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श्रमिकों को मिली बड़ी राहत: विशेष अभियान के तहत 23 श्रम मामलों का निपटारा, 10.32 लाख रुपये का भुगतान

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नई दिल्ली- श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत मुख्य श्रमायुक्त (केंद्रीय) कार्यालय द्वारा लंबित श्रम मामलों के त्वरित निपटारे के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत आज दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) और उसके ठेकेदारों से जुड़े दावा मामलों की संयुक्त सुनवाई आयोजित की गई। यह सुनवाई नई दिल्ली स्थित उप मुख्य श्रमायुक्त (केंद्रीय) कार्यालय में क्षेत्रीय श्रमायुक्त (केंद्रीय)-सह-प्राधिकरण, वेतन संहिता 2019 के समक्ष संपन्न हुई।

मामलों के प्रभावी और शीघ्र समाधान के उद्देश्य से मुख्य श्रमायुक्त (केंद्रीय) सोनल मिश्रा भी सुनवाई में शामिल हुईं। उन्होंने दिल्ली क्षेत्र के अधिकारियों, प्रबंधन प्रतिनिधियों और श्रमिकों को संबोधित करते हुए श्रम विवादों के समयबद्ध निपटारे तथा श्रम कानूनों के सख्त अनुपालन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि श्रमिकों को त्वरित न्याय उपलब्ध कराना मंत्रालय की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

सुनवाई के दौरान कुल 193 दावा मामलों पर विचार किया गया, जिनमें से 23 मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया गया। इसके परिणामस्वरूप 12 श्रमिकों को उनके बकाया भुगतान के रूप में कुल 10,32,484 रुपये प्रदान किए गए। शेष मामलों में भी विस्तृत सुनवाई की गई, जिससे अगली निर्धारित तिथि पर उनके समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ।

कार्यवाही के दौरान DMRC के वरिष्ठ श्रम कल्याण निरीक्षक, श्रम कल्याण निरीक्षक तथा ठेकेदारों के प्रतिनिधियों को श्रम कानूनों के अनुपालन के प्रति जागरूक किया गया। विशेष रूप से समय पर वेतन भुगतान, वैधानिक अभिलेखों के रखरखाव और श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया गया। प्रबंधन पक्ष ने श्रम अधिकारियों को आश्वासन दिया कि नियमों के बेहतर अनुपालन के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का यह विशेष अभियान श्रमिकों की शिकायतों के त्वरित समाधान, न्याय तक उनकी पहुंच को सशक्त बनाने, श्रम कानूनों के अनुपालन को मजबूत करने और सौहार्दपूर्ण औद्योगिक संबंधों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।



डॉ. मनसुख मांडविया ने बीएमएस के अखिल भारतीय त्रैवार्षिक सम्मेलन में श्रमिक कल्याण को बताया विकसित भारत की आधारशिला

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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने आज ओडिशा के पुरी में आयोजित भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के अखिल भारतीय त्रैवार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। उन्होंने दोहराया कि श्रमिकों का कल्याण, गरिमा और सुरक्षा सरकार की राष्ट्रीय विकास की परिकल्पना के केंद्र में है।

डॉ. मांडविया ने कहा,

“मुझे श्रम शक्ति और युवा शक्ति के लिए कार्य करने का सौभाग्य मिला है। ये दोनों शक्तियाँ भारत की प्रगति की आधारशिला हैं और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाएँगी।”

मंत्री ने कहा कि बीएमएस न केवल भारत का सबसे बड़ा ट्रेड यूनियन है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में भी शामिल है। उन्होंने कहा कि बीएमएस ने श्रमिकों के कल्याण, देश के श्रमबल को न्याय दिलाने और उन्हें राष्ट्रीय विकास व आर्थिक वृद्धि में भागीदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यह जोर देते हुए कि आर्थिक विकास के लिए श्रमिक और उद्योग—दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, मंत्री ने कहा कि एक मजबूत और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए दोनों के बीच सामंजस्य और सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इसी संतुलन को मजबूत करने, श्रमिकों के लिए कल्याण और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने तथा उद्योगों के लिए अनुपालन को सरल बनाने के उद्देश्य से श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) को लागू किया है।

उन्होंने कहा,

“मैं बीएमएस को बधाई देता हूँ कि उसने 15 अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ श्रम संहिताओं का स्वागत किया, श्रमिकों में जागरूकता फैलाई और दुष्प्रचार का मुकाबला किया। यह जिम्मेदार और रचनात्मक नेतृत्व को दर्शाता है, जिसमें संगठनात्मक हितों से ऊपर श्रमिकों के हितों को रखा गया है।”

श्रम संहिताओं के सक्षम प्रावधानों पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने अनिवार्य नियुक्ति पत्र, पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अवसर, वार्षिक स्वास्थ्य जांच तथा खतरनाक उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का उल्लेख किया।

सामाजिक सुरक्षा पहलों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकार ने लगातार कवरेज बढ़ाने और श्रमिकों के लिए संस्थागत समर्थन को मजबूत करने का कार्य किया है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार लगभग 94 करोड़ लोग अब सामाजिक सुरक्षा के अंतर्गत आ चुके हैं और वर्ष 2026 तक 100 करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का लक्ष्य है।

उन्होंने आगे कहा कि ईएसआईसी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में अब श्रमिकों के बच्चों के लिए मेडिकल शिक्षा में आरक्षण की सुविधा दी जा रही है, जिससे वित्तीय बोझ कम होगा और उच्च शिक्षा की उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायता मिलेगी।

डॉ. मांडविया ने कहा कि बीएमएस ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की वेतन सीमा बढ़ाने, न्यूनतम मजदूरी (फ्लोर वेज) पर निर्णय लेने तथा ईपीएस-95 के अंतर्गत न्यूनतम पेंशन बढ़ाने से संबंधित प्रतिवेदन प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सभी विषयों पर श्रमिकों के हित में गंभीरता से विचार किया जाएगा और शीघ्र निर्णय लिए जाएंगे।

उन्होंने कहा,

“देश की प्रगति श्रमिकों के कल्याण से अलग नहीं की जा सकती। जब श्रमिक समृद्ध होते हैं, तब देश समृद्ध होता है।”

‘नया भारत’ के निर्माण में श्रमिकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकार श्रमिक कल्याण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर आगे बढ़ती रहेगी। उन्होंने यह भी दोहराया कि सरकार उन संगठनों का निरंतर समर्थन करेगी जो ईमानदारी से श्रमिकों के कल्याण, सशक्तिकरण और संरक्षण के लिए कार्य करते हैं।

डॉ. मांडविया ने सभी हितधारकों से ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा,
“हमें सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे, हर श्रमिक को आगे बढ़ाना होगा और उन्हें अपनी पूरी क्षमता को साकार करने के लिए सशक्त बनाना होगा।”

इस सम्मेलन ने श्रम सुधारों, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक सशक्तिकरण पर संवाद के लिए एक मंच प्रदान किया, जिसमें देशभर से श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

उद्घाटन सत्र में कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया, जिनमें हिरणमय पंड्या, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बीएमएस; रविंद्र हिमते, राष्ट्रीय महामंत्री, बीएमएस; सर्गेई चेर्नोगायेव, अध्यक्ष, एफएनपीआर, रूस; मा. भागैया, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, आरएसएस; तथा युकी ओत्सुजी, वर्कर स्पेशलिस्ट, दक्षिण एशिया एवं कंट्री ऑफिस, आईएलओ, नई दिल्ली शामिल थे।


डॉ. मनसुख मंडाविया ने गोवा में दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया, श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर

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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार और युवा मामले एवं खेल मंत्री, डॉ. मनसुख मंडाविया, ने 7 जनवरी 2026 को गोवा में दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया।

यह सम्मेलन छह क्षेत्रीय सम्मेलनों की श्रृंखला में पहला है, जिन्हें श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित किया जाएगा। इन सम्मेलनों का उद्देश्य चार श्रम संहिताओं के सुचारू क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC), कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PMVBRY) से संबंधित मुद्दों पर विचार-विमर्श करना है।

केंद्रीय मंत्री डॉ. मंडाविया ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने राज्यों की सराहना की, जिन्होंने चार श्रम संहिताओं के प्रावधानों के अनुरूप अपने मौजूदा श्रम कानूनों में संशोधन करने का उत्साहपूर्वक प्रयास किया। यह सुधार 21 नवंबर 2025 से लागू हुए हैं और इसमें वार्षिक स्वास्थ्य जांच, जोखिमपूर्ण गतिविधियों में लगे श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, नियुक्ति पत्र जारी करना अनिवार्य, और ग्रेच्युटी की पात्रता अवधि घटाकर एक वर्ष करना जैसी प्रगतिशील प्रावधान शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि आगे केंद्र और राज्य सहनशील समन्वय के माध्यम से कोड्स का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे, जिससे श्रमिकों के कल्याण और लाभ में समानता और निष्पक्षता बढ़ेगी। इन श्रम सुधारों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया जैसे Global Times और The Economist से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।

सम्मेलन में सचिव, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, वंदना गुरनानी ने बताया कि चार श्रम संहिताओं का उद्देश्य 29 मौजूदा श्रम कानूनों को समेकित और सरल बनाकर श्रमिक कल्याण को मजबूत करना है। इन संहिताओं में वेब-आधारित निरीक्षण प्रणाली और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज जैसे कई प्रगतिशील उपाय शामिल हैं। केंद्रीय सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट नियमों को पूर्व-प्रकाशित किया है, जबकि नियमों की आवश्यकता न होने वाले प्रावधान 21 नवंबर 2025 से लागू हैं। उन्होंने राज्यों से कहा कि वे अपने संबंधित नियमों को शीघ्र अधिसूचित करें और इसके लिए कानून विभाग की सलाह लें।

सरलीकृत क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, मंत्रालय ने FAQs हैंडबुक जारी की, V.V. गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान (VVGNLI) के माध्यम से क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किए, ड्राफ्ट निरीक्षण योजना साझा की और डिजिटल हस्तक्षेपों के लिए श्रम सुविधा और समाधान पोर्टल्स पर API इंटीग्रेशन किया। राज्यों को PMVBRY के तहत आउटरीच, दुकानों और प्रतिष्ठानों अधिनियमों के साथ ओवरलैप, और ESIC कवरेज के विस्तार का लाभ उठाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों, संविदा और आउटसोर्सेड श्रमिकों को शामिल करना भी शामिल है।

सम्मेलन नियमों और विनियमों पर विचार-विमर्श, अंतराल और असमानताओं की पहचान, सांविधिक अधिसूचनाओं का त्वरित प्रावधान, बोर्डों और फंडों के गठन और संबंधित संस्थागत तंत्रों पर चर्चा के लिए मंच के रूप में कार्य करेगा। इसमें चार श्रम संहिताओं के तहत योजनाओं, आईटी सिस्टम और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के कार्यान्वयन, क्षेत्रीय स्तर के अधिकारियों की क्षमता निर्माण और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तथा अन्य हितधारकों के बीच जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

सम्मेलन में मंत्रालय और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे और सक्रिय भागीदारी की।


वेतन संहिता, 2019 : श्रमिकों के अधिकार और आर्थिक न्याय को सशक्त बनाती ऐतिहासिक पहल

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परिचय

भारत सरकार समानता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए समावेशी नीतियों व कार्यक्रमों के प्रति प्रतिबद्ध है, जो समाज के सभी वर्गों को सशक्त बनाते हैं। श्रम और रोजगार मंत्रालय का उद्देश्य सभी के लिए सम्मानजनक कार्य परिस्थितियाँ, गुणवत्तापूर्ण जीवन एवं सतत् रोजगार अवसर प्रदान करना है।

द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग ने अनुशंसा की थी कि मौजूदा श्रम कानूनों को कार्य-आधारित समूहों में चार या पाँच श्रम संहिताओं में समेकित किया जाए। इसी क्रम में वेतन संहिता, 2019 चार प्रमुख संहिताओं में से एक है। यह संहिता समानता, श्रमिक कल्याण और उद्यमों की स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई गई है। यह प्रमुख परिभाषाओं को मानकीकृत करती है, प्रक्रियाओं को सरल बनाती है तथा नियोक्ताओं के लिए तेज और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करती है। इन श्रम सुधारों का व्यापक लक्ष्य है—सभी के लिए सम्मानजनक रोजगार सृजन के माध्यम से आर्थिक विकास को गति देना।

वेतन संहिता, 2019 : समाहित किए गए कानून

वेतन संहिता, 2019 में 4 प्रमुख वेतन एवं भुगतान संबंधी कानूनों को सम्मिलित किया गया है:

  • भुगतान-ए-वेतन अधिनियम, 1936

  • न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948

  • बोनस भुगतान अधिनियम, 1965

  • समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976

यह संहिता श्रमिक अधिकारों की रक्षा करने के साथ-साथ नियोक्ताओं के लिए अनुपालन को सरल बनाती है। यह समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा और शोषण से सुरक्षा प्रदान करती है, जो कार्यस्थल पर गरिमा और स्थिरता सुनिश्चित करती है। महिलाओं के लिए समान वेतन और प्रतिनिधित्व की गारंटी देकर यह समावेशी श्रम बाजार को मजबूत करती है।

इन प्रावधानों से उत्पादकता, श्रमिक कल्याण, रोजगार सृजन और आर्थिक विकास—सभी को बढ़ावा मिलता है।

क्या आप जानते हैं?

श्रम सुधारों के तहत सिंगल रजिस्ट्रेशन, सिंगल लाइसेंस और सिंगल रिटर्न की व्यवस्था लागू की गई है, जिससे अनुपालन बोझ कम होता है और रोजगार को बढ़ावा मिलता है।

वेतन संहिता, 2019 के तहत —

  • नियमों की संख्या 163 से घटकर 58,

  • फॉर्म 20 से घटकर 6

  • रजिस्टर 24 से घटकर 2 कर दिए गए हैं।

न्यूनतम एवं न्यायसंगत वेतन सुनिश्चित करना

न्यूनतम वेतन का सार्वभौमीकरण

धारा 5 के अनुसार अब न्यूनतम वेतन सभी क्षेत्रों, संगठित और असंगठित दोनों पर लागू होंगे। पहले यह केवल अनुसूचित रोजगारों पर लागू था, जिससे केवल लगभग 30% श्रमिक ही कवर होते थे।

श्रमिक-हितैषी प्रावधान

  • हर कर्मचारी को न्यूनतम वेतन का कानूनी अधिकार

  • देशभर में वेतन असमानता में कमी

  • दिहाड़ी, आकस्मिक श्रमिक, प्रवासी मजदूरों को सुरक्षा

  • आय में स्थिरता और बेहतर जीवन स्तर

रोजगार-हितैषी प्रावधान

  • महिलाओं और प्रवासी श्रमिकों की भागीदारी में वृद्धि

  • निष्पक्ष वेतन से नौकरी में स्थिरता

फ़्लोर वेज (राष्ट्रीय न्यूनतम आधार वेतन)

धारा 9 व नियम 11 के अनुसार केंद्र सरकार फ्लोर वेज तय करेगी, जो भोजन, वस्त्र आदि की न्यूनतम जीवन आवश्यकताओं पर आधारित होगा। राज्य सरकारें इससे कम वेतन निर्धारित नहीं कर सकेंगी।

लाभ

  • राज्यों में वेतन असमानता में कमी

  • मजदूरों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति

  • प्रवासन में कमी

  • एकसमान न्यायसंगत वेतन सुनिश्चित

कौशल, क्षेत्र और कठिनाई के आधार पर न्यूनतम वेतन

  • समय-कार्य एवं पीस-रेट कार्य हेतु वेतन दरें सरकार तय करेगी

  • कौशल, क्षेत्र और कार्य कठिनाई को आधार बनाया जाएगा

  • वेतन का पुनरीक्षण हर 5 वर्ष में अनिवार्य

वेतन का पुनर्निर्धारण

वेतन में—

  • मूल वेतन

  • महंगाई भत्ता

  • रिटेनिंग भत्ता
    शामिल होंगे।

यदि भत्ते कुल वेतन के 50% से अधिक हैं, तो अतिरिक्त भाग को वेतन में जोड़ा जाएगा।

लाभ

  • सामाजिक सुरक्षा लाभ (PF, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ, बोनस) अधिक होंगे

  • संविदा एवं अनौपचारिक श्रमिकों को समान सुरक्षा

कार्य घंटे का निर्धारण

धारा 13 (नियम 6) के अनुसार:

  • सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे

  • किसी दिन अधिकतम 12 घंटे (विशेष परिस्थितियों में)

  • साप्ताहिक अवकाश अनिवार्य

यह प्रावधान कार्य-जीवन संतुलन, स्वास्थ्य और उत्पादकता में सुधार लाता है।

वेतन भुगतान की गारंटी

समय पर वेतन भुगतान

धारा 17 के अनुसार:

  • दैनिक → शिफ्ट समाप्ति पर

  • साप्ताहिक → साप्ताहिक अवकाश से पहले

  • पखवाड़े → 2 दिनों के भीतर

  • मासिक → अगले महीने की 7 तारीख तक

  • इस्तीफा/निष्कासन → 2 कार्य दिवसों के भीतर

वेतन पर्ची (वेज स्लिप)

धारा 50(3) के अनुसार वेतन भुगतान के समय इलेक्ट्रॉनिक/भौतिक वेतन पर्ची देना अनिवार्य।

वार्षिक बोनस का भुगतान

  • पात्रता: वर्ष में कम से कम 30 दिन कार्य

  • बोनस: 8.33% से 20% तक

  • उद्देश्य: लाभ-साझेदारी, प्रेरणा और उपभोग क्षमता बढ़ाना

दावा दाखिल करने की सीमा अवधि बढ़ाकर 3 वर्ष

इससे कर्मचारियों को न्याय पाने की अधिक समय-सुविधा मिलती है।

पीस-रेट कार्य के लिए न्यूनतम समय-दर वेतन

धारा 12 के अनुसार, न्यूनतम समय-दर से कम वेतन नहीं दिया जा सकता।

ओवरटाइम भुगतान

धारा 14 के अनुसार ओवरटाइम वेतन सामान्य वेतन से दोगुना।

दंडों का गैर-आपराधिकरण (Decriminalisation)

  • पहली बार के अपराध पर कंपाउंडिंग (50% अधिकतम जुर्माना)

  • कारावास हटाकर नागरिक दंड लागू

  • न्याय तेज और मैत्रीपूर्ण अनुपालन वातावरण

विकासोन्मुख प्रावधान

  • परिभाषाओं का एकीकरण

  • इंस्पेक्टर राज की समाप्ति

  • वेब-आधारित निरीक्षण

  • पारदर्शी, सहयोगात्मक अनुपालन

वन नेशन, वन वेज कोड

वेतन, कार्यकर्ता, कर्मचारी आदि की एक समान परिभाषा पूरे देश में लागू।

इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर की व्यवस्था

निरीक्षण के साथ-साथ जागरूकता, मार्गदर्शन और अनुपालन में सहायता प्रदान करना।

नियोक्ता की संपत्तियों की सुरक्षा

सरकारी अनुबंधों से संबंधित जमा राशि को न्यायालयों द्वारा जब्त नहीं किया जा सकेगा (कर्मचारी देयताओं को छोड़कर)।

लैंगिक समानता

लिंग-आधारित भेदभाव पर प्रतिबंध

धारा 3 के अंतर्गत:

  • भर्ती, वेतन, कार्य-शर्तों में कोई लिंग आधारित भेदभाव नहीं

  • ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के लिए भी समान संरक्षण

सलाहकार बोर्डों में महिलाओं का एक-तिहाई प्रतिनिधित्व

धारा 42 के अनुसार—महिलाओं की नीतिगत भागीदारी सुनिश्चित।

निष्कर्ष

वेतन संहिता, 2019 भारत के श्रम बाजार में न्याय, समानता और समावेशिता को मजबूत बनाती है। यह श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करती है, नियोक्ताओं के हितों को संतुलित करती है, अनुपालन सरल बनाती है, और औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देती है।

संपूर्ण रूप से, यह संहिता श्रमिकों की गरिमा, आर्थिक न्याय और राष्ट्र के समग्र विकास को प्रोत्साहित करती है।


औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 : श्रम सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम

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परिचय

कर्मचारियों और उद्योगों की सफलता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी होती है; दोनों में से कोई भी अकेले विकसित नहीं हो सकता। जब उद्योग बढ़ते हैं, तो वे स्थिर नौकरियाँ, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। वहीं, एक प्रेरित और सुरक्षित कार्यबल उत्पादकता एवं नवाचार को बढ़ावा देता है, जिससे उद्योगों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।

राष्ट्रीय श्रम आयोग ने श्रमिकों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से मौजूदा श्रम कानूनों को सरल और तार्किक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया था। इसी दिशा में, तीन मौजूदा प्रमुख कानून—औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 और औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946—को समेकित करते हुए औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 लागू की गई है।

समेकित कानून: औद्योगिक संबंध संहिता, 2020

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 का उद्देश्य ट्रेड यूनियनों, छंटनी, औद्योगिक विवादों से संबंधित कानूनों को एकीकृत करना तथा समान परिभाषाओं के माध्यम से अनुपालन को सरल बनाना है। यह संहिता श्रमिकों की सुरक्षा और उद्योगों की लचीलापन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए औद्योगिक सामंजस्य को बढ़ावा देती है और ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ को सुगम बनाती है।

इस संहिता के लागू होने से नियम 105 से घटकर 51 हो गए हैं, फॉर्म 37 से घटकर 18 हो गए हैं, और रजिस्टर 3 से घटकर शून्य हो गए हैं, जिससे कुल मिलाकर अनुपालन का बोझ कम हुआ है और रोजगार सृजन को प्रोत्साहन मिला है।

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 एक संतुलित और प्रगतिशील ढांचा तैयार करती है, जो श्रमिकों, नियोक्ताओं और पूरे अर्थतंत्र के लिए लाभकारी है। यह श्रमिक-हितैषी है, क्योंकि यह उचित प्रतिनिधित्व, नौकरी सुरक्षा और त्वरित विवाद निपटान सुनिश्चित करती है। साथ ही यह रोजगार-हितैषी है, क्योंकि यह अनुपालन को सरल बनाती है और लचीली नियुक्तियों को बढ़ावा देती है। महिलाओं के लिए समान अवसर और कार्य-लचीलेपन के प्रावधान इसे समावेशी बनाते हैं। समग्र रूप से, यह संहिता एक समान, तेज और प्रभावी प्रणाली की दिशा में प्रगति करते हुए विकास-उन्मुख वातावरण तैयार करती है।

अनुपालन को सरल बनाने हेतु समान परिभाषाएँ

“कर्मचारी/वर्कर” की परिभाषा का विस्तार

अधिक श्रमिकों को मूल श्रम अधिकारों का लाभ दिलाने हेतु “वर्कर” की समावेशी परिभाषा निर्धारित की गई है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(ज़ीआर) के अनुसार, ‘वर्कर’ की परिभाषा में अब सेल्स प्रमोशन कर्मचारी, पत्रकार, और ₹18,000 प्रतिमाह तक वेतन पाने वाले पर्यवेक्षी कर्मचारी भी शामिल हैं।

श्रमिक-हितैषी लाभ

  • इनके योगदान को मान्यता देने वाली नीतियों का निर्माण

  • व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर आर्थिक सुरक्षा में सुधार

  • आय असमानता में कमी

  • स्वास्थ्य लाभ, बीमारी अवकाश जैसे अधिकारों तक पहुँच

“उद्योग/इंडस्ट्री” की परिभाषा का विस्तार

धारा 2(पी) के अनुसार, ‘उद्योग’ अब किसी भी व्यवस्थित गतिविधि को शामिल करता है, जो नियोक्ता और कर्मचारियों के सहयोग से संचालित होती हो—चाहे पूंजी निवेश किया गया हो या लाभ कमाने का उद्देश्य हो अथवा न हो।

श्रमिक-हितैषी लाभ

  • गैर-लाभकारी और कम पूंजी वाले संगठनों तक श्रम अधिकारों का विस्तार

  • सुलह अधिकारी और औद्योगिक न्यायाधिकरण जैसी औपचारिक विवाद निपटान प्रणालियों तक पहुँच

  • सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों का विस्तार

  • सेवा शर्तों में परिवर्तन, छंटनी मुआवजे आदि का लाभ नए क्षेत्रों तक पहुँचना

“वेतन” की परिभाषा में बदलाव

एक समान और स्पष्ट परिभाषा सभी श्रम संहिताओं में लागू की गई है। 50% सीमा निर्धारित होने से यह सुनिश्चित होता है कि भत्तों को अनुचित रूप से बढ़ाकर मूल वेतन को कम नहीं किया जाएगा, जिससे ग्रेच्युटी, सामाजिक सुरक्षा अंशदान और छंटनी मुआवजे की गणना वास्तविक आय पर आधारित हो सके।

श्रमिक-हितैषी लाभ

  • एक समान वेतन परिभाषा

  • सामाजिक सुरक्षा लाभों में वृद्धि

  • छंटनी/ले-ऑफ़ मुआवजे में वृद्धि

  • वेतन-संबंधी विवादों में कमी

  • वेतन संरचना में पारदर्शिता

ट्रेड यूनियनों को वैधानिक मान्यता

51% सदस्यता वाले ट्रेड यूनियन को ‘नेगोशिएटिंग यूनियन’ के रूप में मान्यता मिलेगी। यदि यह सीमा पूरी नहीं होती, तो 20% या उससे अधिक सदस्यता वाले यूनियनों को मिलाकर ‘नेगोशिएटिंग काउंसिल’ बनाया जाएगा।

श्रमिक-हितैषी लाभ

  • औपचारिक मान्यता और अधिकार

  • वेतन एवं सेवा शर्तों पर सामूहिक सौदेबाजी

  • शिकायत निवारण में भागीदारी

  • औद्योगिक लोकतंत्र को मजबूती

प्रो-ग्रोथ लाभ

  • वैधानिक सामूहिक सौदेबाजी ढांचा

  • नियोक्ता के लिए एकल वार्ता मंच

फिक्स्ड-टर्म रोजगार (FTE)

निश्चित अवधि के रोजगार को कानूनी मान्यता दी गई है। FTE कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारियों के समान सभी वेतन, भत्ते, कार्य घंटे और वैधानिक लाभ मिलेंगे।

श्रमिक-हितैषी लाभ

  • सुरक्षित एवं स्वस्थ कार्य स्थितियाँ

  • सभी वैधानिक लाभ

  • 1 वर्ष सेवा पर ग्रेच्युटी

  • युवाओं के लिए अनुभव अर्जित करने का अवसर

रोजगार एवं विकास लाभ

  • मौसमी/प्रोजेक्ट आधारित क्षेत्रों में लचीली नियुक्तियाँ

  • अत्यधिक ठेकाकरण में कमी

  • नियोक्ताओं को लागत दक्षता एवं लचीलापन

“हड़ताल” की परिभाषा में बदलाव

बिना पूर्व सूचना वाली अचानक हड़ताल रोकने हेतु “सामूहिक आकस्मिक अवकाश” (50% से अधिक कर्मचारियों द्वारा) भी हड़ताल की परिभाषा में शामिल किया गया है।

प्रो-ग्रोथ लाभ

  • कारोबार सुगमता को बढ़ावा

  • बातचीत और समाधान को प्रोत्साहन

  • श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा

विवाद समाधान प्रक्रिया का सरलीकरण

अपराधों का अपराधमुक्तिकरण और संयोजन

कुछ हल्के उल्लंघनों को अपराधमुक्त किया गया है और पहली बार उल्लंघन पर आर्थिक दंड देकर मामलों का निपटारा संभव है।

श्रमिक-हितैषी लाभ

  • कानूनी उत्पीड़न में कमी

  • त्वरित विवाद समाधान

  • छोटे उल्लंघनों पर रोजगार प्रभावित न होना

प्रो-ग्रोथ लाभ

  • आपराधिक मुकदमेबाजी के बजाय आर्थिक दंड

  • उद्योगों को सुरक्षा और स्थिरता

  • न्यायालयों पर भार कम

सरलीकृत विवाद निपटान प्रणाली

  • द्विसदस्यीय औद्योगिक न्यायाधिकरण (न्यायिक + प्रशासनिक)

  • समयबद्ध निपटान

  • सुलह विफल होने पर 90 दिनों में सीधे न्यायाधिकरण में आवेदन

हड़ताल एवं लॉकआउट का विनियमन

14 दिन पूर्व नोटिस अनिवार्य है। सुलह/न्यायाधिकरण के दौरान हड़ताल व लॉकआउट प्रतिबंधित।

लाभ

  • अचानक उत्पादन बाधित होने से रोक

  • वार्ता की संभावना बढ़ना

  • आर्थिक नुकसान में कमी

  • श्रमिक–नियोक्ता संतुलन

छंटनी संबंधी प्रावधान

वर्कर री-स्किलिंग फंड

छंटनी की स्थिति में नियोक्ता को 15 दिनों के वेतन के बराबर राशि फंड में जमा करनी होगी।

लाभ

  • अल्पकालिक आर्थिक राहत

  • कौशल उन्नयन के अवसर

  • शीघ्र पुनर्नियोजन की संभावना

छंटनी/ले-ऑफ़/समापन के लिए सीमा 100 से बढ़कर 300

प्रो-ग्रोथ लाभ

  • निवेश आकर्षण

  • छोटे उद्योगों के लिए संचालन में लचीलापन

रोजगार लाभ

  • रोजगार का औपचारीकरण

  • उद्योगों का विस्तार

कार्यस्थल पर लैंगिक समानता

शिकायत निवारण समिति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

  • कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा एवं समानता में वृद्धि

  • संवेदनशील एवं निष्पक्ष समाधान प्रक्रिया

वर्क फ्रॉम होम प्रावधान

  • सेवा क्षेत्र में मॉडल स्थायी आदेशों में स्पष्ट अनुमति

  • विशेष रूप से महिलाओं के लिए लचीलापन बढ़ाता है

अन्य विकास-उन्मुख प्रावधान

स्थायी आदेशों की बाध्यता 300 कर्मचारियों पर लागू

  • छोटे उद्योगों के लिए अनुपालन में सरलता

  • सेवा शर्तों में लचीलेपन की सुविधा

डिजिटल प्रणाली

  • ई-रिकॉर्ड, पंजीकरण और संचार

  • पारदर्शिता, कम कागज़ी कार्य और तेज़ प्रक्रिया

निष्कर्ष

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 श्रम कानूनों में व्यापक सुधार लाती है। यह श्रमिक सुरक्षा, सामूहिक सौदेबाजी, विवाद समाधान, और नियोक्ताओं को संचालन में लचीलापन—इन सभी को आधुनिक और सरल रूप में प्रस्तुत करती है। यह श्रमिकों एवं उद्योगों के बीच सामंजस्य स्थापित कर उत्पादकता, विकास और स्थिर औद्योगिक वातावरण को बढ़ावा देती है।


सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: प्रमुख विशेषताएँ और व्यापक श्रमिक कल्याण सुधार

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मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • यह संहिता नौ मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को एकीकृत कर एक रूपरेखा प्रदान करती है, जिससे संगठित, असंगठित, गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म सभी प्रकार के श्रमिकों के लिए सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

  • EPFO और ESIC का दायरा पूरे देश में विस्तारित किया गया है, जिससे अधिक संस्थान और अधिक श्रमिक सामाजिक सुरक्षा लाभों के अंतर्गत आएंगे।

  • गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को पहली बार मान्यता दी गई है और उनके कल्याण हेतु सामाजिक सुरक्षा कोष का प्रावधान किया गया है।

  • महिलाओं के लिए 26 सप्ताह का मातृत्व अवकाश, वर्क-फ्रॉम-होम, एवं क्रेच सुविधा जैसे प्रावधानों को और सशक्त बनाया गया है।

  • डिजिटल रिकॉर्ड, अपराधमुक्तिकरण, अपराधों के निपटारे में संयोजन (compounding), और तकनीक आधारित निरीक्षण-प्रधान सहायक प्रणाली के माध्यम से “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” को बढ़ावा दिया गया है।

परिचय

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 भारत के श्रम कल्याण ढांचे में एक महत्वपूर्ण सुधार है, जिसका उद्देश्य सभी वर्गों के श्रमिकों के लिए व्यापक और समावेशी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह संहिता नौ सामाजिक सुरक्षा कानूनों को एकीकृत कर एक सरल और व्यापक ढांचा प्रदान करती है, जिससे संगठित, असंगठित, गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा लाभों की पहुंच बढ़ाई जा सके।

इन विविध श्रम कानूनों को एक मंच पर लाकर, संहिता अनुपालन को सरल बनाती है, दक्षता बढ़ाती है, और जीवन एवं विकलांगता बीमा, स्वास्थ्य एवं मातृत्व लाभ, भविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी जैसे लाभों तक पहुंच को विस्तारित करती है। यह डिजिटल प्रणालियों और पारदर्शी तंत्रों के माध्यम से कार्यान्वयन को मजबूत करती है, जिससे नियोक्ता और कर्मचारी दोनों को सुगमता मिलती है।

श्रमिक-हितैषी प्रावधान (Pro-Worker Provisions)

1. फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को ग्रेच्युटी

संहिता की धारा 53 के तहत फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों (FTE) के लिए ग्रेच्युटी की पात्रता अवधि 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष कर दी गई है।
1 वर्ष की निरंतर सेवा पूर्ण करने पर उन्हें अनुपातिक आधार पर ग्रेच्युटी मिलेगी।

2. गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को शामिल करना

धारा 113 और 114 के तहत पहली बार गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा लाभ उपलब्ध कराए गए हैं।
इसके तहत “एग्रीगेटर” की परिभाषा भी शामिल की गई है।

मुख्य प्रावधान—

  • राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन

  • राज्य स्तरीय बोर्ड जो असंगठित, गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों हेतु योजनाओं की सिफारिश करेगा

  • सामाजिक सुरक्षा कोष (Social Security Fund)—केंद्र/राज्य योगदान, CSR, कंपाउंडिंग से प्राप्त राशि आदि से बनाया जाएगा

  • धारा 13—भविष्य की आवश्यकताओं हेतु अतिरिक्त कार्य भी सौंपे जा सकेंगे

3. EPFO का सार्वभौमिक कवरेज

EPF अधिनियम, 1952 को समाप्त कर दिया गया है।
अब 20 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले सभी प्रतिष्ठान EPFO के दायरे में आएंगे।
इससे कर्मचारी भविष्य निधि कवरेज बढ़ेगा और विवाद कम होंगे।

4. राष्ट्रीय पंजीकरण एवं यूनिक आईडी

असंगठित, गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस बनेगा।
पोर्टल पर पंजीकरण के बाद प्रत्येक श्रमिक को यूनिक आईडी मिलेगी, जो आधार सत्यापित होगी।
इससे प्रवासी श्रमिकों को देशभर में पोर्टेबिलिटी मिलेगी।

5. “वेतन” की एक समान परिभाषा

वेतन = मूल वेतन + महंगाई भत्ता + रिटेनिंग भत्ता
अन्य भत्ते 50% से अधिक होने पर अतिरिक्त राशि वेतन में जोड़ी जाएगी।
इससे ग्रेच्युटी, पेंशन आदि में लाभ बढ़ेगा।

6. “परिवार” की विस्तृत परिभाषा

अब इसमें शामिल—

  • महिला कर्मचारी की सास-ससुर (आय सीमा आधारित)

  • माता-पिता न होने पर अविवाहित नाबालिग भाई/बहन

ESIC लाभों का दायरा बढ़ा।

7. आवागमन के दौरान दुर्घटना पर मुआवज़ा

घर से कार्यस्थल के बीच यात्रा में दुर्घटना होने पर अब इसे सेवा के दौरान दुर्घटना माना जाएगा।

8. ESIC का विस्तार

ESIC अब पूरे भारत में लागू होगा।

  • 10 से कम कर्मचारियों वाले संस्थानों के लिए स्वैच्छिक विकल्प

  • ख़तरनाक कार्यों में 1 कर्मचारी होने पर भी अनिवार्य

  • प्लांटेशन श्रमिक भी शामिल

महिला-हितैषी प्रावधान (Pro-Women Provisions)

1. मातृत्व लाभ

  • 80 दिन कार्य पर उपस्थित—पात्र

  • 26 सप्ताह का अवकाश

  • गोद लेने/सरोगेसी पर 12 सप्ताह

2. वर्क-फ्रॉम-होम

मातृत्व अवकाश के बाद, कार्य की प्रकृति अनुरूप, वर्क-फ्रॉम-होम का प्रावधान।

3. सरल चिकित्सा प्रमाणन

अब प्रमाण पत्र—

  • पंजीकृत डॉक्टर

  • आशा कार्यकर्ता

  • एएनएम

  • दाई
    द्वारा जारी किया जा सकेगा।

4. मेडिकल बोनस

₹3,500—प्रि-नैटल/पोस्ट-नैटल सेवाएँ न मिलने पर देय।

5. स्तनपान अवकाश

बच्चे के 15 माह तक प्रतिदिन दो ब्रेक।

6. क्रेच सुविधा

50+ कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में अनिवार्य।

  • चार बार विजिट

  • साझा क्रेच सुविधा की अनुमति

  • क्रेच न होने पर ₹500/माह (प्रति बच्चा, अधिकतम दो)

विकास-उन्मुख प्रावधान (Pro-Growth Provisions)

1. डिजिटलीकरण

सभी रिकॉर्ड/रिटर्न इलेक्ट्रॉनिक रूप में—अनुपालन सरल, लागत कम।

2. जांच पर सीमा

PF जांच आरंभ करने की सीमा—5 वर्ष
जांच 2 वर्ष में पूरी, CPFC की अनुमति से 1 वर्ष अतिरिक्त।

3. अपील हेतु कम जमा राशि

अब केवल 25% जमा कर अपील दायर की जा सकती है (पहले 40–70%)।

4. भवन निर्माण उपकर—स्व-मूल्यांकन

उपकर संग्रह सरल व तेज़ होगा।

5. प्लांटेशन हेतु ESIC

प्लांटेशन मालिक स्वेच्छा से ESIC अपना सकेंगे।

6. अपराधमुक्तिकरण (Decriminalization)

  • उल्लंघन सुधार हेतु 30 दिन की नोटिस अवधि

  • 13 अपराधों में जेल के स्थान पर जुर्माना

  • 7 अपराध कंपाउंडेबल

7. निरीक्षक-कम-फैसिलिटेटर

धारा 72—

  • ऑनलाइन, रैंडम निरीक्षण

  • सहयोगात्मक, मार्गदर्शक दृष्टिकोण

  • इंस्पेक्टर राज में कमी

8. अपराधों का संयोजन (Compounding)

पहली बार—

  • केवल जुर्माने से निपटान

  • अधिकतम जुर्माने का 50%/75% देकर मामला सुलझाया जा सकता है

  • मुकदमों में कमी

रोज़गार-उन्मुख प्रावधान (Pro-Employment Provisions)

1. करियर सेंटर

  • पंजीकरण, मार्गदर्शन, जॉब-मैचिंग

  • डिजिटल व फिजिकल—दोनों प्लेटफॉर्म

  • नियोक्ताओं द्वारा रिक्तियों की अनिवार्य सूचना

2. फिक्स्ड-टर्म रोजगार

FTE कर्मचारियों को—

  • 1 वर्ष में ग्रेच्युटी

  • स्थायी कर्मचारियों जैसी सामाजिक सुरक्षा

3. श्रमिकों का सार्वभौमिक कवरेज

(a) गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिक—पहली बार मान्यता
(b) असंगठित/स्व-नियोजित श्रमिक—विशेष योजनाएँ

निष्कर्ष

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 नौ मौजूदा कानूनों को एकीकृत कर, संगठित–असंगठित सभी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करती है। यह महिलाओं की भागीदारी बढ़ाती है, अनुपालन सरल बनाती है, और “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” को प्रोत्साहित करती है।
यह संहिता विकसित भारत 2047 की दिशा में समावेशी विकास और सामाजिक सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया के नेतृत्व में श्रम सुधारों का ऐतिहासिक क्रियान्वयन : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी बधाई

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रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज देश में चार श्रम संहिताओं के ऐतिहासिक क्रियान्वयन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया जी के दूरदर्शी नेतृत्व की सराहना की है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि श्रम सुधारों का यह महत्वपूर्ण निर्णय देश के 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों के अधिकार, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण की एक अभूतपूर्व गारंटी है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि आज का दिन भारत के श्रम क्षेत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर है। चारों श्रम संहिताओं के लागू होने से न्यूनतम वेतन का अधिकार, महिलाओं को समान वेतन का प्रावधान, फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को ग्रेच्युटी, प्रत्येक श्रमिक के लिए सामाजिक सुरक्षा, मुफ्त स्वास्थ्य जांच की सुविधा और ओवरटाइम पर डबल वेतन जैसी व्यवस्थाएँ पूरे देश में सुनिश्चित होंगी। उन्होंने कहा कि इन प्रावधानों से न केवल श्रमिक वर्ग को लाभ मिलेगा, बल्कि औद्योगिक वातावरण अधिक पारदर्शी, संतुलित और श्रमिक-हितैषी होगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जिस समावेशी और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प लिया है, श्रम संहिताओं का लागू होना उस दिशा में एक बड़ा परिवर्तनकारी कदम है। उन्होंने कहा कि भारत की कार्यशील जनसंख्या राष्ट्र की उत्पादन शक्ति और आर्थिक समृद्धि की आधारशिला है, और उनके अधिकारों का संरक्षण किसी भी सशक्त राष्ट्र की प्राथमिकता है। यह संहिताएँ देश की श्रम शक्ति को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और सशक्त वातावरण प्रदान करेंगी।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  कहा कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा, उनके कल्याण और सामाजिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाले इस निर्णय के लिए वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और केंद्रीय मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया जी के प्रति आभार प्रकट करते हैं। उन्होंने कहा कि यह सुधार नई अर्थव्यवस्था, बेहतर औद्योगिक संबंधों और मजबूत श्रम बाजार का आधार साबित होगा।

मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि इन श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन से देशभर में रोजगार, उत्पादन, निवेश और औद्योगिक विकास की गति और अधिक मजबूत होगी, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ेगी।

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