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संत रविदास जयंती पर बड़ा निर्णय: आदमपुर एयरपोर्ट अब ‘श्री गुरु रविदास महाराज जी एयरपोर्ट’ कहलाएगा

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि संत रविदास जयंती के पावन अवसर पर लिया गया यह निर्णय देश के लिए गौरव और सम्मान का विषय है। अब पंजाब के आदमपुर एयरपोर्ट को ‘श्री गुरु रविदास महाराज जी एयरपोर्ट’ के नाम से जाना जाएगा।

प्रधानमंत्री ने इसे असंख्य लोगों के लिए खुशी का दिन बताते हुए कहा कि यह महान संत श्री गुरु रविदास महाराज जी के शाश्वत आदर्शों को समर्पित एक उपयुक्त श्रद्धांजलि है। उन्होंने कहा कि समानता, करुणा और सेवा का संदेश आज भी समाज को प्रेरणा देता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच X पर साझा किए गए संदेश में कहा,

“यह हमारे लिए सौभाग्य और गौरव की बात है कि आज संत रविदास जयंती के पावन अवसर पर यह निर्णय लिया गया है कि आदमपुर एयरपोर्ट को अब ‘श्री गुरु रविदास महाराज जी एयरपोर्ट’ के नाम से जाना जाएगा। यह असंख्य लोगों के लिए आनंद का दिन है। यह श्री गुरु रविदास महाराज जी के शाश्वत आदर्शों को समर्पित एक विनम्र श्रद्धांजलि है। समानता, करुणा और सेवा का उनका संदेश हम सभी को गहराई से प्रेरित करता है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि गुरु रविदास महाराज की शिक्षाएँ सामाजिक समरसता, भाईचारे और मानवता के मूल्यों को मज़बूत करती हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी सही मार्ग दिखाती रहेंगी।



प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में ‘दी लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन’ अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का किया उद्घाटन

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज नई दिल्ली स्थित राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर में भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी “दी लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन” का उद्घाटन किया। संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित यह ऐतिहासिक प्रदर्शनी एक शताब्दी से अधिक समय बाद पहली बार भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेषों, रत्न-अवशेषों एवं अवशेष पात्रों का अब तक का सबसे व्यापक और दुर्लभ संग्रह एक साथ प्रस्तुत कर रही है, जिनमें हाल ही में भारत को प्रत्यावर्तित किए गए अवशेष भी शामिल हैं।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा,

“125 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भारत की विरासत वापस लौटी है और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर अपने घर लौट आई है। आज से भारत की जनता भगवान बुद्ध के इन पावन अवशेषों के दर्शन कर सकेगी और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेगी।”

इस अवसर पर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि प्रधानमंत्री की उपस्थिति, जिनमें भारत की आत्मा को शासन की कार्यवाही में रूपांतरित करने की अद्वितीय क्षमता है, सदैव प्रेरणादायी और विशेष महत्व रखती है। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री का स्वागत करना सभी के लिए अत्यंत गर्व का विषय है।

यह उद्घाटन भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक यात्रा में एक ऐतिहासिक क्षण है, जो 127 वर्षों के बाद पिपरहवा अवशेषों के पुनः एकीकरण का साक्षी बना है। इस संग्रह में 1898 में कपिलवस्तु में हुए उत्खनन से प्राप्त अवशेष, 1972–75 के उत्खननों से मिली सामग्री, भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित धरोहर तथा पेप्पे परिवार का वह संग्रह शामिल है, जिसे जुलाई 2025 में भारत सरकार के निर्णायक हस्तक्षेप के बाद विदेश में नीलामी से रोककर भारत वापस लाया गया।

प्रधानमंत्री के आगमन पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता; केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत; केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू; दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना; संस्कृति राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने उनका स्वागत किया।

अपने भ्रमण के दौरान प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और भगवान बुद्ध की ध्यानमग्न प्रतिमा पर खटक और गुलाब की पंखुड़ियाँ अर्पित कीं। उन्होंने पिपरहवा स्थल से प्राप्त एक प्राचीन मुहर का अभिषेक किया, बोधि वृक्ष का पौधारोपण किया, आगंतुक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए, प्रदर्शनी कैटलॉग का विमोचन किया तथा उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं को चिवर दान अर्पित किया।

“दी लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन” विषयवस्तु के अंतर्गत क्यूरेट की गई इस प्रदर्शनी में 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान काल तक की 80 से अधिक विशिष्ट और दुर्लभ वस्तुएँ प्रदर्शित की गई हैं। इनमें मूर्तियाँ, पांडुलिपियाँ, थंका चित्र, अनुष्ठानिक वस्तुएँ, अवशेष पात्र और रत्नजड़ित धरोहरें शामिल हैं। प्रदर्शनी का केंद्र बिंदु वह विशाल एकाश्म पत्थर का संदूक है, जिसमें मूल रूप से ये पवित्र अवशेष खोजे गए थे।

1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा कपिलवस्तु से संबद्ध प्राचीन स्तूप स्थल पर खोजे गए पिपरहवा अवशेष भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से एक हैं। आज इनका पुनः एकत्र होना भारत की सांस्कृतिक धरोहर को पुनः प्राप्त करने, संरक्षित करने और सम्मान देने की अटूट प्रतिबद्धता का सशक्त प्रतीक है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक सहभागिता में उसकी सभ्यतागत और आध्यात्मिक विरासत की भूमिका लगातार सशक्त हुई है। अब तक 642 प्राचीन धरोहरें भारत वापस लाई जा चुकी हैं, जिनमें पिपरहवा अवशेषों की वापसी सांस्कृतिक कूटनीति और विरासत संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

इस उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्रीगण, राजनयिक समुदाय के सदस्य, राजदूत, वंदनीय बौद्ध भिक्षु, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, विद्वान, विरासत विशेषज्ञ, कला जगत के प्रतिनिधि, विद्यार्थी तथा देश-विदेश से आए बौद्ध अनुयायी उपस्थित रहे।

यह प्रदर्शनी संस्कृति मंत्रालय की विरासत संरक्षण एवं सांस्कृतिक नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करती है तथा बुद्ध धम्म की जन्मभूमि के रूप में भारत की विशिष्ट पहचान और विश्व के साथ अपनी सभ्यतागत विरासत साझा करने के उसके स्थायी संकल्प का उत्सव है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने पुनः कहा,

“125 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भारत की विरासत वापस लौटी है और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर अपने घर लौट आई है। आज से भारत की जनता भगवान बुद्ध के इन पावन अवशेषों के दर्शन कर सकेगी और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेगी।”





‘वीर बाल दिवस’ पर गुरु गोबिंद सिंह जी, माता गुजरी और साहिबज़ादों को अमित शाह व प्रधानमंत्री मोदी की भावपूर्ण श्रद्धांजलि

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‘वीर बाल दिवस’ के अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सिख धर्म के दशम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी, माता गुजरी जी तथा चारों साहिबज़ादों को उनके अद्वितीय बलिदान को स्मरण करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

‘एक्स’ (X) पर साझा किए गए अपने संदेश में अमित शाह ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी के वीर पुत्रों—साहिबज़ादा अजीत सिंह, साहिबज़ादा जुझार सिंह, साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह और साहिबज़ादा फतेह सिंह—द्वारा अत्यंत अल्प आयु में धर्म और देश की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान विश्व इतिहास में साहस, शौर्य और त्याग का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह बलिदान न केवल तत्कालीन अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नैतिक शक्ति और मानवता की रक्षा का संदेश देता है।

अमित शाह ने कहा कि माता गुजरी जी और गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा साहिबज़ादों में संस्कारित किए गए मूल्य—धर्म की रक्षा, मानवता की सेवा और अन्याय के विरुद्ध अडिग रहने की भावना—क्रूर शासकों द्वारा दी गई अमानवीय यातनाओं के बावजूद भी डिग नहीं सके। उन्होंने कहा कि यह अदम्य साहस भारतीय सभ्यता की आत्मा को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘वीर बाल दिवस’ की शुरुआत का उल्लेख करते हुए अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह प्रयास सुनिश्चित करता है कि चारों साहिबज़ादों के त्याग और बलिदान की गाथा हर पीढ़ी तक पहुँचे और देश के युवा उनसे प्रेरणा लेकर राष्ट्र, समाज और मानवता की सेवा के लिए आगे आएँ।

प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी ने भी ‘वीर बाल दिवस’ के अवसर पर गुरु गोबिंद सिंह जी, माता गुजरी जी और चारों साहिबज़ादों को नमन करते हुए कहा कि उनका सर्वोच्च बलिदान भारत की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक विरासत और धर्म की रक्षा के लिए अमर प्रेरणा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि साहिबज़ादों का शौर्य और दृढ़ संकल्प देशवासियों को सदैव सत्य, साहस और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्वामी श्रद्धानंद को बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित

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केंद्रीय गृह मंत्री और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने स्वामी श्रद्धानंद को उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

‘X’ पर साझा किए गए संदेश में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती जी ने स्वराज और भारतीय संस्कृति के लिए समान रूप से योगदान दिया और अपने पूरे जीवन में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया। शाह ने यह भी कहा कि उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और भारतीय बौद्धिक परंपरा को बढ़ावा देने में अविस्मरणीय भूमिका निभाई। बलिदान दिवस के अवसर पर स्वामी श्रद्धानंद जी को नमन।

वंदे मातरम् की गौरव गाथा का स्मरण हर भारतीय के लिए गर्व का विषय – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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रायपुर- राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में आयोजित विशेष चर्चा में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  वंदेमातरम के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वंदे मातरम्  देशप्रेम का वह जज्बा था जिसकी गूंज से ब्रिटिश हुकूमत तक कांप उठती थी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह उद्घोष करोड़ों भारतीयों के हृदय में साहस, त्याग और बलिदान की अग्नि प्रज्वलित करता रहा। उन्होंने कहा कि यह वही स्वर था जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की शक्ति प्रदान की।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानियों को स्मरण करते हुए कहा कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, खुदीराम बोस सहित असंख्य क्रांतिकारी वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए मां भारती के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए। उनका बलिदान आज भी हर भारतीय को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि वंदे मातरम् की गौरव गाथा का स्मरण करना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह गीत हमें उस संघर्ष, उस पीड़ा और उस अदम्य साहस की याद दिलाता है, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाई। यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का आधार स्तंभ है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं होती, जो मानचित्र पर अंकित होती हैं। किसी राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसकी सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं और उन मूल्यों से होती है, जो सदियों से उसके आचार-विचार और जीवन पद्धति का हिस्सा रहे हैं। भारत की यह सांस्कृतिक निरंतरता विश्व में अद्वितीय है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा में वंदे मातरम् पर विशेष चर्चा आयोजित करने का उद्देश्य यह भी है कि हम इतिहास की उन गलतियों को कभी न भूलें, जिन्होंने देश को गहरे घाव दिए, जिनकी पीड़ा आज भी हमारे समाज में कहीं-न-कहीं महसूस की जाती है। इतिहास से सीख लेकर ही हम एक सशक्त और समरस भारत का निर्माण कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री साय ने इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के उन सभी वीर सपूतों को नमन किया, जिन्होंने वंदे मातरम् के भाव को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर भारत माता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् हमें हमारी विरासत, हमारी सांस्कृतिक चेतना और हजारों वर्षों की सभ्यता से जोड़ता है। यह उन आदर्शों की सामूहिक अभिव्यक्ति है, जिन्हें हमने युगों-युगों में आत्मसात किया है।

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धरती को माता के रूप में पूजने की भावना रही है, जिसे हम मातृभूमि कहते हैं। वंदे मातरम् इसी भाव का सशक्त और पवित्र स्वरूप है, जो हमें प्रकृति, भूमि और राष्ट्र के प्रति सम्मान और कर्तव्यबोध सिखाता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस विशेष चर्चा के आयोजन के लिए विधानसभा अध्यक्ष तथा सभी  सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे विमर्श नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कर्नाटक के बेलगावी में छत्रपति शिवाजी महाराज की 25 फुट ऊँची प्रतिमा का उद्घाटन, राज्य और राष्ट्र गौरव का प्रतीक

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कर्नाटक के बेलगावी जिले के अठाणी में मराठा प्रतिमा छत्रपति शिवाजी महाराज की 25 फुट ऊँची भव्य प्रतिमा का उद्घाटन केंद्रीय संचार एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया। इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए मंत्री ने कहा कि यह केवल एक प्रतिमा का अनावरण नहीं है, बल्कि भारत की स्वाभिमान, साहस और हिंदवी स्वराज की चेतना को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का संकल्प है।

सिंधिया ने कहा कि “जय भवानी, जय शिवाजी” का उद्घोष आज भी हर भारतीय में निडरता, राष्ट्रीय कर्तव्य और गर्व की भावना जगाता है। कार्यक्रम में मंजुनाथ भारती स्वामीजी, संभाजी भिड़े गुरुजी, कर्नाटक के मंत्री संतोष लाड और सतीश जरकिहोली, कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी, कोल्हापुर सांसद शाहू छत्रपति महाराज, पूर्व कर्नाटक मंत्री बी. पाटिल, पीजीआर सिंधे और अन्य गणमान्य नेता उपस्थित थे।

शिवाजी महाराज: हिंदवी स्वराज के निर्माता और राष्ट्रीय कर्तव्य का प्रतीक

केंद्रीय मंत्री ने अपने संबोधन में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और संघर्षों को याद किया, बताया कि मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने हिंदवी स्वराज की प्रतिज्ञा ली। अद्वितीय साहस, रणनीतिक कुशलता और दूरदर्शी नेतृत्व के माध्यम से उन्होंने आक्रमणकारियों को परास्त किया और भारत के स्वाभिमान की रक्षा की।

सिंधिया ने कहा कि बेलगावी और अठाणी क्षेत्र शिवाजी महाराज की वीरता का साक्षी रहा है। दक्षिण भारत में उनके अभियान के दौरान यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह डेक्कन, कोंकण और गोवा को जोड़ने वाले मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करता था। इसी भूमि पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा का उद्घाटन इतिहास, परंपरा और वर्तमान को जोड़ने वाला गर्व का क्षण है।

आधुनिक भारत शिवाजी महाराज से प्रेरित होकर आगे बढ़ रहा है:

केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि भारत के आत्म-सम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच छत्रपति शिवाजी महाराज का चरित्र और आदर्श और भी प्रासंगिक हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत और राष्ट्रीय कर्तव्य की भावना देश भर में गहराई से जुड़ी हुई है।

सिंधिया ने कहा कि यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है, साहस कभी नहीं मिटता और स्वराज की भावना हमेशा जीवित रहती है।

सिंधिया महाराष्ट्र और कर्नाटक के दो दिवसीय दौरे पर थे, जिसमें उन्होंने पहले कोल्हापुर में बॉम्बे जिमखाना के 150 वर्ष पूरे होने पर स्मारक डाक टिकट का विमोचन किया और ग्रामीण डाक सेवक सम्मेलन में भाग लिया। रविवार को बेलगावी में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के उद्घाटन समारोह में उन्होंने भाग लिया।

काशी तमिल संगम 4.0: काशी और तमिलनाडु की सांस्कृतिक एकता का भव्य उत्सव

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केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री एवं शिक्षा राज्य मंत्री, जयंत चौधरी ने काशी तमिल संगम (KTS) 4.0 का दौरा करते हुए कहा कि, “काशी तमिल संगम दो प्राचीन परंपराओं को और करीब लाता है और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को प्रतिबिंबित करता है, जहाँ भारत की समृद्ध विविधता एक एकीकृत शक्ति बनती है।” यह संगम 2 दिसंबर से जारी है और काशी तथा तमिलनाडु के बीच गहरे सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों का उत्सव मनाता है।

चौधरी ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, काशी एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र बनकर उभरी है, जो भारत की विविध विरासत को संरक्षित करने, मनाने और एकजुट करने के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। तमिलनाडु के साथ यह नया संबंध यह दर्शाता है कि भारत की सांस्कृतिक एकता इसकी विविधता में गहराई से निहित है। यह पहल समझ और एकता की नई ज्वाला को प्रज्वलित कर रही है। भारत की समृद्ध विरासत गर्व के साथ प्रदर्शित हो रही है और इसकी परंपराओं को आत्मविश्वास और गौरव के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।”

उन्होंने इस वर्ष के विषय “Learn Tamil – Tamil Karkalam” की सराहना करते हुए कहा कि भारत की विविध भाषाएँ लोगों को जोड़ती हैं, और इस प्रकार की पहल युवाओं में सम्मान, संवाद और सहयोग की नई भावना को प्रेरित करती हैं। अपने दौरे के दौरान, उन्होंने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों, भाषा कार्यशालाओं और छात्र आदान-प्रदान कार्यक्रमों का अवलोकन किया। उन्होंने विशेष रूप से युवा द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और लोक नृत्यों की सराहना की।

शिक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित और IIT मद्रास एवं BHU द्वारा समन्वित KTS 4.0 में प्रमुख पहलें शामिल हैं—तेनकसी से काशी तक ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान, काशी के स्कूलों में 50 तमिल शिक्षकों की तैनाती, और उत्तर प्रदेश के छात्रों के लिए तमिल भाषा अध्ययन यात्राएँ। कार्यक्रम में काशी के ऐतिहासिक तमिल सांस्कृतिक स्थलों के दौरे भी शामिल हैं। KTS 4.0 में सात विभिन्न समूहों—छात्र, शिक्षक, महिलाएँ, कारीगर, मीडिया पेशेवर, आध्यात्मिक विद्वान और अन्य पेशेवरों—के 1,400 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए हैं।

सांस्कृतिक अनुभव, शैक्षणिक आदान-प्रदान और व्यापक जन भागीदारी के साथ, काशी तमिल संगम 4.0 भारत की सांस्कृतिक एकता का भव्य उत्सव है—जो काशी और तमिलनाडु की समृद्ध परंपराओं के बीच शाश्वत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करता है।


प्रधानमंत्री मोदी ने झारखंड स्थापना दिवस और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर दी शुभकामनाएँ, कहा–साहस और संघर्ष की प्रेरणा आज भी ज़िंदा है

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड के लोगों को राज्य स्थापना दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ दी हैं और इस अवसर पर सभी परिवारों की प्रगति और समृद्धि की कामना की। प्रधानमंत्री ने कहा कि झारखंड जनजातीय संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से समृद्ध प्रदेश है, जिसकी धरती पर साहस और संघर्ष की गाथाएँ सदियों से सुनाई देती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा को उनकी 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि जनजातीय गौरव दिवस के पावन अवसर पर पूरा देश उनके अद्वितीय योगदान को याद कर रहा है। उनका साहस, संघर्ष और मातृभूमि के लिए बलिदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

प्रधानमंत्री ने अपने X (पूर्व में Twitter) पोस्ट में लिखा:

"जनजातीय संस्कृति से समृद्ध गौरवशाली प्रदेश झारखंड के सभी निवासियों को राज्य के स्थापना दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। भगवान बिरसा मुंडा जी की इस धरती का इतिहास साहस, संघर्ष और स्वाभिमान की गाथाओं से भरा हुआ है। आज इस विशेष अवसर पर मैं राज्य के अपने सभी परिवारजनों के साथ ही यहां की प्रगति और समृद्धि की कामना करता हूं।"

उन्होंने आगे कहा:

"देश के महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा जी को उनकी 150वीं जयंती पर शत-शत नमन। जनजातीय गौरव दिवस के इस पावन अवसर पर पूरा देश मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा के लिए उनके अतुलनीय योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा है। विदेशी हुकूमत के अन्याय के खिलाफ उनका संघर्ष और बलिदान हर पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा।"


वंदे मातरम के 150 वर्ष: राष्ट्रीय उत्सव में देशभक्ति और एकता का भव्य उद्घोष

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वंदे मातरम के 150 वर्ष एक राष्ट्रीय स्मृति-उद्यम है, जिसका उद्देश्य वंदे मातरम की भावना और भारत के इतिहास में इसकी अनूठी भूमिका का उत्सव मनाना है। वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं है; यह भारत की सामूहिक चेतना है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह देशभक्ति और संघर्ष का उद्घोष बनकर उभरा था।

1 अक्टूबर को मंत्रिमंडल ने ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ का देशव्यापी उत्सव आयोजित करने को मंजूरी दी। इसका उद्देश्य नागरिकों, विशेषकर युवाओं और छात्रों को गीत की मूल क्रांतिकारी भावना से जोड़ना है। इन उत्सवों के माध्यम से इस अमर संदेश को सम्मानित किया जाएगा और सुनिश्चित किया जाएगा कि इसकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के हृदय में सदा जीवित रहे।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम पहली बार उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था, जो बंगाली साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में धारावाहिक रूप में छापा गया था। समय के साथ यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का ब्रह्मनाद बन गया। मातृभूमि को दिव्य स्वरूप में वंदित करने वाला यह गीत प्रकृति और राष्ट्र दोनों को एक सूत्र में पिरोता है, जिसने पीढ़ियों तक भारतीयों को एक भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान दी।

वंदे मातरम के 150 वर्ष—राष्ट्रीय स्मृति समारोह का उद्घाटन

‘150 वर्ष वंदे मातरम’ के स्मारक समारोह का शुभारंभ प्रधानमंत्री द्वारा दिल्ली में एक भव्य राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रमुख कलाकारों, युवा प्रतिनिधियों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम में एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट भी जारी किया गया।


वंदे मातरम कॉन्सर्ट — ‘नाद एकम्, रूपम् अनेकम्’

वंदे मातरम: नाद एकम्, रूपम् अनेकम् एक सांस्कृतिक प्रस्तुति थी जिसमें देशभर के गायक और वादक एकत्र होकर राष्ट्रीय गीत की मनमोहक प्रस्तुति में सहभागी हुए। यह कार्यक्रम भारत की एकता में विविधता की भावना का सुंदर प्रतीक था और संगीत के माध्यम से गर्व, एकता और देशभक्ति का प्रेरक संदेश देता है। यह उस अमर गीत को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि थी, जो हर भारतीय के हृदय में गूँजता है।

वंदे मातरम का सामूहिक गायन

कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण प्रधानमंत्री के नेतृत्व में वंदे मातरम के पूर्ण स्वरूप का ऐतिहासिक सामूहिक गायन था। इसी समय देशभर में मुख्यमंत्री, राज्यपाल, उपराज्यपाल, स्कूली और कॉलेज के छात्र, अधिकारी और नागरिकों ने भी सामूहिक गायन में भाग लिया। यह राष्ट्रगीत की कालातीत ऊर्जा को समर्पित एक अभूतपूर्व आयोजन था जिसने देशभर में एकता और देशभक्ति की भावना का संचार किया।

36 राज्यों और 653 जिलों में वंदे मातरम कार्यक्रम

इस अभियान के अंतर्गत वंदे मातरम पर आधारित कार्यक्रमों को व्यापक जनसमर्थन मिला है। अब तक 39,783 से अधिक आयोजन अभियान वेबसाइट पर अपलोड किए जा चुके हैं।
ये कार्यक्रम 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और 653 जिलों में आयोजित किए गए हैं।

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय और विभाग भी वंदे मातरम के 150 वर्षों का उत्सव मना रहे हैं। 52 मंत्रालयों ने अपने आयोजन अभियान वेबसाइट पर साझा किए हैं।

विश्वभर में भारतीय मिशनों द्वारा आयोजन

दुनिया के विभिन्न देशों में भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास स्थानीय समुदाय और भारतीय प्रवासी जनसमुदाय के साथ मिलकर सामूहिक वंदे मातरम गायन आयोजित कर रहे हैं।

स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रम

देशभर के स्कूल और कॉलेज भी इस सामूहिक वंदे मातरम आंदोलन से जुड़े हुए हैं।
अब तक:

  • 11,632 स्कूल

  • 554 कॉलेज

वंदे मातरम आधारित कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं।

कई शिक्षण संस्थानों के छात्र और शिक्षकों ने 7 नवंबर 2025 को दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम को सीधे प्रसारण के माध्यम से देखा।

1.25 करोड़ भारतीयों ने रिकॉर्ड किया अपना वंदे मातरम

1.25 करोड़ से अधिक भारतीय अब तक वंदे मातरम का अपना संस्करण रिकॉर्ड कर चुके हैं।

आप भी वंदे मातरम गीत सुनें और अपना संस्करण यहाँ अपलोड करें:


प्रधानमंत्री मोदी 7 नवंबर को ‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्षों के समारोह का करेंगे उद्घाटन

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 7 नवंबर 2025 को सुबह लगभग 9:30 बजे इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम, नई दिल्ली में राष्ट्रीय गीत “वन्दे मातरम्” के साल भर चलने वाले समारोह का उद्घाटन करेंगे।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी करेंगे। यह कार्यक्रम 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक पूरे देश में आयोजित होने वाले समारोह की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक है, जो इस कालजयी रचना के 150 वर्षों का उत्सव मनाएगा। “वन्दे मातरम्” ने भारत की स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणा दी और आज भी राष्ट्रीय गर्व और एकता की भावना को उजागर करता है।

इस समारोह में सुबह लगभग 9:50 बजे पूरे देश के सार्वजनिक स्थलों पर “वन्दे मातरम्” के पूर्ण संस्करण का सामूहिक गायन आयोजित किया जाएगा, जिसमें समाज के सभी वर्गों के नागरिक भाग लेंगे।

वर्ष 2025 में “वन्दे मातरम्” की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया था और यह अक्षय नवमी, 7 नवंबर 1875 के अवसर पर रचित हुआ। “वन्दे मातरम्” पहली बार उनके उपन्यास आनंदमठ के हिस्से के रूप में साहित्यिक पत्रिका बंगादर्शन में प्रकाशित हुआ। इस गीत में मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और दिव्यता का प्रतीक बताया गया है और इसने भारत के जागृत राष्ट्रभाव और आत्म-सम्मान की भावना को काव्यात्मक रूप में व्यक्त किया। जल्दी ही यह गीत देशभक्ति का एक स्थायी प्रतीक बन गया।

आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद ट्रेनिंग एक्रेडिटेशन बोर्ड (ATAB) की प्रगति की समीक्षा की

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आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद ट्रेनिंग एक्रेडिटेशन बोर्ड (ATAB) की प्रगति और पाठ्यक्रम मान्यता तथा पेशेवर प्रमाणन के माध्यम से आयुर्वेद के वैश्विक प्रसार के प्रयासों का आकलन करने के लिए उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की। बैठक की अध्यक्षता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), आयुष मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, प्रतापराव जाधव ने की। इस अवसर पर सचिव वैद्य राजेश कोटेचा भी उपस्थित थे।

बैठक के दौरान डॉ. वंदना सिरोहा ने ATAB की उपलब्धियों और रणनीतिक दिशा प्रस्तुत की, विशेष रूप से उन आयुर्वेद पाठ्यक्रमों के मान्यता में इसके योगदान पर ध्यान केंद्रित करते हुए जो राष्ट्रीय भारतीय प्रणाली चिकित्सा आयोग (NCISM) अधिनियम, 2020 (पूर्व में IMCC अधिनियम, 1970) के दायरे के बाहर हैं। उन्होंने विदेशों में कार्यरत आयुर्वेद पेशेवरों के लिए हाल ही में शुरू किए गए एंडॉर्समेंट (प्रमाणन) योजना का भी विवरण दिया।

आयुर्वेद ट्रेनिंग एक्रेडिटेशन बोर्ड (ATAB) को आयुष मंत्रालय ने राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ (RAV) के प्रशासनिक ढांचे के तहत दिसंबर 2019 में गजट अधिसूचना के माध्यम से स्थापित किया था। ATAB का उद्देश्य उन आयुर्वेद प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को मान्यता देना है, जो भारत और विदेशों में मौजूदा वैधानिक निकायों के तहत विनियमित नहीं हैं।

वर्तमान में, ATAB ने कुल 113 आयुर्वेद प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को मान्यता दी है, जिनमें 24 भारतीय संस्थानों के 99 पाठ्यक्रम और 2 देशों के 14 अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम शामिल हैं। इस प्रकार, यह वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद शिक्षा के मानकीकरण और विश्वसनीयता में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

इसके अतिरिक्त, ATAB ने विदेशों में कार्यरत योग्य आयुर्वेद पेशेवरों को औपचारिक रूप से मान्यता देने के लिए एक संरचित एंडॉर्समेंट योजना लागू की है। इस योजना के तहत, प्रशिक्षकों की कौशल, ज्ञान और नैतिक मानकों में कठोर मापदंडों को पूरा करना आवश्यक है। अब तक कुल 41 आयुर्वेद डॉक्टरों को इस पहल के तहत औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है, जिससे एक विश्वसनीय वैश्विक नेटवर्क तैयार हुआ है।

यह एंडॉर्समेंट योजना पेशेवर वैधता को बढ़ाती है, अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता को सुगम बनाती है, और आयुर्वेद को विश्वभर के मुख्यधारा के स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल करने में मदद करती है। यह जनता के विश्वास को भी मजबूत करती है और शिक्षा, अनुसंधान और भारत की पारंपरिक चिकित्सा धरोहर के प्रचार में वैश्विक सहयोग के अवसर पैदा करती है।

आयुष मंत्रालय ATAB जैसे संस्थागत माध्यमों के जरिए आयुर्वेद की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और वैश्विक पहुंच सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध है, जो भारत के पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य की धुरी के रूप में स्थापित करने की दृष्टि के अनुरूप है।


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