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एनबीए ने लाभ-साझेदारी ढांचे के तहत 45 दिनों में ₹2.40 करोड़ की राशि प्राप्त की

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राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके उपयोग से उत्पन्न लाभों के निष्पक्ष और समान वितरण को सुनिश्चित करने के अपने दायित्व को आगे बढ़ाते हुए, पिछले 45 दिनों में एक्सेस एंड बेनिफिट-शेयरिंग (ABS) ढांचे के तहत ₹2.40 करोड़ की राशि प्राप्त की है। यह राशि बीज तथा पशु आहार/कॉस्मेटिक क्षेत्रों से संबंधित संस्थाओं द्वारा जैविक संसाधनों के अनुसंधान और वाणिज्यिक उपयोग हेतु प्राप्त दस आवेदनों से प्राप्त हुई है।

लाभ-साझेदारी योगदान विभिन्न कृषि जैविक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त हुआ है, जिनमें धान, प्याज, करेला, सरसों, कपास, लौकी, बैंगन, मिर्च, खीरा, भिंडी, तोरई, टमाटर और समुद्री शैवाल की किस्में/हाइब्रिड शामिल हैं। ₹2.30 करोड़ की एक बड़ी राशि एम/एस पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन से सरसों और धान के हाइब्रिड के वाणिज्यिक उपयोग के लिए प्राप्त हुई है। शेष राशि एम/एस ईस्ट वेस्ट सीड्स इंडिया प्रा. लि., एम/एस एडवांटा एंटरप्राइजेज लि., एम/एस टोकिता सीड इंडिया प्रा. लि., एम/एस एवेलो इंक और एम/एस सी6 एनर्जी प्रा. लि. से प्राप्त हुई है। इन जैविक संसाधनों का उपयोग उन्नत और हाइब्रिड बीज किस्मों सहित कृषि आधारित उत्पादों के विकास के लिए किया गया, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिला है।

ABS तंत्र के तहत, लाभ संबंधित संस्थानों, स्थानीय समुदायों, किसानों, जैव विविधता प्रबंधन समितियों आदि के साथ साझा किया जाएगा, जिन्होंने बीजों की मूल किस्में प्रदान की थीं। यह प्रणाली आजीविका संवर्धन को समर्थन देती है और जमीनी स्तर पर जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग को प्रोत्साहित करती है।

हाल के वर्षों में, NBA ने अनुपालन को आसान बनाने और व्यवसाय करने में सुगमता को बढ़ावा देने के लिए सरल और पारदर्शी प्रक्रियाएं शुरू की हैं, साथ ही यह सुनिश्चित किया है कि जमीनी स्तर के समुदायों के हित सुरक्षित रहें। बीज क्षेत्र ABS ढांचे के तहत अग्रणी योगदानकर्ता के रूप में उभरा है। प्राधिकरण सभी हितधारकों, विशेषकर विभिन्न क्षेत्रों की कंपनियों को जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों का अनुपालन करने और जैव विविधता संरक्षण तथा लाभ-साझेदारी में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करता है।

उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में वर्तमान तक NBA ने बीज क्षेत्र से ₹3.42 करोड़ की राशि प्राप्त की है। नवीनतम प्राप्ति के साथ, NBA द्वारा अब तक प्राप्त कुल ABS राशि ₹266 करोड़ (लगभग 29 मिलियन अमेरिकी डॉलर) को पार कर चुकी है। इसमें से ₹83 करोड़ केवल बीज क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं, जिससे यह रेड सैंडर्स के बाद दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन गया है।

NBA जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD) और नागोया प्रोटोकॉल के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तथा राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों और कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के लक्ष्य-13 को प्राप्त करने में योगदान दे रहा है, जो ABS तंत्र के लिए विधायी उपायों पर जोर देता है।


राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) की कार्यकारी समिति की 68वीं बैठक आयोजित

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राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) की कार्यकारी समिति (Executive Committee) की 68वीं बैठक का आयोजन गंगा और उसकी सहायक नदियों के अविरल (निर्बाध) एवं निर्मल प्रवाह को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया। बैठक की अध्यक्षता NMCG के महानिदेशक राजीव कुमार मित्तल ने की। बैठक में नदी की पारिस्थितिकी बहाली, जैव विविधता संरक्षण, प्रकृति-आधारित समाधानों (Nature Based Solutions) के माध्यम से नवाचार, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा आधारभूत संरचना परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया गया।

बैठक में मंत्रालय एवं संबंधित एजेंसियों के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे, जिनमें जल संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव एवं वित्तीय सलाहकार गौरव मसालदान, NMCG के उप महानिदेशक नलिन श्रीवास्तव, कार्यकारी निदेशक (परियोजना) बृजेंद्र स्वरूप, कार्यकारी निदेशक (तकनीकी) अनुप कुमार श्रीवास्तव, कार्यकारी निदेशक (प्रशासन) एस.पी. वशिष्ठ तथा कार्यकारी निदेशक (वित्त) भास्कर दासगुप्ता शामिल थे। राज्य सरकारों की ओर से परियोजना निदेशकों में पश्चिम बंगाल की  नंदिनी घोष, उत्तर प्रदेश के जोगेंद्र कुमार, बिहार अर्बन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (BUDCO) के प्रबंध निदेशक अनिमेष कुमार तथा NMCG के निदेशक राहुल द्विवेदी उपस्थित रहे।

गंगा बेसिन में संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों के संरक्षण को मंजूरी

गंगा बेसिन में संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक नई परियोजना को स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना का उद्देश्य रेत-टीलों (sandbar) पर घोंसला बनाने वाले पक्षियों, विशेषकर इंडियन स्किमर, के प्रजनन स्थलों की रक्षा करना है। नमामि गंगे मिशन–II के अनुरूप यह परियोजना दीर्घकालिक निगरानी, समुदाय की भागीदारी तथा साक्ष्य-आधारित संरक्षण पर केंद्रित है। चंबल और निचली गंगा में घोंसलों की निगरानी जारी रहेगी तथा बिजनौर, नरौरा और प्रयागराज में इसे प्रारंभ किया जाएगा। प्रशिक्षित स्थानीय समुदाय संवेदनशील रेत-टीलों की सुरक्षा, मानवीय हस्तक्षेप को कम करने और जागरूकता एवं क्षमता निर्माण गतिविधियों में सहयोग करेंगे।

यह परियोजना नदी-आधारित जीव-जंतुओं की जैव विविधता संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल है, जो डॉल्फिन, मछलियों, कछुओं और मगरमच्छों से संबंधित NMCG के प्रयासों को पूरक बनाते हुए नदी जीव-जंतुओं पर समग्र ध्यान केंद्रित करेगी।

परियोजनाओं के सुचारू क्रियान्वयन हेतु प्रशासनिक एवं व्यय स्वीकृतियां

बैठक के दौरान गंगा बेसिन राज्यों में विभिन्न परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन एवं सुचारू संचालन के लिए संशोधित प्रशासनिक और व्यय स्वीकृतियां प्रदान की गईं। इन स्वीकृतियों से व्यावहारिक क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियों का समाधान होगा, संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा मिलेगा तथा परियोजनाओं की गुणवत्ता, पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी।

इन स्वीकृतियों से जिन परियोजनाओं के क्रियान्वयन में सुविधा मिलेगी, उनमें उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में 10 KLD फीकल स्लज एवं सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट, कानपुर में मौजूदा सीवरेज अवसंरचना का पुनर्वास एवं मुख्य सब-स्टेशन का नवीनीकरण, वाराणसी में गंगा सतह की स्वच्छता हेतु ट्रैश स्किमर परियोजना, बिहार के दानापुर, फुलवारी शरीफ और फतुहा में इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन तथा एसटीपी परियोजनाएं, झारखंड के फुसरो में इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन तथा एसटीपी परियोजना, तथा पश्चिम बंगाल में गार्डन रीच और कूरापुकुर स्थित दो प्रमुख गंगा प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं में छोटे संशोधन शामिल हैं।

प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा

कार्यकारी समिति ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक नवोन्मेषी दृष्टिकोण अपनाते हुए दिल्ली में यमुना में गिरने वाले शास्त्री पार्क नाला, गौशाला नाला तथा कैलाश नगर/रमेश नगर नालों के इन-सीटू उपचार और पुनर्जीवन हेतु प्रकृति-आधारित समाधान (Nature Based Solutions) परियोजना को मंजूरी दी। यह पर्यावरण-अनुकूल और प्रभावी पहल है, जिसके अंतर्गत चट्टानी फिल्टर, पत्थर की चिनाई और जलीय पौधों के माध्यम से कच्चे सीवेज का प्राकृतिक उपचार कर उसे यमुना में प्रवेश से पहले ही शुद्ध किया जाएगा।

सांस्कृतिक विरासत संरक्षण हेतु गोमती नदी उद्गम स्थल का पुनर्विकास

समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में गोमती नदी के उद्गम स्थल की प्राकृतिक पवित्रता और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने के लिए एक व्यापक मास्टर प्लान तैयार किया गया है। इस योजना में आधुनिक अवसंरचना विकास, कैचमेंट क्षेत्र उपचार, जल स्रोतों का पुनर्जीवन तथा माधोटांडा नगर से निकलने वाले सीवेज का प्रकृति-आधारित उपचार शामिल है। साथ ही घाटों और आरती मंचों का विकास, झीलों का पुनर्जीवन और कछुओं के आवासों का संरक्षण भी किया जाएगा। श्मशान, पंचवटीका और योग मंडप जैसी सुविधाएं स्थल के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ाएंगी।

इन सभी स्वीकृतियों के माध्यम से कार्यकारी समिति ने नदी-आधारित जैव विविधता संरक्षण को सुदृढ़ करने, प्रकृति-आधारित समाधानों को मुख्यधारा में लाने, नदियों से सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करने तथा गंगा के पुनर्जीवन के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन की दिशा में NMCG के संकल्प को और सशक्त किया है।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा रेड सैंडर्स संरक्षण हेतु ₹14.88 करोड़ की एबीएस राशि जारी

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राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) के अंतर्गत आंध्र प्रदेश वन विभाग को ₹14.88 करोड़ (USD 1.65 मिलियन) की राशि जारी की है। यह राशि रेड सैंडर्स (Pterocarpus santalinus) के संरक्षण, सुरक्षा, पुनर्जनन, अनुसंधान एवं विकास, जागरूकता सृजन तथा क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के लिए निर्धारित की गई है। यह लाभ-साझेदारी योगदान 29 फॉर्म-I आवेदनों से प्राप्त हुआ है।

इस नवीनतम निर्गम के साथ, भारत में अब तक की कुल एबीएस राशि ₹143 करोड़ (USD 15.8 मिलियन) से अधिक हो गई है। अब तक एनबीए द्वारा रेड सैंडर्स संरक्षण और लाभ दावेदारों के लिए आंध्र प्रदेश को ₹104 करोड़ (USD 12.5 मिलियन) से अधिक की राशि जारी की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों को भी ₹15 करोड़ (USD 1.8 मिलियन) से अधिक की एबीएस राशि प्रदान की गई है।

रेड सैंडर्स, अपने विशिष्ट गहरे लाल रंग की लकड़ी के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है और यह पूर्वी घाटों के सीमित क्षेत्रों—विशेष रूप से अनंतपुर, चित्तूर, कडप्पा, प्रकाशम और कर्नूल जिलों (आंध्र प्रदेश) में स्थानिक (एंडेमिक) रूप से पाया जाता है। यह लाभ-साझेदारी राशि 1,115 टन रेड सैंडर्स लकड़ी की नीलामी से प्राप्त हुई है, जिसे राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) द्वारा जब्त किया गया था और बाद में स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, एमएमटीसी लिमिटेड और पीईसी लिमिटेड जैसी केंद्रीय सरकारी एजेंसियों द्वारा नीलाम किया गया।

उल्लेखनीय है कि रेड सैंडर्स की एबीएस राशि के माध्यम से एनबीए ने संरक्षण, सतत उपयोग, आनुवंशिक सुधार और मूल्य संवर्धन से जुड़े अनुसंधान परियोजनाओं को समर्थन दिया है। ये परियोजनाएं आईसीएफआरई–आईएफजीटीबी, आईसीएफआरई–आईडब्ल्यूएसटी और सीएसआईआर–आईआईसीबी जैसे प्रतिष्ठित सरकारी अनुसंधान संस्थानों द्वारा संचालित की गईं।

आंध्र प्रदेश के विभिन्न वन प्रभागों में किए गए फील्ड सर्वेक्षणों के दौरान 1,513 आनुवंशिक संसाधनों का जियो-रेफरेंस्ड लक्षणों सहित दस्तावेजीकरण किया गया तथा 15,000 से अधिक खड़े पेड़ों में विविधता और प्रजनन व्यवहार का आकलन किया गया। उत्कृष्ट संसाधनों से बीज एकत्र कर एक्स-सीटू संरक्षण किया गया तथा राष्ट्रीय रेड सैंडर्स फील्ड जीन बैंक की स्थापना के प्रयास जारी हैं। ऊतक संवर्धन (टिशू कल्चर), उन्नत अंकुरण तथा उच्च सफलता वाली वनस्पतिक प्रवर्धन तकनीकों को मानकीकृत कर सुदृढ़ किया गया। दीर्घकालिक स्थिरता के लिए सीड प्रोडक्शन एरिया के प्रारंभिक दिशा-निर्देश भी विकसित किए गए।

रेड सैंडर्स की छाल और हार्टवुड से साबुन, क्रीम, लिप केयर उत्पाद और वुड कोटिंग्स जैसे मूल्य संवर्धित उत्पाद सफलतापूर्वक विकसित किए गए। विशेष रूप से Royalseema RS Soap® का ट्रेडमार्क (ट्रेडमार्क नं. 5870030) पंजीकृत किया गया तथा Royal Red लिपस्टिक ने भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के मानकों को पूरा किया। यह शोध को व्यावहारिक अनुप्रयोगों में बदलने का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे आईसीएफआरई–वन आनुवंशिकी एवं वृक्ष प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर द्वारा विकसित किया गया।

यह पहल न्यायसंगत और समान लाभ-साझेदारी, अवैध व्यापार की रोकथाम तथा जैव विविधता शासन में सामूहिक कार्रवाई को सुदृढ़ करने के प्रति एनबीए की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है। एबीएस से प्राप्त धनराशि को संरक्षण, वैज्ञानिक नवाचार और समुदाय-आधारित विकास में पुनर्निवेश कर एनबीए रेड सैंडर्स के पारिस्थितिक, आनुवंशिक और सामाजिक-आर्थिक मूल्यों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है। ये प्रयास इस स्थानिक प्रजाति को वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखते हुए जैव विविधता शासन में भारत के नेतृत्व को और मजबूत करते हैं।

रेड सैंडर्स संरक्षण के लिए NBA ने 6.2 करोड़ रुपये जारी किए

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राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत प्रवेश और लाभ साझा करने (ABS) तंत्र के तहत 11.12.2025 को लाभार्थियों को 6.2 करोड़ रुपये जारी किए। यह धनराशि लुप्तप्राय रेड सैंडर्स (Pterocarpus santalinus) के संरक्षण का समर्थन करेगी और पाँच राज्यों में किसानों तथा वन-निर्भर समुदायों की आजीविका को सशक्त बनाएगी।

ABS निधि राज्य वन विभागों, राज्य जैव विविधता बोर्डों तथा रेड सैंडर्स उगाने वाले किसानों को जारी की गई है, जो इस स्थानिक और वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण प्रजाति की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह नवीनतम वितरण रेड सैंडर्स के सतत संरक्षण और जिम्मेदार उपयोग को आगे बढ़ाएगा।

जारी किए गए 6.2 करोड़ रुपये में से:

  • तेलंगाना के किसानों को 17.8 लाख रुपये

  • आंध्र प्रदेश के किसानों को 1.1 करोड़ रुपये

  • तमिलनाडु वन विभाग को 2.98 करोड़ रुपये

  • कर्नाटक वन विभाग को 1.05 करोड़ रुपये

  • महाराष्ट्र वन विभाग को 69.2 लाख रुपये

  • तेलंगाना वन विभाग को 5.8 लाख रुपये
    इसके अतिरिक्त, संबंधित राज्य जैव विविधता बोर्डों के बीच 16 लाख रुपये साझा किए गए हैं।

इस नई किश्त के साथ, रेड सैंडर्स संरक्षण के लिए ABS के तहत कुल वितरण 101 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। अब तक, 216 किसान— जिनमें 198 आंध्र प्रदेश और 18 तमिलनाडु के हैं— रेड सैंडर्स ABS तंत्र से लाभान्वित हुए हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और ओडिशा के वन विभाग और राज्य जैव विविधता बोर्ड भी लाभान्वित हुए हैं।

यह धनराशि निम्न कार्यों के लिए उपयोग की जाएगी:

  • अग्रिम पंक्ति संरक्षण

  • गश्त और निगरानी अवसंरचना सुदृढ़ीकरण

  • शोध-आधारित वानिकी पद्धतियाँ

  • समुदाय-आधारित आजीविका कार्यक्रमों का विस्तार

  • रेड सैंडर्स उत्पादकों की सामाजिक-आर्थिक क्षमता में सुधार

इस रिलीज़ के साथ, NBA की कुल ABS वितरण राशि 127 करोड़ रुपये से अधिक हो गई है, जो जैव संसाधनों से जुड़े न्यायपूर्ण और समान लाभ-साझाकरण के क्रियान्वयन में भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को दर्शाती है। यह कार्रवाई राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना 2024–2030 तथा कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा के तहत लक्ष्य-13 तथा लक्ष्य-19 प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

यह वितरण इस बात का प्रमाण है कि जैविक विविधता अधिनियम के ABS प्रावधान संरक्षण को एक सतत आजीविका अवसर में कैसे बदल सकते हैं। ये प्रयास भारत की इस नेतृत्व क्षमता को प्रदर्शित करते हैं कि वह ABS सिद्धांतों को व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी तरीके से लागू कर रहा है—जो पर्यावरणीय सुरक्षा और सतत आजीविका दोनों को सुदृढ़ करता है।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने रेड सैंडर्स किसानों और आंध्र विश्वविद्यालय को ₹3 करोड़ की एबीएस राशि वितरित की

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भारत की जैव विविधता संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority - NBA) ने आंध्र प्रदेश के 198 किसानों और रेड सैंडर्स (लाल चंदन) की खेती करने वालों सहित कुल 199 लाभार्थियों को ₹3.00 करोड़ की राशि वितरित की है। लाभार्थियों में एक शैक्षणिक संस्था — आंध्र विश्वविद्यालय — भी शामिल है। यह वितरण आंध्र प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड के माध्यम से किया गया है और यह जैव विविधता अधिनियम के तहत एक्सेस एंड बेनिफिट-शेयरिंग (Access and Benefit Sharing – ABS) तंत्र का हिस्सा है।

यह पहल, जैव विविधता संरक्षण में समावेशी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए एनबीए द्वारा किए गए लाभ-साझाकरण उपायों की श्रृंखला का हिस्सा है। इससे पहले, एनबीए ने आंध्र प्रदेश वन विभाग, कर्नाटक वन विभाग और आंध्र प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड को रेड सैंडर्स के संरक्षण के लिए ₹48.00 करोड़ तथा तमिलनाडु के किसानों को ₹55.00 लाख जारी किए थे।

वर्तमान वितरण के तहत, प्रत्येक किसान को ₹33,000 से लेकर ₹22.00 लाख तक की राशि प्राप्त होगी, जो इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्होंने उपयोगकर्ताओं को कितनी मात्रा में रेड सैंडर्स की लकड़ी आपूर्ति की है। यह भी उल्लेखनीय है कि किसानों को उनकी लकड़ी की बिक्री कीमत की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त हुआ है।

लाभार्थी आंध्र प्रदेश के चार जिलों — चित्तूर, नेल्लोर, तिरुपति और कडप्पा — के 48 गांवों से हैं, जो इस मूल्यवान स्थानीय प्रजाति की खेती और संरक्षण में संलग्न ग्रामीण समुदायों की व्यापक भागीदारी को दर्शाता है।

इस पहल की शुरुआत एनबीए द्वारा 2015 में गठित रेड सैंडर्स पर विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों से हुई थी। समिति ने “रेड सैंडर्स के उपयोग से उत्पन्न संरक्षण, सतत उपयोग और निष्पक्ष एवं समान लाभ-साझाकरण के लिए नीति” शीर्षक से एक व्यापक नीति तैयार की थी। समिति के कार्य का एक महत्वपूर्ण परिणाम 2019 में विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा की गई नीति शिथिलता थी, जिसके तहत खेती से प्राप्त रेड सैंडर्स के निर्यात की अनुमति दी गई — यह वैध और सतत व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम था।

यह पहल इस बात का प्रमाण है कि किस प्रकार ABS जैसे नीतिगत उपकरण जैव विविधता संरक्षण को एक व्यवहार्य आजीविका विकल्प बना सकते हैं। यह लाभ-साझाकरण पहल जैव विविधता संरक्षण को आजीविका सुधार से जोड़ने, सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने और जैव विविधता के संरक्षकों को उनका उचित अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एनबीए की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है। यह भारत के सबसे मूल्यवान और प्रतीकात्मक वृक्ष — रेड सैंडर्स — के दीर्घकालिक संरक्षण और निष्पक्ष लाभ-साझाकरण के प्रयासों में एक और मील का पत्थर है।

अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल अभयारण्य दिवस 2025: प्रकृति और मानव के संतुलन का उत्सव

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विश्वभर में 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल अभयारण्य दिवस (International Day for Biosphere Reserves) मनाया जाता है — यह दिन उन क्षेत्रों के सम्मान में समर्पित है जहाँ प्रकृति और मानव समुदाय सामंजस्यपूर्ण रूप से सह-अस्तित्व करते हैं। ये अभयारण्य न केवल पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक हैं, बल्कि सतत विकास और सामुदायिक कल्याण के प्रयोगात्मक प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करते हैं।

भारत, जैवमंडल अभयारण्यों के वैश्विक नेटवर्क का एक अग्रणी सदस्य होने के नाते, इस दिवस को गर्व के साथ मनाता है। यहाँ पहाड़ों से लेकर तटीय क्षेत्रों और द्वीपों तक फैले 18 जैवमंडल अभयारण्य (Biosphere Reserves) हैं, जिनमें से 13 यूनेस्को द्वारा विश्व जैवमंडल नेटवर्क (WNBR) में शामिल हैं। ये अभयारण्य भारत की जैव विविधता, पारिस्थितिकीय समृद्धि और स्थानीय समुदायों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

भारत का जैवमंडल अभयारण्य नेटवर्क

भारत के पास वर्तमान में 91,425 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 18 जैवमंडल अभयारण्य हैं। यह कार्यक्रम पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अधीन एक केंद्रीय प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) के रूप में संचालित होता है, जिसमें वित्तीय साझेदारी अनुपात 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 रखा गया है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में जैव विविधता संरक्षण का बजट ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ कर दिया गया है, जो सरकार की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

2025 में हिमाचल प्रदेश के “कोल्ड डेजर्ट बायोस्फीयर रिज़र्व” का यूनेस्को में शामिल होना भारत की बढ़ती वैश्विक संरक्षण भूमिका को और मज़बूती प्रदान करता है।

जैवमंडल अभयारण्य क्या हैं?

जैवमंडल अभयारण्य ऐसे संरक्षित क्षेत्र होते हैं जिन्हें राष्ट्रीय सरकारें नामित करती हैं ताकि:

  • जैव विविधता का संरक्षण किया जा सके,

  • और साथ ही स्थानीय समुदायों के लिए सतत आजीविका के अवसर प्रदान किए जा सकें।

इन्हें “सतत विकास के अध्ययन केंद्र” (Learning Places for Sustainable Development) कहा जाता है।
इनका उद्देश्य सामाजिक और पारिस्थितिकीय प्रणालियों के बीच संबंधों को समझना और उन्हें संतुलित करना है।

विश्वभर में 26 करोड़ से अधिक लोग जैवमंडल अभयारण्यों में रहते हैं, जो कुल मिलाकर 7 मिलियन वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करते हैं — यह ऑस्ट्रेलिया के आकार के बराबर है।

यूनेस्को का “मैन एंड बायोस्फीयर (MAB)” कार्यक्रम

यूनेस्को का Man and Biosphere Programme (MAB) एक अंतरराष्ट्रीय पहल है, जो पृथ्वी के पारिस्थितिकीय संतुलन को समझने और मानव कल्याण के साथ सामंजस्य स्थापित करने पर केंद्रित है।
इसका उद्देश्य है —

  • जैवमंडल में हो रहे प्राकृतिक और मानवीय परिवर्तनों का अध्ययन,

  • जैव और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण को बढ़ावा देना,

  • और सतत विकास के लिए वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करना।

यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय समन्वय परिषद (MAB-ICC) के अंतर्गत संचालित होता है, जिसमें 34 सदस्य देश शामिल हैं।

 भारत की पहल और उपलब्धियाँ

भारत का जैवमंडल अभयारण्य कार्यक्रम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय नेतृत्व का उदाहरण है।
यह कार्यक्रम न केवल पारिस्थितिक संरक्षण को बढ़ावा देता है बल्कि स्थानीय समुदायों के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर भी केंद्रित है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • स्थानीय समुदायों को आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराना

  • बफर और ट्रांज़िशन जोनों में इको-विकास गतिविधियाँ

  • सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से जैव विविधता पर दबाव कम करना

भारत के जैवमंडल अभयारण्य, प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलिफेंट, ग्रीन इंडिया मिशन, और राष्ट्रीय जैव विविधता कार्ययोजना (NBAP) जैसी राष्ट्रीय पहलों के साथ मिलकर एक समग्र संरक्षण ढांचा तैयार करते हैं।

संरक्षण से जुड़ी प्रमुख राष्ट्रीय योजनाएँ

  • प्रोजेक्ट टाइगर (1973): बाघ संरक्षण की भारत की सबसे सफल पहल, जिसने बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की है।

  • प्रोजेक्ट एलिफेंट: एशियाई हाथियों की सुरक्षा, उनके आवास का संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने पर केंद्रित।

  • ग्रीन इंडिया मिशन: जलवायु परिवर्तन से निपटने और वन आच्छादन बढ़ाने की दिशा में राष्ट्रीय अभियान।

  • इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ वाइल्डलाइफ हैबिटैट्स (IDWH): राज्य सरकारों को तकनीकी व वित्तीय सहायता प्रदान करने वाली योजना।

  • ईको सेंसिटिव जोन (ESZ): संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बफर जोन बनाकर पारिस्थितिकी की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

भारत की वैश्विक स्थिति और उपलब्धियाँ

  • भारत विश्व में 9वें स्थान पर है कुल वन क्षेत्र के आधार पर।

  • वार्षिक वन वृद्धि दर में भारत तीसरे स्थान पर है (FAO रिपोर्ट, 2025)।

  • सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक प्रबंधन ने भारत को जैव विविधता संरक्षण में अग्रणी बनाया है।

भारत के प्रयासों ने पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, जलवायु लचीलापन मजबूत करने और जैव विविधता को संरक्षित करने में निर्णायक योगदान दिया है।

निष्कर्ष

  • भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय जैवमंडल अभयारण्य दिवस का उत्सव मनाना उसकी सतत विकास और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
  • भारत के जैवमंडल अभयारण्य यह सिद्ध करते हैं कि प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक कल्याण साथ-साथ चल सकते हैं।
  • यूनेस्को के साथ साझेदारी और सरकार के सुदृढ़ प्रयासों से भारत न केवल जैव विविधता संरक्षण का वैश्विक नेता बना है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सतत जीवन शैली (Sustainable Living) का मार्गदर्शन भी कर रहा है। 


उत्तर प्रदेश और सिक्किम की जैव विविधता प्रबंधन समितियों को राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा ₹18.3 लाख की राशि जारी

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राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने उत्तर प्रदेश और सिक्किम के जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) को ₹18.3 लाख की राशि जारी की है। यह राशि जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत प्रवेश और लाभ-साझेदारी (Access and Benefit Sharing) व्यवस्था के तहत प्रदान की गई है।

यह धनराशि संबंधित राज्य जैव विविधता बोर्डों के माध्यम से सीधे दो बीएमसी को हस्तांतरित की गई —

  1. नर्राऊ ग्राम जैव विविधता प्रबंधन समिति, आक्राबाद कौल तहसील, अलीगढ़ जिला, उत्तर प्रदेश, और

  2. लामपोखरी झील क्षेत्र जैव विविधता प्रबंधन समिति, अरितार, सिक्किम।

उत्तर प्रदेश में एक कंपनी ने नर्राऊ गांव से लिग्नोसेल्यूलोसिक बायोमास से किण्वनीय यौगिक (fermentable compounds) बनाने के लिए फसल सामग्री का उपयोग किया। वहीं सिक्किम में एक अन्य कंपनी ने लामपोखरी झील क्षेत्र की मिट्टी और जल नमूनों से सूक्ष्मजीवों (microorganisms) तक पहुंच प्राप्त की, जिन्हें अनुसंधान उद्देश्य के लिए प्रयोग किया गया।

इन निधियों के माध्यम से, एनबीए स्थानीय समुदायों को जैव विविधता संरक्षण और अपने प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सशक्त बना रहा है।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने स्थानीय समुदायों को ₹1.36 करोड़ जारी किए: जैव विविधता संरक्षण और लाभ-साझेदारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

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जैव विविधता के संरक्षण, सतत उपयोग और लाभों के न्यायसंगत एवं समान वितरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सशक्त प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने ₹1.36 करोड़ की राशि जारी की है, जिससे महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के स्थानीय समुदायों को व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभों का हिस्सा मिलेगा।

यह राशि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्डों के माध्यम से तीन जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) —

  1. साखरवाडी गांव, फलटण तालुका, सतारा जिला (महाराष्ट्र),

  2. कुंजिरवाडी गांव, हवेली तालुका, पुणे (महाराष्ट्र), तथा

  3. कासगंज क्षेत्र, एटा जिला (उत्तर प्रदेश) — को वितरित की जाएगी।

प्रत्येक समिति को ₹45.50 लाख प्राप्त होंगे। यह कदम सरकार की समानता, स्थिरता और संरक्षण के सिद्धांतों के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

यह राशि एक सुगम्य एवं लाभ-साझेदारी (Access and Benefit Sharing – ABS) भुगतान का प्रतिनिधित्व करती है, जो एक वाणिज्यिक इकाई द्वारा मिट्टी और औद्योगिक अपशिष्ट नमूनों से सूक्ष्मजीवों का उपयोग कर फ्रक्टो-ओलिगोसेकेराइड्स उत्पाद बनाने के बाद प्राप्त हुई है। इन निधियों का उपयोग जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 44 और संबंधित राज्य जैव विविधता नियमों के तहत निर्धारित गतिविधियों में किया जाएगा।

यह वित्तीय पहल स्थानीय समुदायों को मान्यता और पुरस्कार देने में एनबीए की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है — जो भारत की समृद्ध जैविक धरोहर के असली संरक्षक हैं। स्थानीय स्तर पर लाभ लौटाकर एनबीए ने समावेशी शासन मॉडल को और सशक्त किया है, जहां संरक्षण और समुदाय की समृद्धि साथ-साथ आगे बढ़ते हैं।

इसके साथ ही यह पहल भारत के अद्यतन राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना (NBSAP) 2024–2030 के राष्ट्रीय लक्ष्य–13 की पूर्ति में योगदान करती है, जो संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (CBD) के CoP-15 में अपनाए गए कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क के अनुरूप है।

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