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गणतंत्र दिवस परेड 2026 में संस्कृति मंत्रालय को दोहरा सम्मान, ‘वंदे मातरम्’ झांकी और सांस्कृतिक प्रस्तुति को पुरस्कार

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संस्कृति मंत्रालय ने गणतंत्र दिवस परेड 2026 में एक महत्वपूर्ण दोहरी उपलब्धि हासिल की। मंत्रालय की झांकी “वंदे मातरम् – 150 वर्षों की यात्रा” को केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ झांकी का प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया, जबकि इसकी भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुति “वंदे मातरम्: भारत की शाश्वत गूंज” को अपनी असाधारण कलात्मक एवं विषयगत उत्कृष्टता के लिए विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

पुरस्कार विजेता झांकी ने ‘वंदे मातरम्’ की 150 वर्षों की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया, जिसमें इसके राष्ट्रीय चेतना के गीत के रूप में उद्भव और भारत के स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय एकता तथा सभ्यतागत चेतना को आकार देने में इसकी सतत भूमिका को दर्शाया गया। सशक्त दृश्यांकन और प्रतीकात्मक प्रस्तुति के माध्यम से झांकी ने राष्ट्रीय गीत की भारतीय सामूहिक पहचान में उसकी कालातीत प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

विशेष पुरस्कार से सम्मानित सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुति “वंदे मातरम् – भारत की शाश्वत गूंज” का संयोजन संगीत नाटक अकादमी द्वारा उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, पटियाला के सहयोग से किया गया। यह प्रस्तुति राष्ट्रऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की उस अमर रचना को नमन करती है, जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बनी। इस भव्य प्रदर्शन में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए लगभग 2,500 कलाकारों ने भाग लिया और शास्त्रीय, लोक तथा जनजातीय कला रूपों के माध्यम से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का सजीव प्रदर्शन किया।

कोरियोग्राफी के माध्यम से भारत की शाश्वत यात्रा को उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान तथा सशस्त्र बलों के शौर्य और समर्पण तक प्रभावी रूप से उकेरा गया। संस्कृत मंत्रों, भावपूर्ण संगीत और गतिशील संरचनाओं से सजी इस प्रस्तुति ने ‘वंदे मातरम्’ की संपूर्ण भावनात्मक और दार्शनिक यात्रा को अभिव्यक्त किया, जिसका समापन तिरंगे को समर्पित एक सशक्त श्रद्धांजलि के साथ हुआ—जो एकता, भक्ति और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है।

इस सांस्कृतिक प्रस्तुति का समग्र रचनात्मक निर्देशन संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा ने किया। संगीत निर्देशन ऑस्कर पुरस्कार विजेता संगीतकार एम. एम. कीरावानी द्वारा किया गया, जबकि अतिरिक्त गीत सुभाष सहगल ने लिखे। वॉयस-ओवर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता अनुपम खेर ने दिया, कोरियोग्राफी संतोष नायर द्वारा की गई तथा परिधान परिकल्पना संध्या रमन ने की।


प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में ‘दी लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन’ अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का किया उद्घाटन

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज नई दिल्ली स्थित राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर में भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी “दी लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन” का उद्घाटन किया। संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित यह ऐतिहासिक प्रदर्शनी एक शताब्दी से अधिक समय बाद पहली बार भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों, रत्न-अवशेषों एवं अवशेष पात्रों का अब तक का सबसे व्यापक और दुर्लभ संग्रह एक साथ प्रस्तुत कर रही है, जिनमें हाल ही में भारत को प्रत्यावर्तित किए गए अवशेष भी शामिल हैं।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा,

“125 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भारत की विरासत वापस लौटी है और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर अपने घर लौट आई है। आज से भारत की जनता भगवान बुद्ध के इन पावन अवशेषों के दर्शन कर सकेगी और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेगी।”

इस अवसर पर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि प्रधानमंत्री की उपस्थिति, जिनमें भारत की आत्मा को शासन की कार्यवाही में रूपांतरित करने की अद्वितीय क्षमता है, सदैव प्रेरणादायी और विशेष महत्व रखती है। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री का स्वागत करना सभी के लिए अत्यंत गर्व का विषय है।

यह उद्घाटन भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक यात्रा में एक ऐतिहासिक क्षण है, जो 127 वर्षों के बाद पिपरहवा अवशेषों के पुनः एकीकरण का साक्षी बना है। इस संग्रह में 1898 में कपिलवस्तु में हुए उत्खनन से प्राप्त अवशेष, 1972–75 के उत्खननों से मिली सामग्री, भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित धरोहर तथा पेप्पे परिवार का वह संग्रह शामिल है, जिसे जुलाई 2025 में भारत सरकार के निर्णायक हस्तक्षेप के बाद विदेश में नीलामी से रोककर भारत वापस लाया गया।

प्रधानमंत्री के आगमन पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता; केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत; केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू; दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना; संस्कृति राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने उनका स्वागत किया।

अपने भ्रमण के दौरान प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और भगवान बुद्ध की ध्यानमग्न प्रतिमा पर खटक और गुलाब की पंखुड़ियाँ अर्पित कीं। उन्होंने पिपरहवा स्थल से प्राप्त एक प्राचीन मुहर का अभिषेक किया, बोधि वृक्ष का पौधारोपण किया, आगंतुक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए, प्रदर्शनी कैटलॉग का विमोचन किया तथा उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं को चिवर दान अर्पित किया।

“दी लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन” विषयवस्तु के अंतर्गत क्यूरेट की गई इस प्रदर्शनी में 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान काल तक की 80 से अधिक विशिष्ट और दुर्लभ वस्तुएँ प्रदर्शित की गई हैं। इनमें मूर्तियाँ, पांडुलिपियाँ, थंका चित्र, अनुष्ठानिक वस्तुएँ, अवशेष पात्र और रत्नजड़ित धरोहरें शामिल हैं। प्रदर्शनी का केंद्र बिंदु वह विशाल एकाश्म पत्थर का संदूक है, जिसमें मूल रूप से ये पवित्र अवशेष खोजे गए थे।

1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा कपिलवस्तु से संबद्ध प्राचीन स्तूप स्थल पर खोजे गए पिपरहवा अवशेष भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से एक हैं। आज इनका पुनः एकत्र होना भारत की सांस्कृतिक धरोहर को पुनः प्राप्त करने, संरक्षित करने और सम्मान देने की अटूट प्रतिबद्धता का सशक्त प्रतीक है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक सहभागिता में उसकी सभ्यतागत और आध्यात्मिक विरासत की भूमिका लगातार सशक्त हुई है। अब तक 642 प्राचीन धरोहरें भारत वापस लाई जा चुकी हैं, जिनमें पिपरहवा अवशेषों की वापसी सांस्कृतिक कूटनीति और विरासत संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

इस उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्रीगण, राजनयिक समुदाय के सदस्य, राजदूत, वंदनीय बौद्ध भिक्षु, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, विद्वान, विरासत विशेषज्ञ, कला जगत के प्रतिनिधि, विद्यार्थी तथा देश-विदेश से आए बौद्ध अनुयायी उपस्थित रहे।

यह प्रदर्शनी संस्कृति मंत्रालय की विरासत संरक्षण एवं सांस्कृतिक नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करती है तथा बुद्ध धम्म की जन्मभूमि के रूप में भारत की विशिष्ट पहचान और विश्व के साथ अपनी सभ्यतागत विरासत साझा करने के उसके स्थायी संकल्प का उत्सव है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने पुनः कहा,

“125 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भारत की विरासत वापस लौटी है और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर अपने घर लौट आई है। आज से भारत की जनता भगवान बुद्ध के इन पावन अवशेषों के दर्शन कर सकेगी और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेगी।”





प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 जनवरी 2026 को पिपरहवा बुद्ध अवशेषों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी का करेंगे उद्घाटन

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संस्कृति मंत्रालय द्वारा हाल ही में भारत वापस लाए गए पिपरहवा अवशेषों, अवशेष पात्रों (रिलिक्वेरीज़) और रत्न अवशेषों को प्रदर्शित करने के लिए राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में एक ऐतिहासिक प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 3 जनवरी 2026 को प्रातः 11.00 बजे किया जाएगा।

यह ऐतिहासिक अवसर 127 वर्षों बाद भगवान बुद्ध के पिपरहवा रत्न अवशेषों के पुनः एकत्रीकरण का प्रतीक है, जिन्हें पिपरहवा स्थल पर 1898 तथा बाद में 1971–1975 के उत्खननों में प्राप्त अवशेषों, रत्न अवशेषों और अवशेष पात्रों के साथ एक साथ प्रदर्शित किया जा रहा है।

“द लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकेंड वन” शीर्षक से आयोजित यह प्रदर्शनी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न सांस्कृतिक संस्थानों से संबंधित प्रासंगिक पुरावशेषों और कलाकृतियों को विषयगत रूप से प्रस्तुत करती है। ये अवशेष भगवान बुद्ध से संबद्ध सबसे व्यापक संग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो गहन दार्शनिक अर्थ, उत्कृष्ट शिल्पकला और वैश्विक आध्यात्मिक महत्व के प्रतीक हैं। प्रदर्शनी में छठी शताब्दी ईसा पूर्व से वर्तमान काल तक की अवधि के 80 से अधिक वस्तुएं प्रदर्शित की जा रही हैं, जिनमें मूर्तियां, पांडुलिपियां, थंका चित्र और अनुष्ठानिक वस्तुएं शामिल हैं।

यह अभूतपूर्व आयोजन जुलाई 2025 में संस्कृति मंत्रालय द्वारा पिपरहवा अवशेषों की सफल स्वदेश वापसी को स्मरण करता है, जिसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से और सॉथबीज़, हांगकांग में प्रस्तावित नीलामी को रोकते हुए संभव बनाया गया। 1898 के उत्खनन के बाद पहली बार, इस प्रदर्शनी में निम्नलिखित को एक साथ प्रस्तुत किया जा रहा है:

  • 1898 के कपिलवस्तु उत्खनन से प्राप्त अवशेष

  • 1972 के उत्खननों से प्राप्त निधियां

  • भारतीय संग्रहालय, कोलकाता से अवशेष पात्र और जड़ाऊ रत्न

  • पेप्पे परिवार के संग्रह से हाल ही में स्वदेश लौटाए गए अवशेष

  • वह एकाश्म पत्थर का संदूक, जिसमें मूल रूप से रत्न अवशेष और अवशेष पात्र पाए गए थे

पवित्र बुद्ध अवशेषों की खोज 1898 में विलियम क्लैक्टन पेप्पे द्वारा प्राचीन कपिलवस्तु स्तूप में की गई थी। खोज के पश्चात इनका एक हिस्सा सियाम (वर्तमान थाईलैंड) के राजा को भेंट किया गया, एक हिस्सा इंग्लैंड ले जाया गया और तीसरा हिस्सा भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित रहा। 2025 में, संस्कृति मंत्रालय के निर्णायक हस्तक्षेप और विश्वभर के बौद्ध समुदायों के समर्थन से पेप्पे परिवार के पास रहे अवशेषों को भारत वापस लाया गया।

यह प्रदर्शनी बौद्ध धर्म की जन्मभूमि के रूप में भारत की भूमिका को रेखांकित करती है और वैश्विक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व में उसकी स्थिति को और सुदृढ़ करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक सहभागिता में उसकी सभ्यतागत और आध्यात्मिक विरासत का विशेष महत्व उभरकर सामने आया है। अब तक 642 पुरावशेषों की भारत में वापसी हो चुकी है, जिनमें पिपरहवा अवशेषों की वापसी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्रीगण, राजदूत एवं राजनयिक समुदाय के सदस्य, वंदनीय बौद्ध भिक्षु, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, विद्वान, विरासत विशेषज्ञ, कला जगत की प्रतिष्ठित हस्तियां, कला प्रेमी, बौद्ध धर्म के अनुयायी और छात्र भाग लेंगे।

यह प्रदर्शनी विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक नेतृत्व के प्रति संस्कृति मंत्रालय की प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करती है तथा भारत की आध्यात्मिक विरासत और बुद्ध धम्म की जन्मभूमि के रूप में उसके वैश्विक महत्व का उत्सव मनाती है। यह भारत की उस सतत प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है, जिसके तहत वह अपनी सभ्यतागत धरोहर को संरक्षित कर विश्व के साथ साझा करता रहा है।


भारत की भाषाई विरासत को नया आयाम: मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला को मिला ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा

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प्रमुख बिंदु

  • भारत सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला भाषाओं को ‘शास्त्रीय भाषा’ (Classical Language) का दर्जा प्रदान किया।
  • अक्टूबर 2025 तक भारत की कुल 11 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त हो चुका है।
  • 2004 से 2024 के बीच छह भारतीय भाषाओं — तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओड़िया — को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई थी।

परिचय

भारत भाषाई विविधता से परिपूर्ण देश है, जहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। भारत सरकार देश की भाषाई विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए अनेक नीतियाँ और कार्यक्रम चलाती है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पहल है — भाषाओं को "शास्त्रीय भाषा" का दर्जा देना। यह दर्जा उन भाषाओं को दिया जाता है जिनका प्राचीन साहित्य, दर्शन और संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी हो और जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हो।

3 अक्टूबर 2024 को केंद्र सरकार ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला को शास्त्रीय भाषाओं की श्रेणी में शामिल किया, जिससे भारत में शास्त्रीय भाषाओं की संख्या 11 हो गई।

शास्त्रीय भाषा का महत्व

किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देना केवल एक भाषाई मान्यता नहीं है, बल्कि यह उस भाषा की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को सम्मान देने का प्रतीक है। यह दर्जा उस भाषा के साहित्य, ज्ञान, दर्शन और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए संस्थागत सहयोग सुनिश्चित करता है।

शास्त्रीय भाषा के निर्धारण के मापदंड

भारत सरकार ने भाषाविदों और इतिहासकारों से परामर्श कर शास्त्रीय भाषा निर्धारण हेतु निम्नलिखित मानक निर्धारित किए हैं:

  1. भाषा का प्राचीनतम रूप कम से कम 1500–2000 वर्ष पुराना हो।

  2. उस भाषा का समृद्ध प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का भंडार हो।

  3. काव्य के साथ-साथ गद्य, अभिलेख और शिलालेखों में भी उसका प्रमाण मिले।

  4. आधुनिक स्वरूप से उसका रूपांतर या निरंतरता स्पष्ट रूप से दिखे।

नई शास्त्रीय भाषाएँ (2024)

मराठी

  • मराठी भाषा महाराष्ट्र की प्रमुख भाषा है और इसकी साहित्यिक परंपरा लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है।
  • मुख्य ग्रंथ: गाथासप्तशती, लीलाचरित्र, ज्ञानेश्वरी।
  • प्रमुख संत कवि: संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम।
  • नानेघाट शिलालेख मराठी की प्राचीनता का प्रमाण है।

पाली

  • पाली भाषा भगवान बुद्ध के उपदेशों की भाषा रही है।
  • मुख्य ग्रंथ: त्रिपिटक — विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक।
  • पाली साहित्य में जातक कथाएँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, जो बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ हैं।

प्राकृत

  • प्राकृत भारत की मध्य इंडो-आर्यन भाषाओं का समूह है, जिससे हिंदी, मराठी, बांग्ला आदि आधुनिक भाषाएँ विकसित हुईं।
  • प्रयोग: भगवान बुद्ध और महावीर ने प्राकृत में उपदेश दिए।
  • महत्व: प्राकृत ने भारतीय साहित्य, नाटक, दर्शन और विज्ञान के विकास में अहम भूमिका निभाई।

असमिया

  • असमिया भाषा संस्कृत और मागधी अपभ्रंश से विकसित हुई है।
  • प्राचीन ग्रंथ: चर्यापद (8वीं से 12वीं सदी)।
  • असमिया, बंगाली और ओड़िया भाषाएँ एक ही भाषाई परंपरा से विकसित हुई हैं।

बांग्ला

  • बांग्ला भाषा भारत की प्रमुख भाषाओं में से एक है।
  • प्राचीन साहित्य: चर्यापद (10वीं–12वीं सदी)।
  • स्वर्ण युग: 19वीं–20वीं सदी — राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय।
  • राष्ट्रीय प्रतीक: राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ — दोनों ही बांग्ला साहित्य की देन हैं।

शास्त्रीय भाषाओं के संवर्धन के लिए सरकारी प्रयास

भारत सरकार ने शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और प्रचार के लिए कई संस्थान स्थापित किए हैं:

  • केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL), मैसूर

  • सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल, चेन्नई

  • सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस — कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओड़िया के लिए।

  • केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्री लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय।

मुख्य गतिविधियाँ:

  • प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण

  • प्राचीन ग्रंथों का अनुवाद

  • शोध और प्रकाशन

  • भाषाई दस्तावेज़ीकरण और ऑडियो-वीडियो संग्रहण

निष्कर्ष

“विरासत भी, विकास भी” — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह मंत्र भारत की सांस्कृतिक नीति का सार है। भारत की शास्त्रीय भाषाएँ — संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला — हमारे बौद्धिक और सांस्कृतिक वैभव की जीवित प्रतीक हैं।

इन भाषाओं को शास्त्रीय दर्जा देकर सरकार ने न केवल उनकी प्राचीनता को सम्मान दिया है, बल्कि युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का मार्ग भी प्रशस्त किया है। यह पहल आत्मनिर्भर भारत और सांस्कृतिक रूप से सशक्त भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।


भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष रूस के काल्मिकिया गणराज्य में होंगे प्रदर्शित

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नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष (Sacred Relics of the Buddha) अब रूस के काल्मिकिया गणराज्य में प्रदर्शित किए जाएंगे। यह पवित्र अवशेष वहाँ के बौद्ध बहुल क्षेत्र के श्रद्धालुओं के दर्शन एवं पूजन के लिए विशेष प्रदर्शनी के रूप में ले जाए जाएंगे।

इस पवित्र यात्रा के साथ भारत से 11 वरिष्ठ भिक्षुओं का उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी जाएगा, जो स्थानीय भक्तों को आशीर्वाद देंगे और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करेंगे।

काल्मिकिया की राजधानी एलीस्ता में आयोजित इस प्रदर्शनी का आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन (IBC), राष्ट्रीय संग्रहालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी 11 से 18 अक्टूबर 2025 तक चलेगी।

इन पवित्र अवशेषों को एलीस्ता के मुख्य बौद्ध मठ गेदन शेड्डुप चोईकोर्लिंग मठ (Golden Abode of Shakyamuni Buddha) में प्रतिष्ठित किया जाएगा। यह मठ तिब्बती बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र है और 1996 में सार्वजनिक रूप से खोला गया था।

प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य करेंगे। इस दौरान विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें साक्य परंपरा के प्रमुख परम पावन 43वें साक्य त्रिजिन रिनपोछे के प्रवचन एवं ‘कंजूर’ (108 वॉल्यूम वाले मंगोलियाई धार्मिक ग्रंथों का सेट) का नौ बौद्ध संस्थानों और एक विश्वविद्यालय को प्रदान करना शामिल है।

इस अवसर पर इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन और सेंट्रल स्पिरिचुअल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ बुद्धिस्ट के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाने की भी संभावना है।

साथ ही, “Sacred Legacy of the Shakyas: Excavation and Exposition of Buddha’s Relics” शीर्षक से एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी, जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेषों की प्राचीन काल से पुनः खोज तक की यात्रा को पैनल्स के माध्यम से दर्शाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, ‘बोधिचित्त’ – बौद्ध कला के खजाने नामक प्रदर्शनी भी राष्ट्रीय संग्रहालय और राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के सहयोग से प्रस्तुत की जाएगी।

भारत से ले जाए जा रहे इन पवित्र अवशेषों को भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से संपूर्ण धार्मिक विधि-विधान के साथ काल्मिकिया पहुंचाया जाएगा।

गौरतलब है कि काल्मिकिया यूरोप का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहाँ महायान बौद्ध धर्म का पालन किया जाता है। यह क्षेत्र विशाल घास के मैदानों और रेगिस्तानी इलाकों से घिरा हुआ है तथा कैस्पियन सागर के तट पर स्थित है।

इससे पूर्व भी भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को मंगोलिया (2022), थाईलैंड (2024) और वियतनाम (2025) में प्रदर्शित किया जा चुका है। काल्मिकिया में प्रदर्शित किए जाने वाले ये अवशेष नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय की ‘बौद्ध गैलरी’ से लिए गए हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कुछ माह पूर्व भगवान बुद्ध के पिपरहवा रत्नावशेषों की भारत वापसी पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा था, “यह प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का क्षण है कि भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष 127 वर्षों बाद अपने देश लौटे हैं। ये अवशेष भारत की भगवान बुद्ध और उनकी शिक्षाओं से घनिष्ठ निष्ठा को दर्शाते हैं।”


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