Media24Media.com: आधुनिकता की भीड़ में खोता सहज जीवन

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आधुनिकता की भीड़ में खोता सहज जीवन

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लेख - महेन्द्र कुमार पटेल, शिक्षक

सुविधाएं बढ़ी हैं तो संघर्ष घटने चाहिए थे, पर हुआ इसके उल्टा है। जैसे-जैसे आधुनिकता और सुविधाएं बढ़ी हैं, वैसे-वैसे मनुष्य की सहनशक्ति और संघर्ष-शक्ति घटती गई है।

पहले संसाधन सीमित थे, जरूरतें कम थीं, पर जीवन बड़ा था। लोगों के पास समय था। शाम को चौपाल लगती थी, परिवार एक साथ बैठकर बतियाता था। बड़ा से बड़ा काम भी बोझ नहीं लगता था, उसे अपना दायित्व समझकर सहजता से निपटा लिया जाता था। खुशी किसी बड़ी उपलब्धि में नहीं, छोटी-छोटी बातों में मिल जाती थी।

आज तस्वीर बदल गई है। घर में सारे साधन मौजूद हैं, फिर भी छोटी-छोटी बातें बड़ी समस्या बन गई हैं। घर में नमक खत्म तो तनाव, गैस सिलेंडर खत्म तो हंगामा, गाड़ी में पेट्रोल खत्म तो दिन खराब और राशन देर से आया तो पूरे घर का माहौल अशांत।

जबकि ये समस्याएं नहीं, जीवन की सामान्य प्रक्रियाएं हैं। पर हमने इन्हीं को समस्या मान लिया है।

इसका सबसे अधिक प्रभाव घर के वातावरण पर पड़ता है। जब छोटी असुविधा को ही संकट मान लिया जाएगा तो मन हर समय अशांत रहेगा। और अशांत मन कभी समाधान नहीं खोजता, वह केवल शिकायतें पैदा करता है।

याद कीजिए, एक दौर था जब संयुक्त परिवार का प्रचलन था। घर की एक महिला 25-30 लोगों के लिए भोजन बनाती थी, ऊपर से एक-दो किलोमीटर दूर से सिर पर रखकर पीने का पानी लाती थी, फिर भी प्रसन्न रहती थी, कहीं किसी से कोई शिकायत नहीं। तब मन बड़ा था, इसलिए काम छोटा लगता था।

आज परिवार सिमट कर दो-तीन लोगों का रह गया है, रसोई में सारी आधुनिक सुविधाएं हैं, फिर भी दो लोगों का खाना बनाना भी बोझ लगने लगा है। क्योंकि साधन तो बढ़ गए, पर मन सिकुड़ गया है।

सच यही है, सुख सुविधाओं से नहीं, स्वभाव से आता है।

जब तक हम छोटी-छोटी असुविधाओं को जीवन का हिस्सा मानकर सहजता से स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक कितनी भी आधुनिकता आ जाए, मन अशांत ही रहेगा। संघर्ष से भागने से, संघर्ष-शक्ति नहीं बढ़ती, संघर्ष को स्वीकार करने से बढ़ती है

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