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जशक्राफ्ट से छत्तीसगढ़ के बांस हस्तशिल्प को मिलेगी नई पहचान

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आधुनिक प्रशिक्षण, डिजाइन नवाचार और बाजार से जुड़ाव के माध्यम से बढ़ेगी आजीविका और रोजगार

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। इसी क्रम में जशपुर जिले में जिला प्रशासन द्वारा "जशक्राफ्ट" ब्रांड के माध्यम से बांस हस्तशिल्प को नई पहचान देने, स्थानीय कारीगरों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने तथा उनकी आय में वृद्धि के उद्देश्य से विशेष पहल की जा रही है।

विकासखंड जशपुर की ग्राम पंचायत झोलांगा में 29 जून से 29 जुलाई तक एक माह का आवासीय बांस हस्तशिल्प प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है। जिला पंचायत एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के संयुक्त प्रयास से संचालित इस प्रशिक्षण का उद्देश्य बांस हस्तशिल्प से जुड़े लगभग 150 परिवारों की आजीविका को सशक्त बनाना है। वर्तमान में 46 महिलाओं का प्रथम बैच प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा है।

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को आधुनिक मशीनों के उपयोग, नवीन डिजाइनों और वर्तमान बाजार की मांग के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाले बांस उत्पाद तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके लिए गुजरात के सूरत से विशेषज्ञ प्रशिक्षकों को आमंत्रित किया गया है। प्रशिक्षण में फैंसी ट्रे, गुलदस्ते, माचिया, सजावटी सामग्री, चटाई, आकर्षक टोकरियां, फर्नीचर, सोफा, पलंग सहित अनेक आधुनिक एवं उपयोगी उत्पाद बनाना सिखाया जा रहा है।

जशपुर और मनोरा विकासखंड में लगभग 250 परिवार वर्षों से बांस हस्तशिल्प के माध्यम से अपनी आजीविका अर्जित कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में बिहान स्व-सहायता समूहों की महिलाएं भी सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। इन समूहों को चक्रीय निधि, सामुदायिक निवेश निधि (सीआईएफ), बैंक लिंकेज तथा मुद्रा ऋण जैसी वित्तीय सुविधाओं से जोड़कर उनके उद्यमों को मजबूत बनाया जा रहा है। साथ ही समय-समय पर कौशल उन्नयन एवं उद्यमिता विकास संबंधी प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

जशक्राफ्ट ब्रांड के अंतर्गत तैयार हस्तशिल्प उत्पादों को रूरल मार्ट, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों तथा देश के विभिन्न बाजारों तक पहुंचाने के लिए डिजाइन एवं विपणन विशेषज्ञों की सेवाएं ली जा रही हैं, ताकि स्थानीय कारीगरों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सके और उन्हें स्थायी बाजार उपलब्ध हो।

राज्य सरकार की यह पहल पारंपरिक बांस शिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण, स्थानीय रोजगार सृजन, जनजातीय परिवारों की आय वृद्धि तथा आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। जिला प्रशासन का लक्ष्य आगामी वर्ष तक हस्तशिल्प से जुड़े सभी स्व-सहायता समूहों के सदस्यों को "लखपति दीदी" की श्रेणी में शामिल करना है।



उदयपुर और लखनपुर में 8 से 14 जून तक चलेगा पारंपरिक शिल्प एवं कला प्रशिक्षण शिविर

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संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के निर्देश पर सरगुजा संभाग में ‘आकार-2026’ का आयोजन

युवाओं को मिलेगा लोक कलाओं का प्रशिक्षण

रायपुर-  संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के निर्देश पर छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक कलाओं और पारंपरिक शिल्प के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा “आकार-2026” पारंपरिक शिल्प एवं विविध कला प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर 8 जून से 14 जून 2026 तक सरगुजा संभाग के उदयपुर और लखनपुर में आयोजित होगा। कार्यक्रम का उद्देश्य नई पीढ़ी को प्रदेश की लोक कला परंपराओं से जोड़ना तथा उनमें पारंपरिक शिल्प और कला के प्रति रुचि विकसित करना है।

14 पारंपरिक कला विधाओं का दिया जाएगा प्रशिक्षण 

संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस विशेष प्रशिक्षण शिविर में प्रतिभागियों को नृत्य, नाटक, वाद्ययंत्र, चित्रकला, क्ले आर्ट, म्यूरल आर्ट, हस्तकढ़ाई, ड्राई फ्लावर आर्ट, कोरिया कला, रजवार मिट्टी चित्र, मेहंदी, मृदा शिल्प, गोदना कला और बांस शिल्प सहित कुल 14 पारंपरिक कला विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन विधाओं में प्रदेश के ख्यातिप्राप्त कलाकारों और पारंगत कला गुरुओं द्वारा प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिससे प्रतिभागियों को कला के व्यावहारिक एवं तकनीकी पक्षों की जानकारी मिल सके।

प्रशिक्षण के लिए पंजीयन प्रक्रिया हो चुकी है 6 जून से प्रारंभ 

शिविर के अंतर्गत उदयपुर में प्रशिक्षण प्रतिदिन सुबह 8 बजे से 11 बजे तक शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में आयोजित होगा, जबकि लखनपुर में पीएमश्री स्कूल परिसर में शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण के लिए पंजीयन प्रक्रिया 6 जून से प्रारंभ हो चुकी है और इच्छुक प्रतिभागी निर्धारित शुल्क जमा कर इसमें भाग ले सकते हैं।

विलुप्तप्राय और लोक जीवन से जुड़ी कला विधाओं को संरक्षित करना

“आकार-2026” का उद्देश्य केवल पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि प्रदेश की विलुप्तप्राय और लोक जीवन से जुड़ी कला विधाओं को संरक्षित करना भी है। प्रशिक्षण के माध्यम से युवा कलाकारों को अनुभवी गुरुओं के मार्गदर्शन में सीखने का अवसर मिलेगा, जिससे वे अपनी प्रतिभा को निखार सकेंगे और भविष्य में स्वरोजगार के नए अवसर भी प्राप्त कर सकेंगे। प्रशिक्षण शिविर के लिए पंजीयन शुल्क मात्र 100 रुपये निर्धारित किया गया है। दिव्यांग एवं अनाथ बच्चों को शुल्क में विशेष छूट प्रदान की जाएगी।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम 

प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद प्रतिभागियों द्वारा तैयार कलाकृतियों की प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी तथा उन्हें प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए जाएंगे। इस प्रकार के आयोजन प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ युवा पीढ़ी में लोक कला और शिल्प परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। “आकार-2026” न केवल कला प्रशिक्षण का मंच बनेगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी साबित होगा।

वेबसाइट www.cgculture.in से आवेदन पत्र का प्रारूप डाउनलोड किया जा सकता है। ई-मेल sanskriti.rajbhasha@gmail.com एवं वेबसाइट www.cgculture.in से प्रशिक्षण  से संबंधित जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अन्य जानकारी हेतु अनूप किंडो प्रभारी अधिकारी आकार से मोबाइल नंबर 77730-49560 और संचालनालय संस्कृति विभाग रायपुर के टेलीफोन नंबर 0771-2995629 और 0771-2537404 पर कार्यालयीन समय पर संपर्क कर सकते हैं।

डाक विभाग और TRIFED की साझेदारी से आदिवासी उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

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आदिवासी कारीगरों को सशक्त बनाने और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, संचार मंत्रालय के अंतर्गत डाक विभाग (DoP) ने जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधीन भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (TRIFED) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

इस साझेदारी का उद्देश्य TRIFED के ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, विशेषकर Tribes India ई-मार्केटप्लेस, के माध्यम से बेचे जाने वाले उत्पादों की डिलीवरी के लिए एक मजबूत, विश्वसनीय और किफायती लॉजिस्टिक्स ढांचा तैयार करना है।

इस MoU के तहत डाक विभाग TRIFED के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से प्राप्त सभी ऑर्डर्स के लिए एंड-टू-एंड लॉजिस्टिक्स समाधान प्रदान करेगा। अपने व्यापक राष्ट्रीय नेटवर्क और अंतिम छोर (last-mile) तक पहुंच का उपयोग करते हुए, डाक विभाग देशभर में आदिवासी उत्पादों की सुचारु पिकअप, ट्रांसमिशन और डिलीवरी सुनिश्चित करेगा।

यह सहयोग आदिवासी कारीगरों और उद्यमियों के लिए बाजार तक पहुंच को मजबूत करने, ऑर्डर पूर्ति को बेहतर बनाने और ग्राहक अनुभव को बढ़ाने में सहायक होगा। डाक विभाग शिपमेंट ट्रैकिंग, नियमित MIS रिपोर्टिंग और TRIFED के डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ API इंटीग्रेशन जैसी सुविधाएं भी प्रदान करेगा, जिससे लॉजिस्टिक्स प्रबंधन सुगम होगा।

इस व्यवस्था के तहत TRIFED के लिए नेशनल अकाउंट फैसिलिटी के अंतर्गत Book Now Pay Later (BNPL) खाता भी बनाया जाएगा, जिससे स्पीड पोस्ट के माध्यम से शिपमेंट बुकिंग और भुगतान प्रक्रिया सरल हो जाएगी।

TRIFED अपनी ओर से उचित पैकेजिंग, लेबलिंग और ऑर्डर से संबंधित जानकारी साझा करना सुनिश्चित करेगा, ताकि लॉजिस्टिक्स संचालन प्रभावी रूप से हो सके। यह पहल देशभर के विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों से पिकअप को कवर करेगी, जिससे व्यापक भौगोलिक पहुंच सुनिश्चित होगी।

यह साझेदारी सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसके तहत आदिवासी आजीविका को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। बेहतर लॉजिस्टिक्स समर्थन के माध्यम से यह पहल आदिवासी समुदायों की आय बढ़ाने, उनके उत्पादों की पहुंच का विस्तार करने और समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सहायक होगी।

यह समझौता प्रारंभिक रूप से दो वर्षों के लिए मान्य होगा, जिसे आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता है।

भारत के वस्त्र और परिधान निर्यात में नवंबर 2025 में 9.4% की वृद्धि, हैंडीक्राफ्ट्स में सबसे अधिक उछाल

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नई दिल्ली- भारत के वस्त्र और परिधान, जिसमें हैंडीक्राफ्ट्स भी शामिल हैं, का निर्यात नवंबर 2025 में 2,855.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो नवंबर 2024 (2,601.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की तुलना में 9.4% की वृद्धि दर्शाता है।

मुख्य क्षेत्रों में वृद्धि:

  • रेडीमेड गारमेंट्स (RMG): 11.3%

  • मानव निर्मित रेशा/कपड़े/मेड-अप्स आदि: 15.7%

  • कॉटन यार्न/कपड़े/मेड-अप्स और हथकरघा उत्पाद: 4.1%

  • हैंडीक्राफ्ट्स (हाथ से बने कालीन को छोड़कर): 29.7%

साल 2025 के लिए, जनवरी–नवंबर 2025 के दौरान वस्त्र और परिधान (हैंडीक्राफ्ट्स को छोड़कर) का कुल निर्यात 32,560.0 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि (32,474.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की तुलना में 0.26% की वृद्धि दर्शाता है।

विशेष रूप से, जनवरी–नवंबर 2025 में रेडीमेड गारमेंट्स का निर्यात पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 3.6% बढ़ा, जबकि जूट उत्पादों में 6.1% की वृद्धि हुई।

केंद्र ने कमलादेवी चट्टोपाध्याय क्राफ्ट लेक्चर सीरीज का उद्घाटन किया

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वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हैंडिक्राफ्ट) कार्यालय ने आज अंतर्राष्ट्रीय क्राफ्ट कॉम्प्लेक्स (द कुंज), नई दिल्ली में एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फॉर हैंडीक्राफ्ट (EPCH) के सहयोग से कमलादेवी चट्टोपाध्याय क्राफ्ट लेक्चर सीरीज के पहले संस्करण का शुभारंभ किया। इस अवसर पर पद्म भूषण से सम्मानित श्री राजीव सेठी ने "हैंडमेड फॉर जन-नेक्स्ट" विषय पर मुख्य व्याख्यान दिया। इस कार्यक्रम में विकास आयुक्त (हैंडिक्राफ्ट) अमृत राज, विकास आयुक्त (हैंडलूम) डॉ. एम. बीना, पूर्व अध्यक्ष EPCH श्री रवी के पास्सी, अतिरिक्त कार्यकारी निदेशक EPCH राजेश रावत सहित 100 से अधिक प्रतिभागी उपस्थित थे, जिनमें प्रमुख डिजाइनर, विद्वान, शिल्प गुरु और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शामिल थे।

यह व्याख्यान श्रृंखला भारत के हस्तकला और हथकरघा परंपराओं को पुनर्जीवित करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाली कमलादेवी चट्टोपाध्याय की दूरदर्शी विरासत को समर्पित है। उनका जीवन पर्यंत कार्य कारीगरों को सशक्त बनाने, देशी शिल्प को बढ़ावा देने और भारतीय हस्तकला को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में सहायक रहा।

राजीव सेठी ने उद्घाटन व्याख्यान में यह सवाल उठाया कि आज के युग में हाथ से बनने वाली चीज़ों की प्रासंगिकता क्या है और इसकी उम्र-पुरानी ताकतें आधुनिक चुनौतियों जैसे पलायन और सांस्कृतिक समानिकीकरण का सामना कैसे कर सकती हैं। उन्होंने हाथ की सूक्ष्मता, कौशल और संवेदनशीलता को रचनात्मक शक्ति बताया, जिसे कोई मशीन पूरी तरह से दोहरा नहीं सकती। उन्होंने यह भी बताया कि हाथ से बनने वाले शिल्प में कम यांत्रिकीकरण, स्थानीय आजीविका और महिलाओं एवं हाशिए पर रहने वाले समुदायों के सशक्तिकरण के माध्यम से स्थिरता जुड़ी होती है।

इस अवसर पर अमृत राज ने कहा कि यह व्याख्यान श्रृंखला याद दिलाती है कि भारत के लाखों कारीगर समावेशी, सतत विकास और वैश्विक हस्तकला उत्कृष्टता में हमारी दृष्टि के केंद्र में हैं। उन्होंने कहा कि यह श्रृंखला कमलादेवी जी की उस दृष्टि का सम्मान है, जिसमें शिल्प को शिक्षा, आजीविका और राष्ट्रनिर्माण के साथ जोड़ा गया।

विकास आयुक्त (हैंडिक्राफ्ट) कार्यालय भारत सरकार की केंद्रीय एजेंसी है, जो कारीगर और शिल्प आधारित गतिविधियों के विकास, विपणन और निर्यात के लिए जिम्मेदार है। यह शिल्प रूपों और कौशल के संवर्धन में भी सहायक है।

पीएम विश्वकर्मा योजना के कारीगरों को ऑनलाइन बाजार तक पहुँच के लिए अमेज़न के साथ समझौते के माध्यम से सशक्त बनाया गया

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सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय ने Amazon Seller Services Private Ltd. के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे PM विश्वकर्मा योजना में पंजीकृत कारीगरों को ऑनलाइन बाजार तक पहुँच प्राप्त होगी, उनके उत्पादों की दृश्यता बढ़ेगी और पूरे भारत में ग्राहक आधार का विस्तार होगा। यह MoU निर्माण भवन, नई दिल्ली में MSME विकास आयुक्त कार्यालय और Amazon टीम द्वारा किया गया।

PM विश्वकर्मा योजना, जिसे 17 सितंबर 2023 को लॉन्च किया गया था, कारीगरों को समग्र सहायता प्रदान करती है। यह योजना कौशल प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों के माध्यम से उत्पाद की गुणवत्ता सुधारने, बाज़ार पहुंच बढ़ाने, ऋण तक पहुँच सुनिश्चित करने और गुरु-शिष्य परंपरा के तहत पारंपरिक कौशल को सशक्त बनाने पर केंद्रित है।

इस साझेदारी के तहत:

  • Amazon योग्य विश्वकर्मा कारीगरों को अपने ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर ऑनबोर्ड करेगा।

  • MoMSME आवश्यक अनुमतियों, पंजीकरण और स्पष्टताओं में सहायता प्रदान करेगा।

  • Amazon के करिगर पहल के माध्यम से हस्तशिल्प उत्पादों की दृश्यता और डिजिटलीकरण को मजबूत किया जाएगा।

यह सहयोग पारंपरिक कारीगरों की उपस्थिति को डिजिटल ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बढ़ाने, उनके उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करने, और Viksit Bharat और Atmanirbhar Bharat की दृष्टि को साकार करने में महत्वपूर्ण कदम है।

PM विश्वकर्मा योजना के लाभार्थी 10 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित Amazon Smbhav Summit 2025 में भी शामिल हुए, जहां उन्होंने पहल के बारे में जानकारी प्राप्त की और कारीगरों से जुड़ने के अवसरों का पता लगाया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2023-24 के राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रस्तुत किए

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भारत की राष्ट्रपति, द्रौपदी मुर्मू, ने आज (9 दिसंबर, 2025) नई दिल्ली में 2023 और 2024 के राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रस्तुत किए।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि कला हमारे अतीत की यादों, वर्तमान के अनुभवों और भविष्य की आकांक्षाओं को दर्शाती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने भावनाओं को चित्रकला या मूर्तिकला के माध्यम से व्यक्त करता रहा है। कला लोगों को संस्कृति से जोड़ती है और एक-दूसरे के साथ संबंध स्थापित करती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि यदि हमारी सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा जीवंत और संरक्षित रही है, तो यह हमारे कलाकारों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रतिबद्धता के कारण संभव हुआ है। हमारे कारीगरों ने अपने कला और परंपराओं को समय के साथ ढालते हुए मूल आत्मा को जीवित रखा। उन्होंने अपने प्रत्येक कला-निर्माण में देश की मिट्टी की खुशबू को संरक्षित किया है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आजीविका का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। इस क्षेत्र में देश में 3.2 मिलियन से अधिक लोग कार्यरत हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि इस क्षेत्र में रोजगार और आय प्राप्त करने वाले अधिकांश लोग ग्रामीण या दूरदराज के क्षेत्रों में रहते हैं। यह क्षेत्र रोजगार और आय को विकेंद्रीकृत करके समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प का संवर्धन सामाजिक सशक्तिकरण के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस क्षेत्र ने परंपरागत रूप से कमजोर वर्गों के लोगों का समर्थन किया है। हस्तशिल्प न केवल कारीगरों को आजीविका का साधन प्रदान करता है, बल्कि उनकी कला उन्हें समाज में मान्यता और सम्मान भी देती है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र का विकास महिलाओं के सशक्तिकरण को भी मजबूत करेगा, क्योंकि इस क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों का 68 प्रतिशत हिस्सा महिलाएं हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प उद्योग की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता है। यह उद्योग पर्यावरण के अनुकूल है और इसका कार्बन फुटप्रिंट कम है। आज पर्यावरण-अनुकूल और सतत जीवनशैली की वैश्विक आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में, यह क्षेत्र सततता में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

राष्ट्रपति यह देखकर प्रसन्न हुईं कि GI टैग भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की पहचान को दुनिया भर में मजबूत कर रहा है। उन्होंने सभी हितधारकों से अपने अद्वितीय उत्पादों के लिए GI टैग प्राप्त करने का प्रयास करने का आग्रह किया। उनका कहना था कि GI टैग उनके उत्पादों को एक विशेष पहचान देगा और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी विश्वसनीयता बढ़ाएगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) पहल हमारे क्षेत्रीय हस्तशिल्प उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहचान को मजबूत कर रही है।

राष्ट्रपति ने कहा कि पीढ़ियों से संग्रहित कारीगरों के ज्ञान, समर्पण और मेहनत के बल पर, भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों ने विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि भारतीय हस्तशिल्पों की मांग में अत्यधिक वृद्धि की संभावना है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र युवा उद्यमियों और डिजाइनरों के लिए उत्कृष्ट अवसर प्रदान करता है ताकि वे अपने उद्यम स्थापित कर सकें।


भारत की जनजातीय कला और सांस्कृतिक विरासत ने IITF में बिखेरी चमक

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भारत की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव

भारत में 705 से अधिक जनजातीय समुदाय रहते हैं, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% हैं। ये समुदाय अपनी अनूठी पारंपरिक कलाओं और हस्तशिल्प के लिए जाने जाते हैं, जो सदियों से उनकी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।

नई दिल्ली में आयोजित 44वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले (IITF) में इसी समृद्ध जनजातीय कला और विरासत का उत्सव मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य ‘एक भारत–श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और मजबूत करना है। इस मेले में देशभर की जनजातियों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया, जिसे भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों का सहयोग प्राप्त है।

जनजातीय कला और हस्तशिल्प को बढ़ावा

भारत रेशम उत्पादन में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। रेशम, जिसे ‘रेशों की रानी’ कहा जाता है, 15वीं शताब्दी से भारत की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है।
आज कई जनजातीय समुदाय विशेष प्रकार का रेशमी कपड़ा और हस्तशिल्प बनाते हैं। देशभर के 52,000 गांवों में लगभग 97 लाख लोग इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

गोंड जनजाति के सचिन वाल्के – तसर रेशम के शिल्पकार

महाराष्ट्र के नागपुर से गोंड जनजाति के सचिन वाल्के और उनका परिवार तसर रेशम की साड़ी बनाते हैं, जिन पर वारली और करवत जैसे पारंपरिक डिजाइन उकेरे जाते हैं।
TRIFED (जनजातीय सहकारी विपणन विकास प्रबंधन महासंघ) ने उन्हें IITF और दिल्ली में आयोजित आदि महोत्सव में अपना काम प्रदर्शित करने में मदद की। वाल्के कहते हैं,
“कपास से लेकर अंतिम उत्पाद तक—हम सब कुछ खुद करते हैं। मेले हमारे लिए खरीदारों तक पहुंचने का सबसे बड़ा माध्यम हैं।”

TRIFED की प्रमुख रणनीतियाँ

  1. क्षमता निर्माण – स्वयं सहायता समूह, प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम

  2. बाज़ार विकास – राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जनजातीय उत्पादों की पहुंच

  3. ब्रांड निर्माण – जनजातीय उत्पादों की पहचान और स्थायी विपणन

भारत दुनिया का एकमात्र देश है जो सभी चार वाणिज्यिक रेशम—मल्बरी, तसर, एरी और मूगा—का उत्पादन करता है।

गुजरात की महिला कारीगर – अप्लीक व मिरर वर्क

गुजरात के बनासकांठा जिले की उगामबेन रामाभाई सुथार सहित 300 महिलाएं अप्लीक और कांच के काम वाले वस्त्र तैयार करती हैं। पहले वे केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित थीं, पर अब TRIFED के सहयोग से उन्हें देशभर में पहचान मिल रही है।
उनके रिश्तेदार प्रिंस कुमार लालजीभाई भी IITF में शामिल हुए और बताया कि “आदि महोत्सव में हमें बहुत अच्छा रिस्पांस मिला।”

झारखंड की पाइटकर कला – एक विलुप्त होती कला को बचाने का प्रयास

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले से झंतु गोपे पाइटकर (Pyatkar) कला को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
यह भारत की सबसे पुरानी लिपिक (narrative) कलाओं में से एक है—प्राकृतिक रंगों से बनी स्क्रॉल-पेंटिंग, जिनमें नृत्य, गीत, मिथक और लोक कथाएं दर्शाई जाती हैं।
गोपे बताते हैं कि इस क्षेत्र की कई पारंपरिक परिवार अब इसे बनाना छोड़ चुके हैं, लेकिन झारखंड कला मंदिर और मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्योग विकास बोर्ड ने उन्हें मेलों में प्रदर्शित करने का अवसर दिया।

मध्य प्रदेश का भारेवां कला – कबाड़ से कला का निर्माण

मध्य प्रदेश के बैतूर से विशाल बागमारी "भारेवां" कला को जीवित रखे हुए हैं। कबाड़ धातुओं से देवी-देवताओं की मूर्तियां, आभूषण और सजावटी वस्तुएं बनाना इस कला की विशेषता है। गोंड जनजाति के उप-समूह भारेवां समुदाय में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

निष्कर्ष

भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (IITF) जनजातीय कला और परंपराओं को संरक्षित करने के राष्ट्रीय प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सरकारी संस्थाएं जनजातीय कलाकारों को मंच और बाजार उपलब्ध कराकर न सिर्फ उनकी कला को जीवित रख रही हैं, बल्कि उनके समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त भी बना रही हैं।

भारत की "एकता में विविधता" को प्रदर्शित करती यह पहल सुनिश्चित करती है कि जनजातीय कला आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत बनी रहे।

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