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छत्तीसगढ़ ने लागू किया 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस एक्ट-2026', निवेश और उद्योगों को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

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रायपुर- छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्योगों और निवेशकों के लिए कारोबारी माहौल को अधिक सरल, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए 'छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस एक्ट-2026' लागू किया है। इस कानून का उद्देश्य उद्योगों की स्थापना और संचालन से जुड़ी सरकारी प्रक्रियाओं को तेज, सरल और समयबद्ध बनाना है, जिससे राज्य में निवेश को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

नए कानून के तहत ट्रस्ट-बेस्ड (विश्वास आधारित) और रिस्क-बेस्ड (जोखिम आधारित) नियामक व्यवस्था अपनाई जाएगी। इसके तहत उद्योगों का वर्गीकरण उनके आकार, निवेश और जोखिम के आधार पर किया जाएगा। कम जोखिम वाले उद्योगों को बार-बार निरीक्षण और अनावश्यक कागजी प्रक्रिया से राहत मिलेगी, जबकि अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में आवश्यक निगरानी जारी रहेगी।

सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से उद्योगों को विभिन्न विभागों से समयबद्ध मंजूरी मिलेगी। निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुमति नहीं मिलने पर कई मामलों में 'डीम्ड अप्रूवल' (स्वतः स्वीकृति) का प्रावधान भी लागू होगा। साथ ही, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को स्व-प्रमाणन (Self-Certification) जैसी सुविधाएं दी जाएंगी, जिससे अनुपालन लागत और प्रशासनिक बोझ कम होगा।

राज्य सरकार का मानना है कि यह कानून पारंपरिक निरीक्षण-आधारित व्यवस्था की जगह पारदर्शी, जवाबदेह और निवेशक-अनुकूल शासन प्रणाली को बढ़ावा देगा। इससे घरेलू और विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा तथा औद्योगिक परियोजनाओं को तेजी से गति मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से छत्तीसगढ़ में विनिर्माण, एमएसएमई, कृषि-आधारित उद्योग, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य उभरते क्षेत्रों में निवेश को नई रफ्तार मिल सकती है। इससे प्रदेश के औद्योगिक विकास के साथ-साथ बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

राज्य सरकार का लक्ष्य छत्तीसगढ़ को देश के सबसे निवेश-अनुकूल राज्यों में शामिल करना है। नया ईज ऑफ डूइंग बिजनेस एक्ट-2026 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है, जो उद्योगों के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाकर आर्थिक विकास को नई गति देने में अहम भूमिका निभाएगा।

लीगल मेट्रोलॉजी अधिनियम में बड़ा सुधार: पहली बार गलती करने वाले कारोबारियों को मिलेगा सुधार का मौका

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नई दिल्ली- उपभोक्ता मामलों के विभाग (Department of Consumer Affairs) ने जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) अधिनियम, 2026 के तहत लीगल मेट्रोलॉजी अधिनियम, 2009 में "इम्प्रूवमेंट नोटिस (Improvement Notice)" व्यवस्था लागू की है। इस नई व्यवस्था के तहत पहली बार प्रक्रियागत या नियामकीय नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों को दंडात्मक कार्रवाई से पहले अपनी गलती सुधारने का अवसर दिया जाएगा।

मुख्य बातें

  • पहली बार हुई प्रक्रियागत या नियामकीय गलती पर सीधे जुर्माना या कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

  • संबंधित अधिकारी पहले इम्प्रूवमेंट नोटिस जारी करेंगे।

  • नोटिस में बताई गई कमियों को निर्धारित समय के भीतर सुधारने का अवसर मिलेगा।

  • समय पर सुधार करने पर अनावश्यक मुकदमेबाजी और दंडात्मक कार्रवाई से बचा जा सकेगा।

  • बार-बार नियमों का उल्लंघन करने या जानबूझकर धोखाधड़ी करने वालों पर सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

किन व्यवसायों को मिलेगा लाभ?

यह व्यवस्था निम्नलिखित सभी पंजीकृत एवं विनियमित संस्थाओं पर लागू होगी:

  • निर्माता (Manufacturers)

  • आयातक (Importers)

  • पैकर (Packers)

  • डीलर एवं व्यापारी

  • रिपेयरर

  • एमएसएमई (MSMEs)

  • अन्य विनियमित कारोबारी

किन मामलों में लागू होगी?

यह व्यवस्था पहली बार होने वाले निम्न प्रकार के उल्लंघनों पर लागू होगी:

  • पंजीकरण संबंधी त्रुटियां

  • रिकॉर्ड एवं दस्तावेजों का रखरखाव

  • मॉडल अप्रूवल

  • बाट एवं माप के निर्माण, बिक्री और मरम्मत

  • बाट एवं माप का आयात

  • पैकेज्ड वस्तुओं से जुड़े नियम

  • वैधानिक जानकारी एवं रिटर्न जमा करना

किन धाराओं पर लागू होगी?

इम्प्रूवमेंट नोटिस की व्यवस्था धारा 25, 27, 28, 29, 31, 32, 34, 35, 36(1), 38, 39, 41(1), 41(2), 45, 46 और 47 के तहत आने वाले निर्धारित प्रथम उल्लंघनों पर लागू होगी।

सरकार का उद्देश्य

सरकार का कहना है कि इस सुधार का उद्देश्य:

  • Ease of Doing Business (EoDB) को बढ़ावा देना,

  • स्वैच्छिक अनुपालन (Voluntary Compliance) को प्रोत्साहित करना,

  • अनावश्यक मुकदमों और अनुपालन लागत को कम करना,

  • तथा "Minimum Government, Maximum Governance" की भावना के अनुरूप पारदर्शी एवं भरोसेमंद नियामकीय व्यवस्था विकसित करना है।

हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। धोखाधड़ी, छेड़छाड़, बार-बार नियम तोड़ने या उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में पहले की तरह कड़ी कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।

भारत में कारोबार करना हुआ आसान: डिजिटल सुधारों और सुशासन से बदला व्यापारिक परिदृश्य

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नई दिल्ली- पिछले एक दशक में भारत ने कारोबार सुगमता (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने के लिए व्यापक सुधार किए हैं। डिजिटल गवर्नेंस, नियमों के सरलीकरण और विश्वास-आधारित प्रशासन की बदौलत देश का व्यावसायिक वातावरण अधिक पारदर्शी, तेज और उद्यम-अनुकूल बना है। इन सुधारों का सकारात्मक प्रभाव निवेशकों के बढ़ते विश्वास और वैश्विक रैंकिंग में भारत की बेहतर स्थिति के रूप में सामने आया है।

विश्व बैंक की Doing Business Report 2020 के अनुसार भारत की रैंकिंग 2014 में 142वें स्थान से बढ़कर 2019 में 63वें स्थान पर पहुंच गई। वहीं IMD World Competitiveness Ranking 2025 में भारत 2021 के 43वें स्थान से सुधरकर 2025 में 41वें स्थान पर पहुंचा है।

स्टार्टअप और एमएसएमई को मिला बड़ा प्रोत्साहन

जनवरी 2016 में शुरू की गई स्टार्टअप इंडिया पहल ने देश में उद्यमिता को नई गति दी है। मार्च 2026 तक 2.23 लाख से अधिक स्टार्टअप्स को मान्यता दी जा चुकी है, जिन्होंने 23.3 लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए हैं। इनमें लगभग 48 प्रतिशत स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या साझेदार शामिल हैं।

इसके अलावा, SPICe+ और MCA21 Version 3 जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने कंपनी पंजीकरण और अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाया है। उद्यम पंजीकरण पोर्टल के माध्यम से एमएसएमई के लिए पंजीकरण पूरी तरह ऑनलाइन, निःशुल्क और कागज रहित हो गया है।

भूमि और संपत्ति पंजीकरण में डिजिटल क्रांति

डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) के तहत देश के 97 प्रतिशत से अधिक कैडस्ट्रल नक्शों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है। ULPIN और NGDRS जैसी प्रणालियों ने भूमि रिकॉर्ड और संपत्ति पंजीकरण को पारदर्शी एवं विश्वसनीय बनाया है, जिससे विवादों और धोखाधड़ी की संभावनाएं कम हुई हैं।

व्यापार अनुमतियों और लाइसेंस प्रक्रियाओं में सरलीकरण

सरकार ने श्रम कानूनों के एकीकरण, सिंगल विंडो सिस्टम और पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण के माध्यम से व्यापार शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाया है। राष्ट्रीय सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) अब 32 केंद्रीय विभागों और 34 राज्यों की स्वीकृतियों को एक मंच पर उपलब्ध कराता है।

बाजार पहुंच और लॉजिस्टिक्स में सुधार

GeM, ONDC, PM गतिशक्ति, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स पोर्टल और लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक 2.0 जैसी पहलों ने व्यवसायों को नए बाजारों से जोड़ने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत की लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स रैंकिंग 2014 के 54वें स्थान से सुधरकर 2023 में 38वें स्थान पर पहुंच गई है।

आसान हुआ ऋण और वित्तीय सहायता प्राप्त करना

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, क्रेडिट गारंटी योजनाएं और क्रेडिट असेसमेंट मॉडल (CAM) जैसी योजनाओं ने छोटे उद्यमियों और एमएसएमई को बिना गारंटी के ऋण उपलब्ध कराना आसान बनाया है। मुद्रा योजना के तहत अब तक 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक के ऋण वितरित किए जा चुके हैं।

कर प्रणाली में पारदर्शिता और सरलता

वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद देश की कर व्यवस्था अधिक एकीकृत और पारदर्शी हुई है। GST के तहत पंजीकृत करदाताओं की संख्या 2017 के लगभग 60 लाख से बढ़कर अप्रैल 2026 तक 1.64 करोड़ से अधिक हो गई है। फेसलेस असेसमेंट और नए ई-फाइलिंग पोर्टल ने कर अनुपालन को और आसान बनाया है।

निर्यात और वैश्विक व्यापार को मिला बढ़ावा

जिलों को निर्यात हब बनाने की पहल, ICEGATE, Trade Connect और Export Promotion Mission जैसी योजनाओं ने भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने में मदद की है। इससे स्थानीय उद्यमों और निर्यातकों को नए अवसर प्राप्त हुए हैं।

विश्वास-आधारित प्रशासन की ओर कदम

जन विश्वास अधिनियम और अनुपालन बोझ कम करने की पहलों के तहत हजारों नियमों को सरल बनाया गया है तथा कई छोटे अपराधों को गैर-आपराधिक श्रेणी में रखा गया है। इससे व्यापारिक गतिविधियों में अनावश्यक कानूनी बाधाएं कम हुई हैं।

निष्कर्ष

डिजिटल बुनियादी ढांचे, नियामकीय सुधारों और पारदर्शी प्रशासन के संयोजन ने भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी और निवेश-अनुकूल अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित किया है। इन सुधारों ने न केवल उद्यमिता और रोजगार को बढ़ावा दिया है, बल्कि भारत को वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य भी बनाया है।

जीएसटी सुधार: हिमाचल की विरासत एवं अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण

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 प्रस्तावना

नवीनतम जीएसटी सुधारों ने देश भर में बोझ कम किया है और विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों को इसके विविध लाभ मिले हैं। हिमाचल प्रदेशजो अपने समृद्ध पारंपरिक शिल्पविशिष्ट कृषि उपज और बढ़ते उद्योगों के लिए जाना जाता हैमें जीएसटी दरों में हालिया कटौती का गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है।

ये छोटे कारीगरों और बुनकरों के लिए राहतकिसानों और कृषकों के लिए नए अवसर और हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक समूहों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धात्मकता लाएँगे। ये सुधार मिलकर आजीविका को मज़बूत करेंगे और राज्य को निरंतर विकास की ओर अग्रसर करेंगे।

 शॉल तथा ऊनी वस्त्र

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध हथकरघा उत्पादोंखासकर शॉल और ऊनी वस्त्रों को नए जीएसटी ढांचे में राहत मिलने की उम्मीद है। ये उत्पाद सिर्फ़ स्मृति चिन्ह नहीं हैंये हज़ारों कारीगरों की आजीविका का ज़रिया हैं।

कुल्लू घाटी मेंस्वयं सहायता समूहों से जुड़े 3,000 से ज़्यादा बुनकर चमकीले पैटर्न वालेजीआई-टैग वालेकुल्लू शॉल बनाते हैं। ये बुनकर राज्य भर के अनुमानित 10,000-12,000 हथकरघा कारीगरों का हिस्सा हैंजो इन हस्तशिल्पों से अपनी आजीविका चलाते हैं। पड़ोसी किन्नौर ज़िले के शॉलजो जटिल पौराणिक रूपांकनों से सजे हैंकई हज़ार कारीगरों द्वारा बुने और हाथ से रंगे जाते हैं। जीएसटी 12% से घटकर 5% होने सेउपभोक्ताओं के लिए इन हस्तनिर्मित उत्पादों की लागत में कमी आने की उम्मीद है। यह कदम कारीगरों की प्रतिस्पर्धात्मकता एवं आय को सीधे तौर पर बढ़ावा देता है।

पश्मीना शॉल को भी 12% से बढ़ाकर 5% कर दिए जाने से लाभ हुआ है। हालाँकि इसे अक्सर कश्मीर से जोड़ा जाता हैहिमाचल प्रदेश का अपना उत्पादन लाहौल-स्पीतिकिन्नौरकुल्लूमंडी और शिमला जैसे क्षेत्रों में भी होता है। हथकरघा क्षेत्र के 10,000-12,000 कारीगरों में से कई पश्मीना से जुड़े हैं और शानदार ऊनी शिल्प तैयार करते हैं। कर में कटौती से इस उच्च-मूल्य वाले क्षेत्र में भी राहत मिली हैजिससे कारीगरों को मार्जिन बनाए रखते हुए अपने शॉलों की कीमतें अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिल सकती है।

शॉलों के साथ-साथपारंपरिक हिमाचली टोपियाँजैसे बहुरंगी किन्नौरी टोपियाँ और दस्ताने जैसे अन्य ऊनी सामान भी संशोधित जीएसटी स्लैब से लाभान्वित होंगे। ये वस्तुएँ ऊँचाई वाले ज़िलों के हज़ारों कारीगरों द्वारा हाथ से बुनी जाती हैं। कम कर से उपभोक्ताओं के लिए कीमतों में कुछ हद तक कमी आने की उम्मीद है। इससे कारीगरों और बुनकरों की आजीविका सुरक्षित होगी और पीढ़ियों पुराने शिल्प को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।

 हस्तशिल्प एवं कुटीर उद्योग

वस्त्र उद्योग के अलावाहिमाचल प्रदेश विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों का केंद्र हैऔर इन सभी को जीएसटी के युक्तिकरण से लाभ हुआ है। अधिकांश हस्तशिल्प वस्तुओं पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% कर दिया गया हैइसका राज्य भर के कारीगरों पर सीधा प्रभाव पड़ा है।

चंबा रुमाल कढ़ाई

चंबा रुमाल एक जीआई-टैग वालालघु हस्त-कढ़ाई वाला कपड़ा हैजिसे मुख्य रूप से चंबा जिले की महिला कारीगरों द्वारा बनाया जाता है। स्थानीय समूहों की सैकड़ों महिलाएँ इसके उत्पादन में शामिल हैं। अब 5% जीएसटी होने सेखरीदारों के लिए लागत कम हैजिससे इन रुमालों की माँग बढ़ सकती है। कर में कटौती शिल्प के सांस्कृतिक मूल्यों की मान्यता और विरासत कला रूपों के प्रचार का भी प्रतीक है।

चंबा चप्पलें

चंबा की पारंपरिक चमड़े की चप्पलेंसैकड़ों छोटी कुटीर शिल्प इकाइयों द्वारा निर्मित एक और जीआई-टैग्ड उत्पाद हैं। कम जीएसटी दर से इनकी कीमतें मशीन-निर्मित जूतों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएँगी और स्वदेशी चप्पलों की बिक्री को बढ़ावा मिलेगा। इससे कारीगरों को अपना मुनाफा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

लकड़ी के शिल्प

जटिल लकड़ी के दरवाजों और पैनलों से लेकर फर्नीचर तकनक्काशीदार लकड़ी के उत्पाद चंबाकिन्नौर और कुल्लू जैसे क्षेत्रों में बनाए जाते हैं। यह उद्योग हिमाचल प्रदेश के हजारों ग्रामीण कारीगरों को रोजगार देता है। नई जीएसटी दरों ने लकड़ी के सामानों को 5% कर की श्रेणी में डाल दिया हैजिससे स्थानीय स्तर पर बने लकड़ी के फर्नीचर और स्मृति चिन्हों की मांग बढ़ेगी। इससे न केवल ये वस्तुएं सस्ती होंगीबल्कि स्थानीय कारीगरों को भी मदद मिलेगी।

मिट्टी के बर्तन और धातु के बर्तन

हिमाचल में एक मज़बूत पारंपरिक धातु शिल्प उद्योग है और राज्य में सैकड़ों छोटी कारीगर इकाइयाँ इन शिल्पों में लगी हुई हैं। विभिन्न ज़िलों में फैलेकुशल कारीगर अनुष्ठानिक बर्तनआभूषण और मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। 5% की संशोधित जीएसटी दरों से स्वदेशी धातु के बर्तनों और मिट्टी के बर्तनों के लिए एक अधिक अनुकूल बाज़ार बनने की उम्मीद है। इससे कारीगरों को अपने धातु के बर्तन और मिट्टी के बर्तन बेचने का बेहतर अवसर मिलेगा।

बाँस की वस्तुएँ

हिमाचल के कुछ हिस्सों में बाँस की वस्तुएँ जैसे टोकरियाँ और अन्य पर्यावरण-अनुकूल शिल्पकलाएँ बनाई जाती हैं। इस उद्योग में सैकड़ों कारीगर काम करते हैंजिनमें से कई हाशिए के समुदायों से आते हैं। इन उत्पादों परजिन पर पहले 12% कर लगता थाअब 5% से कम कर लगता है।

कारीगरों के लिएयह एक स्वागत योग्य बदलाव हैक्योंकि इससे न केवल उनके ग्राहकों के लिए कीमतें कम होंगीबल्कि यह टिकाऊपारंपरिक शिल्पकला के प्रति सरकार के समर्थन को भी दर्शाता है।

 कृषिबागवानी और संबद्ध विकास इंजन

 कृषिबागवानी और संबद्ध विकास इंजन

कृषि कई क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों के माध्यम से हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था को सहारा देती है जो सैकड़ों लोगों को आजीविका प्रदान करते हैं। जीएसटी सुधारों ने इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण लाभ पहुँचाए हैंजिससे न केवल सामर्थ्य बढ़ा हैबल्कि किसानों और श्रमिकों की आय में भी वृद्धि हुई है।

कांगड़ा चाय

पालमपुर और आसपास के इलाकों में स्थित अपने हरे-भरे चाय बागानों के लिए कांगड़ा को "उत्तर भारत की चाय राजधानी" के रूप में जाना जाता है। कांगड़ा में लगभग 5,900 छोटे चाय बागान हैंजहाँ बागानों और कारखानों में हज़ारों मज़दूर चाय उगाते हैं। जीआई टैग वाली यह प्रसिद्ध चाय अब जीएसटी से मुक्त हैऔर खुली चाय पर अब 0% जीएसटी लगता है। नई जीएसटी दरों ने खरीदारों के लिए खुली चाय की पत्तियों को प्रभावी रूप से सस्ता कर दिया है। इससे प्रतिस्पर्धी बाज़ारों में कांगड़ा चाय की बिक्री बढ़ेगी। इस प्रकारकर राहत के माध्यम से सरकारी सहायता न केवल परिवारों के लिए सामर्थ्य लाएगीबल्कि पारंपरिक कृषि क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में भी मदद करेगी।

काला जीरा

काला जीरा हिमाचल प्रदेश के ऊँचाई वाले ज़िलों में उगाया जाने वाला एक सुगंधित मसाला है। अपनी विशिष्ट सुगंध और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध इस मसाले की खेती इस क्षेत्र के कुछ सौ किसान और संग्राहक करते हैं। जीएसटी में 12% से 5% की कमी से उत्पाद की कीमत कम होने की संभावना हैजिससे माँग में वृद्धि होगी। किसानों को अपनी उपज के लिए ज़्यादा ऑर्डर मिलेंगेऔर इससे खेती का विस्तार करने को प्रोत्साहन मिल सकता है।

चुल्ली तेल (खुबानी गिरी का तेल)

चुल्ली तेलहिमालयी क्षेत्र में निकाला जाने वाला एक पारंपरिक खुबानी गिरी का तेल हैजो अपने चिकित्सीय गुणों के लिए जाना जाता है। जीएसटी दर 5% तक कम होने सेइस क्षेत्र के बाहर के उपभोक्ताओं को भी यह थोड़ा सस्ता लग सकता हैजिससे इस उत्पाद की पहुँच बढ़ सकती है। कुल मिलाकरयह सैकड़ों ग्रामीण उत्पादकों को रोजगार देने वाले स्थानीय उद्योग के लिए एक सहायक कदम है।

सेब के डिब्बों की पैकेजिंग

हिमाचल प्रदेश के बागवानी उत्पादन में सेब का योगदान लगभग 80% है। शिमला और अन्य सेब क्षेत्रों में उगाया जाने वाला यह उद्योग हज़ारों सेब उत्पादकों को प्रभावित करता है। ये उत्पादक अपनी उपज को भारत भर के बाज़ारों में भेजने के लिए डिब्बोंट्रे और अन्य पैकेजिंग सामग्री पर निर्भर करते हैं। ऐसी सामग्रियों पर जीएसटी घटाकर 5% करने से इनपुट लागत कम होने की उम्मीद हैयानी सस्ते डिब्बे उपलब्ध होंगेजिससे उत्पादकों और अन्य स्थानीय पैकेजिंग आपूर्ति इकाइयों को सीधा लाभ होगा।

कृषि इनपुट

जीएसटी सुधारों ने उर्वरकों जैसे कृषि इनपुटों की दरों को घटाकर 5% कर दिया है। इससे कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा मिलेगा और कृषि दक्षता और उत्पादन में सुधार होगा। इसलिएइनपुट कीमतों पर संशोधित दरों से राज्य भर के लाखों किसानों को लाभ होगा।



औद्योगिक एवं विनिर्माण क्षेत्र

खाद्य प्रसंस्करण

हिमाचल के बद्दीबरोटीवाला और नालागढ़ स्थित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को विभिन्न प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर जीएसटी की दर घटाकर 5% करने से लाभ होगा। यह औद्योगिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये प्रसंस्करण इकाइयाँ क्षेत्र के लगभग 10,000 लोगों को रोजगार देती हैं। खाद्य पदार्थों पर कर कम होने से खुदरा कीमतों में कमी आने की संभावना है जिससे माँग बढ़ेगी और बिक्री में वृद्धि होगी।

चिकित्सा उपकरण

हिमाचल के सोलन ज़िले में स्थित चिकित्सा उद्योगक्षेत्र के लगभग 10,000 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार प्रदान करता है। कई चिकित्सा उपकरणों पर अब 5% कर लगने से इस उद्योग को काफ़ी फ़ायदा होगा।

 अन्य उपभोक्ता वस्तुएँ

विशिष्ट उद्योगों और उत्पादक-केंद्रित बदलावों के अलावाजीएसटी सुधार औसत हिमाचली उपभोक्ता को भी राहत देते हैं। एक उल्लेखनीय बदलाव विभिन्न उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और उपकरणों पर जीएसटी को 28% से घटाकर 18% करना हैजिसका सीधा असर हिमाचल के ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है। उपभोक्ता वस्तुओं की कम कीमतों से ग्रामीण बाज़ारों में मांग बढ़ने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि छोटे शहरों के स्थानीय खुदरा विक्रेताओं की बिक्री बढ़ेगी। दरअसलइलेक्ट्रॉनिक्स पर जीएसटी में कटौती से आधुनिक सुविधाएँ थोड़ी और सस्ती हो जाएँगी।

 निष्कर्ष

जीएसटी दरों में कटौती का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था के सकारात्मक विकास और सामाजिक-आर्थिक कल्याण में दिखाई देगा। हिमाचल प्रदेश के मामले मेंये सुधार यह सुनिश्चित करेंगे कि देवभूमि भी फलते-फूलते बाज़ारों और समृद्ध आजीविकाओं की भूमि बने। राज्य के अनूठे उत्पादों को लाभ होगाचाहे वह कुल्लू का बुनकर होशिमला का सेब उत्पादक होकांगड़ा घाटी का चाय उत्पादक होया बद्दी का कारखाना श्रमिक होये सब मिलकर हिमाचल की अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मकता और अवसरों में वृद्धि की ओर अग्रसर करेंगे।

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