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Dhanteras 2026: धनतेरस पर 1 घंटे 22 मिनट रहेगा राहुकाल, जानें खरीदारी और पूजा का शुभ मुहूर्त

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 Dhanteras 2026 Shubh Muhurat: हिंदू धर्म में धनतेरस का पर्व धन, आरोग्य और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। दीपावली से पहले आने वाले इस त्योहार पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। इस दिन सोना-चांदी, बर्तन, वाहन और अन्य नई वस्तुओं की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। साथ ही शाम को घर के बाहर यम दीपक जलाने की परंपरा भी निभाई जाती है।


इस साल धनतेरस का पर्व शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस दिन खरीदारी और पूजा-पाठ के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व रहेगा। हालांकि, इस दौरान राहुकाल का भी ध्यान रखना जरूरी है। मान्यता है कि राहुकाल में नए और मांगलिक कार्यों की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। ऐसे में अगर आप धनतेरस पर सोना-चांदी या कोई अन्य कीमती सामान खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो पहले शुभ और अशुभ समय की जानकारी जरूर ले लें।

धनतेरस 2026 पर कब रहेगा राहुकाल?

नई दिल्ली के समय के अनुसार, शुक्रवार 6 नवंबर को धनतेरस के दिन राहुकाल सुबह 10 बजकर 42 मिनट से दोपहर 12 बजकर 4 मिनट तक रहेगा। इसकी कुल अवधि 1 घंटा 22 मिनट होगी।

ज्योतिषीय मान्यताओं के मुताबिक, राहुकाल के दौरान नए काम की शुरुआत और मांगलिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए इस अवधि में खरीदारी और अन्य शुभ कार्यों के लिए दूसरा समय चुनना बेहतर माना जाता है।

राहुकाल में किन कामों से बचना चाहिए?

धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल के दौरान इन कार्यों को करने से परहेज किया जाता है:

  • नई खरीदारी: सोना-चांदी, वाहन और अन्य महंगी वस्तुओं की खरीदारी टालने की मान्यता है।

  • नए कारोबार की शुरुआत: दुकान, व्यापार या नए कार्यालय का उद्घाटन करने से बचना चाहिए।

  • मांगलिक कार्य: विवाह, सगाई, गृह प्रवेश और अन्य शुभ आयोजनों की शुरुआत टालनी चाहिए।

  • नई यात्रा: किसी महत्वपूर्ण यात्रा की शुरुआत के लिए दूसरा समय चुनना शुभ माना जाता है।

  • बड़े आर्थिक फैसले: महत्वपूर्ण लेन-देन, निवेश और आर्थिक समझौतों को इस अवधि में टालने की सलाह दी जाती है।

  • करियर से जुड़े फैसले: नौकरी या व्यवसाय से जुड़े बड़े शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए राहुकाल से अलग समय चुनने की मान्यता है।

धनतेरस 2026 पर खरीदारी के शुभ चौघड़िया मुहूर्त

धनतेरस पर सोना-चांदी, बर्तन और अन्य वस्तुओं की खरीदारी के लिए चौघड़िया मुहूर्त देखा जाता है। नई दिल्ली के अनुसार, 6 नवंबर को खरीदारी के लिए बताए गए शुभ समय इस प्रकार हैं:

चौघड़िया मुहूर्तसमय
अमृत चौघड़ियासुबह 10:31 से 10:42 बजे तक
शुभ चौघड़ियादोपहर 12:04 से 1:26 बजे तक
चर चौघड़ियाशाम 4:10 से 5:32 बजे तक
लाभ चौघड़ियारात 8:48 से 10:26 बजे तक

इन समयों में स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त और पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है।

धनतेरस 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त

धनतेरस की शाम भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा का विशेष महत्व है। पूजा के लिए नई दिल्ली के अनुसार शुभ समय इस प्रकार बताया गया है:

पूजा एवं कालसमय
धनतेरस पूजा मुहूर्तशाम 6:02 से 7:57 बजे तक
प्रदोष कालशाम 5:32 से रात 8:09 बजे तक
वृषभ काल (स्थिर लग्न)शाम 6:02 से 7:57 बजे तक
यम दीपदानशाम 5:32 से 6:51 बजे तक

धनतेरस पर क्यों की जाती है भगवान धन्वंतरि की पूजा?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। इसी कारण इस दिन उनकी पूजा करने से अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है।

धनतेरस पर माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा भी की जाती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।

शरद पूर्णिमा आज: रात में क्यों की जाती है मां लक्ष्मी की पूजा? जानें धार्मिक मान्यता

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Sharad Purnima 2026 Puja Vidhi: शरद पूर्णिमा का पर्व आज, 25 अक्टूबर 2026, रविवार को मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष धार्मिक महत्व है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने, मंत्र जाप करने और दीपदान करने से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इस अवसर पर घरों में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा के साथ खीर का भोग लगाने की परंपरा भी है।

मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने और मां लक्ष्मी का स्मरण करने से परिवार में सुख-शांति और खुशहाली बनी रहती है। ऐसे में अगर आप भी इस दिन पूजा करने की तैयारी कर रहे हैं, तो आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त, पूजन सामग्री, पूजा की विधि और मां लक्ष्मी के प्रभावशाली मंत्र।

शरद पूर्णिमा 2026 का शुभ मुहूर्त

पंचांग में शरद पूर्णिमा की तिथि और चंद्रोदय के समय का विशेष महत्व माना जाता है। दिए गए विवरण के अनुसार पूजा के प्रमुख समय इस प्रकार हैं:

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026, सुबह 11:55 बजे

  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर 2026, सुबह 9:41 बजे

  • चंद्रोदय का समय: शाम करीब 5 बजे

  • निशीथ काल में पूजा: रात 11:40 बजे से मध्यरात्रि के बाद तक

पूजा का सटीक शुभ मुहूर्त स्थान और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग में समय की पुष्टि कर लें।

मां लक्ष्मी की पूजा के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए?

शरद पूर्णिमा पर पूजा करने के लिए कुछ आवश्यक सामग्री पहले से तैयार रखनी चाहिए। इसमें मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर, लाल या पीला कपड़ा, चौकी, रोली, अक्षत, मौली, सुपारी, पान, लौंग, इलायची, फूल, घी का दीपक, धूप, कपूर, शंख और पूजा के लिए जल शामिल हैं।

इसके अलावा भोग के लिए खीर, मखाने, बताशे या अन्य मिठाई रख सकते हैं। मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी को कमल का फूल अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।

शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा कैसे करें?

1. स्नान कर पूजा का संकल्प लें: सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। इसके बाद श्रद्धानुसार व्रत रखने और मां लक्ष्मी की पूजा करने का संकल्प लें।

2. चौकी पर स्थापित करें मां लक्ष्मी की प्रतिमा: शाम को पूजा स्थल की सफाई करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।

3. विधि-विधान से करें पूजन: मां लक्ष्मी को रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें। घी का दीपक जलाकर धूप दिखाएं और श्रद्धापूर्वक पूजा करें।

4. खीर का भोग लगाएं: शरद पूर्णिमा पर खीर बनाने और उसका भोग लगाने की परंपरा है। कई परिवार खीर को कुछ समय के लिए चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं। इसके बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

5. करें मंत्र जाप और आरती: पूजा के दौरान मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें। अंत में आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करें। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण भी कर सकते हैं।

शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी के कौन से मंत्र का जाप करें?

शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी की आराधना के लिए इन मंत्रों का जाप किया जा सकता है।

मां लक्ष्मी का मंत्र

ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।

महालक्ष्मी बीज मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।

चंद्र देव का मंत्र

ॐ सों सोमाय नमः।

श्रद्धालु इनमें से किसी एक मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं। मंत्र जाप के दौरान मन को शांत रखें और श्रद्धा के साथ मां लक्ष्मी का स्मरण करें।

शरद पूर्णिमा की रात क्यों मानी जाती है खास?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी की आराधना और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। इसे कोजागरी पूर्णिमा इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि इससे जुड़ी परंपरा में रात के समय जागकर मां लक्ष्मी का स्मरण किया जाता है।

इस दिन भक्त पूजा-पाठ, मंत्र जाप और दान-पुण्य के माध्यम से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हालांकि, ये धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं पर आधारित मान्यताएं हैं। पूजा का उद्देश्य श्रद्धा, मानसिक शांति और परिवार की खुशहाली की कामना करना है।

दशहरा: बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक

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दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हमें सच्चाई, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। हर साल यह त्योहार बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा है।

भगवान श्रीराम के विजय का पर्व

दशहरे का संबंध रामायण से है। मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। रावण दहन इसी विजय की याद दिलाता है। देश के अनेक हिस्सों में रामलीला का आयोजन किया जाता है और शाम को रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।

यह परंपरा केवल एक पौराणिक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की जीत होती है।

मां दुर्गा की शक्ति और विजय का प्रतीक

दशहरे का एक अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक पक्ष मां दुर्गा से जुड़ा है। मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर बुराई पर विजय प्राप्त की थी। इसी कारण देश के कई हिस्सों में यह पर्व नवरात्रि और दुर्गा पूजा के समापन के रूप में मनाया जाता है। यह नारी शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक भी है।

छत्तीसगढ़ का अनोखा बस्तर दशहरा

छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं के कारण पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यहां दशहरे का मुख्य केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, आदिवासी संस्कृति और सदियों पुरानी सामुदायिक परंपराएं हैं। यह उत्सव लगभग 75 दिनों तक चलने के लिए प्रसिद्ध है।

बस्तर दशहरे की सबसे खास बात यह है कि यहां परंपरागत रूप से रावण दहन नहीं किया जाता। इसके बजाय देवी की पूजा, विभिन्न देवी-देवताओं का आगमन, पारंपरिक रथ यात्रा और स्थानीय रीति-रिवाजों के माध्यम से उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक है।

दशहरा हमें क्या सिखाता है?

दशहरे का वास्तविक अर्थ केवल रावण के पुतले का दहन करना नहीं है। इसका सबसे बड़ा संदेश है अपने भीतर मौजूद बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करना। क्रोध, लालच, अहंकार, ईर्ष्या, झूठ और अन्याय ऐसी कमजोरियां हैं, जो व्यक्ति और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाती हैं।

यदि हम इस दिन अपने व्यवहार में सुधार करने, दूसरों का सम्मान करने, सच्चाई का साथ देने और जरूरतमंदों की सहायता करने का संकल्प लें, तो त्योहार का उद्देश्य और भी सार्थक हो सकता है।

आज के समय में दशहरे का संदेश और भी महत्वपूर्ण है। समाज में बढ़ती नफरत, भ्रष्टाचार और आपसी मतभेदों के बीच हमें प्रेम, सद्भाव, ईमानदारी और जिम्मेदारी को अपनाने की जरूरत है।

उत्सव के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी

दशहरा खुशियों, मेल-मिलाप और उत्सव का अवसर है। इस दौरान हमें बच्चों, बुजुर्गों और आसपास के लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। रावण दहन के कार्यक्रमों में सुरक्षित दूरी बनाए रखना, प्रशासन के निर्देशों का पालन करना और पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने वाले तरीकों को अपनाना भी हमारी जिम्मेदारी है।

निष्कर्ष

दशहरा हमें याद दिलाता है कि जीवन में जीत उसी की होती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और न्याय का साथ नहीं छोड़ता। भगवान श्रीराम का आदर्श, मां दुर्गा की शक्ति और बस्तर की सांस्कृतिक परंपराएं हमें साहस, संयम और एकता की प्रेरणा देती हैं।

आइए, इस दशहरे पर हम केवल रावण के पुतले का दहन न करें, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करने का संकल्प लें। यही इस पर्व की सच्ची भावना और सबसे बड़ी सीख है।

आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं!


आज देवशयनी एकादशी: चातुर्मास का शुभारंभ, भगवान विष्णु की आराधना में लीन हुए श्रद्धालु

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नई दिल्ली- आज देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ देवशयनी एकादशी का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी के साथ चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होता है।

मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। भक्त भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर व्रत रख रहे हैं तथा सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण की कामना कर रहे हैं। कई स्थानों पर विशेष भजन-कीर्तन, धार्मिक अनुष्ठान और सत्संग का आयोजन भी किया जा रहा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु के देवउठनी एकादशी पर जागृत होने के साथ ही शुभ एवं मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।

धर्माचार्यों ने श्रद्धालुओं से विधि-विधान के साथ व्रत और पूजा करने तथा जरूरतमंदों की सहायता एवं दान-पुण्य करने का भी आह्वान किया है।

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