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सफलता की कहानी-पलाश फूल से बढ़ती आजीविका और समृद्धि

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रायपुर- पलाश (टेसू या ढाक) का फूल न केवल प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आजीविका और स्वास्थ्य के लिए एक बहुमूल्य संसाधन है। इसके नारंगी-लाल फूलों को जंगल की आग भी कहा जाता है, जो वसंत ऋतु में ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि लाते हैं। पलाश के फूल, बीज और गोंद (कमरकस) आयुर्वेद में चर्म रोग, पेट के कीड़े, डायबिटीज, और यौन स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्रयुक्त होते हैं। इन औषधीय उत्पादों को बेचकर भी ग्रामीण अपनी आय बढ़ाते हैं।

औषधीय और सांस्कृतिक फूल है पलाश

पलाश फूल (ब्यूटिया मोनोस्पर्मा), जिसे टेसू, ढाक या “जंगल की आग” (फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट) भी कहा जाता है, भारत का एक महत्वपूर्ण औषधीय और सांस्कृतिक फूल है। बसंत ऋतु में खिलने वाले इसके आकर्षक नारंगी फूल न केवल प्राकृतिक सुंदरता बढ़ाते हैं, बल्कि औषधीय उपयोग, प्राकृतिक होली रंग और त्वचा की देखभाल में भी काम आते हैं। छत्तीसगढ़ के वन मण्डल कटघोरा में पलाश के वृक्ष बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। पसान, केन्दई, जटगा, एतमानगर, कटघोरा, चौतमा और पाली जैसे क्षेत्रों में इसकी भरपूर उपलब्धता है। यहां के आदिवासी और वनवासी परिवारों के लिए लघु वनोपज संग्रहण आजीविका का प्रमुख साधन है। पलाश फूल का संग्रहण मुख्यत मार्च-अप्रैल माह में किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ, रायपुर द्वारा वर्ष 2025 में इसका संग्रहण दर 11.50 रूपए प्रति किलोग्राम निर्धारित किया गया। यह दर संग्राहकों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य दिलाने में मददगार साबित हुई है।

कटघोरा वनमण्डल में पलाश फूल का संग्रहण लगातार बढ़ रहा है

वर्ष 2022-23 में 116 संग्राहकों से 402 क्विंटल, वर्ष 2023-24 में 40 संग्राहकों से 58 क्विंटल,वर्ष 2024-25 में 107 संग्राहकों से 147 क्विंटल और वर्ष 2025-26 में 20 संग्राहकों से 76 क्विंटल संग्रहण किया गया इसके साथ ही साथ पलाश के मूल्य में भी वृद्धि हुई है। वर्ष 2022-23 में 900 रुपये प्रति क्विंटल मिलने वाला पलाश वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1150 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। इसके बाद संघ मुख्यालय द्वारा इसे 1600 रुपये प्रति क्विंटल की दर से विक्रय किया गया, जिससे संग्राहकों को बेहतर लाभ मिला।

20 संग्राहकों को कुल 87,400 रुपए का भुगतान

वन धन विकास केंद्र पसान, मोरगा, डोंगानाला, गुरसियां और मानिकपुर के माध्यम से संग्रहण कार्य को संगठित रूप दिया गया है। इन केंद्रों ने स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण, संग्रहण और विपणन में सहयोग प्रदान किया। वर्ष 2025-26 में पलाश फूल संग्रहण करने वाले 20 संग्राहकों को कुल 87,400 रुपए का भुगतान किया गया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और जीवन स्तर में सुधार आया। यह पहल शासकीय योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें लघु वनोपज के माध्यम से ग्रामीण और आदिवासी परिवारों को रोजगार और आय के अवसर मिल रहे हैं।

ग्रामीण रोजगार का एक बड़ा साधन पलाश के फूल

पलाश के फूल मां लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय माना जाता है, इसलिए इन्हें पूजा-पाठ में उपयोग किया जाता है। मान्यता है कि इन्हें तिजोरी में रखने से धन-समृद्धि बढ़ती है। पलाश के पत्तों से बने पत्तल और दोने शादियों और अन्य आयोजनों में इको.फ्रेंडली विकल्प के रूप में बहुत लोकप्रिय हैं, जो ग्रामीण रोजगार का एक बड़ा साधन है। आगामी सीजन में कटघोरा वनमण्डल के सभी समितियों में व्यापक प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों को पलाश फूल संग्रहण से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इससे न केवल आजीविका के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि वन संसाधनों का सतत और समुचित उपयोग भी सुनिश्चित होगा। पलाश सिर्फ फूलों की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता,आजीविका और समृद्धि की नई उड़ान की कहानी है।

पलाश के फूलों से प्राकृतिक और हर्बल गुलाल, रंग 

पलाश के फूलों का सबसे बड़ा व्यावसायिक उपयोग होली के लिए प्राकृतिक और हर्बल गुलाल, रंग बनाने में होता है। आदिवासी और ग्रामीण महिलाएं पलाश ब्रांड के माध्यम से इन फूलों से इको-फ्रेंडली रंग तैयार कर अपनी आजीविका बढ़ा रही हैं।

पीएम विश्वकर्मा हाट 2026 का शुभारंभ: कारीगरों को मिला राष्ट्रीय मंच, ‘विरासत से विकास’ की सशक्त झलक

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केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्री जीतन राम मांझी ने आज नई दिल्ली के दिल्‍ली हाट, आईएनए में पीएम विश्वकर्मा हाट 2026 का उद्घाटन किया। इस अवसर पर एमएसएमई तथा श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे, इराक और रवांडा के राजदूत, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि, कारीगर तथा अन्य हितधारक उपस्थित रहे।

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए जीतन राम मांझी ने पीएम विश्वकर्मा योजना की उपलब्धियों को रेखांकित किया और प्रदर्शनी के आयोजन के लिए मंत्रालय की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह योजना गांव स्तर के कारीगरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि पीएम विश्वकर्मा योजना देश के हर विश्वकर्मा को बाजार से जोड़कर राष्ट्र निर्माण में भागीदार बना रही है।

राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने कहा कि प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में पीएम विश्वकर्मा पहल ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने बताया कि 117 से अधिक कारीगरों की इस हाट में भागीदारी यह दर्शाती है कि योजना किस तरह गांवों के कारीगरों को वैश्विक अवसरों से जोड़ रही है। यह सफलता भारत सरकार और एमएसएमई मंत्रालय के सतत प्रयासों का परिणाम है।

एमएसएमई मंत्रालय के सचिव एस.सी.एल. दास ने पीएम विश्वकर्मा को “विरासत से विकास” की भावना को साकार करने वाली एक महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि विश्वकर्मा अपनी पारंपरिक दक्षताओं को आगे बढ़ाते हुए देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त बना रहे हैं।

अपर सचिव एवं विकास आयुक्त डॉ. रजनीश ने कहा कि विश्वकर्मा भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के इंजन हैं। उन्होंने योजना के अंतर्गत मिलने वाले लाभों और कारीगरों के लिए सृजित नए विपणन अवसरों पर प्रकाश डाला।


कार्यक्रम के दौरान बिहार और राजस्थान की थीम पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और लोकनृत्य भी आयोजित किए गए, जिन्होंने आयोजन में रंग और उत्साह भर दिया।

पीएम विश्वकर्मा हाट 2026 का आयोजन 18 से 31 जनवरी 2026 तक दिल्‍ली हाट में किया जा रहा है। यह प्रतिदिन सुबह 10:30 बजे से रात 10:00 बजे तक आम जनता के लिए खुला रहेगा। प्रदर्शनी में देशभर के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से आए 117 से अधिक कारीगर भाग ले रहे हैं। यहां हस्तनिर्मित उत्पाद, लाइव शिल्प प्रदर्शन और सांस्कृतिक अनुभव प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो “विश्वकर्मा का अभियान, विकसित भारत का निर्माण” की भावना को सजीव करते हैं।

पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत कारीगरों को पहचान पत्र और प्रमाण पत्र, ₹500 प्रतिदिन का प्रशिक्षण भत्ता, ₹15,000 तक टूलकिट सहायता, ₹3 लाख तक का बिना गारंटी ऋण, डिजिटल लेनदेन प्रोत्साहन तथा ब्रांडिंग, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स के माध्यम से विपणन सहायता प्रदान की जा रही है। यह योजना पारंपरिक कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाते हुए विकसित भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है।


वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के लिए स्थानीय कार्रवाई का आह्वान: दिल्ली डिक्लेरेशन बना ARISE सिटीज फोरम 2025 का प्रमुख निष्कर्ष

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नई दिल्ली- आगामी यूएनएफसीसीसी जलवायु सम्मेलन (COP30) की दिशा तय करते हुए दिल्ली डिक्लेरेशन ऑन लोकल एक्शन फॉर ग्लोबल क्लाइमेट गोल्स को ARISE सिटीज फोरम 2025 का प्रमुख परिणाम घोषित किया गया। यह सम्मेलन 8–9 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित किया गया, जिसकी मेज़बानी ICLEI साउथ एशिया और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) ने संयुक्त रूप से की।

यह घोषणा वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों की साझा आवाज़ के रूप में सामने आई, जिसमें स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बहुस्तरीय सहयोग को मजबूत करने और शहरी जलवायु कार्रवाई को गति देने का आह्वान किया गया।

इस फोरम में 25 देशों के 60 शहरों से आए 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें स्थानीय सरकारें, निजी क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थान और जलवायु नीति विशेषज्ञ शामिल थे। सभी ने मिलकर यह संकल्प लिया कि शहरों की आवाज़ वैश्विक जलवायु एजेंडे में प्रमुख रूप से गूंजे, और सततता, समानता और लचीलापन को प्राथमिकता दी जाए।

कार्यक्रम का उद्घाटन भारत सरकार के आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री तोखन साहू ने किया। मुख्य वक्ताओं में ICLEI के महासचिव गिनो वैन बेगिन, NIUA की निदेशक डॉ. देबोलिना कुंडु, एशियाई विकास बैंक के निदेशक नोरियो सैतो, भारत में संयुक्त राष्ट्र के रेज़िडेंट कोऑर्डिनेटर शॉम्बी शार्प, और ICLEI साउथ एशिया के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल श्री इमानी कुमार शामिल थे।

दो दिवसीय फोरम के समापन पर स्वीकृत दिल्ली डिक्लेरेशन को भारत के सांसद शंकर लालवानी, मेंटर, क्लाइमेट पार्लियामेंट, ने ICLEI साउथ अमेरिका के डिप्टी एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी रोड्रिगो डि सूजा कोरादी को सौंपा। यह घोषणा आगामी COP30 (बेलें, ब्राजील) में भारत और वैश्विक दक्षिण की ओर से एक सामूहिक शहरी प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत की जाएगी।

यह डिक्लेरेशन इस बात का प्रतीक है कि शहर और स्थानीय प्रशासन अब वैश्विक जलवायु शासन के केंद्र में हैं। इसमें यह स्पष्ट किया गया कि शहरी नेतृत्व पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। साथ ही, यह दस्तावेज़ NDCs 3.0, जलवायु वित्त की समान पहुंच और स्थानीय प्राथमिकताओं को वैश्विक नीतियों में शामिल करने की दिशा में ठोस कदमों को रेखांकित करता है।

दिल्ली डिक्लेरेशन के प्रमुख बिंदु:

  • स्थानीय और बहुस्तरीय NDCs के माध्यम से जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देना।

  • अनुकूलन, परिपत्रता और प्रकृति-आधारित समाधानों को शहरी लचीलापन में एकीकृत करना।

  • न्यायसंगत और सहभागी हरित परिवर्तन को प्रोत्साहित करना।

  • नागरिकों, महिलाओं, युवाओं और समुदायों को जलवायु प्रशासन में सशक्त बनाना।

  • बहुस्तरीय शासन और पारदर्शी डाटा सिस्टम को सुदृढ़ करना।

  • शहरों के लिए जलवायु वित्त की पहुंच और क्षमता बढ़ाना।

  • दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से वैश्विक दक्षिण के शहरी नेतृत्व को सशक्त बनाना।

राज्य मंत्री तोखन साहू ने अपने संबोधन में कहा, “शहर विकास के केंद्र हैं, लेकिन जनसंख्या वृद्धि, जल और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जहां चुनौतियाँ हैं, वहीं समाधान भी हैं। ARISE जैसे मंच समाधान खोजने का अवसर देते हैं।”

ICLEI साउथ एशिया के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल इमानी कुमार ने कहा, “ARISE सामूहिक स्वामित्व और साझा कार्रवाई की भावना का प्रतीक है। यह भारत से बेलें तक विचारों को नवाचार में बदलने का प्रयास है।”

CDRI के महानिदेशक अमित प्रौढ़ी ने कहा, “तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के इस दौर में हमें यह समझना होगा कि जोखिम को कैसे पहचानें और बुनियादी ढांचे की नई कल्पना कैसे करें।”

NIUA की निदेशक डॉ. देबोलिना कुंडु ने कहा, “दिल्ली डिक्लेरेशन इस बात का प्रमाण है कि सहयोग और सामूहिक दृष्टिकोण से परिवर्तन संभव है। अब समय है कि हम ARISE की भावना को अपने शहरों तक पहुँचाएँ।”

ARISE सिटीज फोरम 2025 दक्षिण एशिया का प्रमुख मंच बनकर उभरा है, जो स्थानीय, समावेशी और बहुस्तरीय जलवायु कार्रवाई को नई दिशा दे रहा है।


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