकर चेतावनी देता है। इसका पायलट प्रोजेक्ट नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे के चार खंडों में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है, जो असम में कुल 64.03 किमी हाथी कॉरिडोर और 141 किमी रेलवे ब्लॉक सेक्शन को कवर करता है। इस प्रणाली को अब उत्तर बंगाल और ओडिशा के संवेदनशील रेलवे क्षेत्रों में भी लागू किया जा रहा है।

इसके अलावा तमिलनाडु के मदुक्करई क्षेत्र में एक AI आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली भी लागू की गई है। इसमें 12 टावरों पर लगे थर्मल और मोशन-सेंसिंग कैमरे हाथियों की गतिविधि को ट्रैक करते हैं और ट्रैक से 100 मीटर के भीतर हाथियों के आने पर वन और रेलवे अधिकारियों को तुरंत सूचना देते हैं, जिससे ट्रेन की गति कम की जा सके और हाथियों को सुरक्षित पार करने का अवसर मिल सके।

कार्यशाला में हाथियों की पारिस्थितिकी, अवसंरचना योजना और जैव विविधता संरक्षण पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रतिभागियों ने राज्यों के आंकड़ों, केस स्टडी और दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों—जैसे आवास विखंडन, भूमि उपयोग परिवर्तन, तेज ट्रेन गति, रात में संचालन और हाथियों की मौसमी आवाजाही—पर चर्चा की।

क्षेत्रीय कार्य समूहों ने विभिन्न परिदृश्यों (शिवालिक-गंगा मैदान, मध्य भारत एवं पूर्वी घाट, उत्तर-पूर्व भारत और पश्चिमी घाट) में चल रहे प्रयासों की समीक्षा की और क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियां सुझाईं। बेहतर प्रथाओं में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सेंसर और AI आधारित पहचान तकनीक, GIS निगरानी और सामुदायिक चेतावनी एवं गश्त नेटवर्क शामिल रहे।

कार्यशाला में रेलवे प्राधिकरणों, वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया गया। साथ ही जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित करने तथा डेटा साझाकरण को मजबूत करने की सिफारिश की गई। प्रतिभागियों ने AI आधारित पहचान, रिमोट सेंसिंग और अन्य शोध क्षेत्रों को भी प्राथमिकता देते हुए प्रोजेक्ट एलीफेंट और रेल मंत्रालय के तहत एक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार करने का सुझाव दिया, ताकि वैज्ञानिक और सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से हाथी-ट्रेन टकराव की घटनाओं को कम किया जा सके।

28वीं राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की बैठक और 22वीं प्रोजेक्ट एलीफेंट की स्टियरिंग कमिटी बैठक विशाखापत्तनम में सम्पन्न

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21 दिसंबर 2025 को सुंदरबन टाइगर रिज़र्व, पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की 28वीं बैठक और प्रोजेक्ट एलीफेंट की 22वीं स्टियरिंग कमिटी बैठक आयोजित की गई। इन बैठकों की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक, बाघ और हाथी क्षेत्रों के विशेषज्ञ तथा प्रमुख संरक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक का उद्देश्य प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट की प्रगति की समीक्षा करना और भारत में बाघों और हाथियों के संरक्षण के लिए भविष्य की रणनीतियों पर विचार-विमर्श करना था।

NTCA बैठक:

भूपेन्द्र यादव ने बैठक की अध्यक्षता करते हुए भारत के वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त बाघ संरक्षण मॉडल पर प्रकाश डाला और विज्ञान-आधारित प्रबंधन, परिदृश्य स्तर की योजना, समुदाय की भागीदारी, अंतर-राज्य समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया।

27वीं बैठक के मिनट्स की पुष्टि की गई और उसमें लिए गए निर्णयों पर कार्रवाई की समीक्षा की गई। चार क्षेत्रीय बैठकों के परिणामों पर चर्चा हुई, जिसमें बाघ रिज़र्वों की प्रमुख चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। मानव–बाघ संघर्ष को कम करने के उपायों पर चर्चा हुई, जिसमें तीन-तरफा रणनीति और “बाघ रिज़र्व के बाहर बाघों का प्रबंधन” परियोजना का शुभारंभ शामिल था। साथ ही स्टाफ की कमी, वित्तीय बाधाएँ, आवासीय विघटन और आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन से संबंधित मुद्दों की समीक्षा की गई और राज्यों तथा संबंधित प्राधिकरणों को उचित कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

बैठक ने NTCA की तकनीकी समिति की बैठकों के निर्णयों को अनुमोदित किया, जिनमें बाघ संरक्षण योजनाओं का अनुमोदन, प्रोजेक्ट चीताह का विस्तार और वृद्धि, बाघों का स्थानांतरण, शिकार प्रजातियों की वृद्धि, परिदृश्य प्रबंधन योजना, मांसाहारी स्वास्थ्य प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रम और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) को परियोजना प्रस्तावों पर NTCA की सिफारिशें शामिल हैं।

बैठक में 7वीं राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड द्वारा NTCA को दिए गए निर्देशों का अनुपालन, प्रोजेक्ट चीताह का गुजरात के गांधीसागर वन्य अभयारण्य और बन्नी घासभूमि में विस्तार, CAMPA द्वारा समर्थित पहलों की प्रगति और प्रस्तावित ग्लोबल बिग कैट समिट की तैयारियों की समीक्षा की गई।

मंत्री ने NTCA की प्रमुख चल रही गतिविधियों की समीक्षा की, जिसमें सिक्स्थ साइकिल ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन, विभिन्न क्षेत्रों में परिदृश्य स्तर के प्रशिक्षण कार्यक्रम, नवंबर 2025 से शुरू हुए ग्राउंड सर्वे और प्रोजेक्ट चीताह के तहत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया और बोत्सवाना से प्रतिनिधिमंडलों के दौरे सहित) शामिल हैं। बैठक ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी संज्ञान लिया और इसके बाघ संरक्षण और प्रबंधन पर प्रभाव पर विचार किया।


प्रोजेक्ट एलीफेंट स्टियरिंग कमिटी बैठक:

बैठक की शुरुआत 21वीं स्टियरिंग कमिटी बैठक के एक्शन टेकन रिपोर्ट की पुष्टि से हुई, इसके बाद स्टियरिंग कमिटी सदस्यों और स्थायी आमंत्रितों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर चर्चा की गई।

दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्व भारत में हाथी संरक्षण के क्षेत्रीय कार्य योजनाओं की स्थिति प्रस्तुत की गई, जिसमें हाथी क्षेत्र राज्यों द्वारा की गई प्रगति और समन्वित अंतर-राज्यीय कार्रवाई के प्राथमिक क्षेत्र चिन्हित किए गए।

ऑल-इंडिया सिंक्रोनाइज्ड एलीफेंट एस्टिमेशन पर अपडेट प्रस्तुत किया गया, जो साक्ष्य-आधारित योजना और निर्णय लेने के लिए महत्वपूर्ण है। नीलगिरी हाथी रिज़र्व के लिए मॉडल एलीफेंट संरक्षण योजना और पालतू हाथियों के DNA प्रोफाइलिंग पर चल रहे कार्यों पर भी चर्चा हुई, जिसमें वैज्ञानिक प्रबंधन और कल्याण मानकों को सुदृढ़ करने पर जोर दिया गया।

मानव–हाथी संघर्ष की स्थिति की व्यापक समीक्षा की गई। समिति ने संघर्ष के कारणों और शमन उपायों पर चल रहे अध्ययन के निष्कर्षों पर चर्चा की, साथ ही हाथी क्षेत्र राज्यों द्वारा अपनाए गए मुआवजा तंत्र की स्थिति और पर्याप्तता का मूल्यांकन किया।

बैठक में हाथी आबादी के अनुमान के तरीकों, रिपु–चिरांग हाथी रिज़र्व के लिए समेकित संरक्षण और प्रबंधन रणनीतियों की प्रगति और भविष्य की कार्य योजनाओं पर भी विचार किया गया। इसमें CAMPA फंडिंग सहायता के साथ सभी हाथी रिज़र्वों के लिए मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन और बांधवगढ़ क्षेत्र में हाथी मार्गों, आवास उपयोग और संघर्ष हॉटस्पॉट पर प्रस्तावित अध्ययन शामिल हैं।

स्टियरिंग कमिटी ने भारत सरकार की विज्ञान-आधारित संरक्षण, अंतर-राज्य समन्वय, तकनीकी नवाचार और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोणों के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया, ताकि हाथियों और हाथी निवास क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सतत भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।

इस अवसर पर भूपेन्द्र यादव ने छह प्रकाशन जारी किए। इनमें शामिल हैं:

  • Project Cheetah in India – वैज्ञानिक प्रबंधन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से प्रोजेक्ट चीताह की प्रगति


  • STRIPES (NTCA का आउटरीच जर्नल) – आधुनिक तकनीक, बाघों का विसरण और ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन की छठी साइकिल

  • NTCA बुकलेट – भारत के बाघ संरक्षण ढांचे और संस्थागत मील के पत्थरों का दस्तावेजीकरण

  • Tigerverse – Little-known facts from India’s Tiger Reserves – बाघ रिज़र्व से जैवविविधता, संस्कृति और संरक्षण कहानियाँ

  • Best Practices in Captive Elephant Management – हाथी परिचालकों के लिए

  • TRUMPET Quarterly Journal (दिसंबर 2025 अंक)

अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल अभयारण्य दिवस 2025: प्रकृति और मानव के संतुलन का उत्सव

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विश्वभर में 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल अभयारण्य दिवस (International Day for Biosphere Reserves) मनाया जाता है — यह दिन उन क्षेत्रों के सम्मान में समर्पित है जहाँ प्रकृति और मानव समुदाय सामंजस्यपूर्ण रूप से सह-अस्तित्व करते हैं। ये अभयारण्य न केवल पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक हैं, बल्कि सतत विकास और सामुदायिक कल्याण के प्रयोगात्मक प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करते हैं।

भारत, जैवमंडल अभयारण्यों के वैश्विक नेटवर्क का एक अग्रणी सदस्य होने के नाते, इस दिवस को गर्व के साथ मनाता है। यहाँ पहाड़ों से लेकर तटीय क्षेत्रों और द्वीपों तक फैले 18 जैवमंडल अभयारण्य (Biosphere Reserves) हैं, जिनमें से 13 यूनेस्को द्वारा विश्व जैवमंडल नेटवर्क (WNBR) में शामिल हैं। ये अभयारण्य भारत की जैव विविधता, पारिस्थितिकीय समृद्धि और स्थानीय समुदायों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

भारत का जैवमंडल अभयारण्य नेटवर्क

भारत के पास वर्तमान में 91,425 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 18 जैवमंडल अभयारण्य हैं। यह कार्यक्रम पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अधीन एक केंद्रीय प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) के रूप में संचालित होता है, जिसमें वित्तीय साझेदारी अनुपात 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 रखा गया है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में जैव विविधता संरक्षण का बजट ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ कर दिया गया है, जो सरकार की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

2025 में हिमाचल प्रदेश के “कोल्ड डेजर्ट बायोस्फीयर रिज़र्व” का यूनेस्को में शामिल होना भारत की बढ़ती वैश्विक संरक्षण भूमिका को और मज़बूती प्रदान करता है।

जैवमंडल अभयारण्य क्या हैं?

जैवमंडल अभयारण्य ऐसे संरक्षित क्षेत्र होते हैं जिन्हें राष्ट्रीय सरकारें नामित करती हैं ताकि:

  • जैव विविधता का संरक्षण किया जा सके,

  • और साथ ही स्थानीय समुदायों के लिए सतत आजीविका के अवसर प्रदान किए जा सकें।

इन्हें “सतत विकास के अध्ययन केंद्र” (Learning Places for Sustainable Development) कहा जाता है।
इनका उद्देश्य सामाजिक और पारिस्थितिकीय प्रणालियों के बीच संबंधों को समझना और उन्हें संतुलित करना है।

विश्वभर में 26 करोड़ से अधिक लोग जैवमंडल अभयारण्यों में रहते हैं, जो कुल मिलाकर 7 मिलियन वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करते हैं — यह ऑस्ट्रेलिया के आकार के बराबर है।

यूनेस्को का “मैन एंड बायोस्फीयर (MAB)” कार्यक्रम

यूनेस्को का Man and Biosphere Programme (MAB) एक अंतरराष्ट्रीय पहल है, जो पृथ्वी के पारिस्थितिकीय संतुलन को समझने और मानव कल्याण के साथ सामंजस्य स्थापित करने पर केंद्रित है।
इसका उद्देश्य है —

  • जैवमंडल में हो रहे प्राकृतिक और मानवीय परिवर्तनों का अध्ययन,

  • जैव और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण को बढ़ावा देना,

  • और सतत विकास के लिए वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करना।

यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय समन्वय परिषद (MAB-ICC) के अंतर्गत संचालित होता है, जिसमें 34 सदस्य देश शामिल हैं।

 भारत की पहल और उपलब्धियाँ

भारत का जैवमंडल अभयारण्य कार्यक्रम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय नेतृत्व का उदाहरण है।
यह कार्यक्रम न केवल पारिस्थितिक संरक्षण को बढ़ावा देता है बल्कि स्थानीय समुदायों के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर भी केंद्रित है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • स्थानीय समुदायों को आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराना

  • बफर और ट्रांज़िशन जोनों में इको-विकास गतिविधियाँ

  • सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से जैव विविधता पर दबाव कम करना

भारत के जैवमंडल अभयारण्य, प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलिफेंट, ग्रीन इंडिया मिशन, और राष्ट्रीय जैव विविधता कार्ययोजना (NBAP) जैसी राष्ट्रीय पहलों के साथ मिलकर एक समग्र संरक्षण ढांचा तैयार करते हैं।

संरक्षण से जुड़ी प्रमुख राष्ट्रीय योजनाएँ

  • प्रोजेक्ट टाइगर (1973): बाघ संरक्षण की भारत की सबसे सफल पहल, जिसने बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की है।

  • प्रोजेक्ट एलिफेंट: एशियाई हाथियों की सुरक्षा, उनके आवास का संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने पर केंद्रित।

  • ग्रीन इंडिया मिशन: जलवायु परिवर्तन से निपटने और वन आच्छादन बढ़ाने की दिशा में राष्ट्रीय अभियान।

  • इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ वाइल्डलाइफ हैबिटैट्स (IDWH): राज्य सरकारों को तकनीकी व वित्तीय सहायता प्रदान करने वाली योजना।

  • ईको सेंसिटिव जोन (ESZ): संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बफर जोन बनाकर पारिस्थितिकी की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

भारत की वैश्विक स्थिति और उपलब्धियाँ

  • भारत विश्व में 9वें स्थान पर है कुल वन क्षेत्र के आधार पर।

  • वार्षिक वन वृद्धि दर में भारत तीसरे स्थान पर है (FAO रिपोर्ट, 2025)।

  • सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक प्रबंधन ने भारत को जैव विविधता संरक्षण में अग्रणी बनाया है।

भारत के प्रयासों ने पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, जलवायु लचीलापन मजबूत करने और जैव विविधता को संरक्षित करने में निर्णायक योगदान दिया है।

निष्कर्ष

  • भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल अभयारण्य दिवस का उत्सव मनाना उसकी सतत विकास और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
  • भारत के जैवमंडल अभयारण्य यह सिद्ध करते हैं कि प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक कल्याण साथ-साथ चल सकते हैं।
  • यूनेस्को के साथ साझेदारी और सरकार के सुदृढ़ प्रयासों से भारत न केवल जैव विविधता संरक्षण का वैश्विक नेता बना है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सतत जीवन शैली (Sustainable Living) का मार्गदर्शन भी कर रहा है। 


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