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डॉ. जितेंद्र सिंह ने विज्ञान मंत्रालयों की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय पर दिया जोर

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मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज भारत सरकार के विज्ञान मंत्रालयों एवं विभागों के सचिवों तथा वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तेजी से पूरा करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों के बीच निर्बाध समन्वय पर बल दिया।

10 से 19 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाले राष्ट्रव्यापी तटीय स्वच्छता अभियान 'स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर' की तैयारियों की समीक्षा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अधिकतम राष्ट्रीय प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों को तकनीकी नवाचार, जनभागीदारी और अंतर-विभागीय सहयोग के साथ मिलकर कार्य करना होगा।

नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर- विज्ञान केंद्र में आयोजित इस बैठक में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी सहित संबंधित वैज्ञानिक विभागों एवं संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

पिछली समन्वय बैठक में लिए गए निर्णयों पर की गई कार्रवाई की समीक्षा करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक विभागों को अलग-अलग संस्थानों के रूप में नहीं, बल्कि एकीकृत वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंत्रालयों के बीच नियमित संवाद, ज्ञान का आदान-प्रदान, संयुक्त पहल और समन्वित कार्यान्वयन से नवाचार को गति मिलेगी, सुशासन मजबूत होगा तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचेगा।

बैठक का प्रमुख विषय 10 से 19 सितंबर 2026 तक देशभर के समुद्री तटों पर आयोजित होने वाला 'स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर' अभियान रहा। मंत्री ने इस राष्ट्रव्यापी पहल की जनजागरूकता रणनीति एवं तैयारियों की समीक्षा की। इस अभियान का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को जनजागरूकता एवं सामुदायिक भागीदारी के साथ जोड़ना है। इस अभियान में वैज्ञानिक संस्थान, सरकारी एजेंसियां, स्वयंसेवी संगठन, शैक्षणिक संस्थान तथा स्थानीय समुदाय व्यापक स्तर पर भागीदारी करेंगे।

बैठक में विभिन्न विज्ञान मंत्रालयों की संचार रणनीति की भी समीक्षा की गई, ताकि पिछले 12 वर्षों, विशेषकर वर्तमान सरकार के पिछले दो वर्षों की वैज्ञानिक उपलब्धियों को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सके। विभागों ने वीडियो, वृत्तचित्र, विषयगत अभियान, इन्फोग्राफिक्स, सफलता की कहानियों तथा जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से डिजिटल पहुंच को मजबूत करने की योजनाएं प्रस्तुत कीं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ), राष्ट्रीय क्वांटम मिशन, राष्ट्रीय अंतर्विषयक साइबर-भौतिक प्रणाली मिशन, अनुसंधान विकास एवं नवाचार योजना सहित विभिन्न प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार की रणनीति प्रस्तुत की। जनभागीदारी बनाए रखने और वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए चरणबद्ध प्रसार योजना तैयार की गई है।

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) ने जानकारी दी कि सीएसआईआर अपने स्थापना दिवस के अवसर पर पिछले 12 वर्षों की प्रमुख उपलब्धियों पर आधारित एक व्यापक प्रकाशन जारी करने की तैयारी कर रहा है। डिजिटल माध्यमों पर सफलता की कहानियों का नियमित प्रसार तथा "इनोवेशन इन एक्शन" व्याख्यान श्रृंखला के माध्यम से वैज्ञानिक संस्थानों के बीच संवाद को और सुदृढ़ किया जाएगा।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने बताया कि उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव-अर्थव्यवस्था, जीनोमिक्स, कृषि जैव प्रौद्योगिकी, अनुसंधान अवसंरचना, जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप तथा सतत विकास में अपने योगदान को प्रदर्शित करने वाली विषयगत प्रकाशनों की श्रृंखला शुरू की है। विभाग #DBTQuest जनसहभागिता अभियान के माध्यम से ज्ञान-आधारित गतिविधियों द्वारा वैज्ञानिक जागरूकता बढ़ा रहा है तथा समन्वित सोशल मीडिया पहलों के जरिए जनसंपर्क का विस्तार कर रहा है।

बैठक में विज्ञान विभागों के बीच अंतर-मंत्रालयी सहयोग को मजबूत करने के प्रयासों की भी समीक्षा की गई। सीएसआईआर, इसरो, डीएसटी, डीबीटी, बार्क तथा अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के संयुक्त कार्यक्रमों, प्रौद्योगिकी विकास साझेदारियों, जैव-चिकित्सा अनुसंधान, नवाचार मंचों तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के लिए समन्वित कार्यक्रमों की प्रगति पर चर्चा हुई। विभागों ने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं एवं शैक्षणिक संस्थानों के बीच नियमित संवाद तंत्र को मजबूत करने के प्रयासों की जानकारी भी दी।

बैठक में अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) के अंतर्गत हुई प्रगति की भी समीक्षा की गई। इसमें SARAL_AI मंच के व्यापक उपयोग, विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं की अधिक भागीदारी तथा अनुसंधान परियोजनाओं से संबंधित जानकारी को डिजिटल माध्यमों से आम जनता तक पहुंचाने के उपायों पर चर्चा हुई।

इसके अतिरिक्त ESTIC-2026, इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF)-2026, राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस-2026 तथा अन्य प्रमुख राष्ट्रीय वैज्ञानिक आयोजनों की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। विभागों ने इन कार्यक्रमों में शोधकर्ताओं, उद्योगों, स्टार्टअप, विद्यार्थियों तथा आम नागरिकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत तैयारियों एवं जनसंपर्क योजनाओं की जानकारी दी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र अब ऐसे नए चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां अनुसंधान उत्कृष्टता, तकनीकी नवाचार, संस्थागत समन्वय और जनसहभागिता को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक विभागों के बीच बढ़ता सहयोग विज्ञान को अधिक सुलभ, अधिक प्रभावी तथा देश की विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

बैठक के दौरान मंत्री ने प्रशासनिक कार्य निष्पादन, संस्थागत समन्वय तथा विज्ञान प्रशासकों की क्षमता निर्माण से जुड़े विषयों की भी समीक्षा की और विभागों से श्रेष्ठ कार्य प्रणालियों को साझा करते हुए वैज्ञानिक तंत्र में सहयोगात्मक सुशासन को और मजबूत करने का आह्वान किया।

टीडीबी ने एयरोस्पेस, रक्षा और ईवी चार्जिंग कनेक्टरों के स्वदेशी व्यावसायीकरण हेतु टीआईईए कनेक्टर्स को दिया समर्थन

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भारत को उन्नत विनिर्माण और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने बेंगलुरु स्थित TIEA Connectors Pvt. Ltd. को “एयरोस्पेस, रक्षा एवं इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए एयरबोर्न कनेक्टर्स और चार्जिंग कनेक्टर्स के व्यावसायीकरण” परियोजना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है।

इस परियोजना का उद्देश्य एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे रणनीतिक एवं उभरते क्षेत्रों के लिए उच्च-विश्वसनीयता (High-Reliability) वाले विद्युत इंटरकनेक्ट सिस्टम के डिजाइन और निर्माण में भारत की स्वदेशी क्षमताओं को सुदृढ़ करना है।

विद्युत कनेक्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक एवं इलेक्ट्रोमैकेनिकल प्रणालियों के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं, जो कठिन परिचालन परिस्थितियों में भी ऊर्जा, सिग्नल और डेटा के निर्बाध संचार को सुनिश्चित करते हैं। एयरोस्पेस, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में इनकी विश्वसनीयता और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इन्हें अत्यधिक कंपन, झटकों, तापमान और पर्यावरणीय दबावों के बीच कार्य करना पड़ता है।

टीआईईए द्वारा विकसित तकनीक उन्नत कंपन-प्रतिरोधी (Vibration-Resistant) संपर्क संरचना पर आधारित है, जो अत्यधिक गतिशील परिस्थितियों में भी स्थिर विद्युत प्रदर्शन सुनिश्चित करती है। इसमें एक स्वामित्वयुक्त (Proprietary) मल्टी-पॉइंट इलास्टिक कॉन्टैक्ट मैकेनिज्म का उपयोग किया गया है, जो संपर्क स्थिरता बढ़ाने, विद्युत प्रतिरोध कम करने और तीव्र कंपन के दौरान भी सिग्नल बाधित होने से रोकने में सक्षम है।

यह तकनीक 100G तक के कंपन स्तर पर भी विश्वसनीय विद्युत संपर्क बनाए रखने में सक्षम है, जिससे यह मिशन-क्रिटिकल एयरोस्पेस, रक्षा और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त बनती है। इन कनेक्टरों का निर्माण उच्च-प्रदर्शन बेरीलियम कॉपर (BeCu) मिश्रधातु से किया जाता है और इनमें विशेष लॉकिंग मैकेनिज्म लगाए गए हैं ताकि कठोर परिस्थितियों में भी सुरक्षित एवं स्थायी विद्युत संपर्क बना रहे।

रणनीतिक उपयोगों के लिए इन कनेक्टरों पर चांदी और सोने की प्लेटिंग भी की जाती है, जिससे बेहतर चालकता, जंग-प्रतिरोध और दीर्घकालिक विश्वसनीयता सुनिश्चित होती है।

यह परियोजना भारत सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल और रक्षा, एयरोस्पेस तथा उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के स्वदेशीकरण के लक्ष्य के अनुरूप है। कंपनी ने उत्पाद डिजाइन, इंजीनियरिंग, टूलिंग, प्रोटोटाइपिंग, परीक्षण और विनिर्माण तक की संपूर्ण क्षमताएं देश में विकसित की हैं, जिससे आयातित तकनीकों पर निर्भरता कम होगी।

यह तकनीक भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्षेत्र की आवश्यकताओं को भी पूरा करेगी और मजबूत एवं विश्वसनीय चार्जिंग कनेक्टर समाधान उपलब्ध कराएगी। इससे घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी, तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा और उच्च-मूल्य इलेक्ट्रॉनिक घटकों के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित होगी।

इस अवसर पर टीडीबी के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में भारत की बढ़ती क्षमताओं के लिए स्वदेशी उच्च-प्रदर्शन घटकों का विकास अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि टीडीबी रणनीतिक और उच्च-विकास वाले क्षेत्रों के लिए वैश्विक स्तर की तकनीक विकसित करने वाले भारतीय उद्यमों को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है।

टीआईईए कनेक्टर्स के प्रवर्तकों ने टीडीबी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे कंपनी को अपनी स्वदेशी कनेक्टर तकनीकों के व्यावसायीकरण में तेजी लाने और एयरोस्पेस, रक्षा, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रिक वाहन तथा औद्योगिक बाजारों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विनिर्माण क्षमता का विस्तार करने में सहायता मिलेगी।


भारत में स्वदेशी टाइप-IV CNG कंपोजिट सिलेंडर निर्माण सुविधा स्थापित करने हेतु TDB और NTF Energy Solutions के बीच समझौता

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भारत सरकार के स्वच्छ ऊर्जा गतिशीलता को बढ़ावा देने, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने तथा आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशी विनिर्माण को सशक्त करने के दृष्टिकोण के अनुरूप, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने दिल्ली स्थित M/s NTF Energy Solutions Private Limited के साथ “टाइप-IV CNG सिलेंडर के व्यावसायीकरण हेतु विनिर्माण सुविधा की स्थापना” नामक परियोजना के लिए एक समझौता किया है।

इस परियोजना का उद्देश्य उन्नत विनिर्माण सुविधा स्थापित करना है, जिसके माध्यम से अत्याधुनिक फिलामेंट वाइंडिंग, ब्लो मोल्डिंग और उच्च-दबाव परीक्षण तकनीकों का उपयोग कर स्वदेशी रूप से विकसित टाइप-IV कंपोजिट CNG सिलेंडरों का उत्पादन और व्यावसायीकरण किया जाएगा। यह पहल स्वच्छ परिवहन और उभरते ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिए उन्नत गैस भंडारण प्रणालियों में भारत की घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

टाइप-IV कंपोजिट सिलेंडर पारंपरिक इस्पात सिलेंडरों का अगली पीढ़ी का विकल्प हैं, जो लगभग 75% तक वजन में कमी प्रदान करते हैं, जिससे वाहन की दक्षता बढ़ती है और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है। इन सिलेंडरों में जंग-रोधी पॉलिमर लाइनर, अनुकूलित CFRP ले-अप और उन्नत मैकेनिकल लॉकिंग सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो सुरक्षा, टिकाऊपन तथा रिसाव, कंपन और दबाव चक्रों के प्रति प्रतिरोध को बढ़ाते हैं। इनका डिज़ाइन 600 बार से अधिक बर्स्ट प्रेशर प्राप्त करता है, जो नियामक मानकों से काफी अधिक है और संचालन सुरक्षा को मजबूत बनाता है।

यह तकनीक NTF Energy Solutions Pvt. Ltd. द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित की गई है और इसे भारत के तेजी से बढ़ते CNG मोबिलिटी इकोसिस्टम को समर्थन देने के लिए डिजाइन किया गया है। यह परियोजना सरकार के स्वच्छ परिवहन, स्वच्छ ईंधन और उन्नत मोबिलिटी घटकों के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है।

प्रस्तावित सुविधा स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल और उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं का उपयोग कर उच्च-दबाव कंपोजिट सिलेंडरों के लिए एक लागत-प्रतिस्पर्धी और भविष्य-उन्मुख उत्पादन प्रणाली विकसित करेगी। यह परियोजना आयात प्रतिस्थापन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और देश में एक मजबूत स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगी।

इस अवसर पर TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा, “उन्नत टाइप-IV कंपोजिट सिलेंडरों का विकास और व्यावसायीकरण भारत के स्वच्छ गतिशीलता ढांचे और स्वदेशी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। NTF Energy Solutions को TDB का समर्थन सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत वह सतत परिवहन, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत में योगदान देने वाली अगली पीढ़ी की तकनीकों को सक्षम बना रही है।”

NTF Energy Solutions Pvt. Ltd. के प्रबंध निदेशक नवीन जैन और निदेशक नमन जैन ने TDB के समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि यह सहायता स्वदेशी हल्के कंपोजिट सिलेंडर तकनीकों के व्यावसायीकरण को तेज करेगी, जिससे कंपनी भारत के स्वच्छ और अधिक दक्ष गतिशीलता समाधान की दिशा में संक्रमण में योगदान दे सकेगी।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने DTU में i-TBI का निरीक्षण किया; विश्वविद्यालयों में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने पर जोर

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने देशभर में 15 समावेशी टेक्नोलॉजी बिजनेस इनक्यूबेटर (i-TBI) स्थापित किए हैं, जो नवाचार और उद्यमिता को महानगरों के बाहर भी लोकतांत्रिक बनाने के उद्देश्य से विभिन्न विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यरत हैं।

यह जानकारी आज केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान, और प्रधानमंत्री कार्यालय, कर्मियों, लोक शिकायतें, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष मंत्रालय के मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय (DTU) का दौरा करते हुए दी। दौरे का उद्देश्य DST समर्थित i-TBI की कार्यप्रणाली और प्रभाव का अवलोकन करना था, जिसे राष्ट्रीय नवाचार विकास और उपयोग (NIDHI) कार्यक्रम के तहत स्थापित किया गया है।

दौरे के दौरान, मंत्री ने DTU i-TBI सुविधा का निरीक्षण किया और यह आंका कि यह इनक्यूबेटर नवाचार, शोध और स्टार्टअप विकास के लिए किस हद तक उपयोग में लाया जा रहा है। शिक्षक, छात्र नवप्रवर्तनकर्ता और स्टार्टअप संस्थापकों से बातचीत करते हुए डॉ. जितेन्द्र सिंह ने विश्वविद्यालय की सराहना की कि उन्होंने DST के सहयोग का प्रभावी उपयोग करते हुए एक जीवंत स्टार्टअप इकोसिस्टम का निर्माण किया है।

मंत्री ने बताया कि DST ने देशभर में 15 i-TBI स्थापित किए हैं, जिनमें से एक DTU में है। यह इनक्यूबेटर विशेष रूप से समावेशिता और महिला-उद्यमिता पर ध्यान केंद्रित करते हुए शैक्षणिक विचारों को बाजार-तैयार समाधान में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने प्रसन्नता व्यक्त की कि DTU i-TBI ने अब तक 15 स्टार्टअप्स को इनक्यूबेट किया है, जो विश्वविद्यालय पारिस्थितिकी तंत्र में बढ़ती उद्यमशीलता क्षमता को दर्शाता है। इस अवसर पर, तीन स्टार्टअप्स को DST-NIDHI फ्रेमवर्क के तहत प्रत्येक को 5 लाख रुपये का स्टार्टअप इग्निशन ग्रांट प्रदान किया गया, जिससे वे अपने विचार को प्रोटोटाइप और प्रारंभिक व्यावसायीकरण तक ले जा सकें। उन्होंने कहा कि ये ग्रांट प्रेरक (catalytic) हैं और युवाओं में जोखिम लेने और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

बड़े नीति दृष्टिकोण पर जोर देते हुए, मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, पिछले दशक में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को अभूतपूर्व प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि तकनीक निर्माता के रूप में उभर रहा है, जिसमें शोध अवसंरचना, शैक्षणिक उत्कृष्टता, इनक्यूबेशन, स्टार्टअप और उद्योग सहयोग सहित पूरे नवाचार चक्र का संरचित समर्थन शामिल है।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने विश्वविद्यालयों को केवल पारंपरिक शिक्षण और शोध तक सीमित रहने के बजाय नवाचार और उद्यमिता के हब बनने पर जोर दिया। उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों को उद्योग के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने, निजी निवेश आकर्षित करने और वित्तीय स्रोत विविधीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया, साथ ही FIST, PURSE और NIDHI जैसे सरकारी योजनाओं का उपयोग कर अपने शोध और नवाचार क्षमता को मजबूत करने का आग्रह किया।

राष्ट्रीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का संदर्भ देते हुए, मंत्री ने कहा कि सरकार ने सुनिश्चित किया है कि नवाचार के अवसर छोटे शहरों और आकांक्षी जिलों तक पहुँचें। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता, मेरिट-आधारित चयन और समावेशी पहुंच ने पूरे देश में युवा नवप्रवर्तकों के बीच विश्वास बनाया है, जिससे वैज्ञानिक क्षमता और महत्वाकांक्षा दोनों का लोकतंत्रीकरण हुआ है।

DTU में DST समर्थित i-TBI, DTU इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन फाउंडेशन के अंतर्गत संचालित होता है और ज्ञान-आधारित स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जिसमें विशेष जोर महिला उद्यमियों पर है। इनक्यूबेटर आइडिएशन से लेकर प्रोटोटाइप, उत्पाद विकास और बाजार तक पहुँच तक पूर्ण सहायता प्रदान करता है, आधुनिक अवसंरचना, मेंटरिंग और वित्तीय सहायता के माध्यम से।

दौरे के समापन पर, डॉ. जितेन्द्र सिंह ने विश्वविद्यालय-आधारित नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई और यह आश्वासन दिया कि वे ऐसी संस्थाओं का समर्थन जारी रखेंगे जो सार्वजनिक निधियों का प्रभावी उपयोग कर शोध, स्टार्टअप और सामाजिक प्रभाव में ठोस परिणाम उत्पन्न कर रही हैं।

युवा तारों के प्रारंभिक जीवन की अस्थिरता का नया अध्ययन: बदलाव और अनपेक्षित चमकें उजागर

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एक नए अध्ययन ने युवा तारों (Young Stellar Objects - YSOs) के प्रारंभिक जीवन की अस्थिरता पर पर्दा उठाया है, जिससे पता चला कि तारों का शुरुआती जीवन पहले सोचे गए से कहीं अधिक उथल-पुथल और परिवर्तनशील होता है।

प्रोटोस्ट्रार के चार विकासात्मक चरणों का योजनात्मक चित्रण (एंड्रिया इसेला के 2006 के शोध प्रबंध से अनुकूलित):

  • क्लास 0: ये तारे घने आवरण (dense envelope) में पूरी तरह से ढके होते हैं, और इनके केंद्र में एक छोटा कोर (core) होता है।

  • क्लास I: कोर का आकार बढ़ता रहता है और एक सपाट परिक्रामी डिस्क (flattened circumstellar disk) बनने लगती है।

  • क्लास II: अधिकांश आसपास की सामग्री गैस और धूल की प्रमुख डिस्क में व्यवस्थित हो जाती है।

  • क्लास III: अंतिम चरण में डिस्क लगभग समाप्त हो जाती है, और तारे का स्पेक्ट्रल एनर्जी वितरण (spectral energy distribution) एक परिपक्व तारे (mature stellar photosphere) जैसा दिखता है।

इस अध्ययन में NASA के Wide-field Infrared Survey Explorer (WISE) और इसके विस्तारित मिशन NEOWISE से एक दशक से अधिक का डेटा शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने अब तक के सबसे बड़े और विस्तृत मध्य-इन्फ्रारेड परिवर्तनशीलता कैटलॉग में 22,000 से अधिक YSOs का विश्लेषण किया।

युवा तारों की विशेषताएँ:

  • YSOs वे तारे हैं जो अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में होते हैं और जिनके केंद्र में स्थिर हाइड्रोजन संलयन नहीं होता।

  • ये तारें घने आणविक बादलों (molecular clouds) के संकुचन से बनते हैं।

  • संकुचन विभिन्न घटनाओं जैसे सुपरनोवा विस्फोट, पास के तारे से विकिरण, या अंतर-तारकीय माध्यम में उथल-पुथल से प्रेरित हो सकता है।

    विभिन्न प्रकार के परिवर्तनशील तारों के उदाहरण लाइट कर्व्स (बाएं से दाएं क्रम में) — लीनियर (Linear), वक्र (Curved), आवर्ती/पुनरावृत्त (Periodic), अचानक चमक (Burst), अचानक मंद होना (Drop), और अनियमित (Irregular)

शोध के प्रमुख निष्कर्ष:

  • YSOs के केंद्र में एक प्रोटोटार बनता है, जो चारों ओर घूर्णनशील डिस्क से घिरा होता है।

  • प्रोटोटार का प्रकाश संलयन से नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण संकुचन और द्रव्यमान संचयन (accretion) से उत्पन्न होता है।

  • समय के साथ, डिस्क से सामग्री प्रोटोटार पर जमा होती रहती है, जिससे अचानक चमक बढ़ना या घटने जैसी घटनाएँ होती हैं।

  • युवा तारों की 36% Class I YSOs में परिवर्तनशीलता देखी गई, जबकि विकसित Class III YSOs में यह केवल 22% थी।

  • रंग परिवर्तन से पता चला कि अधिकांश तारों में चमक बढ़ने पर लालिमा बढ़ती है, जबकि कुछ में नीला होना देखा गया, जो आंतरिक डिस्क संरचना या बढ़ी हुई संचयन क्रियाओं को दर्शाता है।

महत्त्व:

यह कैटलॉग अब तक का सबसे पूर्ण मध्य-इन्फ्रारेड दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो यह समझने में मदद करता है कि तारे कैसे बढ़ते हैं, भोजन लेते हैं और अपने धूल भरे परिवेश को छोड़ते हैं। इस कैटलॉग में 5,800 से अधिक परिवर्तनशील YSOs शामिल हैं।

जैसे-जैसे James Webb Space Telescope (JWST) और 3.6m Devasthal Optical Telescope (DOT) जैसी दूरबीनें इस अध्ययन का अनुसरण करेंगी, शोधकर्ता यह समझ पाएंगे कि हमारे जैसे सूर्य जैसे तारे अंधकार से कैसे उत्पन्न हुए।


शहरी जल वितरण में डिजिटल क्रांति: भारत-इज़राइल साझेदारी से विकसित होगा AI आधारित अनुकूली डिजिटल ट्विन फ्रेमवर्क

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प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने पुणे स्थित एम/एस कपिह डीप टेक प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक समझौता किया है। यह समझौता “शहरी जल वितरण प्रणालियों के लिए अनुकूली डिजिटल ट्विन फ्रेमवर्क: भारतीय अवसंरचना हेतु एक संकल्पनात्मक कार्यान्वयन रणनीति” नामक परियोजना के लिए किया गया है।

इस पहल के तहत, TDB कुल परियोजना लागत ₹5.82 करोड़ में से ₹4.07 करोड़ की सशर्त अनुदान सहायता प्रदान करेगा। यह परियोजना भारत-इज़राइल औद्योगिक अनुसंधान एवं तकनीकी नवाचार कोष (I4F) कॉल फॉर प्रपोज़ल के अंतर्गत, इज़राइली साझेदार एम/एस रियाली टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के सहयोग से समर्थित है।

इस परियोजना का फोकस एक AI-आधारित अनुकूली डिजिटल ट्विन फ्रेमवर्क विकसित करना है, जो शहरी जल वितरण प्रणालियों के प्रदर्शन को वास्तविक समय में सिमुलेट, मॉनिटर और प्रेडिक्ट कर सके। इस समाधान में RealiteQ क्लाउड-आधारित SCADA प्लेटफॉर्म को उन्नत एनालिटिक्स के साथ एकीकृत किया गया है, ताकि भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप एक स्केलेबल और किफायती उपकरण विकसित किया जा सके।

डिजिटल ट्विन समाधान के कार्यान्वयन में जोखिम निवारण रणनीतियों को शामिल करके, यह परियोजना भारत के जल क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों को हल करने का प्रयास करेगी, जैसे कि:

  • पुराना और दबावग्रस्त बुनियादी ढांचा

  • नॉन-रेवेन्यू वॉटर (NRW) की उच्च हानियाँ

  • खंडित और सीमित मॉनिटरिंग सिस्टम

  • शहरी आपूर्ति श्रृंखलाओं में संसाधनों की अक्षमताएँ

इसकी व्यापक उपयोगिता सुनिश्चित करने के लिए, परियोजना के तहत कई पायलट परिनियोजन किए जाएंगे। इसके माध्यम से यह प्रदर्शित किया जाएगा कि भारतीय शहर किस प्रकार धीरे-धीरे AI-सक्षम मॉनिटरिंग और नियंत्रण प्रणालियाँ अपना सकते हैं। यह चरणबद्ध दृष्टिकोण शुरुआती लागत को कम करने और पुरानी अवसंरचना के साथ एकीकरण को आसान बनाने की उम्मीद है।

समझौते पर बोलते हुए, टीडीबी के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा:

“भारत की शहरी जल प्रणालियाँ गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं, जिनके लिए नवाचारपूर्ण और प्रौद्योगिकी-आधारित समाधानों की आवश्यकता है। अनुकूली डिजिटल ट्विन फ्रेमवर्क के विकास का समर्थन करके, TDB ऐसे स्केलेबल और व्यावहारिक उपकरण उपलब्ध करा रहा है, जो दक्षता बढ़ा सकते हैं, अपव्यय घटा सकते हैं और शहरी अवसंरचना को अधिक लचीला बना सकते हैं।”

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