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UPI पर नए इंटरचेंज शुल्क की खबर, ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट पेमेंट पर 0.4% चार्ज की चर्चा

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नई दिल्ली- डिजिटल पेमेंट से जुड़ी एक नई खबर इन दिनों चर्चा में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ₹2,000 से अधिक के कुछ UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4% इंटरचेंज शुल्क लागू किए जाने की बात कही जा रही है। यह बदलाव 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने की चर्चा है।

हालांकि, इस खबर को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंटरचेंज शुल्क को सीधे आम उपभोक्ता से वसूले जाने वाले सामान्य UPI चार्ज के रूप में नहीं समझना चाहिए। इंटरचेंज शुल्क मुख्य रूप से पेमेंट इकोसिस्टम में शामिल संस्थाओं के बीच लेनदेन से जुड़ी फीस होती है।

क्या हर UPI पेमेंट पर लगेगा चार्ज?

नहीं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह किसी भी तरह से हर UPI भुगतान पर लगाया जाने वाला सामान्य शुल्क नहीं है। प्रस्तावित/रिपोर्ट किए गए बदलाव का संबंध कुछ विशेष मर्चेंट पेमेंट्स से बताया जा रहा है, खासकर ₹2,000 से अधिक के लेनदेन से।

इसलिए अगर कोई व्यक्ति किसी दुकान, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या सेवा प्रदाता को UPI के जरिए भुगतान करता है, तो केवल इस खबर के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि उसे हर बार भुगतान राशि के ऊपर 0.4% अतिरिक्त देना पड़ेगा।

इंटरचेंज शुल्क क्या होता है?

इंटरचेंज शुल्क वह शुल्क है जो पेमेंट ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने वाले सिस्टम में संबंधित पक्षों के बीच निर्धारित नियमों के तहत लगाया जाता है। इसका उद्देश्य पेमेंट नेटवर्क में शामिल बैंकों और अन्य संबंधित संस्थाओं के बीच लागत एवं राजस्व का संतुलन बनाए रखना होता है।

यानी 0.4% इंटरचेंज शुल्क का मतलब यह नहीं है कि ग्राहक को सीधे 0.4% अतिरिक्त भुगतान करना ही होगा।

₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या असर पड़ेगा?

रिपोर्ट में जिस व्यवस्था की चर्चा है, उसके तहत पात्र मर्चेंट ट्रांजैक्शन में ₹2,000 से अधिक की राशि पर इंटरचेंज शुल्क की गणना की जा सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर किस प्रकार के मर्चेंट, पेमेंट इंस्ट्रूमेंट और ट्रांजैक्शन कैटेगरी पर होगा, यह लागू नियमों और आधिकारिक दिशा-निर्देशों पर निर्भर करेगा।

ग्राहकों के लिए क्या है सबसे जरूरी बात?

UPI भारत में रोजमर्रा के डिजिटल भुगतान का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। ऐसे में इंटरचेंज शुल्क से जुड़ी खबर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यह भ्रम पैदा हो सकता है कि अब हर UPI भुगतान महंगा हो जाएगा।

फिलहाल इस खबर को 'हर UPI पेमेंट पर 0.4% शुल्क' के रूप में समझना सही नहीं है। उपभोक्ताओं पर सीधे कोई सामान्य UPI चार्ज लागू होने और पेमेंट इकोसिस्टम में इंटरचेंज शुल्क लगने—इन दोनों बातों में अंतर है।

आधिकारिक स्पष्टता का इंतजार

15 अक्टूबर 2026 से संबंधित इस प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था को लेकर अंतिम प्रभाव समझने के लिए NPCI, बैंकों और संबंधित आधिकारिक संस्थाओं की स्पष्ट गाइडलाइन महत्वपूर्ण होगी। इसलिए ग्राहकों को सोशल मीडिया पर चल रही अधूरी जानकारी के बजाय आधिकारिक घोषणा और लागू नियमों पर भरोसा करना चाहिए।

ब्रिक्स ICT ट्रैक में भारत ने रखा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विजन, ग्लोबल साउथ के लिए मजबूत डिजिटल साझेदारी का आह्वान

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पुणे- संचार राज्य मंत्री डॉ. चंद्रशेखर पेम्मासानी ने पुणे में आयोजित BRICS ICT Track Thematic Panel Discussion में मुख्य वक्तव्य देते हुए भारत के खुले, समावेशी और मजबूत डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (Digital Public Infrastructure—DPI) की वैश्विक भूमिका पर प्रकाश डाला।

“Sustainable and Resilient Digital and ICT Ecosystems: Digital Public Infrastructure for Impact – Global South Insights on Powering Public Services and Economic Growth” विषय पर आयोजित इस चर्चा में BRICS देशों के मंत्री, नीति-निर्माता, शिक्षाविद और उद्योग जगत के प्रतिनिधि शामिल हुए।

भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बना नई विकास व्यवस्था का आधार

डॉ. पेम्मासानी ने कहा कि पारंपरिक रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर का अर्थ सड़क, बंदरगाह और बिजली जैसी भौतिक संपत्तियों से लगाया जाता था, लेकिन भारत ने पहचान, बैंकिंग, भुगतान, सत्यापन योग्य दस्तावेज और सहमति आधारित डेटा जैसे डिजिटल माध्यमों पर आधारित एक आधुनिक डिजिटल व्यवस्था विकसित की है।

उन्होंने कहा कि भारत की असली उपलब्धि एक ऐसे खुले और इंटरऑपरेबल सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म का निर्माण है, जिस पर बैंक, फिनटेक कंपनियां और सरकारी विभाग विभिन्न सेवाएं विकसित कर सकते हैं।

UPI ने डिजिटल भुगतान को बनाया आसान

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रमुख स्तंभों का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने UPI की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि UPI से 720 बैंक जुड़े हुए हैं और यह भारत के लगभग 85 प्रतिशत डिजिटल लेनदेन को प्रोसेस करता है। उन्होंने कहा कि वैश्विक रियल-टाइम भुगतान में भारत की हिस्सेदारी करीब 49 प्रतिशत है और UPI अब 9 साझेदार देशों तक पहुंच चुका है।

DBT और DigiLocker से पारदर्शिता को बढ़ावा

डॉ. पेम्मासानी ने Direct Benefit Transfer (DBT) की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया। DBT पोर्टल के माध्यम से 56 मंत्रालयों की 318 योजनाओं को जोड़ा गया है, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम करने और लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद मिली है।

वहीं, DigiLocker के 70 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता हैं और इसके माध्यम से करीब 9 अरब सत्यापन योग्य डिजिटल दस्तावेज जारी किए जा चुके हैं।

उन्होंने ONDC, Government e-Marketplace (GeM) और Account Aggregator जैसी पहलों को भी डिजिटल बाजार और डेटा से जुड़ी नागरिकों की स्वायत्तता को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया।

99 प्रतिशत गांवों तक 4G कवरेज

भारत के दूरसंचार क्षेत्र में हो रहे विस्तार पर प्रकाश डालते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि देश के लगभग 99 प्रतिशत गांवों में 4G मोबाइल कवरेज पहुंच चुका है। इसके लिए करीब 4 अरब डॉलर के सैचुरेशन अभियान को आगे बढ़ाया जा रहा है।

भारत में 5G नेटवर्क का भी तेजी से विस्तार हुआ है और 5 लाख से अधिक 5G बेस स्टेशन तैनात किए जा चुके हैं। वहीं, BharatNet मिशन के तहत प्रमुख गांवों तक हाई-स्पीड ऑप्टिकल फाइबर पहुंचाने का काम जारी है।

हरित ऊर्जा पर भी जोर

डिजिटल और दूरसंचार विस्तार के साथ पर्यावरणीय स्थिरता पर भी जोर देते हुए डॉ. पेम्मासानी ने बताया कि मोबाइल टावरों में वर्तमान में 12.4 प्रतिशत हरित ऊर्जा का उपयोग हो रहा है। वर्ष 2030 तक दूरसंचार बुनियादी ढांचे में 30 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग का राष्ट्रीय लक्ष्य रखा गया है।

ग्लोबल साउथ के लिए DPI जरूरी

अपने संबोधन के समापन में डॉ. पेम्मासानी ने कहा कि Digital Public Infrastructure केवल विकसित देशों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ के सतत विकास की आवश्यकता है।

उन्होंने BRICS देशों के बीच मजबूत डिजिटल सहयोग का आह्वान करते हुए मॉड्यूलर और ओपन-सोर्स तकनीकी ढांचे को साझा करने पर जोर दिया, ताकि महंगे लाइसेंसिंग खर्च को कम किया जा सके। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय ICT मानक निर्धारण संस्थाओं में ग्लोबल साउथ की उचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त क्षमता निर्माण की आवश्यकता बताई।

इस thematic panel में ब्राजील के संचार मंत्री फ्रेडेरिको डी सिकीरा फिल्हो और दक्षिण अफ्रीका के संचार एवं डिजिटल प्रौद्योगिकी उपमंत्री मोंडली गंगुबेले सहित BRICS देशों के अन्य प्रतिनिधि और वैश्विक तकनीकी क्षेत्र के प्रमुख विशेषज्ञ भी शामिल हुए।

कतर से भारत भेजें पैसे, अब UPI से तुरंत पहुंचेगी रकम

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कतर पोस्ट के आउटलेट से सीधे UPI-सक्षम भारतीय बैंक खातों में भेजी जा सकेगी रकम

दोहा- कतर में रहने वाले भारतीयों के लिए बड़ी सुविधा शुरू हुई है। PosTransfer powered by UPI के जरिए अब कतर पोस्ट के आउटलेट से भारत में UPI-सक्षम बैंक खातों में सीधे पैसे भेजे जा सकेंगे। यह सेवा 15 अगस्त 2026, भारत के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कतर में शुरू की गई।

यह सेवा कतर पोस्ट, इंडिया पोस्ट, यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के इंटरकनेक्शन प्लेटफॉर्म (UPU-IP) और NPCI International Payments Limited (NIPL) के सहयोग से विकसित की गई है। इसका उद्देश्य डाक नेटवर्क की व्यापक पहुंच को भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (Digital Public Infrastructure) से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय धन हस्तांतरण को आसान और सुविधाजनक बनाना है।

कतर पोस्ट से सीधे UPI खाते में पहुंचेगी रकम

इस सुविधा के तहत ग्राहक कतर पोस्ट के किसी आउटलेट पर जाकर भारत में पैसे भेज सकते हैं। इसके लिए उन्हें भारत में पैसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की UPI ID और आवश्यक पहचान संबंधी जानकारी देनी होगी। लाभार्थी को अपने UPI ऐप के माध्यम से विदेशी धनराशि प्राप्त करने की सुविधा सक्रिय करनी होगी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद भेजी गई रकम लाभार्थी के UPI-सक्षम बैंक खाते में तुरंत जमा हो जाएगी।

10 से 4,000 कतर रियाल तक भेज सकेंगे

इस सेवा के तहत एक लेनदेन में QAR 10 से QAR 4,000 तक की राशि भेजी जा सकती है। हालांकि, प्रति लेनदेन अधिकतम सीमा ₹1 लाख के समतुल्य होगी। प्रत्येक लेनदेन पर QAR 15 का फ्लैट सेवा शुल्क निर्धारित किया गया है।

कतर में रह रहे भारतीयों को होगा बड़ा फायदा

कतर में बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय रहता है। ऐसे में यह सुविधा भारत में अपने परिवारों और प्रियजनों को पैसे भेजने वाले लोगों के लिए एक विश्वसनीय, आसान और किफायती माध्यम उपलब्ध कराएगी। डाक नेटवर्क की पहुंच और UPI की डिजिटल क्षमता के मेल से दोनों देशों के बीच वित्तीय संपर्क को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

स्वतंत्रता दिवस पर हुआ सेवा का शुभारंभ

सेवा के शुभारंभ के अवसर पर कतर में भारतीय दूतावास के चार्ज डी'अफेयर्स संदीप कुमार ने दोहा के LuLu Mall स्थित कतर पोस्ट आउटलेट का दौरा किया और संबंधित हितधारकों से बातचीत की। इस अवसर पर भारत-कतर के बीच डिजिटल वित्तीय संपर्क और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने में इस पहल के महत्व को रेखांकित किया गया।

अन्य देशों में भी शुरू होंगे नए कॉरिडोर

UPU-IP को भारत के UPI इकोसिस्टम से जोड़कर PosTransfer powered by UPI को अंतरराष्ट्रीय आवक धन प्रेषण सेवा के रूप में विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य भागीदार देशों के डाक ऑपरेटरों के माध्यम से भारत में UPI-सक्षम बैंक खातों तक सुरक्षित और सरल तरीके से धनराशि पहुंचाना है।

इंडिया पोस्ट अन्य देशों के डाक ऑपरेटरों के साथ भी ऐसे नए PosTransfer powered by UPI कॉरिडोर शुरू करने की दिशा में काम कर रहा है। इससे विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भारत में पैसे भेजने की सुविधा और मजबूत होने की उम्मीद है।

UPI को लेकर बड़ा अपडेट: ग्राहकों के लिए भुगतान रहेगा मुफ्त, व्यापारियों पर लग सकता है मामूली शुल्क

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भारत में डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर एक अहम अपडेट सामने आया है। UPI के जरिए भुगतान करने वाले आम ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, यानी नागरिकों के लिए UPI पेमेंट पहले की तरह मुफ्त रहने की संभावना है। वहीं, कुछ मामलों में व्यापारियों से मामूली शुल्क लिए जाने पर चर्चा चल रही है।

UPI देश में डिजिटल लेनदेन का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है और करोड़ों लोग रोजमर्रा के भुगतान के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में ग्राहकों पर किसी तरह का अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाने से डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

व्यापारियों से संभावित शुल्क को लेकर अंतिम व्यवस्था और नियमों का स्पष्ट होना अभी बाकी है।

MeitY ने BFSI क्षेत्र के लिए 'डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट 2025-26' का दूसरा संस्करण जारी किया

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इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In), वित्तीय क्षेत्र कंप्यूटर सुरक्षा घटना प्रतिक्रिया दल (CSIRT-Fin) और SISA के सहयोग से बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, बीमा (BFSI) तथा डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र के लिए 'डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट 2025-26' का दूसरा संस्करण जारी किया।

रिपोर्ट वित्तीय संस्थानों, नियामकों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों को बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, बीमा और डिजिटल भुगतान क्षेत्र में तेजी से बदलते साइबर खतरों का समग्र आकलन उपलब्ध कराती है।

रिपोर्ट जारी करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि साइबर खतरे लगातार अधिक जटिल होते जा रहे हैं। ऐसे समय में डिजिटल विश्वास को मजबूत करने के लिए सरकारी संस्थानों और उद्योग जगत के बीच मजबूत साझेदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि CERT-In, CSIRT-Fin और SISA के बीच यह सहयोग भारत की साइबर सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी साइबर सुरक्षा ज्ञान को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।

रिपोर्ट डिजिटल फॉरेंसिक एवं इंसिडेंट रिस्पॉन्स (DFIR) अनुसंधान, CERT-In और CSIRT-Fin के विश्लेषण तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित खतरों पर किए गए अध्ययन पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि पिछले संस्करण में किए गए सात प्रमुख पूर्वानुमानों में से छह अब वास्तविकता बन चुके हैं। इससे स्पष्ट होता है कि किसी नए साइबर खतरे के सामने आने और उसके दुरुपयोग के बीच का समय तेजी से घट रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, सोशल इंजीनियरिंग, क्रेडेंशियल चोरी, सप्लाई-चेन पर हमले और क्लाउड का दुरुपयोग जैसे खतरे अब सामान्य हमले की रणनीतियां बन चुके हैं। आधुनिक साइबर हमले अब वैध लॉगिन, अधिकृत भुगतान या सामान्य उपयोगकर्ता गतिविधि की तरह दिखाई देते हैं, जिससे उन्हें समय रहते पहचानना बेहद कठिन हो जाता है।

SISA के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी दर्शन शांतमूर्ति ने कहा कि नवाचार और उसके दुरुपयोग के बीच की दूरी काफी कम हो गई है। उन्होंने कहा कि BFSI क्षेत्र का आधार विश्वास है और साइबर सुरक्षा अब केवल तकनीकी नियंत्रण का विषय नहीं, बल्कि संस्थानों की विकास रणनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

CERT-In के महानिदेशक डॉ. संजय बहल ने कहा कि भारत का वित्तीय तंत्र जितना अधिक डिजिटल और परस्पर जुड़ा हुआ होगा, साइबर सुरक्षा उतनी ही साझा जिम्मेदारी बन जाएगी। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट संस्थानों को उभरते खतरों का पूर्वानुमान लगाने, परिचालन क्षमता बढ़ाने और देश की डिजिटल वित्तीय व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने में मदद करेगी।

रिपोर्ट में 'एनाटॉमी ऑफ साइबर फेल्योर' नामक चार-स्तरीय ढांचा (4-Layer Gap Archetype Framework) भी प्रस्तुत किया गया है, जो यह समझने में मदद करता है कि आधुनिक साइबर हमले किन कमजोरियों का लाभ उठाकर बड़े सुरक्षा उल्लंघन में बदल जाते हैं। इसके आधार पर संस्थान जोखिमों की पहचान कर अपनी साइबर सुरक्षा रणनीति को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

रिपोर्ट में अगले 18 महीनों का रोडमैप भी प्रस्तुत किया गया है, जिसमें बुनियादी सुरक्षा उपायों को मजबूत करने, निरंतर जोखिम मूल्यांकन, समन्वित प्रतिक्रिया और अधिक सक्षम साइबर सुरक्षा ढांचा विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया है।

भारत में डिजिटल भुगतान क्रांति: UPI ने बदली वित्तीय लेन-देन की तस्वीर

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कुछ समय पहले तक भारत में पैसे का लेन-देन समय लेने वाला और जटिल प्रक्रिया हुआ करता था। बिल भुगतान के लिए लंबी कतारें, पैसे भेजने के लिए बैंक जाना और कई दिनों तक इंतजार करना आम बात थी। लेकिन आज डिजिटल तकनीक ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है।

डिजिटल परिवर्तन की शुरुआत

भारत में भुगतान प्रणाली का विकास बार्टर सिस्टम से लेकर नकद, चेक और डिजिटल माध्यमों तक हुआ है। 2000 के दशक में RBI ने RTGS (2004) और IMPS (2010) जैसी सेवाएं शुरू कीं, जिससे तेज ट्रांसफर संभव हुआ, लेकिन इनकी पहुंच सीमित थी।

JAM ट्रिनिटी: बड़ा बदलाव

डिजिटल क्रांति की असली नींव JAM ट्रिनिटी (जनधन, आधार और मोबाइल) ने रखी:

  • जनधन योजना: करोड़ों लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा

  • आधार: डिजिटल पहचान और पारदर्शिता सुनिश्चित

  • मोबाइल: आसान और त्वरित लेन-देन का माध्यम

इससे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) को मजबूती मिली और लोगों में डिजिटल भुगतान के प्रति भरोसा बढ़ा।

UPI: एक क्रांतिकारी नवाचार

2016 में लॉन्च हुआ यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) भारत की भुगतान प्रणाली में बड़ा बदलाव लेकर आया:

  • मोबाइल नंबर या UPI ID से तुरंत भुगतान

  • 24x7 रियल-टाइम ट्रांजैक्शन

  • सभी बैंकों और ऐप्स के बीच इंटरऑपरेबिलिटी

  • सुरक्षित और आसान उपयोग

UPI की उपलब्धियां

  • जनवरी 2026 में 21.7 अरब ट्रांजैक्शन

  • ₹28.33 लाख करोड़ का लेन-देन

  • भारत के 81% डिजिटल रिटेल भुगतान में हिस्सेदारी

  • वैश्विक रियल-टाइम भुगतान में 49% हिस्सा

वित्तीय समावेशन को बढ़ावा

UPI ने सिर्फ भुगतान आसान नहीं किया, बल्कि:

  • छोटे व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों को डिजिटल बनाया

  • ग्रामीण और शहरी अंतर को कम किया

  • क्रेडिट, बीमा और बचत तक पहुंच बढ़ाई

आज ऑटो ड्राइवर, दुकानदार, किसान—सभी QR कोड से भुगतान ले रहे हैं।

सुरक्षा और विश्वास

  • RBI द्वारा टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन लागू (1 अप्रैल 2026 से)

  • सुरक्षित और भरोसेमंद लेन-देन

  • आसान शिकायत निवारण प्रणाली

वैश्विक पहचान

भारत का UPI अब दुनिया में मिसाल बन चुका है:

  • IMF और World Bank ने सराहा

  • कई देशों (UAE, सिंगापुर, नेपाल, फ्रांस आदि) में विस्तार

  • दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम

निष्कर्ष

UPI ने भारत में वित्तीय लेन-देन को तेज, सरल, पारदर्शी और समावेशी बना दिया है। यह सिर्फ एक पेमेंट सिस्टम नहीं, बल्कि जन-जन का प्लेटफॉर्म बन गया है, जिसने देश की आर्थिक प्रगति को नई दिशा दी है।


वित्तीय सेवा विभाग ने 2025 में किए ऐतिहासिक सुधार, बैंकिंग और डिजिटल भुगतान में भारत ने रचा नया कीर्तिमान

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नई दिल्ली- वित्त मंत्रालय के अंतर्गत वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने वर्ष 2025 में व्यापक और दूरगामी सुधारों के माध्यम से भारत के बैंकिंग, बीमा, पेंशन, डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन तंत्र को नई मजबूती प्रदान की है। “आपकी पूँजी, आपका अधिकार” अभियान, बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम 2025, EASE 8.0 (EASE₹ise), क्रेडिट लाइन ऑन UPI और Hello! UPI जैसे नवाचारों ने वित्तीय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, समावेशी और नागरिक-केंद्रित बनाया है।

बैंकिंग क्षेत्र ऐतिहासिक मजबूती की ओर

सरकार के सुधारात्मक कदमों के परिणामस्वरूप बैंकिंग क्षेत्र की परिसंपत्ति गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
सितंबर 2025 तक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) का सकल एनपीए घटकर 2.05% और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) का 2.30% रह गया है।
प्रावधान कवरेज अनुपात (PCR) बढ़कर SCBs में 93% से अधिक और PSBs में लगभग 95% हो गया है।
वित्त वर्ष 2024-25 में SCBs ने ₹4.01 लाख करोड़ और PSBs ने ₹1.78 लाख करोड़ का अब तक का सर्वाधिक शुद्ध लाभ दर्ज किया।

EASE सुधारों से बदली PSBs की तस्वीर

EASE एजेंडा के तहत डिजिटल बैंकिंग, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा, ग्राहक सेवा और फिनटेक सहयोग को बढ़ावा मिला। EASE₹ise के अंतर्गत जोखिम प्रबंधन, नवाचार, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और उत्कृष्टता पर विशेष जोर दिया गया, जिससे PSBs को भविष्य के लिए तैयार किया गया।


डिजिटल भुगतान में भारत वैश्विक अग्रणी

DIGIDHAN मिशन के तहत डिजिटल लेन-देन में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई।
वर्ष 2017-18 के 2,071 करोड़ लेन-देन से बढ़कर 2024-25 में यह संख्या 22,831 करोड़ हो गई।
UPI आज देश के कुल खुदरा डिजिटल भुगतानों का लगभग 81% संभाल रहा है और वैश्विक रियल-टाइम भुगतान में भारत की हिस्सेदारी लगभग 49% है।
Hello! UPI, UPI Lite X और क्रेडिट लाइन ऑन UPI ने वरिष्ठ नागरिकों, ग्रामीण क्षेत्रों और फीचर फोन उपयोगकर्ताओं के लिए डिजिटल भुगतान को सरल बनाया है।

वित्तीय समावेशन को नई गति

प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत 57 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें ₹2.8 लाख करोड़ से अधिक जमा है।
मुद्रा योजना, स्टैंड-अप इंडिया, अटल पेंशन योजना और NPS वात्सल्य ने महिलाओं, युवाओं, किसानों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान की है।

बीमा, NBFC और MSME को बढ़ावा

सबका बीमा, सबकी रक्षा अधिनियम 2025 के माध्यम से बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा 100% कर दी गई है।
NBFCs और MSMEs के लिए नई क्रेडिट गारंटी योजनाओं से निवेश और रोजगार सृजन को बल मिला है।
SIDBI ने MSME क्लस्टरों में नए शाखा नेटवर्क का विस्तार किया है।

निष्कर्ष

वर्ष 2025 में वित्तीय सेवा विभाग के सुधारों ने भारत की वित्तीय प्रणाली को अधिक मजबूत, पारदर्शी और समावेशी बनाया है। बैंकिंग स्थिरता, डिजिटल भुगतान में वैश्विक नेतृत्व और व्यापक वित्तीय समावेशन के साथ DFS ने विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया है।


ई-बिल सिस्टम का शुभारंभ: उर्वरक सब्सिडी के डिजिटल और पारदर्शी भुगतान की दिशा में बड़ा कदम

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माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया विजन और विकसित भारत @ 2047 के लक्ष्य के अनुरूप, उर्वरक विभाग ने डिजिटल शासन और वित्तीय सुधारों को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। माननीय केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में ई-बिल सिस्टम का उद्घाटन किया। इस प्रणाली के माध्यम से सरकार लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के उर्वरक सब्सिडी भुगतान को डिजिटल रूप से संसाधित कर सकेगी।

समारोह में संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह ऑनलाइन प्रणाली पारदर्शी, कुशल और तकनीक-संचालित शासन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उर्वरक विभाग के सचिव राजत कुमार मिश्रा ने कहा कि इस लॉन्च के साथ विभाग के वित्तीय संचालन को आधुनिक बनाने में एक बड़ी मील का पत्थर स्थापित हुआ है। यह नई प्रणाली मैन्युअल और कागजी प्रक्रियाओं से पूरी तरह डिजिटल, सिस्टम-टू-सिस्टम वर्कफ़्लो में परिवर्तन का प्रतीक है, जिससे बिलों के भौतिक आदान-प्रदान की आवश्यकता समाप्त हो गई है।

यह पहल उर्वरक विभाग के iFMS (Integrated Financial Management System) और वित्त मंत्रालय के CGA के PFMS के बीच अनोखी तकनीकी साझेदारी का परिणाम है।

CCA संतोष कुमार ने कहा कि इस परिवर्तन से पारदर्शिता और जवाबदेही काफी हद तक बढ़ेगी, क्योंकि यह सभी वित्तीय लेन-देन का केन्द्रीयकृत और छेड़छाड़-रहित डिजिटल ऑडिट ट्रेल बनाएगा, जिससे निगरानी और ऑडिटिंग आसान हो जाएगी। इस प्रणाली के तहत वरिष्ठ अधिकारियों को रियल-टाइम खर्च की निगरानी और मजबूत वित्तीय नियंत्रण मिलेगा, क्योंकि सभी भुगतान केंद्रीयकृत प्रणाली में ट्रैक और रिपोर्ट किए जाएंगे।

JS (F&A) मनोज सेठी ने कहा कि यह प्रणाली एंड-टू-एंड डिजिटल बिल प्रोसेसिंग सक्षम करती है, जिससे भुगतान की समय-सीमा में तेजी आएगी, विशेषकर साप्ताहिक उर्वरक सब्सिडी भुगतान के समय पर वितरण में। साथ ही, ई-बिल प्लेटफ़ॉर्म उपयोगकर्ताओं की सुविधा बढ़ाता है क्योंकि उर्वरक कंपनियां ऑनलाइन दावा जमा कर सकती हैं और भुगतान की स्थिति रियल-टाइम में ट्रैक कर सकती हैं, जिससे भौतिक यात्रा और मैन्युअल फॉलो-अप की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

यह प्रणाली विभाग में मानक इलेक्ट्रॉनिक वर्कफ़्लो (जैसे फर्स्ट-इन-फर्स्ट-आउट बिल प्रोसेसिंग) को लागू करती है, जिससे बिल हैंडलिंग में समानता, निष्पक्षता और वित्तीय नियमों का पालन सुनिश्चित होता है। इसके अलावा, सिस्टम एकीकरण से आईटी सिस्टम साइलो कम, सिस्टम मेंटेनेंस सरल और रियल-टाइम वित्तीय जानकारी का व्यापक आधार तैयार होता है, जो नीति निर्माण और बजट प्रबंधन में सहायक है।

इस कार्यक्रम में AS अनीता सी. मेश्राम, AS अपर्णा शर्मा, JS KK पाठक, JS अनुराग रोहतगी और डायरेक्टर लबोनी दास दत्ता उपस्थित थे।

असेम गुप्ता, वरिष्ठ तकनीकी निदेशक, NIC ने समाधान की तकनीकी उत्कृष्टता और सहज आर्किटेक्चर समझाया। NIC टीम, जिसमें जॉइंट डायरेक्टर आशुतोष तिवारी और डेवलपर हरेकृष्ण तिवारी शामिल थे, ने प्लेटफ़ॉर्म के कार्यान्वयन और डेमो का समर्थन किया। NIC के प्रयासों की व्यापक सराहना की गई।

संगठित ई-बिल प्रणाली वित्तीय शासन को सशक्त बनाती है, जिसमें पूर्वनिर्धारित मानदंडों के खिलाफ भुगतान की पुष्टि, ऑडिट उद्देश्यों के लिए हर क्रिया का लॉग और धोखाधड़ी या दुरुपयोग के जोखिम को कम करना शामिल है। यह पहल सरकार की पारदर्शी, कुशल और तकनीक-संचालित प्रशासन के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।

भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता: वित्तीय सेवाओं पर ऐतिहासिक समझौते की वार्ता संपन्न

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भारत और न्यूज़ीलैंड ने 22 दिसंबर 2025 को भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के अंतर्गत वित्तीय सेवाओं पर परिशिष्ट (Financial Services Annex) से संबंधित वार्ताओं को सफलतापूर्वक संपन्न कर लिया है। यह उपलब्धि द्विपक्षीय आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि को 10 दिसंबर 2025 को आयोजित अंतिम दौर की वार्ताओं के दौरान अंतिम रूप दिया गया।


भारत और न्यूज़ीलैंड वित्तीय सेवा क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए दृढ़ प्रतिबद्धता साझा करते हैं। इस संबंध के महत्व को स्वीकार करते हुए, दोनों देशों ने एक दूरदर्शी, संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौता विकसित करने के लिए सहयोग किया है, जो उनके-अपने वित्तीय सेवा क्षेत्रों के लिए नए अवसर खोलेगा। यह एफटीए द्विपक्षीय सहयोग को गति देने, बाजार पहुंच को सुगम बनाने और दोनों अर्थव्यवस्थाओं की वित्तीय प्रणालियों के गहन एकीकरण के लिए आवश्यक संस्थागत और नियामक ढांचा प्रदान करेगा।

भारत–न्यूज़ीलैंड वित्तीय सेवाएं परिशिष्ट, सामान्य GATS प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़ते हुए, कुल 18 अनुच्छेदों तक विस्तारित है। इसके प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं:

इलेक्ट्रॉनिक भुगतान और रियल-टाइम लेन-देन अवसंरचना:

भारत और न्यूज़ीलैंड ने घरेलू भुगतान अंतर्संचालनीयता विकसित करने तथा एकीकृत फास्ट पेमेंट सिस्टम (FPS) के माध्यम से रियल-टाइम सीमा-पार रेमिटेंस और व्यापारी भुगतान को समर्थन देने पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता जताई है। यह प्रावधान भारत के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम और फिनटेक क्षेत्र को सशक्त करेगा, भारतीय प्रवासी समुदाय से रेमिटेंस प्रवाह को बढ़ाएगा, भारतीय भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए बाजार के अवसर पैदा करेगा और UPI व NPCI जैसी भारत की डिजिटल भुगतान प्रणालियों की तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ उठाएगा।

वित्तीय प्रौद्योगिकी और नियामक नवाचार:

दोनों देशों ने वित्तीय सेवाओं में नवाचार के लिए सहयोग को मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की है। समझौते में एक-दूसरे के रेगुलेटरी सैंडबॉक्स और डिजिटल सैंडबॉक्स फ्रेमवर्क से सीखने के प्रावधान शामिल हैं, जिनका सीमा-पार अनुप्रयोग संभव होगा। इससे भारत को द्विपक्षीय साझेदारी में एक फिनटेक हब के रूप में स्थापित करने में मदद मिलेगी तथा भारतीय फिनटेक कंपनियों के लिए सहयोग के नए अवसर सृजित होंगे।

वित्तीय सूचना का हस्तांतरण और संरक्षण:

भारत और न्यूज़ीलैंड ने वित्तीय सूचना के हस्तांतरण, प्रसंस्करण और भंडारण से संबंधित प्रत्येक पक्ष के विधायी और नियामक अधिकारों को मान्यता दी है। साथ ही, डेटा संप्रभुता और उपभोक्ता गोपनीयता की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सीमा-पार डिजिटल संचालन को सुगम बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

क्रेडिट रेटिंग और गैर-भेदभाव:

इस प्रावधान के तहत भारतीय वित्तीय संस्थानों को न्यूज़ीलैंड के बाजार में मनमाने या भेदभावपूर्ण क्रेडिट आकलन से सुरक्षा मिलेगी। इससे भारतीय बैंकों, बीमा कंपनियों और अन्य वित्तीय सेवा प्रदाताओं के लिए बाजार पहुंच सुगम होगी और उनके संचालन पर किसी प्रकार के भेदभावपूर्ण नियामक प्रतिबंध से बचाव होगा।

बैक-ऑफिस और सहायक सेवाएं:

वित्तीय सेवाओं परिशिष्ट के अंतर्गत दोनों देशों ने बैक-ऑफिस और वित्तीय सेवाओं से जुड़ी सहायक गतिविधियों को समर्थन देने पर सहमति जताई है। यह भारत की विश्वस्तरीय आईटी और बिजनेस प्रोसेस सर्विस क्षमताओं का लाभ उठाएगा तथा लागत-कुशल वित्तीय सेवा वितरण को सक्षम बनाएगा, साथ ही भारत के वित्तीय सेवाओं, आईटी और बीपीओ क्षेत्रों की वृद्धि को समर्थन देगा।

एफडीआई सीमा और बैंक शाखाएं:

विशिष्ट प्रतिबद्धताओं की अनुसूचियां बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में बाजार पहुंच और राष्ट्रीय उपचार पर प्रगतिशील सहयोग को दर्शाती हैं। भारत ने बैंकिंग और बीमा में एफडीआई सीमा बढ़ाने तथा चार वर्षों की अवधि में 15 बैंक शाखाएं स्थापित करने की अनुमति देने वाला उदार बैंक शाखा लाइसेंसिंग ढांचा प्रस्तावित किया है, जो GATS के तहत पहले प्रस्तावित 12 शाखाओं की सीमा से अधिक है। इससे भारतीय वित्तीय सेवा प्रदाताओं को न्यूज़ीलैंड में अपने संचालन का विस्तार करने में मदद मिलेगी और वित्तीय सेवाओं के निर्यात में भारत की स्थिति मजबूत होगी।

कुल मिलाकर, भारत–न्यूज़ीलैंड वित्तीय सेवाएं परिशिष्ट पर वार्ताओं का सफल समापन दोनों सरकारों की आर्थिक संबंधों को गहरा करने और तेजी से विकसित हो रहे वित्तीय सेवा परिदृश्य में पारस्परिक अवसरों का लाभ उठाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह समझौता दूरदर्शी, संतुलित और बेहतर बाजार पहुंच, नियामक स्पष्टता तथा सहयोगी ढांचे प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, जिससे दोनों देशों के वित्तीय संस्थानों और सेवा प्रदाताओं को लाभ होगा।

वर्तमान में, भारतीय बैंक—बैंक ऑफ बड़ौदा और बैंक ऑफ इंडिया—न्यूज़ीलैंड में चार शाखाओं के साथ सहायक संचालन कर रहे हैं, जबकि न्यूज़ीलैंड की कोई भी बैंकिंग या बीमा इकाई भारत में मौजूद नहीं है और न ही कोई भारतीय बीमा कंपनी न्यूज़ीलैंड में स्थापित है। यह एफटीए स्पष्ट बाजार पहुंच प्रतिबद्धताओं, नियामक पारदर्शिता और द्विपक्षीय सहयोग ढांचे के माध्यम से द्विपक्षीय निवेश, संस्थागत उपस्थिति और सेवाओं के विस्तार को प्रोत्साहित करेगा तथा दोनों देशों के वित्तीय सेवा बाजारों के बीच संबंधों को नई गति देगा।

स्कूलिंग में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार की पहल

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भारत सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में जीवन और शिक्षा की सुविधा (Ease of Living & Schooling) को बढ़ावा देने के लिए कई विधायी, नीति और संस्थागत सुधारों की पहल की है।

एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में, विद्यालय शिक्षा और साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) और अन्य संबंधित हितधारकों को पत्र लिखकर यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को स्कूलों में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसका उद्देश्य स्कूल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाना, विशेषकर स्कूलों में वित्तीय लेन-देन से संबंधित कार्यों को सरल और पारदर्शी बनाना है।

UPI, मोबाइल वॉलेट और नेट बैंकिंग जैसी डिजिटल भुगतान प्रणालियों की व्यापक और बढ़ती पहुँच का लाभ उठाते हुए, विभाग ने सभी राज्यों, UTs और मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त निकायों जैसे NCERT, CBSE, KVS, NVS को यह सुझाव दिया है कि वे स्कूलों में प्रवेश और परीक्षा शुल्क की डिजिटल माध्यम से वसूली के लिए सुरक्षित और पारदर्शी तरीके अपनाएँ।

पत्र में कहा गया है कि नकद-आधारित भुगतान से डिजिटल भुगतान में संक्रमण करने के कई फायदे हैं। यह अभिभावकों और छात्रों के लिए सुविधाजनक, पारदर्शी और घर से भुगतान करने योग्य विकल्प उपलब्ध कराता है, जिससे उन्हें स्कूल आने की आवश्यकता नहीं होती।

विभाग ने राज्यों और UTs को इसी दिशा में कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया है और कहा कि स्कूलों में डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ना सरकारी डिजिटल परिवर्तन के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप एक महत्वपूर्ण कदम होगा। इससे सभी हितधारकों की वित्तीय साक्षरता बढ़ेगी और डिजिटल लेन-देन की दुनिया खुल जाएगी।

यह पहल विकसित भारत 2047 के विज़न को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान देगी — एक डिजिटल रूप से सशक्त, समावेशी और नागरिक-केंद्रित शिक्षा प्रणाली की दिशा में।


15 नवंबर से FASTag नहीं होने पर कैश में दोगुना, UPI से केवल 1.25 गुना टोल शुल्क देना होगा

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राष्ट्रीय राजमार्गों पर नकद लेन-देन समाप्त करने और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने नियमों में संशोधन किया

डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने और राष्ट्रीय राजमार्गों पर उपयोग शुल्क प्लाज़ा (टोल प्लाज़ा) पर नकद लेन-देन को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दर निर्धारण और वसूली) नियम, 2008 में संशोधन किया है।

नए नियम के तहत, यदि कोई वाहन बिना वैध और कार्यशील FASTag के शुल्क प्लाज़ा में प्रवेश करता है तो नकद भुगतान करने पर उससे संबंधित वाहन श्रेणी के लिए लागू उपयोग शुल्क का दोगुना शुल्क लिया जाएगा।

हालाँकि, यदि वही उपयोगकर्ता शुल्क का भुगतान यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के माध्यम से करता है, तो उससे संबंधित वाहन श्रेणी के लागू शुल्क का केवल 1.25 गुना शुल्क लिया जाएगा।

उदाहरण:

  • यदि किसी वाहन के लिए वैध FASTag के माध्यम से ₹100 का उपयोग शुल्क निर्धारित है,

  • तो नकद भुगतान करने पर शुल्क ₹200 होगा,

  • जबकि UPI से भुगतान करने पर शुल्क केवल ₹125 होगा।

यह संशोधन शुल्क वसूली प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाने, टोल वसूली में पारदर्शिता बढ़ाने और राष्ट्रीय राजमार्ग उपयोगकर्ताओं के लिए आवागमन को आसान बनाने के उद्देश्य से किया गया है। यह अधिसूचना 15 नवंबर, 2025 से प्रभावी होगी।

राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दर निर्धारण और वसूली) नियम, 2008 में किया गया यह नवीनतम संशोधन सरकार की इस प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि वह टोल वसूली को अधिक कुशल बनाने और टोल प्लाज़ा पर भीड़भाड़ को कम करने के लिए तकनीक का अधिकतम उपयोग करेगी। संशोधित नियम डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करेंगे, टोल संचालन में पारदर्शिता बढ़ाएँगे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर उपयोगकर्ताओं के समग्र अनुभव में सुधार करेंगे।


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