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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश: पूर्व हाईकोर्ट जजों के रिटायरमेंट लाभों पर बनेगी समान राष्ट्रीय नीति

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं में एकरूपता लाने के लिए केंद्र सरकार को समिति गठित करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने पर यह अनुमति दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र तय समय में समिति का गठन नहीं करता है, तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं समिति गठित कर सकता है।

दरअसल, अलग-अलग राज्यों में सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुविधाओं में काफी अंतर है। इनमें ड्राइवर, सुरक्षा व्यवस्था और यात्रा के दौरान सरकारी आवास जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसी असमानता को दूर करने के लिए पूरे देश में एक समान नीति तैयार करने की दिशा में यह कदम उठाया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 20 जुलाई 2026 को केंद्र को दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने का निर्देश दिया था। समिति को इस विषय पर अपनी सिफारिशें तैयार करनी हैं।

अब मामले की अगली सुनवाई करीब 10 दिन बाद होने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों के लिए देशभर में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर एक समान व्यवस्था बनने का रास्ता साफ हो सकता है।

छात्र प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पूर्व जज की अध्यक्षता में बनेगी हाई-पावर्ड कमेटी

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नई दिल्ली- देश के विभिन्न हिस्सों में परीक्षा प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिस ज्यादती के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण पहल की। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की तथ्यात्मक जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित करने की मंशा जताई है। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में होगी समिति

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार प्रस्तावित समिति की अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज करेंगे। इसमें एक पूर्व हाईकोर्ट जज और सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी/पूर्व DGP को भी शामिल किया जाएगा। कोर्ट ने बताया कि एक पूर्व CBI निदेशक और एक पूर्व DGP की सहमति भी प्राप्त हो चुकी है। हालांकि समिति की अंतिम संरचना, अधिकार क्षेत्र और जांच की प्रक्रिया को लेकर औपचारिक आदेश जारी होना बाकी है।

कोर्ट ने संबंधित पक्षों को समिति के कार्यादेश और जांच के दायरे को लेकर लिखित सुझाव देने की अनुमति दी है। बताया गया है कि औपचारिक आदेश में समिति के गठन और कामकाज का विस्तृत स्वरूप तय किया जाएगा।

पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं की होगी जांच

प्रस्तावित समिति छात्र प्रदर्शनों के दौरान लगाए गए पुलिस ज्यादती के आरोपों की तथ्यात्मक पड़ताल करेगी। इसके साथ ही प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ हुई हिंसा, महिला प्रदर्शनकारियों से जुड़े कथित यौन उत्पीड़न एवं अन्य शिकायतों पर भी विचार किया जा सकता है। समिति को आवश्यकता पड़ने पर महत्वपूर्ण या तत्काल मामलों में अंतरिम रिपोर्ट देने की संभावना भी जताई गई है।

यह मामला उन छात्र आंदोलनों से जुड़ा है, जिनमें कथित परीक्षा प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन हुए थे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी बड़ी संख्या में छात्रों ने प्रदर्शन किया था।

पुलिस ने आरोपों से किया इनकार

जहां प्रदर्शनकारी पक्षों की ओर से पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए हैं, वहीं दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में अत्यधिक बल प्रयोग से इनकार किया है। पुलिस का कहना है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भीड़ के कुछ हिस्सों द्वारा बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ने का प्रयास किया गया था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल का इस्तेमाल किया गया।

बिहार सरकार ने भी अपने जवाब में पुलिस द्वारा अनुपातहीन बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया है। सरकार के अनुसार प्रदर्शन के दौरान कुछ स्थानों पर हथियारों से फायरिंग की घटनाएं हुईं, लेकिन इन घटनाओं के संबंध में उसका पक्ष अलग है और मामले की परिस्थितियों की जांच न्यायिक प्रक्रिया के तहत हो रही है।

छात्रों के भविष्य को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट गंभीर

सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में, जहां गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि या गंभीर अपराध शामिल नहीं हैं, छात्रों के खिलाफ मामलों को समाप्त करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि हजारों छात्रों का भविष्य इस मामले से जुड़ा हुआ है।

हालांकि गंभीर अपराधों में शामिल या गंभीर आपराधिक इतिहास वाले लोगों के मामलों को अलग तरीके से देखने की बात कही गई है।

अंतिम आदेश का इंतजार

सुप्रीम कोर्ट की इस पहल को छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष तथ्यात्मक जांच की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब सभी पक्षों के सुझावों पर विचार करने के बाद अदालत समिति की अंतिम संरचना, अधिकार क्षेत्र और कार्यप्रणाली को लेकर औपचारिक आदेश जारी करेगी।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इससे न केवल पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की जांच का रास्ता स्पष्ट होगा, बल्कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर भी आगे की दिशा तय हो सकती है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: लगातार मानसिक प्रताड़ना और शादी का दबाव आत्महत्या के लिए उकसाने के समान हो सकता है

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए और उस पर लगातार शादी करने का दबाव बनाया जाए, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) के दायरे में आ सकती हैं।

अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि किसी व्यक्ति पर लगातार मानसिक दबाव, उत्पीड़न और भावनात्मक प्रताड़ना उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। यदि इस तरह की परिस्थितियां किसी व्यक्ति को आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर करती हैं, तो मामले के तथ्यों के आधार पर इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में देखा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रत्येक घटना के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना आवश्यक है। अदालत की यह टिप्पणी मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक दबाव से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण के रूप में देखी जा रही है।

इस फैसले ने यह संदेश भी दिया है कि किसी भी व्यक्ति पर लगातार मानसिक दबाव या अनावश्यक सामाजिक एवं वैवाहिक दबाव बनाना गंभीर कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है।

विधायी प्रारूपण के 36वें बेसिक कोर्स का शुभारंभ, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 18 अधिकारी ले रहे हैं प्रशिक्षण

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नई दिल्ली- विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग के अंतर्गत इंस्टीट्यूट ऑफ लेजिस्लेटिव ड्राफ्टिंग एंड रिसर्च (ILDR) द्वारा आयोजित विधायी प्रारूपण (Legislative Drafting) के 36वें बेसिक कोर्स का शुभारंभ 22 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित विधायी सभागार, कर्तव्य भवन-02 में किया गया। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों के लिए आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र में विधायी विभाग एवं विधिक कार्य विभाग के सचिव डॉ. राजीव मणि, अतिरिक्त सचिव एवं कोर्स निदेशक (ILDR) डॉ. मनोज कुमार तथा विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर डॉ. राजीव मणि ने पूरे देश में विधायी प्रारूपण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इससे कानूनों में स्पष्टता, समानता और कानूनी निश्चितता सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर हो रहे विधायी सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गुणवत्तापूर्ण और एकसमान प्रारूपण अत्यंत आवश्यक है।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 22 जुलाई से 25 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इसमें 13 राज्य सरकारों और एक केंद्रशासित प्रदेश से आए 18 प्रशिक्षु अधिकारी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को विधायी प्रारूपण के सिद्धांतों की गहन समझ प्रदान करना तथा विधायी दस्तावेजों के मसौदा-निर्माण का व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर उन्हें प्रभावी प्रारूपण के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कौशल से सुसज्जित करना है।

यह कोर्स देशभर में विधायी प्रारूपण की एकरूपता, सटीकता और उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के साथ-साथ राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेशों की संस्थागत क्षमता को भी मजबूत करेगा।

छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) का मसौदा तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित

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रायपुर- छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए इसके मसौदे (ड्राफ्ट) को तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है।

समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी. रमासुब्रमणियन करेंगे। समिति में कानून, प्रशासन और समाज से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है, ताकि व्यापक विचार-विमर्श के बाद राज्य के लिए उपयुक्त मसौदा तैयार किया जा सके।

सरकार के अनुसार, यह समिति विभिन्न राज्यों में लागू या प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के प्रावधानों का अध्ययन करेगी, संबंधित कानूनों की समीक्षा करेगी और विभिन्न सामाजिक, धार्मिक तथा कानूनी पक्षों से सुझाव प्राप्त करने के बाद अपनी सिफारिशें राज्य सरकार को सौंपेगी।

समिति राज्य के सभी वर्गों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से संवाद स्थापित कर एक संतुलित और व्यवहारिक मसौदा तैयार करेगी।

गौरतलब है कि उत्तराखंड के बाद छत्तीसगढ़ समान नागरिक संहिता की दिशा में ठोस पहल करने वाले राज्यों में शामिल हो गया है। सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानूनों की संभावनाओं का अध्ययन करना और राज्य के हित में उपयुक्त सुझाव तैयार करना है।

मुख्य न्यायाधीश द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता रोशन चंद्राकर का सम्मान

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आरंग- अधिवक्ता संघ रायपुर द्वारा 35 वर्ष का विधि व्यवसाय पूर्ण करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं के सम्मान में भव्य सम्मान समारोह का आयोजन रायपुर में किया गया। इस अवसर पर कुल 32 वरिष्ठ अधिवक्ताओं को उनके दीर्घकालीन योगदान और विधि क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। समारोह में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के मुख्य न्यायाधीश माननीय रमेश सिन्हा जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

इसी कार्यक्रम में अधिवक्ता संघ आरंग से वरिष्ठ अधिवक्ता रोशन  चंद्राकर को भी सम्मान प्रदान किया गया। माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा जी द्वारा उन्हें श्रीफल, शाल एवं सम्मान पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया। 

समारोह में बड़ी संख्या में अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

दिव्यांग व्यक्तियों सहित नागरिकों के लिए सुलभ कानूनी सेवाओं और डिजिटल न्यायालय अवसंरचना पर सरकार की पहल

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सरकार ने आम जनता और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभ, गुणवत्तापूर्ण और शीघ्र कानूनी सेवाएँ सुनिश्चित करने के कई कदम उठाए हैं।

लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज (LSA) अधिनियम, 1987 समाज के कमजोर वर्गों, जिनमें दिव्यांग व्यक्ति भी शामिल हैं, को मुफ़्त और सक्षम कानूनी सेवाएँ प्रदान करने का प्रावधान करता है।

NALSA का विशेष कार्यक्रम

NALSA दिव्यांग व्यक्तियों के लिए NALSA (Legal Services to the Mentally Ill and Persons with Intellectual Disabilities) Scheme, 2024 लागू कर रहा है। इस योजना का उद्देश्य मानसिक रोगियों और बौद्धिक दिव्यांग व्यक्तियों की विशिष्ट कानूनी और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप सेवाएँ प्रदान करना है।

  • इस योजना के तहत प्रत्येक राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में ‘Manonyay’ (LSUM) – मानसिक रोगियों और बौद्धिक दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कानूनी सेवा इकाई स्थापित की गई है।

  • केवल लद्दाख और दादरा एवं नगर हवेली को छोड़कर सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में यह इकाई मौजूद है।

जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए अवसंरचना विकास

सरकार एक केंद्र प्रायोजित योजना के तहत जिला और अधीनस्थ न्यायालयों की अवसंरचना सुविधाओं के विकास हेतु राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के संसाधनों को बढ़ावा दे रही है। इसमें शामिल हैं:

  • न्यायालय हॉल का निर्माण

  • न्यायिक अधिकारियों के लिए आवासीय इकाइयाँ

  • वकीलों के लिए हॉल

  • डिजिटल कंप्यूटर रूम

  • शौचालय परिसर

योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रस्तावित अवसंरचना का डिज़ाइन दिव्यांग-अनुकूल होना चाहिए। भवन डिज़ाइन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD), दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग, सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय द्वारा समय-समय पर निर्धारित मानकों/सुलभता मानकों के अनुरूप होते हैं।

eCourts परियोजना – चरण III

  • इस परियोजना में 24 घटक हैं, जिनमें दिव्यांग व्यक्तियों सहित नागरिकों के लिए मजबूत और सुलभ डिजिटल अवसंरचना विकसित करने के महत्वपूर्ण उपाय शामिल हैं।

  • दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुविधाजनक ICT सक्षम उपकरण प्रदान किए गए हैं।

  • 752 न्यायालयों (उच्च न्यायालयों सहित) की वेबसाइटों को S3WaaS प्लेटफ़ॉर्म (Secure, Scalable and Sugamya Website as a Service) पर स्थानांतरित किया गया, जिससे वेबसाइट दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभ हो।

  • S3WaaS प्लेटफ़ॉर्म में अंशतः और पूरी तरह दृष्टिबाधित नागरिकों के लिए सामग्री की आसान दृश्यता जैसी विशेषताएँ शामिल हैं।

यह जानकारी कानून और न्याय मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री एवं संसदीय कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री, अर्जुन राम मेघवाल ने आज लोकसभा में दी।

कानून और न्याय मंत्रालय में LIMBS ‘लाइव केस’ डैशबोर्ड का प्रदर्शन: डिजिटल कानूनी प्रबंधन में नई पहल

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कानून और न्याय मंत्रालय, लीगल अफेयर्स विभाग ने आज लीगल इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड ब्रीफिंग सिस्टम (LIMBS) के “लाइव केस” डैशबोर्ड को प्रदर्शित करने के लिए एक सफल कार्यक्रम आयोजित किया, जो शास्त्री भवन, नई दिल्ली में हुआ।

इस कार्यक्रम का शुभारंभ कानून और न्याय मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने किया। उन्होंने इस पहल को सरकारी मुकदमेबाजी प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

कार्यक्रम में डॉ. अंजू राठी राणा, भारत सरकार की संघीय कानून सचिव, वरिष्ठ अधिकारी और विभिन्न मंत्रालयों व विभागों के गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।

LIMBS “लाइव केस” डैशबोर्ड की विशेषताएँ

LIMBS “लाइव केस” डैशबोर्ड अदालत के मामलों का रियल-टाइम डेटा विज़ुअलाइजेशन प्रस्तुत करता है और आने वाली सुनवाई के मामलों का सारांश प्रदान करता है, जिससे सक्रिय निर्णय लेना और मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय संभव होता है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार मुकदमेबाजी को कम करने की आवश्यकता पर बल दिया है। भारत सरकार, being one of the largest litigants, ने LIMBS लागू किया ताकि अदालत के मामलों की प्रणालीगत, सक्रिय और दक्ष निगरानी की जा सके।

वर्तमान में, LIMBS पोर्टल में 53 मंत्रालयों और विभागों से 7,23,123 लाइव केस दर्ज हैं। 13,175 मंत्रालय उपयोगकर्ता और 18,458 अधिवक्ता नियमित रूप से मामलों को अपडेट करते हैं।

डिजिटल सुधार और बेहतर प्रशासन

यह पहल सरकार की डिजिटल रूपांतरण यात्रा में एक मील का पत्थर है, जो तकनीक के माध्यम से प्रभावी कानूनी मामलों का प्रबंधन, डेटा-आधारित निर्णय और बेहतर शासन परिणाम सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।


विधायी विभाग द्वारा विशेष अभियान 5.0 : लंबित मामलों के निस्तारण, ई-वेस्ट प्रबंधन एवं रिकॉर्ड डिजिटलीकरण पर विशेष ध्यान

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विधि और न्याय मंत्रालय, लंबित मामलों के निस्तारण हेतु विशेष अभियान (SCDPM) मना रहा है। विशेष अभियान 5.0 दिनांक 2 अक्टूबर, 2025 से 31 अक्टूबर, 2025 तक आयोजित किया जा रहा है।

इस वर्ष अभियान का मुख्य फोकस निम्नलिखित पर होगा:

  • ई-वेस्ट निस्तारण : अनुपयोगी या परित्यक्त कंप्यूटर, लैपटॉप, प्रिंटर, LED, ई-डिस्प्ले बोर्ड आदि का निपटान।

  • लंबित मामलों का निस्तारण : सांसद संदर्भ, राज्य सरकारों से प्राप्त संदर्भ, अंतर-मंत्रालयी संदर्भ, संसदीय आश्वासन, पीएमओ संदर्भ, लोक शिकायतें एवं अपीलें इत्यादि।

  • रिकॉर्ड प्रबंधन : भौतिक अभिलेखों की समीक्षा और छंटाई (weeding out), कार्यालयों में स्वच्छता सुनिश्चित करना, अभिलेखों/फाइलों का डिजिटलीकरण।

  • स्थान प्रबंधन एवं कार्यस्थल सुधार : कार्यालयों में स्थान का कुशल उपयोग और कार्यस्थल अनुभव को बेहतर बनाना।

विशेष अभियान 5.0 के तहत विधायी विभाग ने यह संकल्प लिया है कि वह लंबित मामलों को कम करने, अनुपयोगी सामग्री का निपटान करने और रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली में सुधार लाने हेतु लक्षित गतिविधियों को अपनाएगा, ताकि अभियान के उद्देश्यों को प्रभावी रूप से प्राप्त किया जा सके।

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