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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन: स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर रेल परिवहन की ओर ऐतिहासिक कदम

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17 जुलाई 2026 को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के निकट जींद और सोनीपत के बीच भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। अब तक यह ट्रेन 1,200 किलोमीटर से अधिक की सफल यात्रा पूरी कर चुकी है और इस दौरान 3,200 लीटर से अधिक डीज़ल की बचत हुई है।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे काम करती है?

हाइड्रोजन ट्रेन में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच होने वाली रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से ट्रेन के भीतर ही बिजली उत्पन्न की जाती है। यही बिजली ट्रेन को संचालित करती है। इस प्रक्रिया में केवल जलवाष्प (Water Vapour) निकलती है, जबकि धुआँ या कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल नहीं होता। इस कारण हाइड्रोजन ट्रेन वर्तमान समय की सबसे स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल रेल प्रणालियों में से एक मानी जाती है।

पूर्णतः स्वदेशी तकनीक पर आधारित परियोजना

यह परियोजना भारतीय रेल के नेतृत्व में विकसित एक पूर्णतः स्वदेशी (Indigenous) पहल है। 10 कोचों वाली इस ट्रेन में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाए गए हैं, जो संयुक्त रूप से 2,400 किलोवाट शक्ति प्रदान करते हैं। ट्रेन में ऊर्जा भंडारण के लिए लिथियम आयरन फॉस्फेट (LiFePO₄) बैटरियाँ तथा हाइड्रोजन सिलेंडरों का उपयोग किया गया है।

भारत की पहली समर्पित हाइड्रोजन भंडारण सुविधा

जींद में भारतीय रेल की पहली समर्पित हाइड्रोजन स्टोरेज सुविधा स्थापित की गई है। इसमें 500 बार तक के दबाव पर ग्रीन हाइड्रोजन का भंडारण किया जाता है तथा 350 बार के दबाव पर ईंधन उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा की कुल भंडारण क्षमता लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन है।

उच्चतम सुरक्षा मानकों से सुसज्जित

हाइड्रोजन ट्रेन में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसमें गैस रिसाव, तापमान, आग और धुएँ का पता लगाने के लिए अनेक स्वतंत्र सुरक्षा प्रणालियाँ स्थापित की गई हैं। इसके साथ ही स्वचालित शट-ऑफ सिस्टम, निरंतर वेंटिलेशन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन तथा सभी आवश्यक तकनीकी परीक्षण एवं प्रमाणीकरण सुनिश्चित किए गए हैं।

जींद–सोनीपत खंड पर सफल संचालन के बाद अब दिल्ली मार्ग पर भी परीक्षण जल्द प्रारंभ किया जाएगा।

हरित भविष्य की ओर भारत का कदम

भारत की हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वदेशी हाइड्रोजन रेल इकोसिस्टम की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह परियोजना शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) रेल परिवहन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है तथा भविष्य में स्वच्छ, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल रेल सेवाओं के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करती है।

यह उपलब्धि भारत को हरित परिवहन (Green Mobility) और स्वच्छ ऊर्जा आधारित रेल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक मजबूत आधार प्रदान करती है।

भारत में ग्रीन यूरिया उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम, उर्वरक विभाग ने आयोजित की प्री-ईओआई बैठक

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सतत कृषि, कार्बन न्यूट्रैलिटी और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उर्वरक विभाग (Department of Fertilizers - DoF) ने भारत में ग्रीन यूरिया संयंत्रों की स्थापना के लिए प्री-एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (Pre-EOI) की उच्चस्तरीय बैठक का सफल आयोजन किया। यह बैठक प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDIL), नोएडा में आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव एवं PDIL के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. के.के. पाठक ने की।

इस सप्ताह की शुरुआत में उर्वरक विभाग ने भारत में ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया था। प्री-ईओआई बैठक में NTPC, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI), ग्रीन अमोनिया एवं यूरिया प्रौद्योगिकी प्रदाता, प्रमुख उर्वरक कंपनियां, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माता, ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया क्षेत्र की कंपनियां सहित सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अनेक हितधारकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन भाग लिया। बड़ी संख्या में भागीदारी इस महत्वाकांक्षी पहल को साकार करने की व्यापक रुचि को दर्शाती है।

प्रमुख नीतिगत और परिचालन बिंदु

1. विभिन्न मंत्रालयों का समन्वित सहयोग

ग्रीन यूरिया उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए कई मंत्रालयों की वित्तीय सहायता सुनिश्चित की गई है।

  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ग्रीन ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने के लिए 19,744 करोड़ रुपये उपलब्ध कराएगा।

  • उर्वरक विभाग (DoF) ग्रीन अमोनिया को देश की उर्वरक उत्पादन प्रणाली में शामिल करने के लिए आवश्यक नीतिगत एवं संस्थागत ढांचा तैयार करेगा।

2. निर्माताओं के लिए सब्सिडी व्यवस्था

ग्रीन अमोनिया का उत्पादन फिलहाल पारंपरिक ग्रे अमोनिया की तुलना में महंगा है। इसे प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार विशेष सब्सिडी व्यवस्था लागू करेगी।

  • SECI ग्रीन अमोनिया उत्पादकों से खरीदकर उर्वरक कंपनियों को ग्रे अमोनिया के बाजार मूल्य पर उपलब्ध कराएगा।

  • उर्वरक विभाग दोनों कीमतों के बीच का अंतर वहन करेगा, जिससे उर्वरक कंपनियों पर अतिरिक्त लागत का बोझ नहीं पड़ेगा।

3. उत्पादकों को वित्तीय प्रोत्साहन

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत ग्रीन अमोनिया उत्पादकों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता दी जाएगी।

  • प्रतिवर्ष 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया की खरीद का लक्ष्य।

  • SECI द्वारा पारदर्शी ई-रिवर्स नीलामी के माध्यम से आवंटन।

  • नए ग्रीनफील्ड और निर्माणाधीन परियोजनाओं को सहायता।

  • व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने के बाद नकद प्रोत्साहन।

  • 10 वर्षों के लिए दीर्घकालिक खरीद समझौते (GAPA/GASA) के माध्यम से बाजार की सुनिश्चितता।

पुडिमाडका पायलट परियोजना बनी मॉडल

बैठक में आंध्र प्रदेश के पुडिमाडका स्थित 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाले ग्रीन यूरिया पायलट प्लांट पर भी चर्चा हुई। NTPC की अनुसंधान इकाई NETRA द्वारा विकसित यह संयंत्र कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCUS) तथा वॉटर इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक का उपयोग करता है। यह परियोजना कार्बोनेटेड फ्लाई ऐश, फूड-ग्रेड उत्पादों और सिंथेटिक ईंधन जैसे उपयोगों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए भारत की रणनीति

भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन हाइड्रोजन के माध्यम से ग्रीन अमोनिया उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, ग्रीन यूरिया के निर्माण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की भी आवश्यकता होती है।

इसके लिए तापीय बिजलीघर, सीमेंट और इस्पात संयंत्रों से प्राप्त कैप्चर की गई CO₂ का उपयोग किया जाएगा।

  • 12.7 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले एक विश्वस्तरीय यूरिया संयंत्र को हर वर्ष लगभग 10 लाख मीट्रिक टन CO₂ की आवश्यकता होगी।

  • भारत वर्तमान में हर वर्ष लगभग 1 करोड़ मीट्रिक टन यूरिया आयात करता है।

  • देश के कई मौजूदा यूरिया संयंत्र 30 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं, इसलिए नई उत्पादन क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को मिलेगा बल

नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया उत्पादन को एकीकृत करने वाली परियोजनाएं भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को मजबूत करेंगी।

NTPC जैसी संस्थाएं, जिनके पास बिजली उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और उर्वरक क्षेत्र का अनुभव है, इन परियोजनाओं के नेतृत्व के लिए उपयुक्त मानी जा रही हैं।

सरकार ने निवेशकों से राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और विकसित हो रहे कार्बन कैप्चर ढांचे का लाभ उठाकर एकीकृत ग्रीन यूरिया परियोजनाएं विकसित करने का आह्वान किया है।

यह पहल भारत को स्वच्छ ऊर्जा आधारित उर्वरक उत्पादन, तकनीकी आत्मनिर्भरता, कार्बन उत्सर्जन में कमी और सतत कृषि की दिशा में एक नई पहचान दिलाने की क्षमता रखती है।

स्वच्छ ऊर्जा में बड़ी सफलता: नए पॉलिमर से ऊर्जा भंडारण और हाइड्रोजन उत्पादन में क्रांतिकारी प्रगति

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ऊर्जा भंडारण और स्वच्छ ईंधन (हाइड्रोजन) उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति करते हुए वैज्ञानिकों ने नए, आसानी से संश्लेषित और अत्यधिक प्रभावी पॉलिमरिक पदार्थ विकसित किए हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

Zn(DAB) और Cd(DAB) नामक ये समन्वय पॉलिमर (coordination polymers) विशेष रूप से डिजाइन की गई संरचनाएं हैं, जिनमें जिंक (Zn²⁺) या कैडमियम (Cd²⁺) धातु आयन और 3,3'-डायमिनोबेंजिडीन (DAB) नामक कार्बनिक अणु मिलकर मजबूत परतदार ढांचा बनाते हैं। इन्हें सरल, कमरे के तापमान पर और बिना जटिल उपकरणों के बड़े पैमाने पर तैयार किया जा सकता है, जिससे ये औद्योगिक उपयोग के लिए उपयुक्त बनते हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (CeNS) और बेंगलुरु स्थित क्राइस्ट विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने इन पदार्थों का परीक्षण किया और स्वच्छ ऊर्जा के दो प्रमुख क्षेत्रों—ऊर्जा भंडारण और हाइड्रोजन उत्पादन—में उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त किए।

प्रयोगशाला परीक्षणों में Zn(DAB) ने 2091.4 F g⁻¹ और Cd(DAB) ने 1341.6 F g⁻¹ की ऊर्जा भंडारण क्षमता दिखाई। व्यावहारिक उपकरणों (सुपरकैपेसिटर) में भी Zn(DAB) ने 785.3 F g⁻¹ और Cd(DAB) ने 428.5 F g⁻¹ का प्रदर्शन किया। साथ ही, ये सामग्री 5000 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी अपनी क्षमता बनाए रखने में सक्षम रही, जो उनकी टिकाऊपन को दर्शाता है।

इसके अलावा, ये पदार्थ पानी को विभाजित कर स्वच्छ हाइड्रोजन ईंधन उत्पादन में भी सक्षम हैं। Zn(DAB) के लिए 263 mV और Cd(DAB) के लिए 209 mV की कम ऊर्जा आवश्यकता (ओवरपोटेंशियल) इन्हें अत्यधिक प्रभावी बनाती है, जिससे भविष्य में हरित हाइड्रोजन उत्पादन अधिक सस्ता और कुशल हो सकता है।

ऊर्जा भंडारण और हाइड्रोजन उत्पादन—दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण ये सामग्री स्वच्छ ऊर्जा समाधानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं। यह नवाचार शोध और वास्तविक उपयोग के बीच की दूरी को कम करने में सहायक होगा।

यह शोध ACS Omega और Catalysis Science & Technology जैसे प्रतिष्ठित जर्नलों में प्रकाशित हुआ है, जो समन्वय पॉलिमरों को अगली पीढ़ी के स्वच्छ ऊर्जा पदार्थों के रूप में स्थापित करता है।

भारत में हरित हाइड्रोजन मिशन: उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने के लिए महत्वपूर्ण कदम

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नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) को लागू कर रहा है, जिसका उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन और इसके व्युत्पन्न उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।

भारत की हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता 2030 तक प्रति वर्ष 5 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँचने की संभावना है।

हरित हाइड्रोजन की लागत को कम करने के लिए NGHM के तहत महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:

i. इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण के लिए प्रोत्साहन योजना के तहत, 15 कंपनियों को कुल 3,000 मेगावाट प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता के लिए पुरस्कृत किया गया है। कुल प्रोत्साहन राशि ₹4440 करोड़ है।

ii. हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए प्रोत्साहन योजना के तहत, 18 कंपनियों को कुल 8,62,000 टन प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता के लिए पुरस्कृत किया गया है।

iii. रिफाइनरी के लिए हरित हाइड्रोजन की खरीद के लिए प्रोत्साहन योजना के तहत, 2 कंपनियों को कुल 20,000 टन प्रति वर्ष की क्षमता के लिए पुरस्कृत किया गया है।

हरित हाइड्रोजन की लागत को कम करने हेतु उठाए गए अन्य कदम निम्नलिखित हैं:

i. जो हरित हाइड्रोजन/हरित अमोनिया संयंत्र 31.12.2030 तक चालू किए जाते हैं और जो हरित हाइड्रोजन या हरित अमोनिया के उत्पादन के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करते हैं, उन्हें परियोजना के कमीशनिंग की तारीख से 25 वर्षों की अवधि के लिए अंतर-राज्यीय संचरण प्रणाली (ISTS) शुल्क से छूट दी गई है।

ii. SEZ अधिनियम, 2005 की धारा 26 के तहत ड्यूटी लाभ उन इकाइयों को दिए गए हैं जो नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों की स्थापना और संचालन एवं रखरखाव (O&M) के लिए केवल इकाई की स्व-उपभोग हेतु इसका उपयोग करती हैं।

MNRE एक अनुसंधान और विकास परियोजना ‘पेरोव्स्काइट टैंडम सोलर सेल का पैमाना बढ़ाना (Phase-I)’ का समर्थन कर रहा है, जिसका कुल परियोजना खर्च ₹83.19 करोड़ है, ताकि पेरोव्स्काइट टैंडम सोलर सेल तकनीक का पैमाना बढ़ाया जा सके और देश में इसका विकास किया जा सके।

यह जानकारी केंद्रीय राज्य मंत्री, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा, श्रीपाद यसो नाइक ने आज राज्यसभा में लिखित उत्तर में प्रस्तुत की।

ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की यात्रा: पिछले 11 वर्षों में ऐतिहासिक परिवर्तन – पीयूष गोयल

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केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने आज नई दिल्ली में एक ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के ऊर्जा क्षेत्र की पिछले 11 वर्षों की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि सशक्त दृष्टि, ईमानदार मंशा और निरंतर क्रियान्वयन किसी राष्ट्र की दिशा और दशा बदल सकते हैं।

सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि के अवसर पर गोयल ने कहा कि देश केवल लौह पुरुष को ही नहीं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी नेता को भी स्मरण करता है, जो भारत को राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर देखना चाहते थे।

मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वही आत्मनिर्भरता की भावना भारत के ऊर्जा क्षेत्र में साकार हुई है। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने अब तक का सर्वाधिक 1,048 मिलियन टन कोयला उत्पादन दर्ज किया, जबकि कोयला आयात में लगभग 8 प्रतिशत की कमी आई है।
उन्होंने कहा कि पिछले 11 वर्षों में भारत की सौर ऊर्जा क्षमता 46 गुना बढ़ी है, जिससे भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश बन गया है। वहीं, पवन ऊर्जा क्षमता 2014 में 21 गीगावॉट से बढ़कर 2025 में 53 गीगावॉट हो गई है।

गोयल ने बताया कि भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनिंग हब बन चुका है और रिफाइनिंग क्षमता को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने पर कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि 34,238 किलोमीटर प्राकृतिक गैस पाइपलाइन को स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 25,923 किलोमीटर परिचालन में हैं।
उन्होंने शांति (SHANTI) विधेयक का भी उल्लेख किया, जिसके तहत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है।

मंत्री ने कहा कि भारत अब अतिरिक्त बिजली उत्पादन, ग्रिड एकीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ चुका है। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि और सतत प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि भारत बिजली की कमी से निकलकर बिजली सुरक्षा और अब बिजली स्थिरता की ओर अग्रसर हुआ है।

गोयल ने कहा कि यह परिवर्तन पाँच प्रमुख स्तंभों पर आधारित है—

पहला स्तंभ: सार्वभौमिक पहुंच

उन्होंने कहा कि सौभाग्य योजना के तहत हर घर तक बिजली पहुँचाई गई है। उजाला योजना के अंतर्गत 47.4 करोड़ एलईडी बल्ब वितरित किए गए, जिससे बिजली बिल में बचत और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई।
उन्होंने कहा कि अब बच्चे सूर्यास्त के बाद भी पढ़ाई कर पा रहे हैं—यह केवल घरों में नहीं, बल्कि आशाओं में भी रोशनी ला रहा है।
उन्होंने बताया कि 10 करोड़ परिवारों को स्वच्छ रसोई गैस कनेक्शन मिलने से महिलाएँ स्वस्थ जीवन जी रही हैं और पीएम-कुसुम योजना के तहत किसान ऊर्जा प्रदाता बन रहे हैं।

दूसरा स्तंभ: वहनीयता

मंत्री ने कहा कि सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों पर जीएसटी 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया गया है।
उन्होंने बताया कि 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण लक्ष्य, जिसे 2030 तक हासिल करना था, वह समय से पहले पूरा कर लिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि सौर और पवन ऊर्जा की बिक्री के लिए अंतर-राज्यीय ट्रांसमिशन शुल्क माफ किया गया है।

तीसरा स्तंभ: उपलब्धता

गोयल ने कहा कि बिजली की कमी 2013 में 4.2 प्रतिशत से घटकर 2025 में 0.1 प्रतिशत रह गई है।
उन्होंने बताया कि एकीकृत राष्ट्रीय ग्रिड के माध्यम से भारत ने 250 गीगावॉट की रिकॉर्ड पीक पावर डिमांड को पूरा किया है।

चौथा स्तंभ: वित्तीय व्यवहार्यता

उन्होंने कहा कि पीएम-उदय योजना के तहत सुधारों से बिजली वितरण क्षेत्र सशक्त हुआ है।
डिस्कॉम बकाया 2022 में ₹1.4 लाख करोड़ से घटकर 2025 में ₹6,500 करोड़ रह गया है।

पाँचवां स्तंभ: स्थिरता और वैश्विक जिम्मेदारी

गोयल ने कहा कि भारत पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने वाला पहला G20 देश बन गया है।
उन्होंने बताया कि देश की 50 प्रतिशत स्थापित विद्युत क्षमता अब गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त हो रही है।

मंत्री ने कहा कि 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने की ओर बढ़ते हुए, भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए रणनीति को पुनः निर्धारित किया जा रहा है।
उन्होंने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उल्लेख किया, जिसका लक्ष्य 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन उत्पादन और ₹1 लाख करोड़ से अधिक की जीवाश्म ईंधन आयात बचत है।
उन्होंने पीएम सूर्य घर योजना का भी जिक्र किया, जिसके तहत लगभग 20 लाख घरों में रूफटॉप सोलर स्थापित किए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के ऊर्जा क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए सरकार जनता को सशक्त कर रही है।
उन्होंने बताया कि कोयला क्षेत्र पर गठित उच्चस्तरीय समिति की कई सिफारिशों पर विचार किया जा रहा है, जिनमें कोयला अन्वेषण और खनन को तेज करना तथा कोयला गैसीकरण को बढ़ावा देना शामिल है।
 गोयल ने विश्वास व्यक्त किया कि विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ते हुए, भारत का ऊर्जा क्षेत्र पैमाने, गति और स्थिरता को एक साथ साधने का वैश्विक उदाहरण बनेगा।

हरित समुद्री भारत की ओर: मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 और अमृत काल विज़न 2047

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मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)

  • मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 व्यापार, निवेश और रोजगार के लिए एक उत्प्रेरक है, जो भारत को आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दिशा में आगे बढ़ाता है।

  • अमृत काल विज़न 2047 के अंतर्गत हरित शिपिंग और समुद्री विकास के लिए लगभग ₹80 लाख करोड़ का निवेश प्रस्तावित है।

  • सागरमाला कार्यक्रम के तहत 2035 तक ₹5.8 लाख करोड़ की लागत वाली 840 परियोजनाएँ कार्यान्वयन में हैं।

परिचय

भारत में ग्रीन मैरीटाइम (हरित समुद्री विकास) की अवधारणा सुरक्षित, स्वच्छ और सतत बंदरगाह संचालन की आवश्यकता से विकसित हुई। जैसे-जैसे वैश्विक स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण (HSE) मानकों का महत्व बढ़ा, भारतीय बंदरगाहों ने यह महसूस किया कि दक्षता के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और श्रमिकों का कल्याण भी अनिवार्य है।

भारत की लंबी तटरेखा में मैंग्रोव, लैगून, प्रवाल भित्तियाँ और समुद्र तट शामिल हैं, जो जैव विविधता और समुद्री जीवन से समृद्ध हैं तथा लाखों तटीय समुदायों का आधार हैं। किंतु व्यापार और विकास के बढ़ते दबाव के कारण इन क्षेत्रों पर खतरा भी बढ़ा है। इसे संतुलित ढंग से प्रबंधित करने के लिए भारतीय बंदरगाहों को नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने, वायु और जल गुणवत्ता सुधारने, हरित आवरण बढ़ाने तथा अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक हो गया है।

मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW) द्वारा तैयार मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 भारत के समुद्री क्षेत्र को सशक्त, स्वच्छ और सतत बनाने की रूपरेखा है। भविष्य का समुद्री परिवहन हरित हाइड्रोजन, अमोनिया, जैव-ईंधन और LNG जैसे स्वच्छ ईंधनों पर आधारित होगा। इस दिशा में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शून्य-उत्सर्जन ईंधनों की राह प्रशस्त कर रहा है।

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन

इस मिशन का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन कम करना और भारत को हरित हाइड्रोजन का वैश्विक केंद्र बनाना है।

2030 तक लक्ष्य:

  • 50 लाख टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन

  • ₹8 लाख करोड़ का निवेश

  • 6 लाख रोजगार

  • ₹1 लाख करोड़ का जीवाश्म ईंधन आयात बचत

कांडला, पारादीप और तूतीकोरिन बंदरगाहों को हरित हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है।

मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 और अमृत काल विज़न 2047

मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 के तहत बंदरगाह, शिपिंग और अंतर्देशीय जलमार्गों में ₹3–3.5 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान है।
मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047 में लगभग ₹80 लाख करोड़ का निवेश प्रस्तावित है, जिसमें ग्रीन कॉरिडोर, ग्रीन हाइड्रोजन बंकरिंग, मेथनॉल चालित जहाज़ और 300 से अधिक कार्य योजनाएँ शामिल हैं।

भारत की ग्रीन पोर्ट पहलें

सौर ऊर्जा

  • छतों, अनुपयोगी भूमि और शांत जल क्षेत्रों में सोलर पैनल

  • फ्लोटिंग सोलर पीवी परियोजनाएँ

पवन ऊर्जा

  • ऑनशोर और ऑफशोर विंड फार्म

  • गुजरात, कच्छ और ओखा क्षेत्र में संभावनाएँ

अन्य नवीकरणीय ऊर्जा

  • ज्वारीय ऊर्जा (गुजरात)

  • वेव एनर्जी और सोलर थर्मल

प्रमुख योजनाएँ और पहल

  • हरित सागर ग्रीन पोर्ट गाइडलाइंस 2023

  • ग्रीन टग ट्रांज़िशन प्रोग्राम (GTTP)

  • हरित नौका (ग्रीन वेसल) पहल

  • तटीय ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर

  • सागरमाला कार्यक्रम – ₹5.8 लाख करोड़ की 840 परियोजनाएँ

स्वच्छ बंदरगाह: उत्सर्जन में कमी

  • 2030 तक 50% पोर्ट वाहनों को स्वच्छ ईंधन पर लाने का लक्ष्य

  • शोर-टू-शिप पावर

  • पोर्ट उपकरणों का विद्युतीकरण

  • LNG बंकरिंग

  • धूल और वायु प्रदूषण नियंत्रण

  • 33% ग्रीन बेल्ट अनिवार्य

भारतीय पोर्ट्स विधेयक 2025

इंडियन पोर्ट्स बिल, 2025 आधुनिक वैश्विक हरित मानकों, आपदा तैयारी और दक्ष संचालन को अनिवार्य बनाता है।
FY 2024-25 में प्रमुख बंदरगाहों पर 855 मिलियन टन कार्गो हैंडलिंग के साथ भारत वैश्विक स्तर पर मजबूती से उभरा है।

वैश्विक साझेदारियाँ और संवाद

  • सागरमंथन

  • ग्रीन और डिजिटल मैरीटाइम कॉरिडोर

  • भारत-सिंगापुर ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर

  • ग्रीन शिपिंग कॉन्क्लेव, मुंबई

हरित शिपिंग और समुद्री प्रदूषण नियंत्रण

  • ऑयल स्पिल रिस्पॉन्स प्लान

  • सैटेलाइट आधारित निगरानी

  • पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा

निष्कर्ष

भारत एक नए समुद्री युग के द्वार पर खड़ा है—जहाँ आर्थिक विकास, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं। स्वच्छ बंदरगाह, कम-उत्सर्जन जहाज़, स्मार्ट अवसंरचना और समावेशी विकास के साथ भारत 2047 तक न केवल एक वैश्विक समुद्री शक्ति बनेगा, बल्कि महासागरों का जिम्मेदार संरक्षक भी सिद्ध होगा।


भारत में हाइड्रोजन मोबिलिटी का आगाज़: टोयोटा मिराई के साथ ग्रीन हाइड्रोजन पायलट परियोजना लॉन्च

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केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने आज मोबिलिटी सेक्टर में हाइड्रोजन के उपयोग पर फील्ड ट्रायल्स के लिए पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किया। उन्होंने इसे भारत की स्वच्छ ऊर्जा प्रगति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया।

भारत की ऊर्जा व्यवस्था में ग्रीन हाइड्रोजन—भविष्य का ईंधन

मंत्री ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन विश्व भर में भविष्य की ऊर्जा प्रणालियों की रीढ़ बनकर उभर रहा है। उन्होंने टोयोटा की ‘मिराई’ हाइड्रोजन फ्यूल-सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल (FCEV) को NISE को सौंपे जाने को महत्वपूर्ण कदम बताया, जिससे भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि ऐसे सहयोग ऊर्जा आत्मनिर्भरता, कम-उत्सर्जन वाले नवाचारपूर्ण परिवहन समाधानों और भारत की पंचामृत जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूत करते हैं।

‘मिराई’—भारत के सतत परिवहन के भविष्य का प्रतीक

जोशी ने कहा कि टोयोटा की ‘मिराई’ (जापानी में फ्यूचर) भारत की स्वच्छ और हरित मोबिलिटी की दिशा में एक नया अध्याय है।

भारतीय परिस्थितियों में होगी 2 वर्ष की व्यापक जांच

MOU के तहत NISE अगले दो वर्षों में मिराई हाइड्रोजन वाहन का परीक्षण भारत की गर्मी, धूल, ट्रैफिक और विविध भौगोलिक परिस्थितियों में करेगा।
यह अध्ययन देशभर में हाइड्रोजन मोबिलिटी को स्केल-अप करने के लिए महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करेगा।

मंत्री ने बताया कि:

  • हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन पूरी तरह स्वच्छ, शांत, शून्य-उत्सर्जन होते हैं

  • इनके उत्सर्जन में केवल शुद्ध पानी निकलता है

  • ये विश्वभर में कारों, बसों, ट्रकों, ट्रेन, जहाजों और पावर सिस्टम्स में इस्तेमाल हो रहे हैं

उन्होंने निजी तौर पर वाहन चलाकर यह संदेश दिया कि हाइड्रोजन मोबिलिटी भारत की परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

हाइड्रोजन तकनीक—नीति से प्रयोग और वाणिज्यिक उपयोग की ओर तेज़ी से अग्रसर

कार्यक्रम में उपस्थित नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद नाइक ने कहा कि यह पहल भारत के स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की दिशा में बड़ा कदम है।

उन्होंने बताया कि:

  • जनवरी 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन शुरू होने के बाद
    भारत नीतियों से वास्तविक प्रयोग और अब वाणिज्यिक उपयोग की ओर बढ़ रहा है

  • मिराई वाहन का वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण भविष्य में बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन-आधारित परिवहन को बढ़ावा देगा

टोयोटा का भारत के स्वच्छ ऊर्जा इकोसिस्टम पर विश्वास

टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के देश प्रमुख विक्रम गुलाटी ने कहा कि यह साझेदारी भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को मजबूत करती है और देश को नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करेगी।

मंत्री ने संसद भवन तक चलाया वाहन

कार्यक्रम के बाद जोशी ने स्वयं मिराई चलाकर नए संसद भवन तक पहुँचाया। उन्होंने कहा कि हाइड्रोजन-आधारित इस ग्रीन टेक्नोलॉजी को प्रदर्शित करने के लिए नया संसद भवन उपयुक्त स्थल है, क्योंकि यह स्वयं ग्रीन बिल्डिंग के रूप में विकसित किया गया है।

टोयोटा मिराई क्या है?

  • दूसरी पीढ़ी की हाइड्रोजन फ्यूल-सेल इलेक्ट्रिक कार

  • हाइड्रोजन + ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली उत्पन्न करती है

  • उत्सर्जन: केवल जलवाष्प

  • रेंज: लगभग 650 किमी

  • रिफ्यूलिंग समय: 5 मिनट से कम

  • दुनिया की सबसे उन्नत शून्य-उत्सर्जन मोबिलिटी तकनीकों में से एक


भारत ने CoP30 में जलवायु कार्रवाई और वैश्विक सहयोग के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई

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पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन के केंद्रीय मंत्री, भूपेंद्र यादव ने 17.11.2025 को ब्राज़ील के बेलें में UNFCCC के 30वें सम्मेलन (CoP30) के उच्च स्तरीय सत्र में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य प्रस्तुत किया। मंत्री ने कहा कि CoP30 को “कार्यान्वयन का COP” और “वादों को पूरा करने का COP” के रूप में याद किया जाना चाहिए।

मंत्री ने ब्राज़ील सरकार और उसके लोगों को CoP30 की मेज़बानी करने के लिए धन्यवाद दिया, जिसे उन्होंने “हमारे ग्रह की पारिस्थितिक संपदा का जीवंत प्रतीक” कहा।

भूपेंद्र यादव ने विकसित देशों से अधिक जलवायु महत्वाकांक्षा दिखाने और अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने का दृढ़ आग्रह किया। उन्होंने कहा, “विकसित देशों को वर्तमान लक्ष्यों से कहीं पहले नेट जीरो तक पहुंचना चाहिए और नए, अतिरिक्त और अनुकूल जलवायु वित्त को ट्रिलियनों की राशि में प्रदान करना चाहिए, न कि बिलियनों में।” उन्होंने सस्ती और सुलभ जलवायु तकनीक की आवश्यकता पर भी जोर दिया और कहा कि जलवायु तकनीक को बौद्धिक संपदा से जुड़े प्रतिबंधों से मुक्त होना चाहिए।

मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह सफलतापूर्वक दिखाया है कि विकास और पर्यावरणीय संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि भारत की उत्सर्जन तीव्रता 2005 से अब तक 36% से अधिक घट चुकी है, और गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोत अब हमारे कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का आधे से अधिक हिस्सा हैं (वर्तमान में लगभग 256 GW), जो कि हमारे 2030 के लक्ष्य से पाँच साल पहले ही प्राप्त किया जा चुका है। उन्होंने आगे बताया कि भारत अपने संशोधित NDCs को 2035 तक घोषित करेगा और पहली द्विवार्षिक पारदर्शिता रिपोर्ट (Biennial Transparency Report) भी समय पर प्रस्तुत करेगा।

भूपेंद्र यादव ने यह भी बताया कि भारत की वैश्विक नेतृत्व भूमिका अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) और ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस जैसी पहलों के माध्यम से प्रदर्शित होती है। उन्होंने भारत के नाभिकीय मिशन (Nuclear Mission) और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen Mission) के माध्यम से 2070 तक नेट जीरो के मार्ग को आगे बढ़ाने की गति पर भी जोर दिया।

मंत्री ने पेरिस समझौते के उद्देश्यों के अनुरूप कार्बन सिंक और भंडार के संरक्षण और विकास पर ध्यान देते हुए बताया कि केवल सोलह महीनों में समुदाय-नेतृत्व वाली पहल के तहत 20 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए। उन्होंने कहा कि यह सामूहिक जलवायु कार्रवाई की शक्ति का वास्तविक प्रमाण है।

मंत्री ने अपने संबोधन का निष्कर्ष इस प्रतिबद्धता के साथ किया कि भारत वैश्विक जलवायु सहयोग और न्याय के प्रति समर्पित है। उन्होंने कहा, “आने वाला दशक कार्यान्वयन, लचीलापन और साझा जिम्मेदारी का दशक होना चाहिए।”


भारत की ग्रीन हाइड्रोजन क्रांति: सतत और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर

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  • भारत का लक्ष्य: 2030 तक हर साल 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन
  • भारत का पहला पोर्ट-आधारित ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट व.ओ. चिदंबरनार पोर्ट पर शुरू
  • 10 मार्गों पर 37 हाइड्रोजन वाहनों के साथ मोबिलिटी पायलट लॉन्च
  • मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित होने और ₹1 लाख करोड़ से अधिक की जीवाश्म ईंधन आयात में कमी की उम्मीद

परिचय

भारत अपनी ऊर्जा परिवर्तन यात्रा के निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है — जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाते हुए स्वदेशी स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ा रहा है। यह भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने और 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के विज़न के अनुरूप है। इस परिवर्तन में ग्रीन हाइड्रोजन एक स्वच्छ, टिकाऊ और स्केलेबल ईंधन के रूप में उभर रहा है, जो कठिन-से-कठिन औद्योगिक क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन करने में सक्षम है।

भारत सरकार ने 2023 में राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य एक संपूर्ण ग्रीन हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना और इस क्षेत्र में अवसरों व चुनौतियों का समाधान करना है।

मुख्य उद्देश्य

यह मिशन केवल एक ऊर्जा पहल नहीं है, बल्कि औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, आयात में कमी और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक रणनीतिक मार्ग है — जो आत्मनिर्भरता के साथ सतत विकास को जोड़ता है।

ग्रीन हाइड्रोजन क्या है?

ग्रीन हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है जो नवीकरणीय ऊर्जा (सौर या पवन ऊर्जा) की मदद से उत्पादित होती है, न कि जीवाश्म ईंधन से। इस प्रक्रिया में जल का विद्युत अपघटन (Electrolysis) करके उसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। यदि इस प्रक्रिया से प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन पर अधिकतम 2 किलोग्राम CO₂ समतुल्य उत्सर्जन होता है, तो उसे “ग्रीन” माना जाता है।

ग्रीन हाइड्रोजन को बायोमास (जैसे कृषि अपशिष्ट) से भी बनाया जा सकता है, बशर्ते उत्सर्जन सीमा के भीतर रहे।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM)

इस मिशन का लक्ष्य 2030 तक भारत को ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में वैश्विक नेता बनाना है।
इसके तहत —

  • 125 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता ग्रीन हाइड्रोजन के लिए समर्पित होगी,

  • ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आएगा,

  • 6 लाख से अधिक रोजगार सृजित होंगे,

  • 50 MMT ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी होगी,

  • और ₹1 लाख करोड़ से अधिक जीवाश्म ईंधन आयात में कमी होगी।

मिशन के चार प्रमुख स्तंभ

  1. नीति और नियामक ढांचा

  2. मांग सृजन

  3. अनुसंधान, नवाचार और विकास (R&D)

  4. इन्फ्रास्ट्रक्चर और पारिस्थितिकी तंत्र विकास

प्रमुख योजनाएँ

(i) SIGHT योजना (Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition)

₹17,490 करोड़ के प्रोत्साहन के साथ इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा।

(ii) ग्रीन हाइड्रोजन हब विकास

तीन प्रमुख बंदरगाह —

  • दीendayal (गुजरात)

  • व.ओ. चिदंबरनार (तमिलनाडु)

  • परेदीप (ओडिशा)
    को ग्रीन हाइड्रोजन हब घोषित किया गया है।

(iii) ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन योजना (GHCI)

अप्रैल 2025 में लॉन्च की गई यह योजना सुनिश्चित करती है कि केवल नवीकरणीय ऊर्जा से बने, और निर्धारित उत्सर्जन सीमा के भीतर आने वाले हाइड्रोजन को ही “ग्रीन” कहा जाए।
BEE (ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी) इस योजना का नोडल प्राधिकरण है।

(iv) Strategic Hydrogen Innovation Partnership (SHIP)

सरकार और उद्योग के बीच साझेदारी के माध्यम से अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की पहल।
₹400 करोड़ की आरएंडडी योजना के तहत 23 अग्रणी परियोजनाएँ पहले से चल रही हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग

औद्योगिक क्षेत्र

  • उर्वरक उत्पादन: ₹55.75 प्रति किलोग्राम की दर से 7.24 लाख मीट्रिक टन/वर्ष ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति हेतु निविदा जारी।

  • पेट्रोलियम रिफाइनिंग: रिफाइनरियों में जीवाश्म-आधारित हाइड्रोजन के स्थान पर ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग।

  • इस्पात उद्योग: 5 पायलट प्रोजेक्ट शुरू, जिनका उद्देश्य हाइड्रोजन-आधारित इस्पात उत्पादन की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन है।

परिवहन क्षेत्र

  • सड़क परिवहन: 10 मार्गों पर 37 हाइड्रोजन वाहनों (बस और ट्रक) के साथ पायलट प्रोजेक्ट — ₹208 करोड़ का निवेश।

  • शिपिंग: व.ओ. चिदंबरनार पोर्ट पर भारत का पहला पोर्ट-आधारित ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट (₹25 करोड़)।

  • उच्च ऊँचाई मोबिलिटी: एनटीपीसी द्वारा लेह (3,650 मीटर) में विश्व का सबसे ऊँचा ग्रीन हाइड्रोजन मोबिलिटी प्रोजेक्ट।

कौशल विकास और वैश्विक सहयोग

  • अब तक 5,600 से अधिक प्रशिक्षुओं को हाइड्रोजन क्षेत्र में प्रमाणित किया गया है।

  • EU-India, UK-India और Germany (H2Global) के साथ साझेदारी के तहत तकनीकी सहयोग और निर्यात अवसरों का विस्तार।

  • Singapore के साथ ग्रीन हाइड्रोजन हब के विकास हेतु MoU साइन।

निष्कर्ष: स्वच्छ विकास की दिशा में अग्रसर भारत

  • ग्रीन हाइड्रोजन भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन का केंद्र है।
  • राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन न केवल देश की ऊर्जा स्वतंत्रता को सुदृढ़ करता है, बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा नेतृत्व की दिशा में भारत की स्थिति को भी मजबूत करता है।

यह मिशन भारत को एक सतत, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर ले जा रहा है।


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