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सीआरपीएफ स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवानों को दी शुभकामनाएं, साहस और राष्ट्रसेवा की सराहना की

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के स्थापना दिवस के अवसर पर सभी अधिकारियों और जवानों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि सीआरपीएफ ने अपने अटूट साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर देश की सेवा में एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने से लेकर प्राकृतिक आपदाओं और अन्य चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में नागरिकों की सहायता करने तक, सीआरपीएफ के जवानों ने हमेशा राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उनके समर्पण और सेवा भावना ने देशवासियों का विश्वास और सम्मान अर्जित किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने विशेष रूप से नक्सलवाद (माओवाद) के खिलाफ सीआरपीएफ की निर्णायक भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि जवानों के साहस, समर्पण और निरंतर अभियानों के कारण प्रभावित क्षेत्रों में शांति, सुरक्षा और विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है, जिससे लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' (X) पर अपने संदेश में कहा कि सीआरपीएफ ने हर कठिन परिस्थिति में राष्ट्र की रक्षा और नागरिकों की सुरक्षा के लिए अद्वितीय साहस का परिचय दिया है। उन्होंने बल के सभी जवानों के उज्ज्वल भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य और सुरक्षित सेवा की कामना करते हुए उनके योगदान को राष्ट्र के लिए प्रेरणादायक बताया।

सीआरपीएफ देश का सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल है, जो आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद और नक्सल विरोधी अभियानों, चुनावी सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में अहम भूमिका निभाता है।


12 वर्षों में बदली भारत की आतंकवाद-रोधी तस्वीर: जीरो टॉलरेंस नीति से मजबूत हुआ राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र

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नई दिल्ली- पिछले 12 वर्षों में भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को एक नई दिशा देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में व्यापक बदलाव किए हैं। केंद्र सरकार की "आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance)" नीति के तहत कानूनी सुधार, संस्थागत सशक्तीकरण, खुफिया समन्वय, सीमा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया गया है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप देश में आतंकवादी घटनाओं और उनसे होने वाली जनहानि में उल्लेखनीय कमी आई है।

2014 में चुनौतीपूर्ण सुरक्षा परिदृश्य

वर्ष 2014 में देश को आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ, आतंकवादी गतिविधियां और पत्थरबाजी की घटनाएं लगातार बढ़ रही थीं। वहीं, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए कट्टरपंथी विचारधाराओं का प्रसार भी नई चुनौती बनकर उभरा था।

कानूनी सुधारों से मिली नई ताकत

सरकार ने आतंकवाद से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण कानूनों में संशोधन किए।

  • यूएपीए (UAPA) संशोधन 2019 के तहत व्यक्तियों को भी आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान किया गया।

  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) संशोधन अधिनियम 2019 से एजेंसी की जांच शक्तियों का विस्तार हुआ।

  • धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) को मजबूत कर आतंकियों की वित्तीय आपूर्ति पर शिकंजा कसा गया।

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में पहली बार आतंकवाद और संगठित अपराध की स्पष्ट परिभाषा दी गई।

  • आर्म्स संशोधन अधिनियम 2019 के जरिए अवैध हथियार तस्करी और आतंकी नेटवर्क पर कड़ा प्रहार किया गया।

NIA और खुफिया तंत्र हुआ और मजबूत

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का बजट 2014-15 के ₹91 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹394 करोड़ से अधिक हो गया। देशभर में विशेष NIA अदालतों की स्थापना की गई तथा 21 शाखा कार्यालय खोले गए।

वहीं, मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC), NATGRID और CCTNS जैसे आधुनिक प्लेटफॉर्म के जरिए विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच रियल-टाइम सूचना साझा करने की व्यवस्था विकसित की गई। हाल ही में साइबर खतरों से निपटने के लिए Cyber Multi Agency Centre (CyMAC) की भी स्थापना की गई है।

आतंकवाद के खिलाफ बदली रणनीति

पिछले दशक में भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी रणनीति को अधिक आक्रामक और जवाबी बनाया।

  • 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक ने आतंकियों के लॉन्च पैड पर सीधा प्रहार किया।

  • 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक ने सीमा पार आतंकी ढांचे को निशाना बनाया।

  • 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के जरिए आतंकवाद के स्रोत पर कार्रवाई की गई।

इन अभियानों ने स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब आतंकवादी हमलों का जवाब निर्णायक तरीके से देगा।

वैश्विक मंच पर भी बढ़ी भारत की भूमिका

भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया है। FATF, संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न द्विपक्षीय मंचों पर भारत ने आतंकवाद के वित्तपोषण और संरक्षण के खिलाफ प्रभावी आवाज उठाई। 2019 में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करवाना और 2025 में तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियां रहीं।

जम्मू-कश्मीर में दिखा सकारात्मक बदलाव

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में 2004-2014 के दौरान 7,217 आतंकवादी घटनाएं हुई थीं, जबकि 2014-2024 के बीच यह संख्या घटकर 2,242 रह गई।

  • पत्थरबाजी की घटनाएं लगभग समाप्त हो गई हैं।

  • आतंकवादी हमलों में नागरिक और सुरक्षा बलों की हताहतों की संख्या में भारी कमी आई है।

  • 2024 में जम्मू-कश्मीर में रिकॉर्ड 2.3 करोड़ पर्यटक पहुंचे।

  • निवेश और विकास परियोजनाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

सुरक्षित और आत्मविश्वासी भारत की ओर

सरकार का कहना है कि पिछले 12 वर्षों में अपनाई गई व्यापक और बहुआयामी रणनीति ने भारत को आतंकवाद के खिलाफ अधिक सक्षम, आधुनिक और सशक्त बनाया है। कानूनी सुधारों, तकनीकी नवाचारों, मजबूत संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बल पर देश की आंतरिक सुरक्षा को नई मजबूती मिली है और नागरिकों का विश्वास भी बढ़ा है।

आतंकवाद के खिलाफ यह परिवर्तन केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, विकसित और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


ओडिशा के मुंडाली में CISF के 57वें स्थापना दिवस समारोह में शामिल हुए गृह मंत्री अमित शाह, जवानों की भूमिका की सराहना

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ओडिशा के मुंडाली में आयोजित केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के 57वें स्थापना दिवस समारोह में अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने CISF के तीन आवासीय परिसरों—कामरूप, नासिक और सीहोर—का शिलान्यास किया, जिनका निर्माण लगभग 890 करोड़ रुपये की लागत से किया जाएगा। साथ ही राजारहाट और दिल्ली में बने दो आवासीय परिसरों का उद्घाटन भी किया। कार्यक्रम में धर्मेंद्र प्रधान,मोहन चरण माझी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। 

अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि 56 वर्षों की यात्रा में CISF ने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है, जो बल की समर्पण, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की कहानी है। उन्होंने कहा कि भारत को विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है, और औद्योगिक विकास के लिए मजबूत औद्योगिक सुरक्षा बल की आवश्यकता होती है।

उन्होंने बताया कि CISF ने समय के साथ हर चुनौती से सीखते हुए खुद को आधुनिक बनाया है, जबकि अपनी परंपराओं को भी जीवित रखा है। आधुनिक हथियारों और तकनीकों से लैस होकर CISF हर प्रकार की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।

गृह मंत्री ने कहा कि भारत के औद्योगिक विकास की कल्पना CISF के बिना संभव नहीं है, क्योंकि यह बल हमेशा देश की सुरक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा रहा है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय ने हाल ही में देश के सभी बंदरगाहों की सुरक्षा भी CISF को सौंपने का निर्णय लिया है।

अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दो महत्वपूर्ण संकल्पों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना और 2027 तक भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना लक्ष्य है, जिसमें CISF एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि CISF के जवानों के बलिदान ने देश की आर्थिक मजबूती में बड़ा योगदान दिया है। पिछले 56 वर्षों में बल को 13,693 से अधिक वीरता और विशिष्ट सेवा पदक प्राप्त हुए हैं, जो इसकी दक्षता और समर्पण का प्रमाण हैं।

गृह मंत्री ने बताया कि आज CISF देश के 70 हवाई अड्डों और 361 महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा कर रहा है। इसके अलावा ड्रोन सुरक्षा के लिए भी CISF को नोडल एजेंसी बनाया गया है। हाल के समय में कार्तव्य भवन, सेवा तीर्थ, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, नवी मुंबई एयरपोर्ट, लेंगपुई एयरपोर्ट, जवाहरपुर थर्मल पावर प्रोजेक्ट और भाखड़ा डैम जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा भी CISF को सौंपी गई है।

अमित शाह ने कहा कि मोदी सरकार का संकल्प है कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त बनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि ओडिशा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में नक्सल विरोधी अभियानों में CISF ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जल्द ही देश पूरी तरह नक्सलवाद से मुक्त होगा और सुरक्षा बल देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 

यह समारोह CISF की गौरवशाली परंपरा, आधुनिक क्षमता और राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति उसके अटूट समर्पण का प्रतीक रहा। 


पूना मार्गम: पुनर्वास से पुनर्जीवन — 15 सशस्त्र माओवादियों ने किया आत्मसमर्पण

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कार्यालय पुलिस अधीक्षक, महासमुंद

दिनांक: 01.03.2026

15 सशस्त्र माओवादी समाज की मुख्यधारा में लौटे

राज्य शासन की पुनर्वास नीति एवं सतत संवाद प्रयासों के परिणामस्वरूप प्रतिबंधित संगठन Communist Party of India (Maoist) की ओडिशा राज्य कमेटी के पश्चिमी सब-जोन अंतर्गत बरगढ़-बलांगीर-महासमुंद (BBM) डिविजनल कमेटी (DVC) के सभी 15 माओवादियों ने अपने धारित हथियारों के साथ जिला पुलिस महासमुंद के समक्ष आत्मसमर्पण किया।

आत्मसमर्पण करने वालों में 9 महिलाएं एवं 6 पुरुष शामिल हैं। सभी ने संविधान एवं तिरंगा ध्वज के प्रति आस्था व्यक्त करते हुए विश्वास, सुरक्षा और विकास का मार्ग चुना।

73 लाख रुपये का कुल इनाम

इन 15 नक्सलियों पर कुल 73 लाख रुपये का इनाम घोषित था, जिसमें—

  • 01 स्टेट कमेटी मेंबर (SCM) – ₹25 लाख

  • 02 डिविजनल कमेटी मेंबर (DCM) – ₹8-8 लाख

  • 05 एरिया कमेटी मेंबर (ACM) – ₹5-5 लाख

  • 07 पार्टी मेंबर (PM) – ₹1-1 लाख


14 अत्याधुनिक हथियार बरामद

आत्मसमर्पण के दौरान कुल 14 हथियार जमा किए गए, जिनमें—

  • 03 एके-47 रायफल

  • 02 एसएलआर रायफल

  • 02 इंसास रायफल

  • 04 .303 रायफल

  • 03 बारह बोर बंदूक

वरिष्ठ नक्सली का आत्मसमर्पण

आत्मसमर्पण करने वालों में सबसे वरिष्ठ विकास उर्फ सुदर्शन उर्फ जंगू उर्फ बाबन्ना उर्फ राजन्ना उर्फ मुप्पीड़ी साम्बैया (उम्र 57 वर्ष), ग्राम तारलापल्ली, थाना हनुमाकोण्डा, जिला वारंगल (तेलंगाना) का निवासी है। वह वर्ष 1985 से संगठन में सक्रिय था और स्टेट कमेटी मेंबर (SCM) के पद पर कार्यरत था। वह BBM डिविजन का प्रभारी था और एके-47 के साथ आत्मसमर्पण किया।

डिविजनल कमेटी सदस्य मंगेश उर्फ रमेश (ग्राम हिदूर, जिला कांकेर) एवं बाबू उर्फ सैतु उर्फ बबलू (जिला नारायणपुर) पर ₹8-8 लाख का इनाम घोषित था। दोनों पूर्व में दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) के विभिन्न डिविजनों में सक्रिय रहे हैं।

आत्मसमर्पण करने वाले 6 सदस्य (नीला, सोनू, रीना, दनेश, दीपना, रनीला) पूर्व में सेंट्रल कमेटी सदस्य चलपति के सुरक्षा दस्ते में कार्यरत रहे थे। गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट ऑपरेशन के बाद इन्हें BBM डिविजन में स्थानांतरित किया गया था।

आत्मसमर्पण के कारण

महासमुंद जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय BBM डिविजनल कमेटी के सदस्यों से आत्मसमर्पण कराने हेतु आकाशवाणी, बैनर, पोस्टर, पाम्फलेट एवं अन्य संवाद माध्यमों से लगातार अपील की जा रही थी। शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत—

  • पदानुसार प्रोत्साहन राशि

  • हथियार सहित आत्मसमर्पण पर अतिरिक्त लाभ

  • स्वास्थ्य सुविधा

  • आवास एवं रोजगार की व्यवस्था

का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया।

जंगलों में कठिन जीवन, परिवार से दूरी, वैचारिक भ्रम तथा पूर्व में आत्मसमर्पण कर चुके साथियों को योजनाओं का लाभ उठाकर परिवार सहित सामान्य जीवन जीते देख इन माओवादियों ने हिंसा का मार्ग त्यागकर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।

सम्मान एवं पुनर्वास

आत्मसमर्पण उपरांत परसदा स्थित सुरक्षित केंद्र परिसर में सभी को तिरंगा ध्वज, संविधान की प्रति तथा शांति, प्रेम और नए जीवन के प्रतीक स्वरूप लाल गुलाब भेंट कर सम्मानित किया गया।

महत्वपूर्ण उपलब्धि

इन 15 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद ओडिशा स्टेट कमेटी का पश्चिमी सब-जोन, जिसमें एक वर्ष पूर्व तक 2 डिविजन एवं 7 एरिया कमेटियां सक्रिय थीं, पूर्णतः समाप्त हो गया है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ का रायपुर पुलिस रेंज एवं ओडिशा का संबलपुर रेंज नक्सल प्रभाव से मुक्त हो गए हैं।

मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समूल उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

पुलिस की अपील

बस्तर क्षेत्र एवं ओडिशा के पूर्वी सब-जोन में सक्रिय शेष नक्सलियों से अपील की जाती है कि वे हथियार त्यागकर संविधान एवं तिरंगा ध्वज के प्रति निष्ठा जताएं और विश्वास, सुरक्षा एवं विकास की मुख्यधारा से जुड़ें।

राज्य शासन की व्यापक नक्सल उन्मूलन नीति तथा “पूना मार्गम: पुनर्वास से पुनर्जीवन” कार्यक्रम के अंतर्गत यह आत्मसमर्पण शांति, संवाद एवं विकास आधारित रणनीति की एक बड़ी सफलता है।

आत्मसमर्पित नक्सलियों का विवरण इस प्रकार है —






नक्सल मुक्त बस्तर की दिशा में एक और निर्णायक कदम : चार इनामी माओवादियों ने किया आत्मसमर्पण

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सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयास, सुदृढ़ कैम्प व्यवस्था और बेहतर कनेक्टिविटी से माओवादी प्रभाव क्षेत्र लगातार रहा है सिमट - मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

रायपुर- किस्टाराम क्षेत्र में 8 लाख रुपये के इनामी चार सक्रिय माओवादी कैडरों द्वारा हिंसा का मार्ग त्यागकर मुख्यधारा से जुड़ने का निर्णय बस्तर में बढ़ते विश्वास, सुरक्षा और विकास के वातावरण का स्पष्ट प्रमाण है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा है कि “नक्सल मुक्त बस्तर – सुरक्षित छत्तीसगढ़” का संकल्प अब जमीनी स्तर पर साकार होता दिखाई दे रहा है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यह परिवर्तन सुरक्षा बलों के समन्वित एवं सतत प्रयासों, सुदृढ़ कैम्प व्यवस्था, प्रभावी क्षेत्रीय उपस्थिति तथा बेहतर सड़क और संचार कनेक्टिविटी का प्रत्यक्ष परिणाम है। इन प्रयासों से माओवादी प्रभाव क्षेत्र लगातार सिमट रहा है और उनका सामाजिक आधार कमजोर हो रहा है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की स्पष्ट नीति है कि जो लोग हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उन्हें अवसर, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराया जाएगा। बस्तर में शांति, विश्वास और विकास की यह यात्रा आगे भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ जारी रहेगी।

आईबी शताब्दी व्याख्यान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संबोधन: ‘जन-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा से विकसित भारत का निर्माण’

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज (23 दिसंबर 2025) नई दिल्ली में “People-Centric National Security: Community Participation in Building Viksit Bharat” (जन-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा: विकसित भारत के निर्माण में सामुदायिक सहभागिता) विषय पर आयोजित आईबी शताब्दी एंडॉवमेंट व्याख्यान को संबोधित किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह गर्व का विषय है कि स्वतंत्रता के बाद से ही इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) भारत के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा देश की एकता और अखंडता की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि इस व्याख्यान का विषय देश के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। आईबी सहित सभी संबंधित संस्थानों को यह जागरूकता फैलानी चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। सजग नागरिक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सरकारी प्रयासों को मजबूत सहयोग प्रदान कर सकते हैं। जब नागरिक समुदाय के रूप में संगठित होते हैं, तो वे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सरकार की पहलों को प्रभावी समर्थन दे सकते हैं। संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है, जिनमें से कई राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक आयामों से जुड़े हैं। छात्र, शिक्षक, मीडिया, आवासीय कल्याण संघ, नागरिक समाज संगठन तथा अन्य अनेक समुदाय इन कर्तव्यों के प्रचार-प्रसार में भूमिका निभा सकते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि सामुदायिक सहभागिता राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ बनाती है। अनेक उदाहरण हैं, जब सजग नागरिकों ने समय पर सूचना देकर सुरक्षा संकट को टालने में पेशेवर बलों की मदद की है। राष्ट्रीय सुरक्षा की विस्तारित परिभाषा और रणनीति में जनता को केंद्र में रखा जाना चाहिए। नागरिकों को केवल मूक दर्शक नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने आसपास और उससे आगे के क्षेत्रों की सुरक्षा में सक्रिय भागीदार बनना चाहिए। ‘जन भागीदारी’ जन-केंद्रित सुरक्षा की आधारशिला है।

राष्ट्रपति ने कहा कि नागरिक पुलिस और आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों को जनता की सेवा की भावना के साथ कार्य करना चाहिए। यही सेवा भावना लोगों के बीच विश्वास पैदा करेगी, जो जन-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के विकास के लिए अनिवार्य है, जिसमें सामुदायिक सहभागिता एक प्रमुख तत्व होगी।

उन्होंने कहा कि भारत को बहु-आयामी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सीमा क्षेत्रों में तनाव, आतंकवाद और उग्रवाद, विद्रोह और साम्प्रदायिक कट्टरता पारंपरिक सुरक्षा चिंताएँ रही हैं। हाल के वर्षों में साइबर अपराध एक गंभीर सुरक्षा खतरे के रूप में उभरे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि देश के किसी भी हिस्से में सुरक्षा की कमी का आर्थिक प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। सुरक्षा आर्थिक निवेश और विकास के प्रमुख कारकों में से एक है। ‘सुरक्षित भारत’ का निर्माण ‘समृद्ध भारत’ के लिए आवश्यक है।

राष्ट्रपति ने कहा कि वामपंथी उग्रवाद लगभग समाप्ति की ओर है। उन्होंने बताया कि आंतरिक सुरक्षा से जुड़े बलों और एजेंसियों की गहन कार्रवाई इसके पीछे प्रमुख कारण रही है। साथ ही, समुदायों का विश्वास जीतने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया गया। जनजातीय और दूरदराज के क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देना उग्रवादी और विद्रोही समूहों द्वारा लोगों के शोषण के खिलाफ प्रभावी सिद्ध हुआ है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सोशल मीडिया ने सूचना और संचार की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। इसमें सृजन और विनाश—दोनों की क्षमता है। गलत सूचना से लोगों की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती है, जिसे निरंतर और प्रभावी ढंग से किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय हित में तथ्य-आधारित विमर्श प्रस्तुत करने वाले सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं का एक समुदाय तैयार करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे जटिल चुनौतियाँ गैर-पारंपरिक और डिजिटल प्रकृति की हैं, जिनमें से अधिकांश अत्याधुनिक तकनीकों से उत्पन्न होती हैं। ऐसे में तकनीकी रूप से सक्षम समुदायों का विकास आवश्यक है। डिजिटल धोखाधड़ी की बढ़ती समस्या के लिए घर, संस्थान और समुदाय—तीनों स्तरों पर सतर्कता जरूरी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म नागरिकों को फिशिंग, डिजिटल धोखाधड़ी और ऑनलाइन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने में सक्षम बना सकते हैं और संबंधित एजेंसियों को रियल-टाइम डेटा उपलब्ध करा सकते हैं। इस डेटा के विश्लेषण से पूर्वानुमानात्मक पुलिसिंग मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। सजग और सक्षम नागरिक समुदाय न केवल साइबर अपराधों के प्रति कम संवेदनशील होंगे, बल्कि इनके खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में भी कार्य करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि यदि नागरिक कल्याण और जन सहभागिता को रणनीति के केंद्र में रखा जाए, तो नागरिक प्रभावी खुफिया और सुरक्षा स्रोत बन सकते हैं। जन भागीदारी से प्रेरित यह परिवर्तन 21वीं सदी की जटिल और बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सहायक होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सार्वजनिक सहभागिता के माध्यम से हम सभी मिलकर एक सजग, शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेंगे।

नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार: 11 वर्षों में 126 से 11 जिलों तक सिमटा रेड कॉरिडोर

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 मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में केवल 11 रह गई है, जबकि सर्वाधिक प्रभावित जिले 36 से घटकर सिर्फ 3 रह गए हैं—यह रेड कॉरिडोर के लगभग पतन को दर्शाता है।

  • 12,000 किमी से अधिक सड़कें, 586 सुदृढ़ पुलिस थाने, 361 नए सुरक्षा कैंप, 8,500 से अधिक मोबाइल टावरों की स्थापना और ₹92 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्ती से नक्सलियों का भौगोलिक व आर्थिक वर्चस्व समाप्त हुआ है।

  • वर्ष 2025 में अब तक 317 नक्सली ढेर, 800 से अधिक गिरफ्तार और लगभग 2,000 ने आत्मसमर्पण किया—यह ऐतिहासिक क्षरण नक्सलमुक्त भारत की दिशा में मार्च 2026 तक अपरिवर्तनीय गति को दर्शाता है।

परिचय

वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) के विरुद्ध केंद्र सरकार की निर्णायक और एकीकृत रणनीति के चलते देशभर में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अभूतपूर्व कमी आई है। 2014 में 36 सर्वाधिक प्रभावित जिले घटकर 2025 में केवल 3 रह गए हैं, जबकि कुल प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर 11 हो गई है। सरकार ने बिखरी हुई नीतियों के स्थान पर संवाद → सुरक्षा → समन्वय के स्पष्ट सिद्धांतों पर आधारित बहुआयामी रणनीति अपनाई है और मार्च 2026 तक हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र को पूरी तरह नक्सलमुक्त करने का लक्ष्य तय किया है।

10 वर्षों में नक्सली हिंसा में बड़ी गिरावट

रेड कॉरिडोर के अंतर्गत छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश–तेलंगाना के कुछ हिस्से प्रभावित थे। सरकार की बहुस्तरीय रणनीति से हिंसा में तेज गिरावट आई है।

2004–2014 की तुलना में 2014–2024 के दौरान:

  • नक्सली हिंसक घटनाओं में 53% की कमी (16,463 से 7,744)।

  • सुरक्षा बलों की शहादत में 73% की गिरावट (1,851 से 509)।

  • नागरिक मौतों में 70% की कमी (4,766 से 1,495)।

2024–2025 की प्रमुख परिचालन उपलब्धियां

  • 2025 में अब तक 317 नक्सली ढेर, 862 गिरफ्तार और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया।

  • 2024 में 290 ढेर, 1,090 गिरफ्तार और 881 आत्मसमर्पण।

  • कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं का सफाया, जिनमें 2024 में 1 और 2025 में 5 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल।

  • ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 हार्डकोर नक्सली ढेर।

  • मई 2025 में बीजापुर में 24 का आत्मसमर्पण; अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ (197) और महाराष्ट्र (61) में कुल 258 आत्मसमर्पण, जिनमें 10 वरिष्ठ नक्सली शामिल।

सुरक्षा परिधि में मजबूती

  • 2014 में 36 के मुकाबले 2025 में केवल 3 सर्वाधिक प्रभावित जिले।

  • कुल प्रभावित जिले 126 से घटकर 11।

  • 2014 तक 66 के मुकाबले पिछले 10 वर्षों में 586 सुदृढ़ पुलिस थाने

  • नक्सली घटनाओं वाले पुलिस थानों की संख्या 2013 में 330 (76 जिलों) से घटकर जून 2025 तक 52 (22 जिलों) रह गई।

  • 361 नए सुरक्षा कैंप और 68 नाइट-लैंडिंग हेलिपैड का निर्माण।

नक्सलियों की फंडिंग पर निर्णायक प्रहार

  • NIA में विशेष वर्टिकल के जरिए ₹40 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त।

  • राज्यों द्वारा ₹40 करोड़ से अधिक और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा ₹12 करोड़ की कुर्की।

  • शहरी नक्सल नेटवर्क और सूचना युद्ध क्षमता को गंभीर क्षति।

राज्यों की क्षमता निर्माण में केंद्र की भूमिका

  • SRE योजना के तहत 11 वर्षों में ₹3,331 करोड़ (पिछले 10 वर्षों में 155% वृद्धि)।

  • विशेष अवसंरचना योजना (SIS) के तहत SF/SIB और पुलिस सुदृढ़ीकरण हेतु हजारों करोड़ की स्वीकृति।

  • 2017–18 से अब तक ₹1,757 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत, ₹445 करोड़ जारी।

  • 586 सुदृढ़ पुलिस थाने निर्मित।

  • SCA योजना के तहत ₹3,817.59 करोड़।

  • ACALWEMS के तहत कैंप अवसंरचना व अस्पताल उन्नयन के लिए सहायता।

अवसंरचना विकास

सड़क संपर्क:

  • मई 2014 से अगस्त 2025 तक 12,000 किमी सड़कें; 17,589 किमी परियोजनाएं ₹20,815 करोड़ की लागत से स्वीकृत।

मोबाइल कनेक्टिविटी:

  • 2G टावर: 2,343 (₹4,080 करोड़)।

  • चरण-2: 2,542 स्वीकृत (₹2,210 करोड़), 1,154 स्थापित।

  • 4G सैचुरेशन/आकांक्षी जिलों में 8,527 स्वीकृत; हजारों टावर कार्यरत।

वित्तीय समावेशन

  • 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम, 37,850 बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट।

  • 90 जिलों में 5,899 डाकघर—हर 5 किमी पर सेवाएं।

शिक्षा एवं कौशल विकास (48 जिले)

  • 48 आईटीआई (₹495 करोड़) और 61 स्किल डेवलपमेंट सेंटर स्वीकृत।

  • 46 आईटीआई और 49 एसडीसी कार्यरत—स्थानीय युवाओं को रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण।

NIA में अलग वर्टिकल व स्थानीय बलों का सशक्तिकरण

  • 108 मामलों की जांच, 87 में चार्जशीट—संगठनात्मक ढांचे को गहरी चोट।

  • 2018 में बस्तरिया बटालियन का गठन—स्थानीय युवाओं की भागीदारी से पूर्व गढ़ों में निर्णायक बढ़त।

3 दशकों बाद मुक्त हुए क्षेत्र (सफलता कथाएं)

  • ऑपरेशन ऑक्टोपस, डबल बुल, चकबंदा से बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, बरामसिया, चक्रबंधा जैसे गढ़ मुक्त।

  • अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों तक स्थायी कैंप।

  • PLGA की मुख्य शक्ति का विघटन और 2024 की TCOC का पूर्ण विफल होना।

आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति

  • वरिष्ठ कैडर को ₹5 लाख, मध्यम/निम्न को ₹2.5 लाख।

  • 36 माह तक प्रशिक्षण हेतु ₹10,000 मासिक स्टाइपेंड।

  • इस वर्ष 521 आत्मसमर्पण; नई राज्य सरकार के बाद कुल 1,053—मुख्यधारा में सफल पुनर्वास।

निष्कर्ष

पिछले 11 वर्षों में केंद्र सरकार की समन्वित, बहुआयामी रणनीति—सुरक्षा कार्रवाई, अवसंरचना विस्तार, वित्तीय नाकेबंदी, विकास संतृप्ति और आकर्षक आत्मसमर्पण नीति—ने नक्सलवाद को 2014 के 126 जिलों से घटाकर 2025 में केवल 11 जिलों तक सीमित कर दिया है। हिंसा में 70% से अधिक कमी, शीर्ष नेतृत्व का सफाया और हजारों कैडरों का पुनर्वास इस बात का प्रमाण है कि नक्सल आंदोलन की वैचारिक और क्षेत्रीय रीढ़ टूट चुकी है। मार्च 2026 तक लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत सतर्कता आवश्यक है, पर दिशा स्पष्ट है—शांति और विकास का नया अध्याय।

नक्सलवाद मुक्त छत्तीसगढ़ का संकल्प तेजी से हो रहा साकार: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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सुकमा में 10 माओवादी कैडरों ने किया आत्मसमर्पण, पुनर्वास से पुनर्जीवन की नई शुरुआत

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज सुकमा जिले में “पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन” कार्यक्रम के तहत दरभा डिवीजन कमेटी सहित विभिन्न नक्सली संगठनों से जुड़े 10 माओवादी कैडरों के आत्मसमर्पण को ऐतिहासिक और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक बताया। इनमें 6 महिला माओवादी भी शामिल हैं, जिन पर कुल 33 लाख रुपये का इनाम घोषित था।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि नक्सलवाद मुक्त छत्तीसगढ़ का संकल्प अब केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि तेजी से साकार होती वास्तविकता बन रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सशक्त नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के विरुद्ध लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यह आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है कि बस्तर में अब हिंसा, भय और भटकाव की विचारधारा कमजोर पड़ रही है, जबकि विकास, विश्वास और संवाद की राह मजबूत हो रही है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि हिंसा के रास्ते पर न वर्तमान सुरक्षित होता है और न ही भविष्य। छत्तीसगढ़ सरकार की विशेष पुनर्वास नीति आत्मसमर्पण करने वालों को सम्मान, सुरक्षा, आजीविका और समाज में पुनर्स्थापना की ठोस गारंटी देती है। मुख्यधारा में लौटकर ये लोग अपने परिवारों के साथ एक स्थायी, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की नई शुरुआत कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया कि सरकार का लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट है— छत्तीसगढ़ को पूर्णतः नक्सलवाद मुक्त बनाना और बस्तर को विकास, विश्वास और अवसरों की नई पहचान देना।

मुख्यमंत्री साय ने आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों के निर्णय का स्वागत करते हुए अन्य भटके युवाओं से भी अपील की कि वे हिंसा का मार्ग छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास की मुख्यधारा से जुड़ें।

उन्होंने कहा कि डबल इंजन की सरकार के समन्वित प्रयासों से सुरक्षा बलों की सशक्त कार्रवाई, विकास योजनाओं का विस्तार और पुनर्वास आधारित मानवीय दृष्टिकोण—तीनों मिलकर बस्तर में परिवर्तन की नई कहानी लिख रहे हैं।

https://x.com/i/status/1999458357623787920

प्रधानमंत्री 29-30 नवंबर को रायपुर में पुलिस महानिदेशकों/महानिरीक्षकों के 60वें अखिल भारतीय सम्मेलन में भाग लेंगे

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सम्मेलन का विषय: 'विकसित भारत: सुरक्षा आयाम'

  1. सम्मेलन में अब तक की प्रमुख पुलिस चुनौतियों से निपटने में हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी और 'सुरक्षित भारत' के निर्माण के लिए एक दूरदर्शी रोडमैप तैयार की जाएगी
  2. वामपंथी उग्रवाद, आतंकवाद का मुकाबला, आपदा प्रबंधन, महिला सुरक्षा और पुलिसिंग में फोरेंसिक विज्ञान तथा एआई के उपयोग जैसे मुद्दों पर प्रमुखता से चर्चा की जाएगी
  3. प्रधानमंत्री विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक भी प्रदान करेंगे

रायपुर- प्रधानमंत्री 29-30 नवंबर, 2025 को भारतीय प्रबंधन संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ में पुलिस महानिदेशकों/महानिरीक्षकों के अखिल भारतीय सम्मेलन के 60वें संस्करण में भाग लेंगे।

यह सम्मेलन 28 से 30 नवंबर तक चलेगा। इसका उद्देश्य अब तक प्रमुख पुलिस चुनौतियों से निपटने में हुई प्रगति की समीक्षा करना और 'विकसित भारत' के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप 'सुरक्षित भारत' के निर्माण के लिए एक दूरदर्शी रोडमैप की रूपरेखा तैयार करना है।

'विकसित भारत: सुरक्षा आयाम' विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में वामपंथी उग्रवाद, आतंकवाद निरोध, आपदा प्रबंधन, महिला सुरक्षा और पुलिस व्यवस्था में फोरेंसिक विज्ञान एवं एआई के उपयोग जैसे प्रमुख सुरक्षा मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी। प्रधानमंत्री विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक भी प्रदान करेंगे।

यह सम्मेलन देश भर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा प्रशासकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के विविध मुद्दों पर खुले और सार्थक विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण संवादात्मक मंच प्रदान करता है। यह पुलिस बलों के सामने आने वाली परिचालन, अवसंरचनात्मक और कल्याण संबंधी चुनौतियों पर चर्चा के साथ-साथ अपराध से निपटने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आंतरिक सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए पेशेवर प्रथाओं के निर्माण और साझाकरण को भी सुगम बनाता है।

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने इस वार्षिक सम्मेलन में निरंतर गहरी रुचि दिखाई है, और स्पष्ट चर्चाओं को प्रोत्साहित किया है। उन्‍होंने एक ऐसा माहौल तैयार किया है जहां पुलिस व्यवस्था पर नए विचार उभर सकें। व्यावसायिक सत्र, विस्तृत बातचीत और विषयगत चर्चाएं प्रतिभागियों को महत्वपूर्ण आंतरिक सुरक्षा और नीतिगत मामलों पर सीधे प्रधानमंत्री के साथ अपने विचार साझा करने का अवसर प्रदान करती हैं।

वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में इस सम्मेलन के स्वरूप में निरंतर सुधार हुआ है, जिसमें देश भर के विभिन्न स्थानों पर इसका आयोजन भी शामिल है। यह सम्मेलन गुवाहाटी (असम), कच्छ के रण (गुजरात), हैदराबाद (तेलंगाना), टेकनपुर (ग्वालियर, मध्य प्रदेश), स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (केवड़िया, गुजरात), पुणे (महाराष्ट्र), लखनऊ (उत्तर प्रदेश), नई दिल्ली, जयपुर (राजस्थान) और भुवनेश्वर (ओडिशा) में आयोजित किया जा चुका है। इसी परंपरा को जारी रखते हुए, इस वर्ष 60वां पुलिस महानिदेशक/पुलिस महानिरीक्षक सम्मेलन रायपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित किया जा रहा है।

इस सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृह राज्य मंत्री, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशक और केंद्रीय पुलिस संगठनों के प्रमुख भाग लेंगे। नए और अभिनव विचारों को सामने लाने के लिए, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के गृह विभाग के प्रमुख और डीआईजी तथा एसपी स्तर के कुछ चुनिंदा पुलिस अधिकारी भी इस वर्ष सम्मेलन में भाग लेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी 60वें DGs/IGs सम्मेलन में रायपुर, छत्तीसगढ़ में भाग लेंगे

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29-30 नवंबर, 2025 को छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) में भारत के पुलिस महानिदेशकों/अधीक्षक जनरल (DGs/IGs) की 60वीं अखिल भारतीय सम्मेलन में भाग लेंगे।

तीन दिवसीय सम्मेलन, जो 28 से 30 नवंबर तक आयोजित किया जा रहा है, का उद्देश्य अब तक पुलिसिंग में हासिल की गई प्रगति की समीक्षा करना और ‘सुरक्षित भारत’ के निर्माण के लिए भविष्य की रूपरेखा तैयार करना है, जो राष्ट्रीय दृष्टि ‘विकसित भारत’ के अनुरूप है।

‘विकसित भारत: सुरक्षा आयाम’ के मुख्य विषय के तहत सम्मेलन में वामपंथी उग्रवाद, आतंकवाद विरोधी उपाय, आपदा प्रबंधन, महिलाओं की सुरक्षा, और पुलिसिंग में फोरेंसिक विज्ञान तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श होगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति पुलिस पदक (President’s Police Medals) सेवा के लिए भी प्रदान करेंगे।

यह सम्मेलन देशभर के वरिष्ठ पुलिस नेताओं और सुरक्षा प्रशासकों के लिए एक महत्वपूर्ण इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, जहाँ वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विविध मुद्दों पर खुलकर और सार्थक आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसके साथ ही, यह सम्मेलन पुलिस बलों द्वारा सामना किए जा रहे संचालन, अवसंरचना और कल्याण संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करने, अपराध नियंत्रण, कानून व्यवस्था बनाए रखने और आंतरिक सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए पेशेवर अनुभव साझा करने का अवसर भी देता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस वार्षिक सम्मेलन में लगातार गहरी रुचि दिखाई है, खुली चर्चाओं को प्रोत्साहित किया है और ऐसा वातावरण बनाया है जहाँ पुलिसिंग पर नए विचार और नवाचार उभर सकें। व्यावसायिक सत्र, ब्रेक-आउट इंटरेक्शन और थीम आधारित डाइनिंग टेबल चर्चाएँ प्रतिभागियों को प्रधानमंत्री के साथ सीधे संवाद करने और आंतरिक सुरक्षा तथा नीति मामलों पर अपने विचार साझा करने का अवसर देती हैं।

2014 के बाद से, प्रधानमंत्री की मार्गदर्शन में इस सम्मेलन का प्रारूप लगातार उन्नत किया गया है और इसे देश के विविध स्थानों पर आयोजित किया गया है। इससे पहले सम्मेलन गुवाहाटी (असम), रण ऑफ कच्छ (गुजरात), हैदराबाद (तेलंगाना), टेकनपुर (ग्वालियर, मध्य प्रदेश), स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (केवड़िया, गुजरात), पुणे (महाराष्ट्र), लखनऊ (उत्तर प्रदेश), नई दिल्ली और जयपुर (राजस्थान), और भुवनेश्वर (ओड़िशा) में आयोजित हो चुका है। इसी परंपरा को जारी रखते हुए, इस वर्ष 60वां DGsP/IGsP सम्मेलन रायपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित किया जा रहा है।

सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, राज्य/संघ शासित प्रदेशों के गृह राज्य मंत्री, राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के DGPs और केंद्रीय पुलिस संगठनों के प्रमुख उपस्थित होंगे। नवोन्मेषी और ताज़ा विचार लाने के लिए इस वर्ष कुछ DIG और SP रैंक के उत्कृष्ट पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के गृह विभाग के प्रमुख भी शारीरिक रूप से भाग लेंगे।

नक्सलवाद के खिलाफ दशक: सुरक्षा, विकास और पुनर्वास के माध्यम से भारत में महत्वपूर्ण प्रगति

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मुख्य बातें

  • 2014 और 2024 के बीच नक्सल से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आयी ।
  • पिछले दस सालों में नक्सल प्रभावित इलाकों में 576 किले सदृश पुलिस स्टेशन निर्मित किये गए। इस दौरान नक्सल प्रभावित ज़िले 126 से घटकर 18 रह गए।
  • अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने सरेंडर किया और करीब 270 नक्सली मारे गए।
  • नक्सलियों से मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 73% की कमी आयी और दूसरी तरफ नक्सली हिंसा में मरने वाले आम नागरिकों की मौतें भी 70% कम हुईं।

 


परिचय

देते हुए नक्सलियो के कारगर नियंत्रण और उनके त्वरित खात्मे की प्रभावी शैली को दर्शाती है। केंद्र सरकार ने सुरक्षा, विकास और पुनर्वास की अपनी एक समन्वित शैली के ज़रिए देश की नक्सल विरोधी रणनीति में एक बुनियादी बदलाव लाया है। नक्सली हिंसा को लेकर पहले अपनाये जाने वाले ढुलमुल तौर तरीके को त्याग कर केंद्र सरकार ने अब बातचीत, सुरक्षा और समन्वय की एकीकृत नी ति अपनायी है, जिसका लक्ष्य मार्च 2026 तक देश के सभी नक्सल प्रभावित जिलों को नक्सल मुक्त बनाना है। यह तरीका कानून क्रियान्वन की कार्यदक्षता, क्षमता निर्माण और सामाजिक समन्वय पर बराबर ध्यान।

नक्सली हिंसा में गिरावट के एक दशक

पिछले एक दशक मेंसुरक्षा बलों की मिली-जुली कोशिशों और नक्सली इलाको में विकास कार्यों की वजह से नक्सली हिंसा में काफी कमी आई है। तुलनात्मक रूप से देखें तो वर्ष 2004-2014 और 2014-2024 के बीचनक्सली हिंसा की घटनायें 16,463 से घटकर 7,744 हो गई। जबकि इस दौरान मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या 1,851 से घटकर 509 रह गईंऔर आम नागरिकों की मौतें 4,766 से घटकर 1,495 हो गई। यह स्थिति नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति और शासन व्यवस्था बहाल होने का एक शानदार संकेत है।

अकेले वर्ष 2025 में सुरक्षा बलों ने 270 नक्सल उग्रवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया, 680 नक्सलियों को गिरफ्तार किया और करीब 1225 नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने के लिए बाध्य किया। सुरक्षा बलों की तरफ से ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियान और बीजापुर , छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में नक्सलियों द्वारा बड़े पैमाने पर किये गए आत्मसमर्पण से नक्सल उग्रवादियों को जीवन की मुख्यधारा में शामिल होने की महती प्रेरणा मिली है।

A diagram of a security progressAI-generated content may be incorrect.

सशक्त सुरक्षा ग्रिड और तकनीकी उन्नययन

नक्सल हिंसा की रोकथाम को लेकर इसके नियंत्रण की बुनियादी संरचना का निर्माण सरकार की तरफ से एक बेहद जरुरी कदम था। पिछले दस सालों में सरकार द्वारा नक्सली इलाकों में हर जरूरत से सुसज्जित 576 पुलिस स्टेशन बनाए गए। पिछले छह सालों में 336 नए सिक्योरिटी कैंप बनाए गए हैं। वर्ष 2014 में नक्सल प्रभावित ज़िलों की संख्या जो 126 हुआ करती थी वह 2024 में घटकर 18 रह गई हैऔर अब सिर्फ़ ज़िले ही सबसे ज़्यादा नक्सल प्रभावित कैटेगरी में हैं। इस दौरान 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड बनाए गए जिससे सुरक्षा बलों को अपने ऑपरेशन के दौरान कभी भी आने-जाने में आसानी हुई है और उनका रिस्पॉन्स टाइम भी बेहतर हुआ है।

सुरक्षा एजेंसियां अब नक्सली गतिविधियों की सटीक मॉनिटरिंग और उनके विश्लेषण के लिए अधुनातन तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों की लोकेशन ट्रैकिंगमोबाइल डेटा एनालिसिससाइंटिफिक कॉल लॉग जांच और सोशल मीडिया एनालिसिस जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर उनकी सभी हरकतों पर करीब से नज़र रखा जाता है। सुरक्षा बलों को अलग-अलग फोरेंसिक और टेक्निकल संस्थानों से मिले सपोर्ट से इंटेलिजेंस इकट्ठा करने और अपनी ऑपरेशनल दक्षता को और मज़बूत बनाने में मदद मिली है। इसके अलावा सुरक्षा बलों द्वारा मॉनिटरिंग और रणनीतिक प्लानिंग को बेहतर बनाने के लिए ड्रोन सर्विलांससैटेलाइट इमेजिंग और एआई -बेस्ड डेटा एनालिटिक्स का भी असरदार तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

नक्सलियों के फाइनेंस नेटवर्किंग के तोड़ की रणनीति

नक्सलवाद को सपोर्ट करने वाले फाइनेंशियल नेटवर्क को अब बड़े सुव्यवस्थित तरीके से खत्म कर दिया गया है। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानि एन आई ए के एक विशेष विंग ने नक्सलियों की ₹40 करोड़ से ज़्यादा की संपत्ति ज़ब्त की है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के ऑपरेशंस से इनकी करीब ₹12 करोड़ की ज़ब्ती हुई है। राज्यों ने भी नक्सलियों की ₹40 करोड़ की प्रॉपर्टी ज़ब्त की है। इसके अलावा, शहरी नक्सलियों को काफी नैतिक और मानसिक झटके लगे हैं, जिससे इनके इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर यानी सू चना युद्ध के लिए उनकी क्षमता में कमी आई है।

क्षमता निर्माण और राजकीय सहयोग

राज्यों के सुरक्षा बलों को मज़बूत बनाना सरकार की वामपंथी उग्रवाद के खात्मे की नीति का एक अहम हिस्सा रहा है। सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर यानी सुरक्षा सम्बंधित व्यय योजना के तहतपिछले 11 सालों में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों को ₹3,331 करोड़ रुपये जारी किए गएजो पिछले दशक की तुलना में 155 % ज़्यादा है। इसी तरह स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (SIS) ने राज्य की स्पेशल फोर्सस्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच और मज़बूत पुलिस स्टेशनों के निर्माण के लिए ₹991 करोड़ रुपये मंज़ूर किए।

2017-18 के बाद से इस क्रम में ₹1,741 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है जिसमे अब तक ₹445 करोड़ जारी किए गए हैं। विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए के तहत, ₹3,769 करोड़ की राशि वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में तमाम विकास परियोजनाओं के लिए आबंटित थीइस राशि में पूरक के रूप में शिविर अवसंरचना के लिए केंद्रीय एजेंसियों को सहायता के तहत ₹122.28 करोड़ और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए ₹12.56 करोड़ प्रदान की गयी।

बुनियादी सुविधाओं का विकास

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के विकास ने वहां सामाजिक और आर्थिक समावेश को गति दी है।

  • सड़क संपर्क: 2014 और 2025 के बीच कुल 17,589 किलोमीटर के निर्माण के लिए ₹20,815 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए जिसमें नक्सली इलाकों में 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण पूरा हुआ
  • मोबाइल कनेक्टिविटी: वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूईप्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी विस्तार को दो चरणों में लागू किया गया है। पहले चरण के तहत, ₹4,080 करोड़ की लागत से 2,343 2जी टावर बनाए गए। दूसरे चरण मेंसितंबर-अक्टूबर 2022 में ₹2,210 करोड़ के निवेश के साथ 2,542 4जी टावर स्वीकृत किए गएजिनमें से 1,139 चालू हो गए हैं। इसके अतिरिक्तनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए 8,527 4जी टावरों को मंजूरी दी गई है। आकांक्षी जिला योजना के तहत स्वीकृत 4,281 टावरों में से 2,556 कार्यरत हैंजबकि 4जी संतृप्ति योजना के तहत, 4,246 टावरों में से 2,602 चालू हैं।
  • वित्तीय समावेशन और पहुंच: नक्सल प्रभावित इलाकों में 1007 बैंक शाखाएं, 937 एटीएम और 37,850 बैंकिंग संवाददाताओं की स्थापना की गई है। अब नक्सल प्रभावित 90 जिलों में 5,899 डाकघर काम करते हैंजिससे प्रत्येक किमी पर नागरिकों को डाक और वित्तीय सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित हुई है।
  • शिक्षा और कौशल विकास: कौशल विकास योजना के तहत, 48 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआईऔर 48 जिलों में 61 कौशल विकास केंद्र (एसडीसीस्थापित करने के लिए ₹495 करोड़ स्वीकृत किए गएजिनमें से 46 आईटीआई और 49 एसडीसी संचालित हैं। ये संस्थान संघर्ष से विकास की ओर बढ़ रहे युवाओं को आजीविका के नए अवसर प्रदान कर रहे हैं।
  • सुरक्षा और प्रवर्तन: कुल 108 मामलों की जांच की गई हैजिसके परिणामस्वरूप अब तक 87 आरोप पत्र दाखिल किए गए हैं। बस्तरिया बटालियनजिसका गठन 2018 में हुआ थामें 1,143 रंगरूट शामिल हैंजिनमें बीजापुरसुकमा और दंतेवाड़ा जिलों के 400 युवा शामिल हैंजो सुरक्षा अभियानों में स्थानीय भागीदारी और उनके विश्वास-निर्माण की प्रतीक हैं।

 

नक्सल नेटवर्क को नेस्तनाबूद कर प्रभावित इलाकों की पुनर्वापसी और उनमे पुनर्वास का कार्य सुनिश्चित करना

अपने सतत सुरक्षा अभियानों और अपनी सटीक खुफिया-आधारित रणनीतियों के माध्यम से, सरकार ने करीब तीन दशक पुराने वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित कई क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया है। सरकार की इस सफलता के पीछे लिए "ट्रेस, टारगेट, न्यूट्रलाइज" यानी पहचान लक्ष्य और मिटा दो का दृष्टिकोण अहम् रहा है, जिससे सुरक्षा बलों को प्रमुख नक्सली नेताओं की पहचान कर उन्हें खत्म करने और उनकी कमान संरचना को बाधित करने में मदद मिली है। नक्सल इलाकों के सुदूर क्षेत्रों में सुरक्षा शिविरों की स्थापना तथा ऑक्टोपस, डबल बुल और चक्रबंध जैसे अभियानों से नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सुरक्षा बलों को उल्लेखनीय सफलता हासिल हुई है। इसके परिणामस्वरूपबुध पहाड़पारसनाथबरमशिया और चक्रबंधा जैसे क्षेत्र वामपंथी उग्रवाद से लगभग मुक्त हो गए हैं। सुरक्षा बलों ने नक्सल विद्रोहियों के अंतिम प्रमुख गढ़ अबूझमाड़ में सफलतापूर्वक प्रवेश किया है। इसके अलावा सुरक्षा बलों ने पीएलजीए (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मीको बीजापुर और सुकमा में अपने मूल क्षेत्रों को छोड़ने के लिए मजबूर करने में बड़ी सफलता पायी। गौरतलब है की वर्ष 2024 में सुरक्षा बलों के खिलाफ नक्सलियों ने एक जवाबी सामरिक हमला अभियान (टी सी ओ सी शुरू किया परन्तु हमारे सुरक्षा बलों ने अपने आक्रामक अभियानों के जरिये उनकी इस मंशा को विफल कर दिया।

वर्ष 2024 में हमारे सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ 26 बृहद मुठभेड़ों को अंजाम दिया जिसके परिणामस्वरूप कई शीर्ष नक्सली कैडरों को ढेर कर दिए गया। इनमे शामिल हैं:

  • 1 आंचलिक समिति सदस्य (जेडसीएम)
  • 5 उप-आंचलिक समिति सदस्य (एसजेडसीएम)
  • 2 राज्य समिति सदस्य (एससीएम)
  • 31 मंडलीय समिति सदस्य (डीवीसीएम)
  • 59 क्षेत्र समिति सदस्य (एसीएम)

सुरक्षा बलों की इस सुव्यवस्थित कार्रवाई ने नक्सलियों के कई मुख्य समूहों को भंग कर दिया है और कई नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति और शासन बहाल कर दिया है। सुरक्षा प्रयासों के साथ-साथसरकार की समर्पण और पुनर्वास नीतिआजीविका और सामाजिक सहायता प्रदान करने की नीति ने कई नक्सल कैडरों को समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया है।
वर्ष 2025 मेंअब तक 521 वामपंथी उग्रवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है। और पिछले दो वर्षों मेंछत्तीसगढ़ में 1,053 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किए हैं। इसके अलावापुनर्वासित कैडरों को ₹5 लाख (उच्च-रैंक), ₹2.5 लाख (मध्य/निम्न-रैंककी वित्तीय सहायता और 36 महीनों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए ₹10,000 का मासिक वजीफा मिलता हैजिससे वे गरिमा और स्थिरता के साथ अपना जीवन फिर से बना सके ।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में,भारत में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षाविकास और सामाजिक न्याय के त्रिकोण पर आधारित एक व्यापक अभियान में दृष्टिगोचर हुई है। मजबूत बुनियादी ढांचेअत्याधुनिक प्रौद्योगिकीलक्षित प्रवर्तन और ममता व करुणा केंद्रित पुनर्वास के माध्यम सेसरकार ने कभी संघर्षरत रहे क्षेत्रों को अब अवसर के केंद्रों में बदल दिया है।

भारत अभी केंद्र और राज्यों के बीच सतत सक्रिय सहयोग के जरिये मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की राह पर अग्रसर है। यह एक निर्णायक सरकार और उसकी शांति और विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के एक दशक का प्रमाण है।

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