Media24Media.com: साक्षरता मिशन के प्रमाण-पत्रों पर सवाल: क्या सिर्फ हस्ताक्षर कर पाना ही साक्षरता है?

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साक्षरता मिशन के प्रमाण-पत्रों पर सवाल: क्या सिर्फ हस्ताक्षर कर पाना ही साक्षरता है?

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परीक्षा, प्रमाण-पत्र और वास्तविक साक्षरता के बीच बढ़ता अंतर

“क्या सिर्फ अपना नाम लिख और हस्ताक्षर कर पाना ही साक्षर होने की पहचान है?”

“बिना नियमित पढ़ाई के केवल परीक्षा में बैठने से क्या साक्षर भारत का लक्ष्य पूरा हो जाएगा?”

“क्या अभिभावक और ग्रामीण साक्षर होने के वास्तविक फायदे जानना नहीं चाहते?”

साक्षरता मिशन और साक्षर भारत कार्यक्रम को लेकर महासमुंद जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में कई सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों, अभिभावकों और शिक्षकों से जुड़े लोगों का कहना है कि कार्यक्रम का मूल उद्देश्य यदि बुनियादी पढ़ना-लिखना और संख्या ज्ञान विकसित करना है, तो केवल परीक्षा आयोजित कर प्रमाण-पत्र जारी करने के बजाय वास्तविक शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।


ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित होने वाली साक्षरता परीक्षाओं को लेकर यह भी शिकायत सामने आ रही है कि बुजुर्गों, महिलाओं और अन्य वयस्कों को परीक्षा केन्द्रों तक लाने का दबाव बनाया जाता है। कुछ ग्रामीणों का दावा है कि जिन लोगों ने परीक्षा में शामिल नहीं होने की इच्छा लिखित रूप से व्यक्त की है, उन्हें भी विभिन्न सरकारी सुविधाओं से नाम कटने अथवा नुकसान होने की बात कहकर परीक्षा में बैठने के लिए दबाव डाला जाता है। इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से जांच और संबंधित विभाग से स्पष्ट स्थिति सामने आना आवश्यक है।

प्रश्न पत्र कौन बनाता है और तैयारी कितनी होती है?

कार्यक्रम से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल का संबंध परीक्षा की तैयारी से है। आरोप है कि कई स्थानों पर परीक्षा की तैयारी के लिए वयस्क परीक्षार्थियों को वर्षभर नियमित रूप से पढ़ाने के बजाय परीक्षा के समय औपचारिक तैयारी कराई जाती है। यहां तक कि प्रश्न-पत्र तैयार करने और परीक्षा की प्रक्रिया में बच्चों तथा शिक्षकों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

यदि वास्तव में ऐसा हो रहा है, तो यह जांच का विषय है कि परीक्षा की निष्पक्षता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित व्यवस्था क्या है और उसका पालन किस स्तर तक किया जा रहा है।

शिक्षक ने भी स्वीकार की कई व्यावहारिक समस्याएं

महासमुंद के कोकड़ी स्थित सरकारी स्कूल में चेतना विकास मूल्य शिक्षा संचालित अभिभावक विद्यालय से जुड़े शिक्षक श्री गेंदलाल कोकडिया से संवाद में उन्होंने बताया कि साक्षरता कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों को बुनियादी पढ़ना-लिखना तथा संख्या ज्ञान प्रदान करना है।

उनके अनुसार, साक्षरता परीक्षा में शामिल होने वाले लोगों को पढ़ाने के लिए सरकार की ओर से अनुदेशक नियुक्त किए जाते हैं। कई स्थानों पर 10वीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थी भी पढ़ाने में सहयोग करते हैं।

हालांकि, उनके अनुसार जमीनी स्तर पर कई व्यावहारिक कठिनाइयां हैं। अनुदेशकों को मिलने वाला मानदेय कम होना, विद्यार्थियों की अपनी पढ़ाई एवं अन्य व्यस्तताएं तथा परीक्षार्थियों द्वारा बुनियादी साक्षरता के महत्व को पर्याप्त रूप से न समझ पाना—इन कारणों से वर्षभर नियमित पढ़ाई नहीं हो पाती।

नतीजा यह होता है कि कुछ लोग परीक्षा के समय केन्द्र तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन परीक्षा के बाद भी वे स्वतंत्र रूप से पढ़ने, लिखने और सामान्य संख्यात्मक जानकारी का उपयोग करने में सक्षम नहीं हो पाते।

साक्षर गांव घोषित होने के बाद फिर परीक्षा केन्द्र क्यों?

कोकडिया के अनुसार, पिछले वर्ष कोकड़ी गांव को सरपंच, पंच, सचिव, साक्षरता विभाग सहित संबंधित लोगों की प्रक्रिया के माध्यम से साक्षर गांव घोषित किया गया था। इसके बावजूद बाद में उसी तरह के क्षेत्रों में फिर से परीक्षा केन्द्र बनाए जाने और बार-बार परीक्षा प्रक्रिया दोहराए जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

यदि किसी गांव को साक्षर घोषित किया गया है, तो उसके बाद वहां के लोगों की वास्तविक साक्षरता का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया? क्या साक्षरता का अर्थ केवल हस्ताक्षर कर पाना है या व्यक्ति को किसी सामान्य वाक्य को पढ़ने, समझने, लिखने और रोजमर्रा की गणना करने में भी सक्षम होना चाहिए?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर जरूरी है।

रविवार की परीक्षा से शिक्षक और परीक्षार्थी भी परेशान

बार-बार परीक्षा आयोजित किए जाने और रविवार को परीक्षा केन्द्रों पर शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने से शिक्षकों की परेशानियां भी सामने आ रही हैं। दूसरी ओर, रोजमर्रा के कामकाज पर निर्भर ग्रामीणों के लिए परीक्षा में शामिल होने के कारण काम प्रभावित होने की समस्या भी बताई जा रही है।

ऐसे में यह जरूरी है कि साक्षरता कार्यक्रम की सफलता केवल कितने लोगों ने परीक्षा दी और कितने प्रमाण-पत्र जारी हुए, इस आंकड़े से तय न की जाए। असली सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि कितने लोग वास्तव में पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणना करना सीख पाए।

सिर्फ प्रमाण-पत्र नहीं, वास्तविक साक्षरता चाहिए

साक्षरता मिशन का उद्देश्य यदि लोगों को आत्मनिर्भर बनाना है, तो केवल परीक्षा में बैठाना पर्याप्त नहीं है। ग्रामीणों को नियमित रूप से पढ़ाने की व्यवस्था, पर्याप्त मानदेय पर प्रशिक्षित अनुदेशक, समयानुकूल कक्षाएं और सीखने के बाद वास्तविक मूल्यांकन आवश्यक है।

साक्षरता का अर्थ केवल अपना नाम लिखना या हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि किसी लिखी हुई बात को पढ़कर समझ पाना, अपनी बात लिख पाना और रोजमर्रा के जीवन में बुनियादी संख्या ज्ञान का उपयोग कर पाना है।

इसलिए मांग यह होनी चाहिए कि—

  • जो व्यक्ति वास्तव में पढ़ना-लिखना और बुनियादी संख्या ज्ञान जानता है, उसी को परीक्षा में सफल घोषित किया जाए।

  • परीक्षा और प्रमाण-पत्र की प्रक्रिया पारदर्शी एवं निष्पक्ष हो।

  • अनुदेशकों को उचित मानदेय दिया जाए।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित, आवश्यकता के अनुसार रात्रिकालीन अथवा सुविधाजनक समय पर कक्षाएं संचालित की जाएं।

  • परीक्षा से पहले नहीं, बल्कि पूरे वर्ष नियमित पढ़ाई कराई जाए।

  • प्रमाण-पत्र जारी करने से पहले वास्तविक बुनियादी साक्षरता का परीक्षण किया जाए।

  • जिन गांवों को साक्षर घोषित किया जा चुका है, वहां दोबारा परीक्षा की आवश्यकता और उसके आधार को सार्वजनिक किया जाए।

  • किसी भी ग्रामीण को सरकारी योजनाओं, राशन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र या अन्य सुविधाओं से नाम काटने का भय दिखाकर परीक्षा में शामिल करने के आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए।

सवाल अब भी कायम है

क्या साक्षर भारत का लक्ष्य केवल परीक्षा केन्द्रों में उपस्थिति, उत्तर पुस्तिका और प्रमाण-पत्र तक सीमित रहेगा, या वास्तव में ग्रामीणों को पढ़ना-लिखना सिखाने की दिशा में ठोस काम होगा?

सरकार और संबंधित विभाग को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्योंकि साक्षरता का प्रमाण-पत्र तभी सार्थक है, जब उसके पीछे वास्तविक ज्ञान और आत्मनिर्भरता हो।

सिर्फ कागज पर साक्षर गांव नहीं, वास्तव में पढ़ने-लिखने में सक्षम गांव चाहिए।

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