Media24Media.com: डाक विभाग की लापरवाही से छूटी नौकरी, आयोग ने दिलाया मुआवजा

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डाक विभाग की लापरवाही से छूटी नौकरी, आयोग ने दिलाया मुआवजा

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 बलौदाबाजार। स्पीड पोस्ट के माध्यम से भेजे गए संविदा भर्ती के तीन आवेदन पत्र निर्धारित समय सीमा के भीतर गंतव्य तक नहीं पहुंचने के मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने डाक विभाग को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने आवेदिका को डाक शुल्क लौटाने के साथ मानसिक एवं आर्थिक क्षतिपूर्ति तथा वाद-व्यय की राशि देने का आदेश दिया है।


जानकारी के अनुसार, लवन निवासी पूनम चौहान ने संविदा नियुक्ति के लिए तीन अलग-अलग पदों पर आवेदन पत्र 12 मार्च 2025 को लवन डाकघर से स्पीड पोस्ट के जरिए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ), जिला बलौदाबाजार-भाटापारा कार्यालय भेजे थे। आवेदनों की अंतिम तिथि 17 मई 2025 निर्धारित थी।

हालांकि, आवेदन निर्धारित समय सीमा तक संबंधित कार्यालय नहीं पहुंच सके। बाद में 19 मई को सीएमएचओ कार्यालय ने बंद लिफाफों में प्राप्त आवेदनों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और उन्हें वापस भेज दिया।

भर्ती का अवसर गंवाना पड़ा

परिवादिनी का आरोप था कि डाक विभाग की लापरवाही के कारण उसके आवेदन समय पर नहीं पहुंच सके, जिससे वह संबंधित संविदा पदों पर भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने और नौकरी प्राप्त करने के अवसर से वंचित रह गई। इसके चलते उसे मानसिक और आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।

इसी आधार पर पूनम चौहान ने जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बलौदाबाजार में परिवाद प्रस्तुत कर डाक विभाग से क्षतिपूर्ति की मांग की।

आयोग ने माना सेवा में कमी

मामले की सुनवाई के दौरान आयोग की अध्यक्ष रंजना दत्ता तथा सदस्य हरजीत सिंह चावला और शारदा सोनी ने प्रस्तुत दस्तावेजों, तथ्यों एवं संबंधित नियमों का परीक्षण किया।

आयोग ने अपने आदेश में कहा कि डाक विभाग द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण स्वीकार्य नहीं हैं। उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि डाक को समय पर पहुंचाने के लिए आवश्यक और समुचित प्रयास नहीं किए गए, जिससे सेवा में कमी साबित होती है।

डाक विभाग को देना होगा मुआवजा

आयोग ने उप डाकपाल, लवन तथा मुख्य पोस्टमास्टर जनरल, रायपुर को आंशिक रूप से सेवा में कमी का दोषी मानते हुए आवेदिका के पक्ष में फैसला सुनाया।

आदेश के अनुसार डाक विभाग को परिवादिनी को—

  • डाक शुल्क के रूप में 123 रुपये,
  • मानसिक एवं आर्थिक क्षतिपूर्ति के रूप में 10 हजार रुपये,
  • वाद-व्यय के लिए 3 हजार रुपये

का भुगतान करना होगा।

आयोग के इस फैसले को उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें सार्वजनिक सेवाओं में लापरवाही पर जवाबदेही तय की गई है।

 
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