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29 जून को होगी केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद की 16वीं बैठक, स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रमुख नीतियों पर होगा मंथन

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नई दिल्ली- केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय 29 जून 2026 (सोमवार) को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद (Central Council of Health and Family Welfare - CCHFW) की 16वीं बैठक आयोजित करेगा। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे. पी. नड्डा करेंगे।

इस सम्मेलन में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल और प्रतापराव जाधव भी शामिल होंगे। इसके अलावा राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्री, सांसद, केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, गैर-सरकारी सदस्य तथा स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ भी भाग लेंगे।

स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रमुख प्राथमिकताओं पर होगी चर्चा

बैठक में केंद्र और राज्यों के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग को मजबूत बनाने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी। इस वर्ष सम्मेलन के प्रमुख विषय होंगे—

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): सतत विकास लक्ष्य (SDGs) एवं प्राथमिकताएं

  • खाद्य एवं औषधि सुधार (Food & Drug Reforms)

  • सहायक स्वास्थ्य सेवाएं (Allied Health Services)

इन विषयों पर चल रही योजनाओं की समीक्षा, राज्यों के सफल अनुभवों का आदान-प्रदान, नई चुनौतियों की पहचान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए साझा रणनीति तैयार की जाएगी।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सर्वोच्च सलाहकार निकाय

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत गठित केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का सर्वोच्च सलाहकार निकाय है। यह परिषद चिकित्सा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा करती है तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केंद्र और राज्यों को आवश्यक सुझाव देती है।

सहकारी संघवाद को मिलेगा और बल

यह सम्मेलन स्वास्थ्य क्षेत्र में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण मंच है। इसके माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय महत्व के स्वास्थ्य मुद्दों पर विचार-विमर्श कर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बेहतर नियोजन और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए साझा रणनीति तैयार करती हैं।

सरकार का मानना है कि इस बैठक से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार, नीति निर्माण में बेहतर समन्वय और देशभर में जनस्वास्थ्य कार्यक्रमों के प्रभावी संचालन को नई दिशा मिलेगी।

आयुष मंत्रालय की उच्च स्तरीय बैठक में ASU चिकित्सा प्रणाली के लिए वैश्विक कोडिंग ढांचे के विकास पर चर्चा

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने 25–26 मई 2026 को ऑनलाइन माध्यम से आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) चिकित्सा प्रणालियों के लिए इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ हेल्थ इंटरवेंशन्स (ICHI) तथा नेशनल हेल्थ इंटरवेंशन कोड्स (NHIC) के विकास पर एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक और परामर्श चर्चा का आयोजन किया।

World Health Organization के साथ हुए ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) और डोनर एग्रीमेंट के बाद यह पहल पारंपरिक चिकित्सा हस्तक्षेपों को WHO के ICHI फ्रेमवर्क में शामिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) चिकित्सा हस्तक्षेपों के लिए एक वैश्विक स्तर पर मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से मजबूत कोडिंग शब्दावली विकसित करना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा का आदान-प्रदान, नैदानिक अनुसंधान को बढ़ावा और स्वास्थ्य प्रणालियों की अंतर-संचालनीयता (interoperability) सुनिश्चित की जा सके, साथ ही बीमा एकीकरण में भी सहायता मिले।

इस बैठक की अध्यक्षता आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित हस्तक्षेप वर्गीकरण पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने, दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करने तथा डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र में अंतर-संचालनीयता बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

उद्घाटन एवं तकनीकी सत्र

उद्घाटन सत्र में Central Council for Research in Ayurvedic Sciences के उपमहानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने स्वागत संबोधन दिया। संयुक्त सचिव डॉ. कविता जैन ने अपने प्रारंभिक वक्तव्य में पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को साक्ष्य-आधारित बनाने के लिए मानकीकृत हस्तक्षेप शब्दावली के महत्व पर प्रकाश डाला।

इसके बाद World Health Organization के प्रतिनिधियों, जिनमें डॉ. पवन गोडतवार (WHO-SEARO) और डॉ. गीता कृष्णन (GTMC जामनगर) शामिल थे, ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

चार-स्तरीय (four-level) श्रेणीबद्ध कोडिंग ढांचों पर विस्तृत तकनीकी प्रस्तुतियाँ संबंधित अनुसंधान परिषदों द्वारा दी गईं:

  • आयुर्वेद (NHICA): प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS

  • सिद्ध (NHICS): प्रो. डॉ. एन. जे. मुथुकुमार, महानिदेशक, CCRS

  • यूनानी (NHICUM): डॉ. एन. ज़हीर अहमद, महानिदेशक, CCRUM

Dr. Nenad Kostanjsek सहित World Health Organization की डेटा स्टैंडर्ड्स एवं इन्फॉर्मेटिक्स टीम के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने ASU हस्तक्षेप वर्गीकरण को वैश्विक स्वास्थ्य सूचना मानकों के अनुरूप बनाने हेतु भविष्य की रूपरेखा और तकनीकी आवश्यकताओं पर विचार-विमर्श किया।

दो दिवसीय बैठक में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी प्रणालियों के लिए अलग-अलग ब्रेकआउट सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें ड्राफ्ट दस्तावेजों की विस्तृत तकनीकी समीक्षा, परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श किया गया। इस बैठक में लगभग 30 वैज्ञानिकों के साथ-साथ Institute of Teaching and Research in Ayurveda, All India Institute of Ayurveda, National Institute of Unani Medicine तथा अन्य प्रमुख आयुष राष्ट्रीय संस्थानों के संकाय सदस्यों ने भाग लिया।

यह अंतिम रूप दिया गया ढांचा जुलाई 2026 में प्रस्तावित WHO-ICHI ASU अल्फा ड्राफ्ट संपादकीय कार्यशाला का आधार बनेगा।

दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम: राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन (National Conference on Rare Diseases) का उद्घाटन किया, जो 5 और 6 मई 2026 को आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन देश में दुर्लभ बीमारियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्वास्थ्य सचिव पुन्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हितधारकों की चुनौतियों को समझना, नवाचार को बढ़ावा देना और देश में दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन के लिए नए विचार विकसित करना है।

उन्होंने बताया कि दुर्लभ रोगों से निपटने की आवश्यकता को सबसे पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में रेखांकित किया गया था और बाद में 2021 की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के माध्यम से इसे एक औपचारिक ढांचा प्रदान किया गया।

उन्होंने कहा कि इस नीति के तहत देशभर में उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित किए गए हैं, जिनकी संख्या 8 से बढ़कर 15 हो गई है, जिनमें उत्तर-पूर्व भारत के दो केंद्र भी शामिल हैं।

स्वास्थ्य सचिव ने यह भी बताया कि दुर्लभ रोगों के मरीजों के इलाज के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। इसके साथ ही जीवनरक्षक दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है, और आगे भी नई दवाओं को इस सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

उन्होंने UMMID पहल और NIDAN केंद्रों के माध्यम से जेनेटिक काउंसलिंग और उपचार सहायता को मजबूत किए जाने की जानकारी दी। अब तक लगभग 1,800 मरीजों को इस नीति के तहत सहायता मिल चुकी है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संस्था दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी शोध और उपचार विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. राजीव बहल ने कहा कि पिछले तीन दशकों में दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि आज भारत न केवल निदान बल्कि उपचार और वित्तीय सहायता के क्षेत्र में भी बेहतर स्थिति में है।

डॉ. बहल ने यह भी कहा कि भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी मॉडल विकसित करना चाहिए, जिसमें डिजिटल तकनीक, एआई और जेनेटिक रिसर्च की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

इस सम्मेलन में विशेषज्ञों ने जेनेटिक तकनीक, सस्ती उपचार रणनीतियों, शोध सहयोग और रोगी-केंद्रित स्वास्थ्य मॉडल पर चर्चा की। मंत्रालय ने सभी हितधारकों के सहयोग से दुर्लभ रोगों से प्रभावित मरीजों को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।

पेट की चर्बी सामान्य मोटापे से अधिक खतरनाक: डॉ. जितेंद्र सिंह

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केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी (एब्डॉमिनल या सेंट्रल ओबेसिटी) सामान्य मोटापे से कहीं अधिक खतरनाक होती है। उन्होंने बताया कि भारतीय संदर्भ में कई बार दुबले-पतले दिखने वाले लोगों में भी अंदरूनी चर्बी (विसरल फैट) अधिक होती है, जो गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।



डॉ. सिंह ने “Advances in Obesity and Lipid Management in CVD” नामक कार्डियोलॉजी की एक पुस्तक के विमोचन के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि सेंट्रल ओबेसिटी डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, फैटी लिवर और लिपिड संबंधी विकारों का बड़ा कारण है, भले ही व्यक्ति बाहर से मोटा न दिखे।

भारतीयों में अधिक जोखिम

मंत्री ने कहा कि भारतीयों में पेट की चर्बी का प्रतिशत अधिक होता है, जो हृदय और मेटाबोलिक बीमारियों का स्वतंत्र जोखिम कारक है। इसलिए समय पर जांच और सही इलाज जरूरी है।

बढ़ती जीवनशैली बीमारियाँ चिंता का विषय

उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतें और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण युवाओं में भी डायबिटीज और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।

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संतुलित जीवनशैली पर जोर

डॉ. सिंह ने लोगों से संतुलित जीवनशैली अपनाने, पर्याप्त नींद लेने और वैज्ञानिक तरीके से फिटनेस बनाए रखने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि बिना तैयारी के अत्यधिक व्यायाम भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

आधुनिक उपचार और नई तकनीक

इस पुस्तक में आधुनिक उपचार पद्धतियों जैसे GLP-1 दवाएं (Semaglutide, Tirzepatide), स्टैटिन्स, PCSK9 inhibitors और AI आधारित चिकित्सा निर्णय प्रणाली को शामिल किया गया है, जो हृदय रोगों के इलाज में मददगार होंगी।

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जागरूकता और रोकथाम जरूरी

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मोटापा और लिपिड असंतुलन आज बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुके हैं। उन्होंने 2050 तक भारत में मोटापे के बढ़ते खतरे को देखते हुए जागरूकता, समय पर जांच और रोकथाम पर जोर दिया।


भारत में वज़न घटाने वाली GLP-1 दवाओं की बिक्री पर सख्ती

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नई दिल्ली- भारत में वज़न घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली GLP-1 आधारित दवाओं की बढ़ती मांग और उनके गलत उपयोग को देखते हुए ड्रग्स कंट्रोलर ऑफ इंडिया (CDSCO) ने देशभर में इन दवाओं की बिक्री और प्रचार पर निगरानी कड़ी कर दी है।

हाल के समय में इन दवाओं के कई जनरिक (सस्ते) वेरिएंट बाजार में आए हैं, जिसके बाद यह दवाएं रिटेल मेडिकल स्टोर्स, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, थोक विक्रेताओं और वेलनेस क्लीनिक्स के जरिए आसानी से उपलब्ध होने लगी हैं। बिना डॉक्टर की सलाह के इनका उपयोग करने से गंभीर साइड इफेक्ट्स और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।

सरकार की बड़ी कार्रवाई

स्थिति को गंभीरता से लेते हुए, केंद्र सरकार और राज्य औषधि नियामकों ने मिलकर सप्लाई चेन में गड़बड़ियों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं।

  • 10 मार्च 2026 को एडवाइजरी जारी
    सभी दवा कंपनियों को निर्देश दिया गया कि वे:

    • किसी भी तरह के भ्रामक या अप्रत्यक्ष विज्ञापन (Surrogate Ads) न करें

    • दवाओं के गलत या ऑफ-लेबल उपयोग को बढ़ावा न दें

देशभर में जांच और निरीक्षण

पिछले कुछ हफ्तों में जांच अभियान तेज किया गया:

  • 49 संस्थानों का निरीक्षण, जिनमें शामिल हैं:

    • ऑनलाइन फार्मेसी वेयरहाउस

    • थोक दवा विक्रेता

    • रिटेल मेडिकल स्टोर

    • वेलनेस और स्लिमिंग क्लीनिक्स

  • जांच में फोकस रहा:

    • बिना अनुमति दवा बिक्री

    • गलत प्रिस्क्रिप्शन प्रैक्टिस

    • भ्रामक मार्केटिंग

  • नियम तोड़ने वालों को नोटिस जारी किए गए हैं

कौन लिख सकता है ये दवा?

सरकार ने स्पष्ट किया है कि GLP-1 दवाएं केवल इन विशेषज्ञ डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन पर ही दी जा सकती हैं:

  • एंडोक्राइनोलॉजिस्ट

  • इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ

  • कुछ मामलों में कार्डियोलॉजिस्ट

नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई

नियामक ने चेतावनी दी है कि आगे भी निगरानी जारी रहेगी और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर:

  • लाइसेंस रद्द

  • जुर्माना

  • कानूनी कार्रवाई

जैसे कदम उठाए जाएंगे।

आम जनता के लिए सलाह

सरकार ने लोगों से अपील की है कि:

  • वज़न घटाने की दवाएं बिना डॉक्टर की सलाह के न लें

  • केवल प्रमाणित विशेषज्ञ से परामर्श लें

  • ऑनलाइन या बिना प्रिस्क्रिप्शन दवाएं खरीदने से बचें

निष्कर्ष

GLP-1 दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है, ताकि लोगों की सेहत सुरक्षित रहे और दवाओं का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने मोटापे को सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में संबोधित किया, सही उपयोग और जागरूकता पर दिया जोर

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केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष, डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि वर्तमान में उपलब्ध वजन कम करने या मोटापा विरोधी दवाओं का उपयोग बहुत ही समझदारी से किया जाना चाहिए।

स्वयं एक प्रसिद्ध डायबेटोलॉजिस्ट और चिकित्सा प्रोफेसर डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मोटापा एक जटिल, दीर्घकालिक और दोबारा होने वाली समस्या है, और केवल एक सौंदर्य या जीवनशैली संबंधी चिंता नहीं है। इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए पूरे समाज की भागीदारी आवश्यक है, क्योंकि यह भारत की सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बन चुकी है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने 2-दिवसीय "एशिया ओशिनिया कॉन्फ्रेंस ऑन ओबेसिटी" (AOCO) के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि डॉक्टर, शोधकर्ता, नीति निर्माता और अन्य हितधारक एक ही मंच पर आने से भारत में मोटापे के संकट की गंभीरता स्पष्ट होती है। उन्होंने कहा कि जिस तरह अर्थशास्त्र केवल अर्थशास्त्री को छोड़कर नहीं छोड़ा जा सकता, उसी तरह मोटापे की समस्या को केवल चिकित्सक या महामारी विज्ञानी तक सीमित नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय पहलू भी हैं।

डॉ. सिंह ने बताया कि भारत में गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) की संख्या बढ़ रही है, जो मोटापे से जुड़ी हैं और कुल मृत्यु दर का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं रोगों का है। उन्होंने कहा कि टाइप 2 डायबिटीज़, हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर मोटापे, विशेषकर पेट और मध्य भाग के मोटापे से जुड़े हैं, जो भारतीय आबादी में अधिक पाए जाते हैं और स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि भारत में यह अभूतपूर्व है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय मंचों से बार-बार मोटापा और जीवनशैली से जुड़े रोगों पर चर्चा की है। उन्होंने FIT इंडिया, खेलो इंडिया और व्यापक रोकथाम स्वास्थ्य कार्यक्रमों के संदर्भ में प्रधानमंत्री के इस प्रयास की सराहना की।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने चेतावनी दी कि मोटापा प्रबंधन के क्षेत्र में बढ़ती व्यावसायिकता और गलत सूचना लोगों को गुमराह कर सकती है। उन्होंने कहा कि केवल औपचारिक स्वीकृतियाँ ही हमेशा सही परिणाम नहीं देतीं, और लोगों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

उन्होंने युवा पीढ़ी तक जागरूकता फैलाने पर जोर दिया और कहा, "हमें केवल जानने वालों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी बात करनी होगी जो नहीं जानते कि उन्हें क्या पता नहीं है।" उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं के स्वास्थ्य और ऊर्जा की सुरक्षा 2047 में विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए आवश्यक है।

इस अवसर पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने AIAARO ओबेसिटी रजिस्ट्री लॉन्च की, जो भारत में मोटापे के शोध तंत्र को मजबूत करने, डेटा संग्रहण, सबूत-आधारित जानकारी और दीर्घकालिक नीति समर्थन प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

AOCO एशिया ओशिनिया एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ ओबेसिटी (AOASO) की प्रमुख कॉन्फ्रेंस है, जिसमें एशिया और ओशिनिया की मोटापा अनुसंधान समितियों का प्रतिनिधित्व होता है। भारत में इसे ऑल-इंडिया एसोसिएशन फॉर एडवांसिंग रिसर्च इन ओबेसिटी (AIAARO) द्वारा AOASO और IAEPEN इंडिया व OSSI के समर्थन से आयोजित किया गया है।

कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को वैश्विक श्रेष्ठ प्रथाओं से अवगत कराना, अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा देना और मोटापे के प्रमाण-आधारित प्रबंधन को मजबूत करना है। इस प्रकार, AOCO मोटापे को केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती के रूप में देखने और इसके प्रभावी समाधान के लिए समन्वित प्रयास करने का मंच प्रदान करता है।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की 21वीं वार्षिक दीक्षांत समारोह में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने किया संबोधन

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के 21वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित किया। समारोह में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, उपमुख्यमंत्री एवं चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री ब्रजेश पाठक, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज कुमार, उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री मयंकशवर शरण सिंह और भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद उपस्थित रहे।

नड्डा ने नए स्नातकों को बधाई दी और KGMU द्वारा चिकित्सा शिक्षा और रोगी देखभाल के क्षेत्र में किए गए योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा, “KGMU 2025 के NIRF रैंकिंग में 8वें स्थान पर है और इसके 12 फैकल्टी मेंबर्स स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा शीर्ष 2% वैज्ञानिकों में सूचीबद्ध हैं, जो वास्तव में प्रशंसनीय उपलब्धि है।”

केंद्रीय मंत्री ने पिछले दशक में भारत में स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में हुए महत्वपूर्ण सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले सदी के अंत में देश में केवल एक AIIMS था, जबकि आज भारत में 23 AIIMS संस्थान हैं, जो हर क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशिक्षण को पहुँचाने के सरकार के संकल्प को दर्शाते हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले 11 वर्षों में देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 819 हो गई है। इसी प्रकार, स्नातक चिकित्सा सीटें 51,000 से बढ़कर 1,19,000 और पोस्टग्रेजुएट सीटें 31,000 से बढ़कर 80,000 हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देशानुसार 2029 तक स्नातक और पोस्टग्रेजुएट स्तर पर अतिरिक्त 75,000 सीटें उपलब्ध कराई जाएंगी, जिनमें से एक वर्ष में ही 23,000 से अधिक सीटें जोड़ दी गई हैं।

नड्डा ने यह भी बताया कि आज देश में 1.82 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मन्दिर संचालित हैं, जो व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत – PMJAY योजना के तहत 62 करोड़ से अधिक लोग, यानी देश की 40% से अधिक आबादी, 5 लाख रुपये तक के स्वास्थ्य कवरेज का लाभ प्राप्त कर रही है।

केंद्रीय मंत्री ने स्नातकों से आग्रह किया कि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत करें। उन्होंने कहा कि सरकार प्रत्येक MBBS छात्र पर 30-35 लाख रुपये खर्च करती है, इसलिए डॉक्टरों को समाज सेवा और चिकित्सा विज्ञान में उत्कृष्टता के लिए समर्पित रहना चाहिए।

इस अवसर पर, 81 छात्रों और एक फैकल्टी सदस्य को उनके शैक्षणिक, नैदानिक और शोध कार्यों में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। पुरस्कारों में गोल्ड और सिल्वर मेडल, मेरिट सर्टिफिकेट, पुस्तक पुरस्कार, नकद पुरस्कार और सर्वोत्तम थीसिस तथा सर्वश्रेष्ठ निवासी के लिए पुरस्कार शामिल हैं।

ब्रजेश पाठक ने कहा कि “120 से अधिक वर्षों से KGMU चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और मानव सेवा में एक मील का पत्थर रही है।” उन्होंने उत्तर प्रदेश में चिकित्सा क्षेत्र में हुए प्रगति का भी उल्लेख किया।

इस समारोह में KGMU की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यनंद (पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त), डीन प्रो. अपजीत कौर और अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।


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