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वंदे मातरम् की गौरव गाथा का स्मरण हर भारतीय के लिए गर्व का विषय – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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रायपुर- राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में आयोजित विशेष चर्चा में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  वंदेमातरम के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वंदे मातरम्  देशप्रेम का वह जज्बा था जिसकी गूंज से ब्रिटिश हुकूमत तक कांप उठती थी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह उद्घोष करोड़ों भारतीयों के हृदय में साहस, त्याग और बलिदान की अग्नि प्रज्वलित करता रहा। उन्होंने कहा कि यह वही स्वर था जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की शक्ति प्रदान की।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानियों को स्मरण करते हुए कहा कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, खुदीराम बोस सहित असंख्य क्रांतिकारी वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए मां भारती के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए। उनका बलिदान आज भी हर भारतीय को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि वंदे मातरम् की गौरव गाथा का स्मरण करना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह गीत हमें उस संघर्ष, उस पीड़ा और उस अदम्य साहस की याद दिलाता है, जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाई। यह हमारी राष्ट्रीय चेतना का आधार स्तंभ है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं होती, जो मानचित्र पर अंकित होती हैं। किसी राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसकी सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं और उन मूल्यों से होती है, जो सदियों से उसके आचार-विचार और जीवन पद्धति का हिस्सा रहे हैं। भारत की यह सांस्कृतिक निरंतरता विश्व में अद्वितीय है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा में वंदे मातरम् पर विशेष चर्चा आयोजित करने का उद्देश्य यह भी है कि हम इतिहास की उन गलतियों को कभी न भूलें, जिन्होंने देश को गहरे घाव दिए, जिनकी पीड़ा आज भी हमारे समाज में कहीं-न-कहीं महसूस की जाती है। इतिहास से सीख लेकर ही हम एक सशक्त और समरस भारत का निर्माण कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री साय ने इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के उन सभी वीर सपूतों को नमन किया, जिन्होंने वंदे मातरम् के भाव को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर भारत माता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् हमें हमारी विरासत, हमारी सांस्कृतिक चेतना और हजारों वर्षों की सभ्यता से जोड़ता है। यह उन आदर्शों की सामूहिक अभिव्यक्ति है, जिन्हें हमने युगों-युगों में आत्मसात किया है।

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धरती को माता के रूप में पूजने की भावना रही है, जिसे हम मातृभूमि कहते हैं। वंदे मातरम् इसी भाव का सशक्त और पवित्र स्वरूप है, जो हमें प्रकृति, भूमि और राष्ट्र के प्रति सम्मान और कर्तव्यबोध सिखाता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस विशेष चर्चा के आयोजन के लिए विधानसभा अध्यक्ष तथा सभी  सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे विमर्श नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रेश्वर शिवयोगी महास्वामी जी की 1066वीं जयंती समारोह का किया उद्घाटन

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (16 दिसंबर, 2025) कर्नाटक के मांड्या जिले के मालवल्ली में आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रेश्वर शिवयोगी महास्वामी जी की 1066वीं जयंती समारोह का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि युगों-युगों से संतों ने अपनी ज्ञानवाणी और करुणा के माध्यम से मानवता को आलोकित किया है। उनके जीवन हमें यह स्मरण कराते हैं कि सच्ची महानता सत्ता या धन में नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और आध्यात्मिक शक्ति में निहित है। ऐसे महान संतों में आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रेश्वर शिवयोगी महास्वामी जी प्रकाश और प्रेरणा के एक उज्ज्वल दीप के रूप में विराजमान हैं।

राष्ट्रपति ने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि मठ के मार्गदर्शन और संरक्षण में जेएसएस महाविद्यापीठ शिक्षा और सामाजिक विकास को समर्पित भारत की प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक बनकर उभरी है। उन्होंने कहा कि विश्वभर में फैले इसके अनेक संस्थान युवाओं के निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उत्थान, संस्कृति संरक्षण और समावेशी समाज की नींव मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि तीव्र परिवर्तन और अनिश्चितताओं के इस युग में सामाजिक समरसता, नैतिक नेतृत्व, युवा सशक्तिकरण और आंतरिक दृढ़ता के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए हमें तकनीक की शक्ति के साथ-साथ मूल्यों की मजबूती भी चाहिए। एक विकसित भारत के लिए आधुनिक शिक्षा और नैतिक ज्ञान, नवाचार और पर्यावरणीय जिम्मेदारी, आर्थिक वृद्धि और सामाजिक समावेशन, तथा प्रगति और करुणा का समन्वय आवश्यक है। भारत सरकार इसी समग्र दृष्टि के साथ कार्य कर रही है। सुत्तूर मठ जैसी संस्थाएं इस राष्ट्रीय प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारा युवा वर्ग है—उनकी ऊर्जा, रचनात्मकता, मूल्य और चरित्र। भारत का भविष्य केवल उनके कौशल और ज्ञान से ही नहीं, बल्कि उनकी ईमानदारी और उद्देश्यबोध से भी आकार लेगा। उन्होंने सुत्तूर मठ जैसी संस्थाओं से युवाओं को प्रेरित करने, जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण करने और आने वाले भारत के शिल्पकारों का मार्गदर्शन जारी रखने का आग्रह किया।


उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने सम्राट पेरुम्बिदुगु मुथरैयार द्वितीय को समर्पित स्मारक डाक टिकट का विमोचन किया

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भारत के उपराष्ट्रपति,सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में सम्राट पेरुम्बिदुगु मुथरैयार द्वितीय (सुवर्ण मरण) को समर्पित स्मारक डाक टिकट का विमोचन किया।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तमिल संस्कृति और भाषा के प्रति भारत सरकार के निरंतर समर्थन की सराहना की। उन्होंने काशी तमिल संगम और तमिल राजाओं, नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों को मान्यता देने एवं सम्मानित करने के प्रयासों की प्रशंसा की, जिन्हें अतीत में पर्याप्त मान्यता नहीं मिली थी।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि सम्राट पेरुम्बिदुगु मुथरैयार पर स्मारक डाक टिकट का विमोचन इस निरंतर मान्यता प्रक्रिया का हिस्सा है।

सम्राट पेरुम्बिदुगु मुथरैयार के ऐतिहासिक महत्व को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि वे प्राचीन तमिलनाडु के सबसे विख्यात शासकों में से एक थे और मुथरैयार वंश के प्रतिष्ठित शासक थे, जिन्होंने 7वीं से 9वीं शताब्दी ईस्वी के बीच तमिलनाडु के मध्य क्षेत्रों पर शासन किया। उन्होंने बताया कि सम्राट ने लगभग चार दशकों तक तिरुचिरापल्ली से शासन किया और उनका राज्य प्रशासनिक स्थिरता, क्षेत्रीय विस्तार, सांस्कृतिक संरक्षण और सैन्य कौशल के लिए जाना जाता था।

उपराष्ट्रपति ने उल्लेख किया कि तमिलनाडु के विभिन्न स्थानों पर पाए गए शिलालेख सम्राट के मंदिरों के दान, सिंचाई कार्यों और तमिल साहित्य में योगदान का प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि सम्राट का शासन दक्षिण भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है।

प्रधानमंत्री की दृष्टि ‘विकसित भारत @2047’ का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर और महान नेताओं की विरासत का दस्तावेजीकरण, सम्मान और संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है। उन्होंने आज़ादी का अमृत महोत्सव के दौरान सभी क्षेत्रों के स्वतंत्रता सेनानियों और महान शासकों को सम्मानित करने के प्रयासों का उल्लेख किया, जिसमें तमिलनाडु भी शामिल है। उन्होंने बताया कि 2014 से अब तक तमिलनाडु सहित लगभग 642 चोरी हुई मूर्तियाँ और प्राचीन वस्तुएँ वापस प्राप्त की गई हैं।

इस अवसर पर वित्त और कॉर्पोरेट मामले की केंद्रीय मंत्री, निर्मला सीतारमण; राज्यसभा के उपाध्यक्ष, हरिवंश; और सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री, डॉ. एल. मुरुगन सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।


बॉम्बे जिमखाना की 150वीं वर्षगांठ पर डाक विभाग ने जारी किया स्मारक डाक टिकट

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 डाक विभाग ने बॉम्बे जिमखाना की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में स्मारक डाक टिकट जारी किया है, जो इसके खेल उत्कृष्टता की समृद्ध विरासत और राष्ट्र में इसके स्थायी सांस्कृतिक योगदान का जश्न मनाता है।

यह स्मारक डाक टिकट मुंबई के बॉम्बे जिमखाना में केंद्रीय संचार और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया द्वारा जारी किया गया, जिसमें राज्यसभा सदस्य मिलिंद देओरा, बॉम्बे जिमखाना के अध्यक्ष संजीव सारन मेहरा, पोस्टमास्टर जनरल, नवी मुंबई क्षेत्र, सुचिता जोशी, और अन्य गणमान्य व्यक्तियों एवं बॉम्बे जिमखाना के सदस्यों की उपस्थिति रही।

बॉम्बे जिमखाना की 150वीं वर्षगांठ पर स्मारक डाक टिकट का विमोचन

इस अवसर पर बोलते हुए, ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने आशा व्यक्त की कि यह स्मारक डाक टिकट प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में यात्रा करता हुए संदेशवाहक की भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि जैसे खेल में कहानियां और मूल्य छिपे होते हैं, वैसे ही यह टिकट भी युवाओं को खेलों में भाग लेने, सक्रिय रहने और संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका में विश्वास रखने के लिए प्रेरित करेगा।

सिंधिया ने भारत पोस्ट और बॉम्बे जिमखाना क्लब के बीच समानता की ओर इशारा करते हुए कहा कि दोनों संस्थाएं भावनाओं को संप्रेषित करने, लोगों को जोड़ने और पीढ़ियों को जोड़ने के उद्देश्य से स्थापित हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण और अडिग समर्थन के तहत डाक विभाग एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है—यह अपनी पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्परिभाषित कर रहा है, सेवा विस्तार कर रहा है और अगले पांच वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा और सर्वसमावेशी लॉजिस्टिक्स संगठन बनने की दिशा में अग्रसर है।

1875 में स्थापित, बॉम्बे जिमखाना भारत की खेल और सामाजिक विरासत में एक प्रतिष्ठित स्तंभ के रूप में खड़ा है। इसने कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों का पोषण किया और सांस्कृतिक व खेल गतिविधियों का एक जीवंत केंद्र बनकर कार्य किया। डेढ़ शताब्दी के दौरान इस संस्थान ने खेल भावना, सहयोग और सामुदायिक जुड़ाव की भावना को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

स्मारक डाक टिकट का विवरण

इस विशेष डाक टिकट में बॉम्बे जिमखाना के प्रतिष्ठित परिसर और मैदान को खूबसूरती से चित्रित किया गया है, जो इसके स्थायी विरासत और भारत के खेल क्षेत्र में योगदान का प्रतीक है।

इस विशेष अंक के माध्यम से डाक विभाग ने संस्था के 150 वर्षों के सफर को सम्मानित किया और भारत की समृद्ध खेल उपलब्धियों को फिलाटेली (डाक टिकट संग्रहण) के माध्यम से संरक्षित और प्रदर्शित करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।

स्मारक डाक टिकट जनता के लिए फिलाटेलिक ब्यूरो और ऑनलाइन www.epostoffice.gov.in के माध्यम से उपलब्ध होगा।

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का संबोधन

सिंधिया ने इस अवसर पर यह भी कहा कि बॉम्बे जिमखाना न केवल खेलों में उत्कृष्टता का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से युवाओं में प्रेरणा और नेतृत्व कौशल को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने डाक विभाग के इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह स्मारक डाक टिकट भविष्य की पीढ़ियों को इस ऐतिहासिक संस्था की विरासत से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।

वंदे मातरम के 150 वर्ष: राष्ट्रीय उत्सव में देशभक्ति और एकता का भव्य उद्घोष

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वंदे मातरम के 150 वर्ष एक राष्ट्रीय स्मृति-उद्यम है, जिसका उद्देश्य वंदे मातरम की भावना और भारत के इतिहास में इसकी अनूठी भूमिका का उत्सव मनाना है। वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं है; यह भारत की सामूहिक चेतना है और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह देशभक्ति और संघर्ष का उद्घोष बनकर उभरा था।

1 अक्टूबर को मंत्रिमंडल ने ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ का देशव्यापी उत्सव आयोजित करने को मंजूरी दी। इसका उद्देश्य नागरिकों, विशेषकर युवाओं और छात्रों को गीत की मूल क्रांतिकारी भावना से जोड़ना है। इन उत्सवों के माध्यम से इस अमर संदेश को सम्मानित किया जाएगा और सुनिश्चित किया जाएगा कि इसकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के हृदय में सदा जीवित रहे।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम पहली बार उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था, जो बंगाली साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में धारावाहिक रूप में छापा गया था। समय के साथ यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का ब्रह्मनाद बन गया। मातृभूमि को दिव्य स्वरूप में वंदित करने वाला यह गीत प्रकृति और राष्ट्र दोनों को एक सूत्र में पिरोता है, जिसने पीढ़ियों तक भारतीयों को एक भावनात्मक और सांस्कृतिक पहचान दी।

वंदे मातरम के 150 वर्ष—राष्ट्रीय स्मृति समारोह का उद्घाटन

‘150 वर्ष वंदे मातरम’ के स्मारक समारोह का शुभारंभ प्रधानमंत्री द्वारा दिल्ली में एक भव्य राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रमुख कलाकारों, युवा प्रतिनिधियों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम में एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट भी जारी किया गया।


वंदे मातरम कॉन्सर्ट — ‘नाद एकम्, रूपम् अनेकम्’

वंदे मातरम: नाद एकम्, रूपम् अनेकम् एक सांस्कृतिक प्रस्तुति थी जिसमें देशभर के गायक और वादक एकत्र होकर राष्ट्रीय गीत की मनमोहक प्रस्तुति में सहभागी हुए। यह कार्यक्रम भारत की एकता में विविधता की भावना का सुंदर प्रतीक था और संगीत के माध्यम से गर्व, एकता और देशभक्ति का प्रेरक संदेश देता है। यह उस अमर गीत को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि थी, जो हर भारतीय के हृदय में गूँजता है।

वंदे मातरम का सामूहिक गायन

कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण प्रधानमंत्री के नेतृत्व में वंदे मातरम के पूर्ण स्वरूप का ऐतिहासिक सामूहिक गायन था। इसी समय देशभर में मुख्यमंत्री, राज्यपाल, उपराज्यपाल, स्कूली और कॉलेज के छात्र, अधिकारी और नागरिकों ने भी सामूहिक गायन में भाग लिया। यह राष्ट्रगीत की कालातीत ऊर्जा को समर्पित एक अभूतपूर्व आयोजन था जिसने देशभर में एकता और देशभक्ति की भावना का संचार किया।

36 राज्यों और 653 जिलों में वंदे मातरम कार्यक्रम

इस अभियान के अंतर्गत वंदे मातरम पर आधारित कार्यक्रमों को व्यापक जनसमर्थन मिला है। अब तक 39,783 से अधिक आयोजन अभियान वेबसाइट पर अपलोड किए जा चुके हैं।
ये कार्यक्रम 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और 653 जिलों में आयोजित किए गए हैं।

भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय और विभाग भी वंदे मातरम के 150 वर्षों का उत्सव मना रहे हैं। 52 मंत्रालयों ने अपने आयोजन अभियान वेबसाइट पर साझा किए हैं।

विश्वभर में भारतीय मिशनों द्वारा आयोजन

दुनिया के विभिन्न देशों में भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास स्थानीय समुदाय और भारतीय प्रवासी जनसमुदाय के साथ मिलकर सामूहिक वंदे मातरम गायन आयोजित कर रहे हैं।

स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रम

देशभर के स्कूल और कॉलेज भी इस सामूहिक वंदे मातरम आंदोलन से जुड़े हुए हैं।
अब तक:

  • 11,632 स्कूल

  • 554 कॉलेज

वंदे मातरम आधारित कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं।

कई शिक्षण संस्थानों के छात्र और शिक्षकों ने 7 नवंबर 2025 को दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम को सीधे प्रसारण के माध्यम से देखा।

1.25 करोड़ भारतीयों ने रिकॉर्ड किया अपना वंदे मातरम

1.25 करोड़ से अधिक भारतीय अब तक वंदे मातरम का अपना संस्करण रिकॉर्ड कर चुके हैं।

आप भी वंदे मातरम गीत सुनें और अपना संस्करण यहाँ अपलोड करें:


जनजातीय गौरव वर्ष 2025 के तहत देशभर में कार्यक्रम आयोजित

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जनजातीय गौरव वर्ष 2025 के अंतर्गत, आज विभिन्न राज्यों में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए गए। ये आयोजन देशभक्ति, एकता और भारत की जीवंत आदिवासी विरासत को उजागर करने के उद्देश्य से किए गए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस ऐतिहासिक अवसर को चिह्नित करते हुए आदिवासी सशक्तिकरण और सांस्कृतिक गौरव के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई, जो “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के दृष्टिकोण के तहत संचालित है।

माननीय आदिवासी मामलों के मंत्री जूल ओराम के मार्गदर्शन में, आदिवासी मामले मंत्रालय देशभर में कार्यक्रम, जागरूकता अभियान और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, ताकि भगवान बिरसा मुंडा की विरासत और भारत की आदिवासी समुदायों के योगदान को सम्मानित किया जा सके।


राज्यवार कार्यक्रम

ओडिशा:

  • क्विज़ प्रतियोगिता और छात्र सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किए गए।

  • भगवान बिरसा मुंडा की विशेष प्रदर्शनी और आदिवासी कलाकारों की पेंटिंग प्रदर्शनी ओडिशा स्टेट ट्राइबल म्यूज़ियम में आयोजित की गई।

  • छात्रों ने म्यूज़ियम दौरे, क्विज़ प्रतियोगिता और सांस्कृतिक फोटो सत्र में भाग लिया।

आंध्र प्रदेश:

  • ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) ने वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन आयोजित किया, जिससे राष्ट्रीय गर्व और एकता की भावना को बढ़ावा मिला।

तेलंगाना:

  • TRI हैदराबाद ने नेहरू सेंचुरी ट्राइबल म्यूज़ियम में छात्रों के साथ वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन आयोजित किया।

जम्मू और कश्मीर:

  • जनजातीय भोजन उत्सव आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्र की पारंपरिक व्यंजनों और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया गया।

  • कार्यक्रम में Chief Education Officer, Kargil मुख्य अतिथि और Indian Army के Commanding Officer अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

झारखंड:

  • भगवान बिरसा मुंडा की जन्मभूमि में PVTG (विशेष रूप से संवेदनशील आदिवासी समूह) वासस्थान पर जंजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा मनाया गया।

  • स्थानीय आदिवासी समुदायों ने परंपरागत कला, संगीत और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के माध्यम से बिरसा मुंडा की विरासत का सम्मान किया।

  • छात्रों और आदिवासी प्रतिनिधियों ने वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन किया।

बिहार:

  • छात्रों ने निबंध और क्विज़ प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

  • EMRS संस्थानों में वित्तीय और डिजिटल साक्षरता कार्यशालाओं का आयोजन किया गया।

गुजरात:

  • मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने जंजातीय गौरव यात्रा का शुभारंभ किया।

  • यात्रा अंबाजी और उमरगाम से शुरू होकर 7–13 नवंबर 2025 तक एकतानगर (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी) तक जाएगी।

  • यात्रा का उद्देश्य आदिवासी नायकों के योगदान के बारे में जागरूकता फैलाना और उनके अदम्य साहस और विरासत को सम्मानित करना है।

तमिलनाडु:

  • ड्राइंग प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें आदिवासी छात्रों ने रचनात्मक प्रतिभा दिखाई।


सिक्किम:

  • ट्राइबल छात्र खेल प्रतियोगिता और स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया गया, जिसमें EMRS छात्रों ने भाग लिया।

नागालैंड:

  • EMRS स्कूलों में कहानियाँ सुनाना और पारंपरिक पोशाक प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिसमें राज्य के विविध आदिवासी समुदायों की धरोहर और लोक परंपराएँ प्रदर्शित हुई।

निष्कर्ष

जनजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा (1–15 नवंबर 2025) के तहत ये गतिविधियाँ आदिवासी पहचान, संस्कृति और उपलब्धियों का सम्मान दर्शाती हैं।

  • ये पहल समावेशी विकास और भारत की समृद्ध आदिवासी विरासत के संरक्षण के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दोहराती हैं।

जनजातीय स्वतंत्रता विद्रोहों पर बने भव्य स्मारक सह-संग्रहालय जल्द लोगों के लिए होगा समर्पित

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राज्योत्सव पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे देश के पहले डिजीटल संग्रहालय का लोकार्पण

आदिवासियों के 14 विद्रोहों और जंगल सत्याग्रह एवं झंडा सत्याग्रह के दृश्य का जीवंत प्रदर्शन

रायपुर- नवा रायपुर अटल नगर के आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में छत्तीसगढ़ के जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के विद्रोहों पर बन रहे स्मारक सह-संग्रहालय जल्द ही लोगों के लिए समर्पित किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्योत्सव के मौके पर देश के पहले डिजीटल संग्रहालय का लोकार्पण करेंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज निर्माणाधीन संग्रहालय स्थल का निरीक्षण कर लोकार्पण की तैयारियों का जायजा लिया एवं अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

गौरतलब है कि राज्य सरकार इस वर्ष छत्तीसगढ़ निर्माण के 25 वर्ष पूर्ण होने पर रजत जयंती के रूप में मना रहा हैं। नवा रायपुर में बन रहे शहीद वीर नारायण सिंह आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारक सह-संग्रहालय के निर्माण कार्यों का निरीक्षण के दौरान मुख्य मंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि आगंतुकों एवं पर्यटकों के हिसाब से संग्रहालय में आडियो-विडीयो विजुवल की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि आगंतुक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में भंलिभांति परिचित हो सके। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की परिकल्पना का परिणाम है कि जल्द ही छत्तीसगढ़ में जनजातीय वर्गों के ऐतिहासिक गौरव गाथा, शौर्य और बलिदान का प्रतीक स्मारक सह-संग्रहालय धरातल पर दिखाई देगा। यह निर्माणाधीन संग्रहालय सदियों के लिए आने वाली नई पीढ़ियों को पुरखों का याद दिलाता रहेगा। उन्होंने कहा कि यह संग्रहालय न सिर्फ आदिवासी वर्गों के लिए बल्कि सभी वर्गों सहित देश-विदेश के लोगों के लिए भी प्रेरणाप्रद बनेगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि इस जीवंत संग्रहालय के माध्यम से लोगों में बड़ी से बड़ी ताकतों के अन्याय, अत्याचार के खिलाफ विद्रोह करने का साहस पैदा होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि सोच का परिणाम है कि आज प्रदेश का पहला संग्रहालय है जो छत्तीसगढ़ के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शौर्य गाथा एवं बलिदान को समर्पित है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्थल निरीक्षण कर तैयारियों का लिया जायजा

मुख्यमंत्री साय ने आगामी राज्योत्सव के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा प्रस्तावित उद्घाटन के मद्देनजर सभी आवश्यक तैयारियां व निर्माण कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने संग्रहालय में डिजीटलीकरण कार्य, पार्किंग व्यवस्था, सॉवेनियर शॉप, गार्डनिंग, वॉटर सप्लाई की स्थिति की जानकारी ली।

प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को संग्रहालय में निर्माणाधीन 14 गैलरियों सहित झंडा सत्याग्रह, जंगल सत्याग्रह, जनजातीय संस्कृतियों पर बने गैलरियों आदि के संबंध में विस्तार से जानकारी दी।

निरीक्षण के दौरान उनके साथ वन एवं जलवायु परिर्वतन मंत्री केदार कश्यप, मुख्य सचिव विकासशील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध सिंह, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, रायपुर संभाग के कमिश्नर महादेव कावरे, आदिम जाति विकास विभाग के आयुक्त डॉ. सारांश मित्तर, मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव एवं जनसंपर्क विभाग के आयुक्त डॉ रवि मित्तल, कलेक्टर गौरव सिंह, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. लाल उमेद सिंह, टीआरटीआई संचालक हिना अनिमेष नेताम सहित  अन्य विभागीय अधिकारी उपस्थित थे।   

वीएफएक्स टेक्नोलॉजी और प्रोजेक्शन वर्क से तैयार हो रहा है संग्रहालय

गौरतलब है कि यह स्मारक सह- संग्रहालय छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बारिकी के साथ अध्ययन व रिसर्च के बाद वीएफएक्स टेक्नोलॉजी और प्रोजेक्शन वर्क के साथ तैयार किया रहा है। संग्रहालय देखने वाले आगंतुकों को आदिवासी विद्रोह का वर्णन स्टैच्यू के पास ही लगे डिजिटल बोर्ड पर उपलब्ध रहेगा। आगंतुक संग्रहालय में आदिवासी विद्रोह को जीवंत महसूस कर सकेगा। वहीं आगंतुक प्रत्येक गैलरी में बनाई गई जीवंत प्रस्तुति के सामने स्कैनर से मोबाईल द्वारा स्कैन कर संबंधित जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।  

16 गैलेरियों में तैयार हो रहा है संग्रहालय

उल्लेखनीय है कि शहीद वीर नारायण सिंह संग्रहालय में स्वतंत्रता आंदोलन के समय छत्तीसगढ़ में हुए विभिन्न आदिवासी विद्रोहों जैसे - हल्बा विद्रोह, सरगुजा विद्रेाह, भोपालपट्टनम विद्रोह, परलकोट विद्रोह, तारापुर विद्रोह, लिंगागिरी विद्रोह, कोई विद्रोह, मेरिया विद्रोह, मुरिया विद्रोह, रानी चौरिस विद्रोह, भूमकाल विद्रोह, सोनाखान विद्रोह, झण्डा सत्याग्रह एवं जंगल सत्याग्रह के वीर आदिवासी नायकों के संघर्ष एवं शौर्य के दृश्य का जीवंत प्रदर्शन 14 गैलेरियों में किया जा रहा है। वहीं जंगल सत्याग्रह और झंडा सत्याग्रह पर एक-एक गैलेरियों का भी निर्माण किया जा रहा है।


भारत के 7 प्राकृतिक धरोहर स्थल यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट में शामिल

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नई दिल्ली-भारत ने अपनी समृद्ध प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक मंच पर संरक्षित और प्रदर्शित करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। राष्ट्रीय गर्व के इस अवसर पर, देश की सात उल्लेखनीय प्राकृतिक धरोहर स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर साइटों की टेंटेटिव लिस्ट में सफलतापूर्वक शामिल किया गया है, जिससे भारत की टेंटेटिव लिस्ट में कुल संपत्तियों की संख्या 62 से बढ़कर 69 हो गई है।



इस समावेशन के साथ, भारत के पास अब यूनेस्को द्वारा विचाराधीन कुल 69 स्थल हैं, जिनमें 49 सांस्कृतिक, 17 प्राकृतिक और 3 मिश्रित धरोहर स्थल शामिल हैं। यह उपलब्धि भारत की अपनी असाधारण प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रचार में अटूट प्रतिबद्धता को पुष्ट करती है।

यूनेस्को की प्रोटोकॉल के अनुसार, किसी भी स्थल को प्रतिष्ठित विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकित करने से पहले उसे टेंटेटिव लिस्ट में शामिल किया जाना आवश्यक है।

नए शामिल स्थलों का विवरण:

  1. पंचगनी और महाबलेश्वर के डेक्कन ट्रैप्स, महाराष्ट्र:

    दुनिया के सबसे अच्छी तरह संरक्षित और अध्ययन किए गए लावा प्रवाहों में से कुछ का घर। ये स्थल विशाल डेक्कन ट्रैप्स का हिस्सा हैं और कोयना वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित हैं—जो पहले से ही यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

  2. सेंट मेरीज़ आइलैंड क्लस्टर का भू-वैज्ञानिक धरोहर, कर्नाटक:

    दुर्लभ स्तंभाकार बेसाल्टिक चट्टानों के लिए प्रसिद्ध, यह द्वीप समूह लेट क्रेटेशियस काल (लगभग 85 मिलियन वर्ष पूर्व) का भू-वैज्ञानिक अवलोकन प्रस्तुत करता है।

  3. मेघालयन युग की गुफाएँ, मेघालय:
    मेघालय की गुफा प्रणालियाँ, विशेषकर मावलुह गुफा, होलोसीन युग में मेघालयन युग का वैश्विक संदर्भ बिंदु हैं, जो महत्वपूर्ण जलवायु और भू-वैज्ञानिक बदलावों को दर्शाती हैं।

  4. नागा हिल ओफियोलाइट, नागालैंड:

    यह दुर्लभ ओफियोलाइट चट्टानों का उद्भव है, जो महासागरीय क्रस्ट को महाद्वीपीय प्लेटों पर उठाए जाने का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं—जो प्लेट टेक्टोनिक्स और मध्य महासागरीय रिज की प्रक्रियाओं की समझ देती हैं।

  5. एर्रा मट्टी डिब्बालु (लाल बालू की टीलियाँ), आंध्र प्रदेश:

    विशाखापत्तनम के पास स्थित ये लाल बालू की शानदार संरचनाएँ अद्वितीय प्राचीन जलवायु और तटीय भू-आकृतिक विशेषताओं को दर्शाती हैं।

  6. तिरुमला हिल्स का प्राकृतिक धरोहर, आंध्र प्रदेश:

    इसमें एपर्चियन अनकॉनफॉर्मिटी और प्रतिष्ठित सिलथोरानम (प्राकृतिक मेहराब) शामिल हैं, जो 1.5 बिलियन वर्ष से अधिक की पृथ्वी की भू-वैज्ञानिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  7. वरकला क्लिफ्स, केरल:

    केरल की तटरेखा पर स्थित यह दृश्यावलोकन क्लिफ्स मियो-प्लियोसीन युग की वर्कल्ली फॉर्मेशन को उजागर करते हैं, साथ ही प्राकृतिक झरने और अद्वितीय कटाव-आकृतियाँ प्रदान करते हैं, जो वैज्ञानिक और पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

वैश्विक धरोहर के प्रति भारत की प्रतिबद्धता

इन स्थलों को टेंटेटिव लिस्ट में शामिल करना भविष्य में विश्व धरोहर सूची में नामांकन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह दर्शाता है कि भारत अपनी प्राकृतिक अद्भुतताओं को वैश्विक संरक्षण प्रयासों के साथ जोड़ने पर ध्यान दे रहा है।

विश्व धरोहर सम्मेलन के लिए भारत की ओर से नामांकन तैयार करने और प्रस्तुत करने में पुरातत्व सर्वेक्षण भारत (ASI) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पेरिस में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने इस प्रयास में ASI की मेहनत की सराहना की।

भारत ने जुलाई 2024 में नई दिल्ली में 46वें विश्व धरोहर समिति सत्र की मेजबानी भी की, जिसमें 140 से अधिक देशों के 2000 से अधिक प्रतिनिधि और विशेषज्ञों ने भाग लिया।


धरोहरों की रक्षा का संकल्प: आईजीएनसीए संरक्षण प्रभाग का गौरवशाली सफर

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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने संरक्षण एवं सांस्कृतिक अभिलेखागार प्रभाग का स्थापना दिवस मनाया

नई दिल्ली- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने 17 सितम्बर 2025 को अपने संरक्षण एवं सांस्कृतिक अभिलेखागार प्रभाग का स्थापना दिवस मनाया, जो विश्वकर्मा जयंती के अवसर के साथ आयोजित हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अजय भटनागर उपस्थित थे। कार्यक्रम में आईजीएनसीए के अधिकारीगण, सहकर्मी, छात्र एवं आमंत्रित अतिथि भी शामिल हुए।

इसी कड़ी में आईजीएनसीए में चल रही ‘मन की बात’ पेंटिंग प्रदर्शनी के अंतर्गत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ पर आधारित पुस्तक ‘Igniting Collective Goodness’ पर चर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा में डॉ. सच्चिदानंद जोशी और आईजीएनसीए की निदेशक (प्रशासन) डॉ. प्रियंका मिश्रा सहित केंद्र के अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

डॉ. जोशी ने कहा, “मन की बात जैसा कार्यक्रम संभवतः विश्व में अनोखा है। इस पहल के माध्यम से प्रधानमंत्री सीधे देश की जनता से जुड़ते हैं, प्रेरणा देते हैं और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देते हैं।” उन्होंने उल्लेख किया कि कार्यक्रम के पहले 100 एपिसोड 100 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा सुने गए हैं और यह कार्यक्रम सामुदायिक भावना का प्रतीक बन चुका है, क्योंकि लोग अक्सर मिलकर इसे सुनते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि स्वच्छता जैसे विषयों का गहरा असर पड़ा है, आज छोटे बच्चे भी दूसरों को स्वच्छता का संदेश दे रहे हैं, जो प्रधानमंत्री की गांधीवादी प्रेरणा को दर्शाता है।

उन्होंने बताया कि मन की बात एकतरफा संवाद नहीं है, बल्कि इसमें देशभर से आई कहानियाँ शामिल होती हैं और नागरिक सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। विजयादशमी 2014 से प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम के अब तक 100 से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके हैं। डॉ. जोशी ने कहा कि रेडियो का श्रव्य माध्यम एक अलग ही प्रभाव छोड़ता है, और प्रत्येक एपिसोड देशभर की विशेष घटनाओं और उपलब्धियों को सामने लाता है, जिससे अन्य लोग प्रेरित होते हैं।

इस अवसर पर डॉ. प्रियंका मिश्रा ने Igniting Collective Goodness पुस्तक पर विचार व्यक्त किए और प्रधानमंत्री के भाषणों पर आधारित पाँच खंडों का उल्लेख करते हुए डॉ. जोशी के संपादकीय योगदान को रेखांकित किया।

संरक्षण प्रभाग के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि यह प्रभाग आज 150 से अधिक संरक्षकों की शक्ति बन चुका है, जिसने लद्दाख से वर्धा तक अनेक ऐतिहासिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाया है। इनमें महात्मा गांधी ग्रामीण उद्योग संस्थान की पहल और भारत मंडपम में विश्व की सबसे बड़ी नटराज प्रतिमा की स्थापना जैसी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ शामिल हैं। उन्होंने लद्दाख में पूरी तरह महिलाओं की टीम द्वारा किए गए कार्य को विशेष उदाहरण बताया और कहा कि संरक्षण दल ने समर्पण और अनुशासन के साथ नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। उन्होंने ज्ञान भारतम् सम्मेलन को याद करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने संरक्षकों के प्रयासों की सराहना की और युवाओं को इस महान पेशे से जुड़ने का आह्वान किया।

डॉ. जोशी ने प्रो. अचल पांडेय और उनकी टीम को बधाई दी और कहा कि छात्रों की तैयारी और निरंतर प्रयास से आने वाली पीढ़ियों को इसका लाभ मिलेगा। प्रो. अचल पांडेय, प्रभागाध्यक्ष, ने संरक्षण एवं सांस्कृतिक अभिलेखागार प्रभाग की अब तक की यात्रा और इसकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि यह प्रभाग ओरछा, वडोदरा, लालबाग (इंदौर), पटना संग्रहालय, अल्बर्ट हॉल संग्रहालय (जयपुर), भरतपुर, लद्दाख और भारत के सर्वोच्च न्यायालय जैसे स्थलों पर सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण कार्य कर रहा है।

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अजय भटनागर ने भारत की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में प्रभाग के सतत प्रयासों की प्रशंसा की और संरक्षण जागरूकता के महत्व पर बल दिया। कार्यक्रम में सांस्कृतिक आयाम जोड़ते हुए कुआहारा सेनके स्कूल की मास्टर ताकाहो असोनुमा और उनकी टीम ने जापानी कला इकेबाना (फूल सज्जा) का प्रदर्शन किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम का समापन प्रो. अचल पांडेय, उनकी टीम और संरक्षक बनने की तैयारी कर रहे छात्रों को बधाई के साथ हुआ, उनके अथक योगदान को भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा में सराहनीय बताया गया।

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