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युवा तारे T Chamaeleontis के धूल भरे आवरण का रहस्य उजागर, ग्रह निर्माण की प्रक्रिया में नई जानकारी

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खगोलविदों ने T Chamaeleontis (T. Cha) नामक एक युवा तारे के धूल भरे घेरे के पीछे छिपा रहस्य सामने लाया है। यह तारा पृथ्वी से लगभग 350 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है और इसके चारों ओर ग्रह निर्माण की प्रक्रिया चल रही है। हाल ही में इस तारे के अंतःसौर डिस्क की आंतरिक दीवार का हिस्सा आंशिक रूप से ढह गया, जिससे वैज्ञानिकों को ग्रह निर्माण वाले डिस्क में रासायनिक प्रक्रिया को समझने का नया दृष्टिकोण मिला।

T Cha के चारों ओर एक ग्रह-निर्माण डिस्क है जिसमें एक बड़ा अंतराल मौजूद है, जिसे संभवतः नवजात ग्रह ने बनाया है। सामान्य परिस्थितियों में डिस्क का घना आंतरिक हिस्सा तारों की पराबैंगनी (UV) किरणों को बाहर के ठंडे हिस्सों तक पहुँचने से रोकता है। यह सुरक्षा Polycyclic Aromatic Hydrocarbons (PAHs) को पहचानने में मुश्किल पैदा करती है। ये PAH अणु कार्बन और हाइड्रोजन से बने फ्लैट, हनीकॉम्ब जैसी संरचनाएँ हैं और जीवन की प्रारंभिक रसायनशास्त्र में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) के वैज्ञानिकों ने NASA के James Webb Space Telescope (JWST) के Mid Infrared Instrument (MIRI) का उपयोग कर T Cha के स्पेक्ट्रम में PAH अणुओं का अध्ययन किया। 2022 में JWST ने आंशिक रूप से ढह गई आंतरिक दीवार के समय का क्षण पकड़ा, जिससे डिस्क के पहले छायांकित हिस्सों में UV विकिरण पहुंचा और PAH अणु प्रकाशित हुए।

इस खोज ने दिखाया कि PAH अणु दो दशकों के दौरान अपनी मूल संरचना बनाए रखते हुए और चमक बढ़ाते हुए भी स्थिर रहे। T Cha का डिस्क अंतराल इसे युवा ग्रहों और उनके नाभिकीय डिस्क के बीच अंतःक्रियाओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

जैसा कि IIA के शोधकर्ता अरुण रॉय ने कहा, “JWST ने PAH अणुओं को स्पष्ट रूप से उजागर किया और यह सबसे कम द्रव्यमान वाले तारों में से एक है जिसमें PAH का पता चला है। यह अचानक प्रकाश की बहार के कारण अणुओं की चमक बढ़ने के दौरान हुई।”

इस खोज से युवा, सूर्य-समान तारों के चारों ओर ग्रह निर्माण वाले डिस्क में जटिल हाइड्रोकार्बन अणुओं की स्थिति और उनकी स्थिरता को समझने में मदद मिलेगी। 

अंतर Galactic माध्यम (IGM) से गैलेक्सियों के चारों ओर गैस के मापन पर प्रभाव: RRI अध्ययन

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रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI) के नए अध्ययन में सामने आया कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) गैलेक्सी के चारों ओर फैले सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) के माप को प्रभावित कर सकता है

गैलेक्सी के चारों ओर परिक्रहीय माध्यम (Circumgalactic Medium) का कलात्मक चित्रण

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI), जो कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, के एक नए अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) की सामग्री गैलेक्सी के चारों ओर फैले डिफ्यूज एनवलप (CGM) के माप को प्रभावित कर सकती है। CGM का सही अनुमान लगाना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गैलेक्सियों के निर्माण और विकास की प्रक्रिया को समझने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

गैलेक्सी की बाहरी परिधि के बाहर एक पतला और भूत-सा हैलो(Halo) फैला होता है, जिसे सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) कहते हैं। CGM में मुख्य रूप से गैस होती है और यह गैलेक्सी को कॉस्मिक वेब से जोड़ता है। CGM का मापन आमतौर पर उच्च आयनित ऑक्सीजन के माध्यम से किया जाता है।

लेकिन माप में समस्या यह है कि CGM और IGM दोनों एक ही लाइन ऑफ साइट में होते हैं, इसलिए ऑब्जर्वेशन के दौरान यह अलग करना मुश्किल होता है कि ऑक्सीजन CGM से है या IGM से। वर्तमान मॉडल्स पूरी ऑब्ज़र्व की गई ऑक्सीजन को CGM से मान लेते हैं।

गैलेक्सियों के चारों ओर आयनीकृत ऑक्सीजन की उपस्थिति का कलात्मक चित्रण और उनके अवलोकन का सिद्धांत

RRI के शोधकर्ताओं ने मॉडलिंग के माध्यम से यह सुझाव दिया है कि CGM में मापी गई गैस का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में IGM से आ रहा हो सकता है।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष:

  • उच्च द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों (जैसे हमारी मिल्की वे) में CGM आयनित ऑक्सीजन का लगभग 50% योगदान देती है, जबकि शेष 50% IGM से आता है।

  • कम द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों में यह प्रतिशत 30% तक कम हो सकता है।

  • यह अध्ययन दर्शाता है कि CGM के माप में IGM के योगदान को ध्यान में रखना जरूरी है।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता और हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के सहयोगियों ने इस मॉडल को और व्यापक और यथार्थपरक बनाने पर काम करना शुरू कर दिया है, ताकि CGM और IGM के बीच अंतर को और स्पष्ट किया जा सके।

यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करेगा कि गैलेक्सियों के निर्माण और विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक क्या हैं और उन्हें अधिक सटीक रूप से मापा जा सके।रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI) के नए अध्ययन में सामने आया कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) गैलेक्सी के चारों ओर फैले सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) के माप को प्रभावित कर सकता है

कम द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों के मामले में अंतर-गैलेक्सीय माध्यम में आयनीकृत ऑक्सीजन की उपस्थिति का कलात्मक चित्रण

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI), जो कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, के एक नए अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) की सामग्री गैलेक्सी के चारों ओर फैले डिफ्यूज एनवलप (CGM) के माप को प्रभावित कर सकती है। CGM का सही अनुमान लगाना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गैलेक्सियों के निर्माण और विकास की प्रक्रिया को समझने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

गैलेक्सी की बाहरी परिधि के बाहर एक पतला और भूत-सा हало फैला होता है, जिसे सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) कहते हैं। CGM में मुख्य रूप से गैस होती है और यह गैलेक्सी को कॉस्मिक वेब से जोड़ता है। CGM का मापन आमतौर पर उच्च आयनित ऑक्सीजन के माध्यम से किया जाता है।

लेकिन माप में समस्या यह है कि CGM और IGM दोनों एक ही लाइन ऑफ साइट में होते हैं, इसलिए ऑब्जर्वेशन के दौरान यह अलग करना मुश्किल होता है कि ऑक्सीजन CGM से है या IGM से। वर्तमान मॉडल्स पूरी ऑब्ज़र्व की गई ऑक्सीजन को CGM से मान लेते हैं।

RRI के शोधकर्ताओं ने मॉडलिंग के माध्यम से यह सुझाव दिया है कि CGM में मापी गई गैस का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में IGM से आ रहा हो सकता है।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष:

  • उच्च द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों (जैसे हमारी मिल्की वे) में CGM आयनित ऑक्सीजन का लगभग 50% योगदान देती है, जबकि शेष 50% IGM से आता है।

  • कम द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों में यह प्रतिशत 30% तक कम हो सकता है।

  • यह अध्ययन दर्शाता है कि CGM के माप में IGM के योगदान को ध्यान में रखना जरूरी है।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता और हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के सहयोगियों ने इस मॉडल को और व्यापक और यथार्थपरक बनाने पर काम करना शुरू कर दिया है, ताकि CGM और IGM के बीच अंतर को और स्पष्ट किया जा सके।

यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करेगा कि गैलेक्सियों के निर्माण और विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक क्या हैं और उन्हें अधिक सटीक रूप से मापा जा सके।

युवा तारों के प्रारंभिक जीवन की अस्थिरता का नया अध्ययन: बदलाव और अनपेक्षित चमकें उजागर

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एक नए अध्ययन ने युवा तारों (Young Stellar Objects - YSOs) के प्रारंभिक जीवन की अस्थिरता पर पर्दा उठाया है, जिससे पता चला कि तारों का शुरुआती जीवन पहले सोचे गए से कहीं अधिक उथल-पुथल और परिवर्तनशील होता है।

प्रोटोस्ट्रार के चार विकासात्मक चरणों का योजनात्मक चित्रण (एंड्रिया इसेला के 2006 के शोध प्रबंध से अनुकूलित):

  • क्लास 0: ये तारे घने आवरण (dense envelope) में पूरी तरह से ढके होते हैं, और इनके केंद्र में एक छोटा कोर (core) होता है।

  • क्लास I: कोर का आकार बढ़ता रहता है और एक सपाट परिक्रामी डिस्क (flattened circumstellar disk) बनने लगती है।

  • क्लास II: अधिकांश आसपास की सामग्री गैस और धूल की प्रमुख डिस्क में व्यवस्थित हो जाती है।

  • क्लास III: अंतिम चरण में डिस्क लगभग समाप्त हो जाती है, और तारे का स्पेक्ट्रल एनर्जी वितरण (spectral energy distribution) एक परिपक्व तारे (mature stellar photosphere) जैसा दिखता है।

इस अध्ययन में NASA के Wide-field Infrared Survey Explorer (WISE) और इसके विस्तारित मिशन NEOWISE से एक दशक से अधिक का डेटा शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने अब तक के सबसे बड़े और विस्तृत मध्य-इन्फ्रारेड परिवर्तनशीलता कैटलॉग में 22,000 से अधिक YSOs का विश्लेषण किया।

युवा तारों की विशेषताएँ:

  • YSOs वे तारे हैं जो अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में होते हैं और जिनके केंद्र में स्थिर हाइड्रोजन संलयन नहीं होता।

  • ये तारें घने आणविक बादलों (molecular clouds) के संकुचन से बनते हैं।

  • संकुचन विभिन्न घटनाओं जैसे सुपरनोवा विस्फोट, पास के तारे से विकिरण, या अंतर-तारकीय माध्यम में उथल-पुथल से प्रेरित हो सकता है।

    विभिन्न प्रकार के परिवर्तनशील तारों के उदाहरण लाइट कर्व्स (बाएं से दाएं क्रम में) — लीनियर (Linear), वक्र (Curved), आवर्ती/पुनरावृत्त (Periodic), अचानक चमक (Burst), अचानक मंद होना (Drop), और अनियमित (Irregular)

शोध के प्रमुख निष्कर्ष:

  • YSOs के केंद्र में एक प्रोटोटार बनता है, जो चारों ओर घूर्णनशील डिस्क से घिरा होता है।

  • प्रोटोटार का प्रकाश संलयन से नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण संकुचन और द्रव्यमान संचयन (accretion) से उत्पन्न होता है।

  • समय के साथ, डिस्क से सामग्री प्रोटोटार पर जमा होती रहती है, जिससे अचानक चमक बढ़ना या घटने जैसी घटनाएँ होती हैं।

  • युवा तारों की 36% Class I YSOs में परिवर्तनशीलता देखी गई, जबकि विकसित Class III YSOs में यह केवल 22% थी।

  • रंग परिवर्तन से पता चला कि अधिकांश तारों में चमक बढ़ने पर लालिमा बढ़ती है, जबकि कुछ में नीला होना देखा गया, जो आंतरिक डिस्क संरचना या बढ़ी हुई संचयन क्रियाओं को दर्शाता है।

महत्त्व:

यह कैटलॉग अब तक का सबसे पूर्ण मध्य-इन्फ्रारेड दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो यह समझने में मदद करता है कि तारे कैसे बढ़ते हैं, भोजन लेते हैं और अपने धूल भरे परिवेश को छोड़ते हैं। इस कैटलॉग में 5,800 से अधिक परिवर्तनशील YSOs शामिल हैं।

जैसे-जैसे James Webb Space Telescope (JWST) और 3.6m Devasthal Optical Telescope (DOT) जैसी दूरबीनें इस अध्ययन का अनुसरण करेंगी, शोधकर्ता यह समझ पाएंगे कि हमारे जैसे सूर्य जैसे तारे अंधकार से कैसे उत्पन्न हुए।


ब्लैक होल की गतिविधियाँ रोकती हैं नए तारों का जन्म: भारतीय खगोलविदों का महत्वपूर्ण अध्ययन

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ब्लैक होल की गतिविधियाँ उसके आसपास नए तारों के जन्म को दबा सकती हैं — एक हालिया अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। यह खोज ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के विकास की गहरी समझ प्रदान कर सकती है और यह भी समझाने में मदद कर सकती है कि कुछ आकाशगंगाओं में तारा-निर्माण की दर इतनी कम क्यों होती है।

गैलेक्‍सी के केंद्र में मौजूद अति-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल गैस के प्रवाह (outflows) को बाहर फेंकते हैं। खगोलविद लंबे समय से अध्ययन कर रहे हैं कि ये गैस प्रवाह और विकिरण (radiation) कैसे मिलकर आकाशगंगाओं के विकास को प्रभावित करते हैं। अब तक यह समझना एक बड़ी पहेली रहा है कि गैस प्रवाह और ब्लैक होल से निकलने वाले विकिरण का सापेक्ष प्रभाव आकाशगंगाओं के विकास पर कितना होता है।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics – IIA), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक स्वायत्त संस्थान है, के खगोलविदों के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन ने इन शक्तिशाली प्रक्रियाओं पर नई रोशनी डाली है। अध्ययन से पता चला है कि ब्लैक होल के आसपास की तीव्र विकिरण और उनसे निकलने वाले उच्च गति के जेट (jets) दोनों मिलकर आकाशगंगा के केंद्र से गैस को बाहर निकाल सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप आकाशगंगा के केंद्रीय क्षेत्रों में तारा निर्माण लगभग बंद हो जाता है, जिससे उसकी वृद्धि नियंत्रित होती है।

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय वेधशालाओं जैसे Sloan Digital Sky Survey (SDSS) टेलीस्कोप (ऑप्टिकल तरंगदैर्घ्य) और Very Large Array (VLA) रेडियो टेलीस्कोप (रेडियो तरंगदैर्घ्य) से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने लगभग 500 निकटवर्ती आकाशगंगाओं का अध्ययन किया जिनके केंद्रों में सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक (Active Galactic Nuclei – AGN) मौजूद हैं। AGN वे ऊर्जावान क्षेत्र हैं जहाँ ब्लैक होल के आसपास गिरता हुआ पदार्थ अत्यधिक विकिरण और गैस उत्पन्न करता है।

अध्ययन की मुख्य लेखिका और IIA की पीएच.डी. छात्रा पायल नंदी बताती हैं —

“हमने पाया कि आयनित गैस के प्रवाह (outflows) AGN में बहुत आम हैं। हालांकि इनका प्रमुख कारण ब्लैक होल से निकलने वाला विकिरण है, लेकिन जिन आकाशगंगाओं में रेडियो जेट हैं, उनमें ये प्रवाह और भी तेज़ तथा ऊर्जावान पाए गए।”

शोध में यह भी पता चला कि रेडियो तरंगदैर्घ्य पर देखी जाने वाली आकाशगंगाओं में इन गैस प्रवाहों की उपस्थिति 56% मामलों में पाई गई, जबकि जिन आकाशगंगाओं में रेडियो उत्सर्जन नहीं था, उनमें यह केवल 25% थी। ये गैस प्रवाह 2000 किलोमीटर प्रति सेकंड तक की गति से चल सकते हैं — इतनी तेज़ कि वे पूरी आकाशगंगा के गुरुत्वाकर्षण से भी बच निकलें।

एक रूपरेखा जो दर्शाती है कि जेट और विकिरण दोनों वाले AGN, केवल विकिरण से संचालित AGN की तुलना में अधिक शक्तिशाली गैस प्रवाह उत्पन्न करते हैं, जिससे उनकी मेजबान आकाशगंगाओं पर अलग-अलग प्रभाव पड़ते हैं।

IIA के वैज्ञानिक सी. एस. स्टालिन, जो अध्ययन के सह-लेखक हैं, ने कहा —

“यह अध्ययन यह दिखाता है कि आकाशगंगाओं के विकास को समझने के लिए बहु-तरंगदैर्घ्य (multi-wavelength) डेटा को साथ में उपयोग करना कितना आवश्यक है।”

वैज्ञानिकों ने पाया कि इन गैस प्रवाहों की ऊर्जा का संबंध ब्लैक होल की कुल चमक (luminosity) से गहराई से जुड़ा है। विशेष रूप से उन आकाशगंगाओं में जिनमें रेडियो जेट मौजूद हैं, यह संबंध और भी मजबूत है। इसका अर्थ यह है कि जेट मुख्य कारण नहीं हैं, लेकिन वे ब्लैक होल से निकलने वाली ऊर्जा को “बूस्ट” कर अधिक गैस बाहर निकालने में मदद करते हैं।

सह-लेखक ध्रुबा जे. साइकिया (IUCAA) ने कहा —

“ये निष्कर्ष सुपरमैसिव ब्लैक होल, रेडियो जेट, तारा निर्माण और आकाशगंगा के विकास के बीच के जटिल संबंधों को समझने में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।”

अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन गैस प्रवाहों के कारण आकाशगंगाओं के केंद्र में तारा निर्माण लगभग पूरी तरह बंद हो गया है। ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड अवलोकनों से यह पुष्टि की गई कि ये हवाएँ ब्लैक होल की गतिविधि से संचालित हैं, न कि नए तारों के बनने से।

इस प्रकार, यह अध्ययन तथाकथित निगेटिव AGN फीडबैक (negative AGN feedback) को दर्शाता है — यानी ब्लैक होल की गतिविधियाँ अपने आसपास नए तारों के बनने को रोक देती हैं।

यह अध्ययन The Astrophysical Journal में प्रकाशित हुआ है और यह ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के विकास की प्रक्रिया को समझने में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह दिखाता है कि ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमय पिंड — सुपरमैसिव ब्लैक होल — भी अपने आसपास के तारों और आकाशगंगाओं के भाग्य को आकार देने में गहरा प्रभाव डालते हैं।

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