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पौध-आधारित प्रोटीन निर्माण में आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा, टीडीबी ने सोनिक बायोकेम को दी वित्तीय सहायता

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मूल्य संवर्धित खाद्य प्रसंस्करण और पौध-आधारित पोषण में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: टीडीबी ने सोनिक बायोकेम एक्सट्रैक्शन्स को वित्तीय सहायता प्रदान की

भारत में मूल्य संवर्धित खाद्य प्रसंस्करण तथा पौध-आधारित पोषण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करते हुए, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) ने मेसर्स सोनिक बायोकेम एक्सट्रैक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड, इंदौर (मध्य प्रदेश) को "फंक्शनल एवं टेक्सचर्ड सोया प्रोटीन कंसन्ट्रेट का विकास और व्यावसायीकरण" परियोजना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है।

इस परियोजना का उद्देश्य कंपनी द्वारा विकसित स्वदेशी प्रौद्योगिकी के आधार पर फंक्शनल सोया प्रोटीन कंसन्ट्रेट (FSPC) और टेक्सचर्ड सोया प्रोटीन कंसन्ट्रेट (TSPC) के व्यावसायिक उत्पादन हेतु अत्याधुनिक विनिर्माण सुविधा स्थापित करना है।

यह पहल उच्च गुणवत्ता वाले, नॉन-जीएमओ (Non-GMO) पौध-आधारित प्रोटीन उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग को ध्यान में रखकर शुरू की गई है। स्वास्थ्यवर्धक, टिकाऊ और क्लीन-लेबल खाद्य उत्पादों की ओर बढ़ती उपभोक्ता रुचि के कारण ऐसे उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। यह परियोजना भारत सरकार के आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के अनुरूप खाद्य प्रसंस्करण क्षमता को मजबूत करने, कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन करने तथा आयात के स्थान पर स्वदेशी उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने में सहायक होगी।

दो दशकों से अधिक समय से नॉन-जीएमओ सोया खाद्य अवयवों के निर्माण और निर्यात में कार्यरत सोनिक बायोकेम ने सोया प्रोटीन कंसन्ट्रेट (SPC) के आधार पर FSPC और TSPC के उत्पादन की स्वदेशी तकनीक विकसित की है।

पारंपरिक उत्पादन प्रक्रियाओं में अपेक्षाकृत महंगे सोया प्रोटीन आइसोलेट (SPI) का उपयोग किया जाता है, जिसे मुख्यतः चीन और अमेरिका जैसे देशों से आयात किया जाता है। इसके विपरीत, कंपनी की तकनीक में स्वयं विकसित और देश में निर्मित SPC का उपयोग किया जाता है, जो समान कार्यात्मक गुण प्रदान करता है। इससे उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और पौध-आधारित प्रोटीन क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता मजबूत होगी।

इस परियोजना के माध्यम से इन उन्नत प्रोटीन उत्पादों का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन किया जाएगा, जिनका उपयोग प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, पौध-आधारित मांस विकल्पों, पोषण संबंधी सप्लीमेंट्स तथा कार्यात्मक खाद्य उत्पादों में व्यापक रूप से किया जाता है। यह तकनीक आयात पर निर्भरता कम करेगी, नए निर्यात अवसर उत्पन्न करेगी तथा मूल्य संवर्धित पौध-आधारित प्रोटीन के तेजी से बढ़ते वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को और मजबूत बनाएगी।

स्वदेशी तकनीक और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नॉन-जीएमओ सोयाबीन का उपयोग करते हुए यह परियोजना उच्च मूल्य वाले प्रोटीन अवयवों की मजबूत घरेलू आपूर्ति श्रृंखला विकसित करेगी। साथ ही भारतीय खाद्य उद्योग को वैश्विक स्तर के प्रतिस्पर्धी कच्चे माल की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित करेगी। इससे कृषि क्षेत्र को बेहतर मूल्य प्राप्त होगा और देश को टिकाऊ खाद्य प्रणाली की ओर बढ़ने में सहायता मिलेगी।

इस अवसर पर टीडीबी के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा:

"उन्नत पौध-आधारित प्रोटीन अवयवों के लिए स्वदेशी विनिर्माण क्षमता का विकास भारत के खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को मजबूत करने और वैश्विक बाजार में हमारी उपस्थिति बढ़ाने के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। टीडीबी ऐसी तकनीकों को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है जो मूल्य संवर्धन को बढ़ावा दें, आयात पर निर्भरता कम करें और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पाद विकसित करें। यह पहल विदेशी मुद्रा की उल्लेखनीय बचत करने के साथ-साथ भारत के लिए नए निर्यात अवसर भी सृजित करेगी।"

सोनिक बायोकेम एक्सट्रैक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड के नेतृत्व ने टीडीबी के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस वित्तीय सहायता से कंपनी अपनी स्वदेशी विकसित तकनीक का बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण कर सकेगी, नॉन-जीएमओ सोया प्रोटीन उत्पादों के क्षेत्र में भारत की अग्रणी भूमिका को और मजबूत करेगी तथा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिकाऊ एवं उच्च गुणवत्ता वाले पौध-आधारित पोषण उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने में सक्षम होगी।

मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी: वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन से कृषि को मिल रही नई दिशा

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नई दिल्ली- भारत की कृषि व्यवस्था की नींव मानी जाने वाली मिट्टी को सुरक्षित और उपजाऊ बनाने के लिए केंद्र सरकार कई महत्वपूर्ण योजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और डिजिटल तकनीकों के माध्यम से देश में खेती को अधिक टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए जा रहे हैं।


देश के कुल 306.65 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में लगभग 59 प्रतिशत भूमि कृषि के अंतर्गत आती है। ऐसे में मिट्टी की गुणवत्ता सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और देश की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है। इसी उद्देश्य से सरकार मृदा संरक्षण और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दे रही है।

25.89 करोड़ से अधिक किसानों को मिला मृदा स्वास्थ्य कार्ड

किसानों को उनकी भूमि की वास्तविक पोषक स्थिति की जानकारी देने के लिए चलाई जा रही मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत अब तक 25.89 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इस योजना के माध्यम से किसानों को फसल के अनुसार उर्वरकों के संतुलित उपयोग की सलाह दी जा रही है, जिससे उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ लागत में भी कमी आ रही है।

प्राकृतिक खेती को मिल रहा बढ़ावा

सरकार द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) के तहत मार्च 2026 तक देशभर में 18,786 क्लस्टरों में 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल किया जा चुका है। इस अभियान से 18 लाख से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। मिशन का उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना और पर्यावरण के अनुकूल खेती को प्रोत्साहित करना है।

'खेत बचाओ अभियान' से बढ़ी किसानों की जागरूकता

संतुलित उर्वरक उपयोग और मिट्टी संरक्षण को लेकर सरकार द्वारा चलाए गए 'खेत बचाओ अभियान' के तहत देशभर में हजारों प्रशिक्षण कार्यक्रम, जागरूकता शिविर और खेत प्रदर्शन आयोजित किए गए। इस अभियान से करीब 1.07 करोड़ किसानों और अन्य हितधारकों तक सीधा संदेश पहुंचा, जबकि सोशल मीडिया के माध्यम से लगभग 4.5 करोड़ लोगों को जोड़ा गया।

AI और डिजिटल तकनीक बदल रही खेती की तस्वीर

अब खेती केवल पारंपरिक अनुभव पर नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीकों पर भी आधारित हो रही है। सरकार भू-स्थानिक (Geospatial) मैपिंग, डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से किसानों को मिट्टी, मौसम और फसल के अनुसार सटीक सलाह उपलब्ध करा रही है। इससे उर्वरकों और पानी का बेहतर उपयोग संभव हो रहा है तथा खेती अधिक लाभदायक बन रही है।

किसानों को मिला सीधा लाभ

झारखंड के धनबाद के किसान निरापदो गोराई ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सलाह के अनुसार उर्वरकों का उपयोग किया, जिससे प्रति एकड़ उर्वरक लागत में लगभग 720 रुपये की बचत हुई और धान की पैदावार 1,000 किलोग्राम से बढ़कर 1,320 किलोग्राम प्रति एकड़ हो गई। यह उदाहरण बताता है कि वैज्ञानिक खेती किसानों की आय बढ़ाने में कितनी प्रभावी साबित हो रही है।

निष्कर्ष

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर रहेगा तो कृषि उत्पादन, किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत होगी। मृदा संरक्षण, प्राकृतिक खेती और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से भारत टिकाऊ कृषि की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

राष्ट्रीय मंच पर चमकी धमतरी की अभिनव पहल, सीएससी स्थापना दिवस पर PACS ड्रोन मॉडल को मिली विशेष पहचान

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कोलकाता में आयोजित 17वें सीएससी स्थापना दिवस समारोह में धमतरी के कृषि नवाचार की सराहना, ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल कृषि सेवाओं के विस्तार का बना मॉडल

रायपुर- कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) ई-गवर्नेंस सर्विसेज इंडिया लिमिटेड के 17वें स्थापना दिवस के अवसर पर पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित धोनो धान्यो ऑडिटोरियम में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की अभिनव पहल PACS ड्रोन मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली। कार्यक्रम में जिले द्वारा प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS) के माध्यम से संचालित ड्रोन सेवाओं, डिजिटल क्रॉप सर्वे तथा किसान पंजीयन (फार्मर रजिस्ट्री) जैसे नवाचारों की सराहना की गई। समारोह के मुख्य अतिथि पश्चिम बंगाल शासन के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री दिलीप घोष थे।


 कार्यक्रम के दौरान मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत धमतरी जयंत नाहटा ने PACS के माध्यम से कृषि उन्नयन“ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में भाग लेते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में ड्रोन सेवाओं के विस्तार तथा PACS को ’वन स्टॉप रूरल सर्विस सेंटर’ के रूप में विकसित करने की कार्ययोजना प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि वर्तमान में जिले की 10 प्राथमिक कृषि साख समितियों के माध्यम से ड्रोन द्वारा तरल उर्वरकों का छिड़काव किया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ में धमतरी जिले की एक अभिनव पहल है।

उन्होंने कहा कि भविष्य में PACS के माध्यम से किसानों को कृषि यंत्रीकरण, डिजिटल सेवाएं, फसल सर्वेक्षण, किसान पंजीयन, वित्तीय एवं बैंकिंग सेवाओं सहित विभिन्न सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने की योजना है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक कृषि सेवाओं की पहुंच बढ़ेगी तथा किसानों को तकनीक आधारित सुविधाओं का लाभ सहजता से प्राप्त होगा।

कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को किसानों की आय बढ़ाने, कृषि लागत कम करने तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। कार्यक्रम में उत्कृष्ट कार्य करने वाले सीएससी-व्हीएलई को सम्मानित भी किया गया।

कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल शासन के सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अपर मुख्य सचिव, भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव तथा सीएससी ई-गवर्नेंस सर्विसेज इंडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी अखिल कुमार सहित देशभर के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एवं सीएससी प्रतिनिधि उपस्थित थे।

सफलता की कहानी-मिलेट से बढ़ी आय, किसानों के जीवन में आई खुशहाली

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श्री अन्न की खेती बन रही लाभ का नया माध्यम

रायपुर- छत्तीसगढ़ और पूरे भारत में मिलेट्स (मोटा अनाज) की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। कम लागत, कम पानी और बंजर भूमि में भी बेहतरीन पैदावार देने के कारण मिलेट्स किसानों की आय बढ़ा रहे हैं और उनके जीवन में खुशहाली ला रहे हैं । कभी पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे रागी (मड़िया), कोदो और कुटकी जैसे मोटे अनाज आज पूरी दुनिया में ‘सुपर फूड’ के रूप में पहचान बना चुके हैं। पौष्टिक गुणों से भरपूर ये अनाज अब घरों के साथ-साथ होटलों और रेस्टोरेंटों में भी पसंद किए जा रहे हैं। बढ़ती मांग और बेहतर बाजार मूल्य ने किसानों के लिए मिलेट (श्री अन्न) की खेती को लाभकारी बना दिया है।

शासन की पहल से बढ़ा श्री अन्न का महत्व

केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मिलेट फसलों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहायता प्रदान की जा रही है। समर्थन मूल्य में वृद्धि और बाजार उपलब्धता के कारण अब अधिक किसान श्री अन्न की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

कृषि उन्नति योजना से मिली नई दिशा

जिले के ग्राम पोटाली और नहाड़ी के दो युवा किसानों ने कृषक उन्नति योजना का लाभ लेकर मिलेट उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। उनकी मेहनत और योजना से मिली सहायता ने उनकी आय में बड़ा बदलाव लाया है।

दिलीप मरकाम ने कोदो-कुटकी से कमाए डेढ़ लाख रुपये

ग्राम पोटाली के धुरवा पारा निवासी किसान दिलीप मरकाम ने इस वर्ष अपने खेत में कोदो-कुटकी की खेती कर लगभग 1 लाख 50 हजार रुपये का लाभ अर्जित किया। वे अपने 17 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में कोदो-कुटकी के साथ धान और सब्जियों का उत्पादन भी करते हैं। दिलीप ने बताया कि उन्होंने इस वर्ष 88 क्विंटल धान बेचकर लगभग 2 लाख 72 हजार रुपये की आय प्राप्त की। खेती को आधुनिक बनाने के लिए उनके पास पावर टिलर जैसे कृषि यंत्र भी उपलब्ध हैं। वे अपनी आय का एक हिस्सा खेती के विकास और नई तकनीकों को अपनाने में निवेश करना चाहते हैं।

हलदर हेमला की मेहनत भी लाई रंग

ग्राम नहाड़ी के किसान हलदर हेमला ने भी कोदो-कुटकी की खेती से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। उन्होंने इस फसल से लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये का लाभ कमाया। उनका कहना है कि मिलेट की खेती कम लागत में बेहतर आय देने वाली फसल साबित हो रही है।

किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही योजना

दिलीप मरकाम और हलदर हेमला का मानना है कि कृषक उन्नति योजना मोटे अनाज उत्पादक किसानों के लिए बेहद लाभकारी है। योजना के माध्यम से किसानों को प्रोत्साहन मिलने से श्री अन्न की खेती का रकबा बढ़ रहा है और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।

स्वास्थ्य और समृद्धि का संगम है श्री अन्न

कोदो, कुटकी और रागी जैसे मोटे अनाज कैल्शियम, आयरन और फाइबर से भरपूर होते हैं। ये ग्लूटेन मुक्त होने के कारण आसानी से पच जाते हैं तथा स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं। यही कारण है कि इनकी मांग लगातार बढ़ रही है और किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है।

सफलता की सीख

पारंपरिक फसलों को आधुनिक बाजार से जोड़कर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। दिलीप मरकाम और हलदर हेमला की सफलता यह साबित करती है कि शासन की योजनाओं और मेहनत के साथ श्री अन्न की खेती ग्रामीण समृद्धि का मजबूत आधार बन सकती है।

सफलता की कहानी-धान छोड़ फूलों की खेती ने बदली आनंदराम की तकदीर

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22 हजार के बदले कमाए 3 लाख रुपए

गेंदा उत्पादन से कोड़केल के किसान ने पेश की सफलता की मिसाल

रायपुर- छत्तीसगढ़ में किसान अब पारंपरिक धान की खेती छोड़कर फूलों की खेती अपनाकर अपनी तकदीर बदल रहे हैं। उद्यानिकी विभाग और सरकारी योजनाओं की मदद से गेंदा, गुलाब जैसे फूलों की वैज्ञानिक खेती कर किसान कम लागत में लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार आया है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन और उद्यानिकी विभाग से मार्गदर्शन मिलने के कारण किसान वैज्ञानिक पद्धति से अधिक उत्पादन ले रहे हैं। एक किसान आनंदराम सिदार की सफलता देखकर अब अन्य ग्रामीण भी परंपरागत खेती से आगे बढ़कर उद्यानिकी फसलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

परंपरागत खेती के दौर में जहाँ किसान अक्सर कम मुनाफे से परेशान रहते हैं, वहीं रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखण्ड के एक छोटे से गाँव कोड़केल के किसान आनंदराम सिदार ने नवाचार से समृद्धि की नई इबारत लिखी है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन की श्गेंदा क्षेत्र विस्तार योजनाश् का लाभ उठाकर आनंदराम ने अपनी आय में कई गुना वृद्धि की है।

धान बनाम गेंदा- मुनाफे का बड़ा अंतर

आनंदराम सिदार पहले पारंपरिक धान की खेती पर निर्भर थे। वे 10 क्विंटल धान का उत्पादन कर मुश्किल से 31 हजार रुपए की कुल आय प्राप्त कर पाते थे, जिसमें से लागत काटकर उनके हाथ मात्र 22 हजार रुपए का लाभ आता था। लेकिन उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने 0.400 हेक्टेयर क्षेत्र में गेंदा फूल की खेती शुरू की, जिससे उनकी आय का ग्राफ अचानक बदल गया।

तकनीकी सहयोग और बंपर उत्पादन

वर्ष 2025-26 के दौरान उद्यानिकी विभाग ने उन्हें उन्नत बीज, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। आनंदराम की मेहनत और विभागीय सहयोग का नतीजा यह रहा कि उन्होंने कुल उत्पादन लगभग 44 क्विंटल गेंदा फूल बेचकर 

 3 लाख रुपए से अधिक की कुल आमदनी हासिल की। धान की तुलना में बेहतर रिटर्न और कम समय में अधिक आय प्राप्त किया।

क्षेत्र के किसानों के लिए बने रोल मॉडल

आनंदराम सिदार की इस सफलता ने पूरे रायगढ़ जिले में गेंदा जैसी नगदी फसलों के प्रति अन्य किसानों का रुझान बढ़ा दिया है। अब क्षेत्र के कई किसान धान के स्थान पर फूलों की खेती को एक लाभकारी विकल्प के रूप में अपना रहे हैं। आनंदराम सिदार का कहना है कि शुरुआत में जोखिम लग रहा था, लेकिन उद्यानिकी विभाग के तकनीकी सहयोग और सही समय पर की गई देखरेख ने मेरी तकदीर बदल दी। आज मैं आत्मनिर्भर हूँ और अपने परिवार को बेहतर जीवन दे पा रहा हूँ।

विभाग की सक्रिय पहल

रायगढ़ जिले में राष्ट्रीय बागवानी मिशन की गेंदा क्षेत्र विस्तार योजना से जुड़ने के बाद आनंदराम सिदार का जीवन की दिशा ही बदल गई। उद्यानिकी विभाग की सक्रियता से फूलों की खेती अब एक टिकाऊ और मुनाफे वाले व्यवसाय के रूप में उभर रही है। विभाग द्वारा लगातार किसानों को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है।

परंपरागत खेती छोड़ फूलों की खेती अपनाई, कम लागत में मिला ज्यादा मुनाफा

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एक किसान की सफलता बनी प्रेरणा, गांव के अन्य किसान भी बढ़ा रहे कदम

रायपुर- परंपरागत खेती (गेहूं-धान) की तुलना में फूलों की खेती कम लागत में 3-4 गुना तक अधिक मुनाफा दे रही है। गेंदा, गुलाब और गुलदाउदी जैसे फूलों की 12 महीने मांग होने से किसान हर सीजन में बंपर कमाई कर रहे हैं। कम पूंजी से शुरू होकर, यह व्यवसाय प्रति हेक्टेयर लाखों रुपये का शुद्ध लाभ  दे रहा है, जिससे किसान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।  शादी, पार्टी, त्यौहार और धार्मिक आयोजनों में फूलों की मांग साल भर बनी रहती है, जिससे अच्छी कीमतें मिलती हैं।

राज्य शासन की योजनाओं का लाभ लेकर रायगढ़ जिले के किसान अब परंपरागत खेती से आगे बढ़ते हुए उद्यानिकी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में लैलूंगा विकासखंड के ग्राम गमेकेरा निवासी किसान ईश्वरचरण पैकरा ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन से फूलों की खेती अपनाकर अपनी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि की है। किसान की सफलता आज सबके लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।

ईश्वरचरण पैकरा पहले परंपरागत रूप से धान की खेती किया करते थे, जिसमें मेहनत के मुकाबले आय सीमित थी। वर्ष 2025-26 में उन्होंने उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में 0.400 हेक्टेयर भूमि पर गेंदा फूल की खेती शुरू की। विभाग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं आवश्यक मार्गदर्शन मिलने से उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से खेती की, जिसका परिणाम बेहद सकारात्मक रहा। जहां पहले धान की खेती से उन्हें लगभग 11 क्विंटल उत्पादन मिलता था और सीमित आय होती थी, वहीं फूलों की खेती से उन्हें करीब 38 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। इस उत्पादन से उनकी कुल आमदनी लगभग 3 लाख 4 हजार रुपये तक पहुंच गई। लागत निकालने के बाद उन्हें लगभग 2 लाख 59 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक है।

फूलों की खेती में सफलता मिलने के बाद ईश्वरचरण पैकरा का आत्मविश्वास बढ़ा है। वे बताते हैं कि कम समय में अधिक लाभ मिलने के कारण अब वे इस खेती को और विस्तार देने की योजना बना रहे हैं। उनके खेत में खिले गेंदा फूलों की रंगीन पंक्तियां आज उनकी मेहनत और सफलता की कहानी बयां करती हैं। उनकी इस उपलब्धि को देखकर गांव के अन्य किसान भी अब उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और विभाग से संपर्क कर फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इस प्रकार राज्य शासन की योजनाएं न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो रही हैं, बल्कि कृषि के स्वरूप में भी सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।

सफलता की कहानी-राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से फायदा,ग्राफ्टेड टमाटर की खेती से दुबेलाल का बढ़ा मुनाफा

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रायपुर- प्रदेश के किसान शासन की योजनाओं का लाभ लेकर और आधुनिक खेती किसानी की तकनीकों को अपनाकर अपनी आमदानी में इजाफा कर रहे हैं। ऐसे ही महासमुन्द जिले के अंतर्गत ग्राम बम्बुरडीह के किसान दुबेलाल कोसरे ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है।दुबेलाल कोसरे, बताते हैं कि पूर्व में वे पारंपरिक रूप से धान एवं अन्य फसलों की खेती करते थे। इस पारंपरिक खेती में लागत अपेक्षाकृत अधिक होने के बावजूद उन्हें सीमित लाभ ही प्राप्त हो पाता था, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा था।

वर्ष 2025-26 में उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में उन्हें यह जानकारी प्राप्त हुई कि उद्यानिकी फसलों के माध्यम से कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन एवं अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। इस जानकारी से प्रेरित होकर उन्होंने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत ग्राफ्टेड टमाटर सीडलिंग प्रदर्शन घटक का लाभ लिया। दुबेलाल कोसरे बताते है कि योजना के तहत उन्हें 30 हजार रुपए का अनुदान भी प्राप्त हुआ, जिससे उन्होंने अपने 0.40 हेक्टेयर सिंचित भूमि में आधुनिक तकनीक के माध्यम से ग्राफ्टेड टमाटर की खेती प्रारंभ की।

कृषक दुबेलाल कोसरे द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली ग्राफ्टेड पौध, सिंचाई हेतु ड्रिप प्रणाली तथा खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग तकनीक का उपयोग किया गया। वे बताते हैं कि उन्नत तकनीकों के समुचित उपयोग से उन्हें प्रति एकड़ लगभग 16 से 18 टन तक उत्पादन प्राप्त हुआ। बाजार में टमाटर का औसत विक्रय मूल्य लगभग 20 रुपए प्रति किलोग्राम मिलने से उन्हें कुल लगभग 3 लाख 9 हजार रुपए का लाभ प्राप्त हुआ। यह लाभ धान की खेती की तुलना में कई गुना अधिक रहा, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।दुबेलाल कोसरे द्वारा अन्य किसानों को उन्नत तकनीकों को अपनाने तथा बाजार की मांग के अनुरूप फसल उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा हैं। उनके मार्गदर्शन से ग्राम बम्बुरडीह के अन्य कृषक भी उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और आधुनिक खेती को अपनाने लगे हैं।


डिजिटल क्रॉप सर्वे से बढ़ी पारदर्शिता, 58 हजार से अधिक युवाओं को रोजगार

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में कृषि क्षेत्र को तकनीकी रूप से सशक्त और आधुनिक बनाने की दिशा में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी एग्रीस्टेक परियोजना नई क्रांति का आधार बन रही है। इस परियोजना के अंतर्गत संचालित डिजिटल क्रॉप सर्वे (Digital Crop Survey) योजना ने राज्य में खेती-किसानी को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ते हुए पारदर्शिता और सटीकता बढ़ाने का कार्य किया है। मोबाइल ऐप आधारित इस सर्वे के जरिए खरीफ और रबी फसलों की जानकारी ऑनलाइन दर्ज की जा रही है, जिससे कृषि प्रबंधन अधिक प्रभावी बन रहा है।

85 प्रतिशत खसरों का डिजिटल सत्यापन पूर्ण

खरीफ वर्ष 2025 के लिए 15 अगस्त 2025 से प्रारंभ किए गए डिजिटल क्रॉप सर्वे में राज्य के 33 जिलों के 18,008 गांवों के कुल 1 करोड़ 19 लाख 68 हजार 415 खसरों का सर्वेक्षण किया गया। इनमें से 1 करोड़ 18 लाख 07 हजार 537 खसरों को अनुमोदित किया गया है। इस प्रकार 85 प्रतिशत खसरों का डिजिटल सर्वे कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया गया है। वहीं, रबी फसल वर्ष 2026 का सर्वे 1 जनवरी 2026 से जारी है।

79 प्रतिशत किसानों की बनी फार्मर आईडी

एग्रीस्टेक परियोजना के तहत राज्य के कुल 40 लाख 08 हजार 908 किसानों में से 31 लाख 68 हजार 555 किसानों का सत्यापन कर फार्मर आईडी तैयार की जा चुकी है। यह कुल किसानों का 79.22 प्रतिशत है। राज्य के उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए केंद्र सरकार ने विशेष केंद्रीय सहायता योजना के अंतर्गत 104 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की है।

तकनीक से मजबूत होगा कृषि तंत्र

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि प्रदेश सरकार किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर खेती को अधिक सक्षम और पारदर्शी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि एग्रीस्टेक परियोजना के माध्यम से किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ शीघ्र मिलेगा तथा कृषि आंकड़ों का वैज्ञानिक प्रबंधन संभव होगा।

ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का नया अवसर

राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा कि डिजिटल क्रॉप सर्वे केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का नया माध्यम बन रहा है। उन्होंने बताया कि खरीफ सीजन 2025-26 में 33 जिलों के 14,066 गांवों में डिजिटल फसल सर्वेक्षण कार्य पूर्ण किया गया, जिसमें 58 हजार 335 ग्रामीण बेरोजगार युवाओं को सर्वेयर के रूप में रोजगार मिला। इन युवाओं को इस कार्य के एवज में लगभग 12 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा।

साल में दो बार मिलेगा रोजगार

अब वर्ष में दो बार—खरीफ और रबी सीजन में—डिजिटल फसल सर्वे होने से ग्रामीण युवाओं को नियमित रोजगार के अवसर मिलेंगे। इससे गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और तकनीक आधारित कृषि प्रणाली को नई मजबूती मिलेगी।

देशभर में प्राकृतिक खेती के प्रसार हेतु दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF), गाजियाबाद द्वारा 24–25 मार्च 2026 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य देशभर में जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना था। इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, कृषि अधिकारियों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), बायो-इनपुट निर्माताओं, प्रगतिशील किसानों और छात्रों ने भाग लिया।

इस दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन नई दिल्ली में डॉ. एस.के. चौधरी, महानिदेशक, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा किया गया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ये मृदा उर्वरता बनाए रखने, पर्यावरण संरक्षण और खेती की लागत कम करने में सहायक हैं।

विशिष्ट अतिथियों में डॉ. जे.के. जेना, महानिदेशक, मत्स्य विभाग ने मत्स्य पालन में जैविक कृषि की भूमिका पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. वेलु मुरुगन ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन में प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को रेखांकित किया। पद्मश्री नेक राम शर्मा ने पिछले 30 वर्षों में प्राकृतिक खेती के अपने अनुभव और सफलता की कहानी साझा की।

तकनीकी सत्र में डॉ. रवि शंकर ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में विज्ञान की भूमिका प्रस्तुत की। अन्य वक्ताओं, जिनमें प्रगतिशील किसान भी शामिल थे, ने अपने अनुभव साझा किए। सत्रों में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय पर जोर दिया गया, ताकि 2047 तक “विकसित भारत” के लक्ष्य को हासिल किया जा सके।

कार्यक्रम में जिन प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई, उनमें शामिल हैं:

  • मृदा स्वास्थ्य और बायो-इनपुट

  • प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक तकनीकें

  • जैव विविधता आधारित कीट प्रबंधन

  • PGS-इंडिया प्रमाणन प्रणाली

  • जैविक उत्पादों का विपणन और मूल्य श्रृंखला

संगोष्ठी के साथ-साथ एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें जैविक और प्राकृतिक खेती से जुड़े नवाचारों को प्रदर्शित किया गया। इसमें बायो-इनपुट केंद्रों, स्टार्टअप्स, एफपीओ और जैविक उत्पादों से जुड़ी कंपनियों ने भाग लिया।

यह संगोष्ठी टिकाऊ कृषि पद्धतियों, जैविक एवं प्राकृतिक खेती की तकनीकों, बाजार अवसरों और नीतिगत समर्थन पर व्यापक चर्चा के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करने का उद्देश्य रखती थी। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) के तहत मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने, गुणवत्ता सुधार और बाजार एकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया।

राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF)

राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, जिसे पहले राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, देश में जैविक और प्राकृतिक खेती के विकास, प्रमाणन और क्षमता निर्माण के लिए एक प्रमुख संस्थान है। यह केंद्र PGS-इंडिया प्रमाणन प्रणाली का कार्यान्वयन, जैविक उर्वरकों की गुणवत्ता परीक्षण, किसानों और कृषि कर्मियों का प्रशिक्षण तथा सतत कृषि प्रथाओं के प्रसार जैसे महत्वपूर्ण कार्य करता है।

खेत से भविष्य तक: सुशासन से सशक्त होती भारतीय कृषि की कहानियाँ

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महाराष्ट्र के नासिक जिले के दाभाड़ी गाँव में रहने वाली भावना नीलकंठ निकम ने स्नातक होने के बावजूद कृषि को अपना पेशा चुना। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) द्वारा उपलब्ध कराए गए संरचित क्षमता निर्माण प्रशिक्षण और कृषि विभाग की विभिन्न योजनाओं के सहयोग से उन्होंने 2,000 वर्ग मीटर का पॉलीहाउस स्थापित किया। उन्होंने ड्रिप सिंचाई, कृषि यंत्रीकरण तथा मत्स्य और कुक्कुट पालन जैसी सहायक गतिविधियों को अपनाते हुए आधुनिक कृषि पद्धतियाँ लागू कीं। उनके खेत में शिमला मिर्च, टमाटर, सेम और अंगूर जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों का उत्पादन होता है। वर्षा जल संचयन तालाबों की व्यवस्था के कारण सूखे समय में भी सिंचाई सुनिश्चित रहती है। नवाचारपूर्ण खेती के लिए उन्हें वर्ष 2021 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा “नवाचारी महिला किसान सम्मान पत्र” सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। उनका खेत अब एक आदर्श एकीकृत कृषि मॉडल बन चुका है, जिससे न केवल उनकी आय में विविधता आई है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए यह एक प्रेरक और प्रशिक्षण स्थल भी बन गया है।

वहीं बिहार के बांका जिले में बिनीता कुमारी ने सीमित संसाधनों के बावजूद एक सफल आजीविका मॉडल विकसित किया। कृषि परिवार से आने वाली बिनीता कुमारी ने KVK बांका से मशरूम उत्पादन और स्पॉन निर्माण का प्रशिक्षण प्राप्त किया। मात्र 25 मशरूम बैग से शुरुआत कर उन्होंने विभिन्न किस्मों के मशरूम और वर्षभर उत्पादन प्रणाली अपनाई। आज वे ताजे मशरूम और स्पॉन की बिक्री से सालाना 2.5 से 3 लाख रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। वे आसपास के किसानों को भी स्पॉन की आपूर्ति करती हैं और भविष्य में एक आधुनिक स्पॉन प्रयोगशाला स्थापित करने की योजना रखती हैं। उनकी पहल से लगभग 300 महिला किसानों ने मशरूम उत्पादन को आय का स्थायी स्रोत बनाया है, जो यह दर्शाता है कि लक्षित प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग किस प्रकार व्यापक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है।

ये उदाहरण भारतीय कृषि की व्यापक तस्वीर को दर्शाते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, ‘कृषि एवं संबद्ध गतिविधियाँ’ क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है, जो वित्त वर्ष 2023-24 में वर्तमान मूल्यों पर देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 16 प्रतिशत का योगदान देता है और करीब 46.1 प्रतिशत आबादी को आजीविका प्रदान करता है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ यह क्षेत्र कई सहायक और डाउनस्ट्रीम उद्योगों को भी मजबूती प्रदान करता है। इसी कारण शासन सुधारों में आय समर्थन, अवसंरचना विकास, सिंचाई विस्तार, जोखिम प्रबंधन, बेहतर बाजार पहुंच और सतत कृषि पर विशेष ध्यान दिया गया है।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत अब तक 21 किस्तों में 3.88 लाख करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं, जिससे किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता मिली है। कृषि अवसंरचना कोष के अंतर्गत 23 दिसंबर 2025 तक 2.87 लाख से अधिक लाभार्थी पंजीकृत हुए हैं और 57,000 करोड़ रुपये से अधिक का वितरण किया गया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देकर किसानों को कम जल-खपत वाली उच्च मूल्य फसलों की ओर प्रेरित किया है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’, कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन, मृदा स्वास्थ्य, वर्षा आधारित क्षेत्र विकास, फसल विविधीकरण और कृषि स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन जैसे घटक शामिल हैं।

ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) ने बाजार पहुंच और मूल्य पारदर्शिता में सुधार किया है, जबकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने फसल नुकसान के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान की है। 23 दिसंबर 2025 तक खरीफ और रबी 2025 सीजन में 16.06 लाख किसानों को 3.60 लाख रुपये के दावे का लाभ मिला है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना ने संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देकर दीर्घकालिक भूमि उत्पादकता सुनिश्चित की है।

इन योजनाओं का प्रभाव तब और अधिक बढ़ जाता है जब ये NABARD और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जैसी संस्थाओं के सहयोग से खेत स्तर पर एकीकृत रूप में लागू होती हैं। तेलंगाना के संगारेड्डी जिले में NABARD अनुदान से समर्थित एक परियोजना के तहत आदिवासी किसानों ने आम की बागवानी, दलहन और सब्जियों की अंतरफसल, तथा सिंचाई अवसंरचना के माध्यम से अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की। इसी तरह हरियाणा के रेवाड़ी जिले में धरचना किसान उत्पादक कंपनी लिमिटेड ने तेलहन उत्पादन को सामूहिक उद्यम में बदलकर 500 से अधिक किसानों, जिनमें 90 प्रतिशत महिलाएँ हैं, की आय बढ़ाई।

सुशासन दिवस के अवसर पर ये अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि कृषि में प्रभावी शासन का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि खेती को एक सम्मानजनक, सुरक्षित और भविष्य उन्मुख आजीविका बनाना है। खेतों से भविष्य तक, भारतीय कृषि की यह नई कहानी नीतिगत समन्वय, सहभागी दृष्टिकोण और ठोस परिणामों पर आधारित है, जो किसानों के आत्मविश्वास और देश की आर्थिक मजबूती को नई दिशा दे रही है।

कृषि में AI और ड्रोन तकनीक को बढ़ावा: किसानों की उत्पादकता, स्थिरता और आय में सुधार

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कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में विभिन्न योजनाओं और पहलों के माध्यम से प्रिसिजन फार्मिंग, ड्रोन तकनीक, क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी नई तकनीकों को अपनाने को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है। AI और ड्रोन का उपयोग फसल उत्पादकता, सतत कृषि और किसानों की आजीविका में सुधार तथा कृषि क्षेत्र की चुनौतियों के समाधान के लिए किया जा रहा है। प्रमुख पहलें इस प्रकार हैं—

किसान ई-मित्र

यह एक वॉयस-आधारित AI-संचालित चैटबॉट है, जो पीएम किसान सम्मान निधि, पीएम फसल बीमा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड से जुड़े किसानों के प्रश्नों का समाधान करता है। यह 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है, प्रतिदिन 8,000 से अधिक प्रश्नों का निपटारा करता है और अब तक 93 लाख से अधिक प्रश्नों के उत्तर दिए जा चुके हैं।

राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली (NPSS)

जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले फसल नुकसान से निपटने के लिए यह प्रणाली AI और मशीन लर्निंग का उपयोग कर कीट प्रकोप का पता लगाती है, जिससे समय पर हस्तक्षेप संभव होता है। वर्तमान में 10,000 से अधिक विस्तार कर्मी इसका उपयोग कर रहे हैं। यह 66 फसलों और 432 से अधिक कीटों को सपोर्ट करती है।

AI आधारित मानसून पूर्वानुमान पायलट

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और डेवलपमेंट इनोवेशन लैब इंडिया के सहयोग से खरीफ 2025 के लिए 13 राज्यों के हिस्सों में स्थानीय स्तर पर मानसून आगमन का पूर्वानुमान तैयार किया गया। एम-किसान पोर्टल के माध्यम से 13 राज्यों के 3,88,45,214 किसानों को पाँच क्षेत्रीय भाषाओं में एसएमएस भेजे गए। मध्य प्रदेश और बिहार में किए गए फीडबैक सर्वे में 31–52% किसानों ने बुवाई से जुड़े निर्णयों (भूमि तैयारी, बुवाई समय, फसल/इनपुट चयन) में बदलाव किया।

कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (SMAM)

छोटे एवं सीमांत किसानों तथा महिला किसानों को ड्रोन खरीद पर 50% अनुदान (अधिकतम ₹5.00 लाख) दिया जा रहा है। साथ ही कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है, जहां ड्रोन सहित आधुनिक कृषि मशीनरी किराए पर उपलब्ध होती है। 2023-24 से 2025-26 (30 नवंबर 2025 तक) इस अवधि में 2,122 ड्रोन किसानों और CHC को स्वीकृत किए गए।

नमो ड्रोन दीदी योजना

महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को ड्रोन उपलब्ध कराकर टिकाऊ व्यवसाय और आजीविका समर्थन देने हेतु यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना स्वीकृत की गई। 2023-24 में प्रमुख उर्वरक कंपनियों द्वारा 1,094 ड्रोन SHGs को वितरित किए गए, जिनमें से 500 ड्रोन नमो ड्रोन दीदी योजना के अंतर्गत हैं। एडीआरटीसी, बेंगलुरु के अध्ययन के अनुसार, ड्रोन से SHGs की गतिविधियां आधुनिक कृषि पद्धतियों तक विस्तृत हुईं, दक्षता-उत्पादकता बढ़ी और ग्रामीण महिलाओं की आय के अवसर बढ़े।

आईसीएआर द्वारा ड्रोन प्रसार

2023-24 से 2025-26 (30 नवंबर 2025 तक) आईसीएआर, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (SAUs) और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के माध्यम से किसानों के खेतों में 41,010 हेक्टेयर क्षेत्र में ड्रोन प्रदर्शन किए गए, जिससे 4,52,291 किसान लाभान्वित हुए।

यह जानकारी कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने आज लोकसभा में लिखित उत्तर में दी।

प्रधानमंत्री किसान सम्पदा योजना (PMKSY) के तहत फूड टेस्टिंग लैब्स के लिए आवेदन आमंत्रित

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कृषि प्रसंस्करण मंत्रालय (MoFPI) योग्य उद्यमियों से अनुरोध करता है कि वे फूड सेफ्टी एंड क्वालिटी एश्योरेंस इंफ्रास्ट्रक्चर (FSQAI) घटक के तहत NABL मान्यता प्राप्त फूड टेस्टिंग लैब्स स्थापित करने के लिए अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करें। इच्छुक आवेदक आवेदन केवल ऑनलाइन जमा कर सकते हैं।

आवेदन करने की महत्वपूर्ण जानकारी:

  • ऑनलाइन आवेदन: https://www.sampada-mofpi.gov.in के माध्यम से।

  • अंतिम तिथि: 20 जनवरी 2026, 17:00 बजे तक।

  • आवेदन शुल्क: गैर-वापसी योग्य डिमांड ड्राफ्ट के रूप में, “Pay & Accounts Officer, Ministry of Food Processing Industries, New Delhi” के नाम। स्कैन कॉपी ऑनलाइन अपलोड करना अनिवार्य है। मूल डाक द्वारा मंत्रालय को अंतिम तिथि के एक सप्ताह के भीतर भेजा जाना चाहिए।

  • प्री-बिड मीटिंग: 02 दिसंबर 2025, 2:30 PM, रूम नंबर 120, मंत्रालय कार्यालय, पंचशील भवन, ऑगस्ट क्रांति मार्ग, नई दिल्ली।

  • तकनीकी सहायता और आवेदन फॉर्म: आवेदन लिंक और फॉर्म 20 जनवरी 2026, 17:00 बजे तक उपलब्ध रहेंगे।

आवेदन करने वाले उद्यमियों से अनुरोध है कि वे स्कीम गाइडलाइन्स (12 नवम्बर 2025) का सख्ती से पालन करें, जो मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

यह पहल किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य परीक्षण सेवाओं तक पहुँच प्रदान करने और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में गुणवत्ता मानकों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की जा रही है।

6वां अंतर्राष्ट्रीय एग्रोनॉमी कांग्रेस (IAC–2025) का उद्घाटन: कृषि में स्मार्ट, सतत और लाभप्रद समाधान पर जोर

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6वें अंतर्राष्ट्रीय एग्रोनॉमी कांग्रेस (IAC–2025) का भव्य उद्घाटन आज एनपीएल ऑडिटोरियम, पुरसा कैंपस, नई दिल्ली में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, शिवराज सिंह चौहान की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ। यह तीन दिवसीय वैश्विक कार्यक्रम (24–26 नवम्बर 2025) भारतीय एग्रोनॉमी सोसाइटी (ISA) द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (NAAS) और ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

कांग्रेस में भारत और विदेशों से 1,000 से अधिक वैज्ञानिक, नीति निर्माता, छात्र, विकास साझेदार और उद्योग विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। इसके अलावा, FAO, CIMMYT, ICRISAT, IRRI, ICARDA और IFDC जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के वैज्ञानिक भी इसमें उपस्थित हैं।

उद्घाटन सत्र में, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि “Viksit Bharat @2047 की नींव स्मार्ट, सतत और लाभप्रद कृषि में है। कृषि को कम संसाधनों में अधिक उत्पादन करने और भविष्य के लिए संरक्षण करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। एग्रोनॉमी वह पुल है जो वैज्ञानिक अनुसंधान को किसान के खेत से जोड़ता है।” उन्होंने मिट्टी की सेहत, जल उपयोग दक्षता, जैव विविधता, इको-न्यूट्रिशन और डिजिटल कृषि पर विशेष जोर दिया।

उन्होंने IAC–2025 घोषणापत्र जारी किया, जिसमें प्रमुख सिफारिशें शामिल हैं:

  • मिट्टी में कार्बन संचयन और जल-दक्ष खेती को बढ़ावा देना

  • AI आधारित डिजिटल कृषि समाधान और Agri-Stack फ्रेमवर्क को बढ़ाना

  • प्राकृतिक और पुनर्योजी कृषि मॉडलों को मुख्यधारा में लाना

  • युवा और महिला किसानों के लिए लक्षित नवाचार कार्यक्रम

  • स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर अगली पीढ़ी की एग्रोनॉमी शिक्षा

  • One-Health, LiFE मिशन और Net-Zero 2070 के अनुरूप कृषि रणनीतियाँ

  • भारतीय जलवायु-स्मार्ट कृषि मॉडलों का वैश्विक प्रचार

कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा, “एग्रोनॉमी को किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान बनाना होगा। इसका अंतिम उद्देश्य किसान की आय, पर्यावरण सुरक्षा और पोषण गुणवत्ता बढ़ाना है।” उन्होंने वर्षा पर निर्भर कृषि, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, महिला सहभागिता, युवा-नेतृत्व वाले नवाचार और ग्रामीण माइक्रो-उद्यमों को सशक्त करने पर बल दिया।

कांग्रेस में 10 प्रमुख थीमैटिक सिम्पोजिया आयोजित किए जाएंगे, जिनमें वैज्ञानिक प्रस्तुतियाँ शामिल होंगी:

  • जलवायु-प्रतिरोधी और कार्बन-न्यूट्रल कृषि

  • प्राकृतिक समाधान और One-Health

  • सटीक इनपुट प्रबंधन और संसाधन दक्षता

  • आनुवंशिक क्षमता का उपयोग

  • ऊर्जा-कुशल मशीनरी, डिजिटल समाधान और पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन

  • पोषण-संवेदनशील कृषि और इको-न्यूट्रिशन

  • लिंग सशक्तिकरण और आजीविका विविधीकरण

  • Agriculture 5.0, अगली पीढ़ी की शिक्षा और Viksit Bharat 2047

  • युवा वैज्ञानिक और छात्र सम्मेलन

ICAR के सचिव और DARE के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जात ने कहा, “भारत की एग्रोनॉमी अनुसंधान विश्व स्तरीय जलवायु-स्मार्ट कृषि का नेतृत्व कर रही है। IAC–2025 के परिणाम ICAR Vision–2050 में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।”

यह मंच G20, FAO, CGIAR और साउथ–साउथ कोऑपरेशन के साथ साझेदारी को और मजबूत करेगा और वैश्विक कृषि नवाचार एवं स्थिरता के नए मार्ग खोलेगा।

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (NBHM): ‘मीठी क्रांति’ की दिशा में भारत की अग्रणी पहल

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परिचय

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (National Beekeeping and Honey Mission – NBHM) एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना (Central Sector Scheme) है, जिसे भारत सरकार ने वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन के समग्र विकास और गुणवत्तापूर्ण शहद एवं अन्य मधु उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया है। इस योजना को राष्ट्रीय मधु बोर्ड (National Bee Board – NBB) द्वारा लागू किया जा रहा है।

NBHM की घोषणा आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत की गई थी, जिसके लिए ₹500 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया गया था। प्रारंभ में इसे वित्त वर्ष 2020–21 से 2022–23 तक लागू किया गया था, जिसे अब वित्त वर्ष 2025–26 तक बढ़ा दिया गया है, और शेष ₹370 करोड़ की राशि के साथ इसे जारी रखा गया है।

मधुमक्खी पालन एक कृषि-आधारित गतिविधि है, जो किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के भूमिहीन श्रमिकों के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत है। यह फसलों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ता है और किसानों की आय में वृद्धि होती है। साथ ही, यह शहद, मोम, परागकण, प्रोपोलिस, रॉयल जेली और मधु विष जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों का उत्पादन करता है, जो ग्रामीण समुदायों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करते हैं।

भारत के विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ (agro-climatic conditions) मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। इस क्षेत्र के महत्व को पहचानते हुए, सरकार ने ‘मीठी क्रांति (Sweet Revolution)’ के तहत NBHM की शुरुआत की, ताकि वैज्ञानिक, संगठित एवं टिकाऊ मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देकर किसानों की आय में वृद्धि की जा सके।

NBHM के अंतर्गत उप-योजनाएँ (Sub-Schemes / Mini Missions)

NBHM को तीन मिनी मिशनों (Mini Missions) के माध्यम से लागू किया जा रहा है:

  1. मिनी मिशन–I:
    फसल उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि के लिए वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन और परागण को बढ़ावा देना।

  2. मिनी मिशन–II:
    मधुमक्खी उत्पादों के फसलोपरांत प्रबंधन — संग्रह, प्रसंस्करण, भंडारण, विपणन, मूल्यवर्धन आदि — पर ध्यान केंद्रित करते हुए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना।

  3. मिनी मिशन–III:
    विभिन्न क्षेत्रों और कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास पर केंद्रित रहना।

मुख्य उद्देश्य (Objectives of NBHM)

  • मधुमक्खी पालन उद्योग के समग्र विकास के माध्यम से आय एवं रोजगार सृजन को बढ़ावा देना।

  • गुणवत्तापूर्ण मधुमक्खी कॉलोनी और पोस्ट-हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे हनी प्रोसेसिंग प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और विपणन केंद्र विकसित करना।

  • क्षेत्रीय और जिला स्तर पर क्वालिटी कंट्रोल लैब्स की स्थापना कर शहद की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।

  • ‘मधुक्रांति पोर्टल (Madhukranti Portal)’ के माध्यम से शहद स्रोत की ऑनलाइन पंजीकरण और ट्रेसबिलिटी प्रणाली विकसित करना।

  • हनी कॉरिडोर विकसित करना और कृषि-उद्यमियों एवं स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देना।

  • महिलाओं का सशक्तिकरण और FPOs, SHGs के माध्यम से सामूहिक संस्थागत ढांचा विकसित करना।

  • नवीनतम प्रौद्योगिकियों और कौशल विकास को बढ़ावा देना ताकि शहद और अन्य मधु उत्पादों का उत्पादन और निर्यात बढ़ाया जा सके।

NBHM की उपलब्धियाँ (Progress and Achievements)

  • वर्ष 2024 में भारत ने लगभग 1.4 लाख मीट्रिक टन (MT) प्राकृतिक शहद का उत्पादन किया।

  • FY 2023–24 में भारत ने लगभग 1.07 लाख MT शहद का USD 177.55 मिलियन मूल्य का निर्यात किया।

  • भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहद निर्यातक है (2020 में 9वें स्थान से उछाल)।

  • 6 विश्वस्तरीय हनी टेस्टिंग लैब्स, 47 मिनी लैब्स, 26 प्रोसेसिंग यूनिट्स और 18 ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग यूनिट्स की स्थापना मार्च 2025 तक की गई है।

  • IIT रुड़की में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन उत्कृष्टता केंद्र (National Centre of Excellence in Beekeeping) की स्थापना की गई है।

  • मधुक्रांति पोर्टल पर 14,859 मधुमक्खी पालक, 269 सोसायटी, 150 फर्म्स और 206 कंपनियाँ पंजीकृत हैं (अक्टूबर 2025 तक)।

  • TRIFED, NAFED, NDDB को 100 मधुमक्खीपालक FPOs गठित करने का कार्य सौंपा गया, जिनमें से 97 FPOs मार्च 2025 तक बन चुके हैं।

मुख्य शहद उत्पादक राज्य एवं निर्यात (Honey Production & Export)

भारत में प्रमुख शहद उत्पादक राज्य हैं —उत्तर प्रदेश (17%), पश्चिम बंगाल (16%), पंजाब (14%), बिहार (12%) और राजस्थान (9%)

भारत से निर्यातित प्रमुख शहद प्रकार हैं —रेपसीड/सरसों शहद, यूकेलिप्टस शहद, लीची शहद, सूरजमुखी शहद आदि।

मुख्य निर्यात गंतव्य हैं —अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब, क़तर और लीबिया।

सफलता की कहानियाँ (Success Stories)

मेघालय के नोंगथाइमाई गाँव में पारंपरिक मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक व्यवसाय में बदल गया है।
स्टीवेंसन शदाप ने सरकारी प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने शौक को व्यवसाय में बदला और अब प्रतिवर्ष ₹1–2 लाख की आमदनी कर रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में सरकार ने 2,000 कॉलोनियाँ 40% सब्सिडी पर उपलब्ध कराई हैं और ₹25 लाख का हनी प्रोसेसिंग एवं बॉटलिंग प्लांट स्थापित किया है।
यहाँ के युवा अब “कुपवाड़ा हनी” ब्रांड के अंतर्गत जैविक शहद का उत्पादन और विपणन कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र का वार्षिक कारोबार ₹3 करोड़ तक पहुँच गया है।

निष्कर्ष (Conclusion)

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (NBHM) भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी और बहुआयामी पहल है, जो देश में ‘मीठी क्रांति’ को गति दे रही है। यह पारंपरिक मधुमक्खी पालन को वैज्ञानिक, तकनीक-आधारित और संगठित उद्योग में परिवर्तित कर रहा है, जिससे ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण, कृषि उत्पादन, और निर्यात क्षमता — सभी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

NBHM भारत को वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

भारत और श्रीलंका के बीच कृषि पर पहली संयुक्त कार्यकारी समूह (JWG) बैठक नई दिल्ली में आयोजित

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भारत और श्रीलंका के बीच कृषि पर पहली संयुक्त कार्यकारी समूह (Joint Working Group – JWG) की बैठक आज नई दिल्ली स्थित कृषि भवन में आयोजित की गई। बैठक की सह-अध्यक्षता भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी और श्रीलंका सरकार के कृषि, पशुधन, भूमि एवं सिंचाई मंत्रालय के सचिव डी. पी. विक्रमसिंघे ने की।

दोनों पक्षों ने कृषि सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा की, जिनमें कृषि यंत्रीकरण, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, बीज क्षेत्र का विकास, कृषि उद्यमिता, कृषि शिक्षा, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, बाजार तक पहुंच और जलवायु-संवेदनशील कृषि शामिल हैं। साथ ही, संयुक्त अनुसंधान एवं क्षमता निर्माण के अवसरों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

बैठक में डिजिटल कृषि, फसल बीमा और कृषि स्टार्टअप जैसी पहलों पर भी चर्चा की गई। श्रीलंकाई प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा, नई दिल्ली का दौरा किया, जहां उन्होंने भारत के कृषि अनुसंधान और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का अवलोकन किया।

चर्चाओं के दौरान भारत और श्रीलंका ने खाद्य और पोषण सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सहयोग को और गहरा करने की अपनी साझा प्रतिबद्धता दोहराई।

श्रीलंकाई प्रतिनिधिमंडल में जी. जी. वी. श्यामली, अतिरिक्त महानिदेशक (विकास), कृषि विभाग; बी. एस. एस. परेरा, निदेशक (पशुधन विकास), कृषि, पशुधन, भूमि एवं सिंचाई मंत्रालय; और गेशन, काउंसलर, श्रीलंका उच्चायोग शामिल थे।

बैठक में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) के संयुक्त सचिव, पीपीवीएफआरए के अध्यक्ष, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विदेश मंत्रालय (MEA) के अधिकारी भी उपस्थित रहे।


राष्ट्रीय एफपीओ समागम 2025: किसान उद्यमिता, सहयोग और सतत कृषि विकास का उत्सव

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा “राष्ट्रीय एफपीओ समागम 2025” का आयोजन 30 और 31 अक्टूबर 2025 को एनसीडीसी और एनसीयूआई परिसर, हौज खास, नई दिल्ली में किया जा रहा है। यह आयोजन 10,000 किसान उत्पादक संगठन (FPO) के गठन और संवर्धन योजना के तहत हुई उल्लेखनीय उपलब्धियों का उत्सव है तथा किसानों के समूहों को सहयोग, प्रौद्योगिकी और मूल्य संवर्धन के माध्यम से सशक्त बनाने का उद्देश्य रखता है।

दो दिवसीय इस कार्यक्रम में 24 राज्यों और 140 जिलों के 500 से अधिक किसान, कार्यान्वयन एजेंसियाँ (IAs), क्लस्टर आधारित व्यावसायिक संगठन (CBBOs) और प्रगतिशील एफपीओ भाग लेंगे। इस दौरान 267 एफपीओ अपने उत्पादों और नवाचारों का प्रदर्शन प्रदर्शनी स्टॉलों के माध्यम से करेंगे।

इनमें से 57 एफपीओ स्टॉल एनसीडीसी परिसर, हौज खास, नई दिल्ली में लगाए जाएंगे, जहाँ अनाज, दालें, मोटे अनाज, मसाले, तिलहन, फल, सब्जियाँ, शहद, चाय, कॉफी, डेयरी और जैविक उत्पादों सहित विभिन्न कृषि और मूल्यवर्धित उत्पाद प्रदर्शित होंगे। प्रदर्शनी में अचार, जैम, गुड़, हर्बल और नेचुरल उत्पाद, मेवे और पारंपरिक हस्तनिर्मित खाद्य पदार्थ भी शामिल होंगे। यह प्रदर्शन “एक भारत – एक कृषि” की भावना को साकार करेगा, जहाँ देशभर के एफपीओ एकजुट होकर एक सशक्त, बाजार उन्मुख कृषि अर्थव्यवस्था के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।

कार्यक्रम के दौरान कई तकनीकी सत्र और पैनल चर्चा आयोजित की जाएंगी, जिनमें प्रमुख विषय होंगे —

  • तेलहन उत्पादन और मूल्य संवर्धन

  • जल उपयोग दक्षता और सतत सिंचाई प्रथाएँ (श्रीमती अर्चना वर्मा, अपर सचिव एवं प्रबंध निदेशक, एनडब्ल्यूएम द्वारा)

  • प्राकृतिक खेती और इसके बाजार अवसर (एनएमएनएफ द्वारा आयोजित)

  • कृषि अवसंरचना निधि (AIF) – ऋण तक पहुँच और अवसंरचना विकास

  • शहद उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन (एनबीबी के साथ)

  • डिजिटल कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बाजार तक पहुँच (फ्लिपकार्ट द्वारा सत्र)

  • उर्वरक और कीटनाशक प्रबंधन (एचआईएल द्वारा)

  • एगमार्क प्रमाणन प्रक्रिया और लाभ (डीएमआई द्वारा)

  • बीज उत्पादन, पैकेजिंग और विपणन (एनएससी द्वारा)

  • खरीदार–विक्रेता संवाद सत्र (Buyer-Seller Meet) व्यापारिक संबंधों और साझेदारी को बढ़ाने के लिए

इसके अतिरिक्त, उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले एफपीओ, सीबीबीओ और कार्यान्वयन एजेंसियों को किसान सशक्तिकरण, व्यावसायिक प्रदर्शन और डिजिटल सक्षमता में उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया जाएगा। Buyer-Seller Meet के माध्यम से किसानों, कृषि उद्योगों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बीच प्रत्यक्ष बाजार संबंध भी स्थापित किए जाएंगे।

राष्ट्रीय एफपीओ समागम 2025 किसान उद्यमिता का एक ऐतिहासिक मंच है, जो यह दर्शाता है कि सामूहिक प्रयास किस प्रकार ग्रामीण परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और सतत कृषि व्यवसाय विकास को गति दे रहे हैं — और सरकार के इस विजन को साकार कर रहे हैं कि किसान केवल उत्पादक नहीं, बल्कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में प्रदाता और भागीदार भी हैं।

ब्लॉक स्तरीय किसान मेला: बहेराडीह के किसान ने छत्तीसगढ़ की 36 भाजियों का लगाया प्रदर्शनी स्टॉल, कृषि सखी और पशु सखी दीदियों की रही उत्साहपूर्ण भागीदारी

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जांजगीर-चाम्पा- छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना की रजत जयंती वर्ष के अवसर पर प्रदेश के क़ृषि प्रधान जिले के जैविक क़ृषि ब्लॉक बलौदा में क़ृषि क्षेत्र के वैज्ञानिक सोंच को प्रोत्साहित करने और आधुनिक तकनिकों के प्रसार के लिए क़ृषि विभाग परिसर में ब्लॉक स्तरीय किसान मेला का आयोजन किया गया, जिसका प्रमुख उद्देश्य किसानों को विभागीय योजनाओं की देना है. यह मेला एक्सटेंशन रिफार्म्स आत्मा योजना के अंतर्गत क़ृषि, पशुपालन, उद्यानिकी, मत्स्य, क्रेड़ा विभाग व क़ृषि विज्ञान केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजन किया गया, जहां जिले के जैविक क़ृषि ग्राम बहेराडीह में स्थापित देश के पहले वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव, रामाधार देवांगन और उनकी टीम द्वारा छत्तीसगढ़ की 36 प्रमुख भाजियों तथा देशी बीजो एवं जैविक खाद व अन्य उत्पादों का  जीवंत प्रदर्शनीय स्टॉल लगाकर प्रस्तुत किया. इस अवसर में किसान स्कूल के टीम ने ब्लॉक स्तरीय किसान मेले में शामिल किसानों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियो को 10 दिसंबर को वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल परिसर में आयोजित होने वाले राज्य स्तरीय भाजी महोत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दिया. इस मौके पर क़ृषि सखी और पशु सखी दीदियों ने स्टॉल में उद्यान विभाग के अधिकारी प्रियंका सेंगर के साथ खुमरी पहनकर अपनी सेल्फी भी लीं.

ब्लॉक स्तरीय क़ृषि मेला को सफल बनाने में चारपारा कलस्टर के पशु सखी दुर्गा अनंत, क़ृषि सखी काजल डहरिया डोंगरी समेत धनेश्वरी भारद्वाज, मनीषा तिवारी कोरबी, लक्ष्मीन बरेठ, सुन्दर बाई कंवर बछोद, कविता यादव, माहेश्वरी यादव जूनाडीह, अनुपा बैनर्जी, अनू बैनर्जी हरदी विशाल, पहरिया कलस्टर से देवकुमारी खूंटे, रामबाई साहू पहरिया, लक्ष्मीन यादव, बचन बाई केवट बोकरामुड़ा, उषा यादव, कला बाई यादव पूरेना, अनुपा बर्मन, सविता कश्यप परसदा, संतोषी केवट, ममता कुम्भकार पंतोरा, जर्वे ब कलस्टर से दूरपती केवट, त्रिवेणी पटेल औराईकला, पूजा यादव,किरण सराफ जर्वे ब, रेखा साहू, फेकन बाई बिंझवार करमन्दा, शिवरात्रि मिलन, राजेश्वरी राठौर पोंच, गायत्री खांडेय, लता यादव नवगंवा, कुरदा कलस्टर से पुष्पा यादव बहेराडीह, शशि कर्ष जाटा, रुखमणि पाण्डेय सिवनी आदि क़ृषि सखी और पशु सखी दीदियों का सराहनीय योगदान रहा.



विशेष लेख : छत्तीसगढ़ रजत महोत्सव : 25 वर्षों की गौरवशाली कृषि यात्रा’

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 ’आत्मनिर्भर कृषि, किसानों की मेहनत और योजनाओं का सफल संगम’

कोरबा-छत्तीसगढ़ राज्य अपनी स्थापना के 25 गौरवशाली वर्षों का उत्सव रजत महोत्सव के रूप में मना रहा है। इस अवसर पर हर क्षेत्र में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, ऊर्जा और ग्राम्य विकास के साथ-साथ कृषि क्षेत्र ने भी इन वर्षों में अद्भुत प्रगति की है। कृषि विभाग कोरबा की यह 25 वर्ष की यात्रा किसानों की मेहनत, सरकारी नीतियों की सफलता और आधुनिक तकनीकों के समन्वय की जीवंत कहानी है। वर्ष 2000 में जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग होकर नया राज्य बना, तब कृषि क्षेत्र पारंपरिक स्वरूप में था, लेकिन आज 2025 में यह आत्मनिर्भर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित क्षेत्र बन चुका है।

राज्य के गठन के बाद कोरबा जिले ने कृषि उत्पादन, क्षेत्र विस्तार, बीज और उर्वरक वितरण के साथ-साथ तकनीकी नवाचार में भी निरंतर प्रगति दर्ज की है। 25 वर्षों की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ के किसान अब केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता के प्रतीक बन चुके हैं। वर्ष 2000 में कोरबा जिले में खरीफ फसलों का कुल क्षेत्र 01 लाख 33 हजार 880 हेक्टेयर था, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 01 लाख 37 हजार 066 हेक्टेयर हो गया है। इसी प्रकार रबी फसलों के अंतर्गत क्षेत्र में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2000 में कुल रबी क्षेत्र 14 हजार 780 हेक्टेयर था, जो अब 40 हजार 368 हेक्टेयर तक पहुँच चुका है। यह वृद्धि केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि जिले के किसान अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक खेती की ओर अग्रसर हुए हैं।

वर्ष 2000 में खरीफ के अंतर्गत अनाज का क्षेत्रफल 02 हजार 096 हेक्टेयर था, जो अब 03 हजार 664 हेक्टेयर तक पहुँच गया है। दलहन फसलों का क्षेत्र भी 04 हजार 535 हेक्टेयर से बढ़कर 07 हजार 581 हेक्टेयर हुआ है, जबकि तिलहन फसलों का क्षेत्र 06 हजार 068 हेक्टेयर से बढ़कर 09 हजार 608 हेक्टेयर हो गया है। सब्जी एवं अन्य फसलों की बात करें तो यह विस्तार सबसे उल्लेखनीय रहा है वर्ष 2000 में 02 हजार 081 हेक्टेयर क्षेत्र में सब्जियाँ बोई जाती थीं, जो अब बढ़कर 19 हजार 515 हेक्टेयर हो गई हैं। यह आँकड़े बताते हैं कि जिले के किसान अब नकदी फसलों, सब्जी उत्पादन और विविध खेती की दिशा में सशक्त रूप से आगे बढ़े हैं।

खेती में उत्पादकता बढ़ाने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता को कोरबा कृषि विभाग ने प्राथमिकता दी। वर्ष 2000 में खरीफ सीजन में किसानों को 2,501.25 क्विंटल बीज वितरित किए गए थे, जबकि वर्ष 2025 में यह आँकड़ा बढ़कर 39,404.34 क्विंटल हो गया है। इसी प्रकार रबी सीजन में वर्ष 2000 के 482.5 क्विंटल की तुलना में वर्ष 2025 में 01हजार 994.27 क्विंटल बीज किसानों को प्रदान किए गए हैं। कुल मिलाकर वर्ष 2000 में जहाँ 02 हजार 983.75 क्विंटल बीज वितरित किए गए थे, वहीं वर्ष 2025 में यह बढ़कर 41 हजार 398.61 क्विंटल तक पहुँच गया है। यह उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है कि किसानों में गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ी है और कृषि विभाग ने इस दिशा में सतत प्रयास किए हैं।

खेती की उत्पादकता को बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। कोरबा जिले में उर्वरक वितरण में पिछले 25 वर्षों में लगभग चार गुना वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 में खरीफ सीजन में 04 हजार 173 टन उर्वरक किसानों को उपलब्ध कराए गए थे, जबकि वर्ष 2025 में यह मात्रा बढ़कर 16 हजार 778.73 टन हो गई है। रबी सीजन में वर्ष 2000 के 479 टन की तुलना में अब 570.55 टन उर्वरक वितरित किए जा रहे हैं। इस प्रकार कुल उर्वरक वितरण वर्ष 2000 के 04हजार 652 टन से बढ़कर अब 17 हजार 349.28 टन हो गया है। यह आंकड़े न केवल कृषि में उर्वरक उपयोग की दक्षता को दर्शाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि कोरबा जिले के किसान अब वैज्ञानिक खेती की ओर अग्रसर हैं।

पिछले दो दशकों में कोरबा जिले में कृषि का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है। पहले जहाँ कृषि केवल जीविकोपार्जन का साधन थी, वहीं अब यह एक लाभदायक व्यवसाय बन चुकी है। फसल विविधीकरण, सिंचाई के साधनों का विस्तार, जैविक खेती, और आधुनिक तकनीक के उपयोग ने जिले की कृषि को मजबूती दी है। कृषि विज्ञान केंद्र और आत्मा परियोजना के माध्यम से किसानों को निरंतर प्रशिक्षण और परामर्श प्रदान किया जा रहा है। मिट्टी परीक्षण, फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसी पहलों ने किसानों को जोखिम से बचाने और उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

महिला स्व-सहायता समूहों ने भी कृषि क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। इन समूहों ने जैविक खाद निर्माण, सब्जी उत्पादन और बीज प्रसंस्करण जैसे कार्यों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिली है और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता में भी वृद्धि हुई है। युवाओं को कृषि में नवाचार और उद्यमिता की दिशा में प्रेरित किया गया है। कृषि आधारित स्टार्टअप, ड्रिप सिंचाई, फसल प्रसंस्करण और विपणन के क्षेत्र में युवाओं ने नई संभावनाएँ खोली हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य की रजत जयंती के इस पावन अवसर पर कोरबा का कृषि विभाग अपनी इन उपलब्धियों पर गर्व करता है। यह यात्रा केवल विभागीय योजनाओं की नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत, तकनीकी जागरूकता और प्रशासनिक प्रतिबद्धता की साझी सफलता की कहानी है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में राज्य सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र को राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने की दिशा में जो ठोस कदम उठाए गए हैं, उनका प्रत्यक्ष प्रभाव कोरबा की धरती पर देखा जा सकता है। यदि संकल्प और समर्पण साथ हों, तो परिवर्तन निश्चित होता है। यह यात्रा केवल खेतों की हरियाली तक सीमित नहीं, बल्कि यह किसानों के चेहरों पर आई मुस्कान, आत्मनिर्भरता की भावना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रतीक है।

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