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जलियांवाला बाग के शहीदों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रद्धांजलि, साहस और बलिदान को बताया प्रेरणास्रोत

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नई दिल्ली- नरेंद्र मोदी  ने आज जलियांवाला बाग नरसंहार के वीर शहीदों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इन अमर बलिदानियों का त्याग हमारे देशवासियों के अदम्य साहस और अटूट आत्मबल का प्रतीक है, जो आज भी हर पीढ़ी को प्रेरित करता है।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि जलियांवाला बाग के शहीदों का बलिदान हमें स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा के मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर प्रेरित करता है। उन्होंने इस ऐतिहासिक घटना को भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय बताते हुए कहा कि विदेशी हुकूमत की बर्बरता के खिलाफ शहीदों ने जो साहस और स्वाभिमान दिखाया, वह देश के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी भाषाओं में श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि जलियांवाला बाग के शहीदों का साहस और दृढ़ संकल्प आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूक करता रहेगा।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित भी साझा किया, जिसमें समाज को सशक्त और समृद्ध बनाने का संदेश दिया गया है। सुभाषित के माध्यम से उन्होंने कहा कि समाज के परिश्रमी और जागरूक लोगों का कर्तव्य है कि वे राष्ट्र को समृद्ध, आत्मनिर्भर और जागरूक बनाने वाली सकारात्मक शक्तियों को बढ़ावा दें, साथ ही विभाजन, अन्याय और असंतोष फैलाने वाली नकारात्मक शक्तियों का दृढ़ता से विरोध करें।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि आज के समय में देश को एकजुट रखते हुए विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने नागरिकों से आह्वान किया कि वे शहीदों के आदर्शों को अपनाते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।

गौरतलब है कि जलियांवाला बाग नरसंहार भारत के इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था और स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी थी। आज भी यह दिन देशवासियों को एकता, संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है।

जलियांवाला बाग नरसंहार (Jallianwala Bagh Massacre) – संक्षिप्त विवरण

जलियांवाला बाग नरसंहार भारतीय इतिहास की सबसे दुखद और महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है, जो 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर में घटी थी।

क्या हुआ था?

बैसाखी के दिन हजारों लोग  जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्रित हुए थे। वे लोग ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानून रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act) के खिलाफ विरोध कर रहे थे।

उसी समय ब्रिटिश अधिकारी जनरल रेजिनाल्ड डायर (General Reginald Dyer)अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचे और बिना किसी चेतावनी के निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया।

कितने लोग मारे गए?

इस गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। आधिकारिक आंकड़े कम बताए गए, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है।

घटना का प्रभाव

  • इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।

  • भारतीयों में अंग्रेजों के खिलाफ गहरा आक्रोश पैदा हुआ।

  • Mahatma Gandhi ने इसके बाद असहयोग आंदोलन शुरू किया।

  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा मिली।

क्यों महत्वपूर्ण है?

जलियांवाला बाग नरसंहार हमें याद दिलाता है कि आजादी कितने बलिदानों के बाद मिली है। यह घटना अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने और एकजुट रहने की प्रेरणा देती है।

देश के स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी नायकों का योगदान अद्वितीय - मुख्यमंत्री साय

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  • शहीद गैंद सिंह नायक ने किया स्वाधीनता आंदोलन का सर्वप्रथम शंखनाद
  • हल्बा-हल्बी समाज के शक्ति दिवस पर्व में शामिल हुए मुख्यमंत्री
  •  समाज के नवनिर्मित कार्यालय भवन के लोकार्पण सहित कई घोषणाएं

रायपुर- स्वाधीनता आंदोलन के साथ-साथ राष्ट्र व समाज के नवनिर्माण में आदिवासी नायकों एवं महापुरूषों का अद्वितीय योगदान है। हल्बा, हल्बी एवं आदिवासी समाज सहित संपूर्ण भारतवर्ष के गौरव शहीद गैंद सिंह नायक ने हमारे देश में आजादी का आंदोलन का सर्वप्रथम शंखनाद किया था। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज जिला मुख्यालय दुर्ग के गोकुल नगर स्थित हल्बा शक्ति स्थल में अखिल भारतीय हल्बा-हल्बी समाज द्वारा आयोजित 35वां मिलन समारोह एवं शक्ति दिवस पर्व को सम्बोधित करते हुए यह बात कही। 

मुख्यमंत्री साय ने इस मौके पर हल्बा-हल्बी समाज के नवनिर्मित कार्यालय का लोकार्पण भी किया। साय ने शक्ति स्थल में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हल्बा समाज के युवा-युवतियों को आवासीय कोचिंग सुविधा प्रदान करने हेतु 50 लाख रूपए तथा पुलगांव दुर्ग स्थित कंवर समाज के सामाजिक भवन में बाउण्ड्रीवॉल निर्माण हेतु 25 लाख रूपए  की स्वीकृत किए जाने की घोषणा भी की। इस अवसर पर उन्होंने हल्बा-हल्बी समाज के सामाजिक पत्रिका ’समाज’ का भी विमोचन किया।

मुख्यमंत्री साय ने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य सहित पूरे देश में आजादी के आंदोलन का सूत्रपात सर्वप्रथम जनजातीय समाज के नायको ने किया था। शहीद वीर नारायण सिंह, शहीद गैंद सिंह नायक सहित जनजाति नायकों एवं देशभक्तों ने अंग्रेजों के खिलाफ कुल 14 क्रांतियों का शंखनाद किया था। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. वाजपेयी ने जनजाति वर्ग के उत्थान एवं विकास के लिए सर्वप्रथम केन्द्रीय जनजाति कार्यालय मंत्रालय का गठन भी किया गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर राजधानी रायपुर में जनजाति समाज के नायकों एवं वीर सपूतों के योगदान तथा अमर गाथाओं को नई पीढ़ी को परिचित कराने साथ-साथ उसके संरक्षण और संवर्धन हेतु विशाल आदिवासी संग्रहालय का निर्माण किया गया है। 

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार ने दो वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी की अधिकांश गारंटियों को प्राथमिकता से पूरा किया है। राज्य की लगभग 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन योजना का लाभ, तेंदूपत्ता संग्राहकों को 5500 रूपए प्रति मानक बोरा के हिसाब से पारिश्रमिक तथा किसानों को धान का मूल्य 3100 रूपए प्रति क्विंटल दिया जा रहा है। 26 लाख से अधिक परिवारों को प्रधानमंत्री आवास की मंजूरी दी गई है। राज्य में भी नक्सलवाद अपने अंतिम सांस गिन रहा है। नियद नेल्ला नार योजना के माध्यम से 400 से अधिक गांवों में विकास के काम तेजी से हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा भी 2047 तक विकसित छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण कर पूरे देश में अग्रणी राज्य बनाने हेतु निरंतर कार्य किया जा रहा है। 

कार्यक्रम को सांसद विजय बघेल और पूर्व मंत्री महेश गागड़ा, हल्बा-हल्बी समाज के प्रदेश अध्यक्ष खलेन्द्र ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ प्रदेश राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के उपाध्यक्ष ललित चन्द्राकर, अखिल भारतीय हल्बा-हल्बी समाज के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित थे।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बलिदान दिवस पर क्रांतिकारियों को दी श्रद्धांजलि

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केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और रोशन सिंह को उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि इन महान क्रांतिकारियों के सर्वोच्च बलिदान ने ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी और ब्रिटिश शासन की नींव को हिला कर रख दिया।

अमित शाह ने कहा कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए इन वीर सपूतों का त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति देशवासियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। उनका बलिदान भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है और आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के लिए समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा।

शहीद वीर नारायण सिंह शहादत दिवस पर विशेष

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सोनाखान के मोर ललहु माटी,,सुरता आथे हम ला,,,

वीर नारायण ला कहां लुका देस,वापिस कर दे हम ला,,,,

 सोनाखान से _पोषण कुमार साहू

रायपुर //सोनाखान की वीरभूमि से आज फिर वही गर्जना सुनाई दे रही है— “वीर नारायण सिंह अमर रहें… अमर रहें…”। ललहु माटी से उठती यह हुंकार केवल नारा नहीं, बल्कि उस आत्मबल की गूंज है, जो छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह ने जन-जन के हृदय में प्रवाहित किया था। उनकी शहादत की गाथा गाते हुए लोग भावुक हैं, आँखें नम हैं और मन गर्व से भरा हुआ।

वीर नारायण सिंह केवल एक नाम नहीं, वे अन्याय के विरुद्ध खड़े आदिवासी चेतना के प्रतीक हैं। 19वीं सदी में अंग्रेजी हुकूमत और जमींदारी शोषण के दौर में, जब अकाल से जनता त्रस्त थी, तब वीर नारायण सिंह ने मानवता का झंडा बुलंद किया। उन्होंने सोनाखान के अनाज भंडार को भूखे लोगों के लिए खोल दिया—यह कदम शोषण के विरुद्ध खुली चुनौती था। अंग्रेजी सत्ता को यह स्वीकार्य नहीं हुआ। परिणामस्वरूप उन पर मुकदमे थोपे गए, उन्हें गिरफ्तार किया गया और अंततः 10 दिसंबर 1857 को रायपुर  के जय स्तम्भ चौक में फांसी दे दी गई। परंतु शरीर को फांसी मिली, विचारों को नहीं—वे अमर हो गए।

आज उनकी कहानियाँ जन-जन की जुबान पर हैं। ग्राम कोसम सरा से आए समारु बैगा भावुक होकर कहते हैं कि वीर नारायण सिंह ने हमारी पीढ़ियों को मान और गौरव से भर दिया। अंचल में उनके लिए असीम श्रद्धा और सम्मान है। वे लोगों की रग-रग में बसते हैं—साहस बनकर, स्वाभिमान बनकर।

यहाँ उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष तीन दिवसीय वीर मड़ई मेला (शहादत दिवस) का आयोजन होता है, जहाँ सोनाखान के 18 टोलों सहित सर्व समाज के लोग बड़ी संख्या में जुटकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ग्राम जोराडबरी रोहासी से आए प्रेम सिंह ध्रुव बताते हैं कि वे अपने परिवार के साथ हर वर्ष यहाँ आते हैं—श्रद्धा के साथ-साथ गौरव की अनुभूति करने।

सोनाखान आज भी अपने वीर सपूत के नाम से गर्व और सम्मान से विभूषित है। सरकार इस शहीद स्थल के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है। यहाँ वीर नारायण सिंह के नाम से स्मारक और संग्रहालय का निर्माण किया गया है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराता है। शहादत दिवस के अवसर पर  आज मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा 101 करोड़ रुपये के 119 विकास कार्यों का लोकार्पण इस बात का प्रमाण है कि यह पवित्र भूमि केवल स्मृति की नहीं, बल्कि विकास और सम्मान की भी धरोहर है।

ललहु माटी आज फिर जीवंत है। हवा में गूंजते नारे, आँखों में सम्मान और दिलों में संकल्प—वीर नारायण सिंह यहां हर जगह मौजूद  हैं। वे सोनाखान की मिट्टी में, उसकी सांसों में, और छत्तीसगढ़ की चेतना में सदा जीवित हैं।

लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पर प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन: राष्ट्रगान की प्रेरणा और इतिहास के गौरवशाली पलों का स्मरण

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लोकसभा में आज ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित विशेष चर्चा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया। उन्होंने इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी सांसदों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि वह मंत्र है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में देश को ऊर्जा, प्रेरणा और त्याग का मार्ग दिखाया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि वंदे मातरम् के 150 वर्ष हम अपनी आंखों के सामने पूरे होते देख रहे हैं। उन्होंने इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख और प्रेरणा का अवसर बताया।

इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ावों का स्मरण

प्रधानमंत्री ने कहा कि इस कालखंड में देश ने कई ऐतिहासिक अवसरों का अनुभव किया—

  • संविधान के 75 वर्ष,

  • सरदार पटेल व भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती,

  • गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहीदी वर्षगांठ।

उन्होंने कहा कि आज वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर सदन सामूहिक ऊर्जा का अनुभव कर रहा है।

वंदे मातरम् का जन्म और उसका प्रभाव

मोदी ने बताया कि वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी, जब 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन भारतीयों पर अत्याचार बढ़ा रहा था। इसी वातावरण में बंकिम दा ने ‘वंदे मातरम्’ के रूप में अंग्रेजों को चुनौती दी।

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् ने भारत की सहस्रों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा को नए शब्दों में जागृत किया। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का गीत नहीं था, बल्कि मां भारती को बंधनों से मुक्त कराने का पुकार था।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूंज

प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् ने हर दिशा में आंदोलन को ऊर्जा दी—

  • बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में यह बुलंद आवाज बना

  • स्वदेशी आंदोलन में यह प्रेरणा बना

  • लाखों लोगों ने जेल, यातना और यहां तक कि फांसी पर जाते हुए भी "वंदे मातरम्" कहा

उन्होंने खूदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी आदि महान शहीदों का स्मरण किया।

महात्मा गांधी और विश्व में वंदे मातरम्

प्रधानमंत्री ने कहा कि महात्मा गांधी ने भी 1905 में लिखा था कि वंदे मातरम् लगभग राष्ट्रीय गान जैसा है। वह इसे सबसे मधुर और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण गीत मानते थे।

उन्होंने कहा कि विदेशों में भी क्रांतिकारियों ने इसे अपनाया—

  • वीर सावरकर के घर ‘इंडिया हाउस’ में इसकी गूंज

  • भिखाजी कामा द्वारा ‘वंदे मातरम्’ नाम से अखबार प्रकाशित करना

  • बिपिनचंद्र पाल और अरविंदो द्वारा उसी नाम का समाचार पत्र निकालना

राजनीतिक विरोध और अन्याय पर प्रधानमंत्री का टिप्पणी

प्रधानमंत्री ने कहा कि 1937 में मुस्लिम लीग के विरोध के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने वंदे मातरम् पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि appeasement राजनीति के कारण उस समय वंदे मातरम् के साथ अन्याय हुआ, जिसके बारे में युवा पीढ़ी को जानना जरूरी है।

आज के भारत में वंदे मातरम् की प्रेरणा

प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी—

  • संकटों के समय,

  • युद्धों के दौरान,

  • आपातकाल के विरोध में,

  • कोविड-19 के दौरान—

वंदे मातरम् की भावना भारत को मजबूती देती रही।

उन्होंने कहा कि यह केवल स्मरण का क्षण नहीं, बल्कि नए संकल्प और ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर है।

2047 तक विकसित भारत के संकल्प का आह्वान

प्रधानमंत्री ने कहा कि जैसे वंदे मातरम् ने स्वतंत्र भारत के सपने को ऊर्जा दी, वैसे ही यह विकसित भारत 2047 के संकल्प को भी शक्ति देगा।

अंत में उन्होंने कहा,

“वंदे मातरम् वह मंत्र है जो हमें कर्तव्य की याद दिलाता है, जो हमें एकता के सूत्र में बांधता है, और जो हमें आत्मनिर्भर व विकसित भारत के सपने को साकार करने की प्रेरणा देता है।”

उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह चर्चा नए भारत को नई ऊर्जा देगी और युवा पीढ़ी को प्रेरित करेगी।

https://twitter.com/i/broadcasts/1jMKgREdjqqxL

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