Media24Media.com: डीजल-पेट्रोल फिर होगा महंगा? होर्मुज संकट और रूसी तेल पर सख्ती से बढ़ी चिंता

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डीजल-पेट्रोल फिर होगा महंगा? होर्मुज संकट और रूसी तेल पर सख्ती से बढ़ी चिंता

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 Petrol-Diesel Price:  मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में तेल टैंकरों की धीमी आवाजाही ने वैश्विक तेल बाजार में हलचल बढ़ा दी है। इसी बीच अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीद पर दी गई छूट आगे नहीं बढ़ाने से भारत की चिंता भी बढ़ गई है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या आने वाले दिनों में देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी हो सकती है।


दरअसल, होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। यहां तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की सप्लाई और ट्रांसपोर्टेशन लागत प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें करीब 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। टैंकरों के इंश्योरेंस और शिपिंग खर्च में भी तेज इजाफा हुआ है।

भारत के सामने बढ़ी दोहरी चुनौती

भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में कीमतों का सीधा असर देश की महंगाई, सरकारी खर्च और आम लोगों के बजट पर पड़ता है।
यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन भारत और चीन ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीद जारी रखी। इससे भारत को लंबे समय तक सस्ता कच्चा तेल मिलता रहा और घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली। इसी दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बन गया।
हालांकि अब अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर दी गई अस्थायी राहत समाप्त कर दी है। इसके बाद भारतीय रिफाइनरियों के लिए जोखिम और लागत दोनों बढ़ सकती हैं।

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था रूसी तेल आयात

डेटा के अनुसार, मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 2.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। कई महीनों तक भारत के कुल तेल आयात में रूसी क्रूड की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत रही। यही वजह थी कि भारत वैश्विक तेल संकट के बावजूद बड़े झटके से बचा रहा।

क्या बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि सरकार और तेल कंपनियां टैक्स, सब्सिडी और स्टॉक मैनेजमेंट जैसे विकल्पों के जरिए तत्काल असर को सीमित करने की कोशिश कर सकती हैं।
फिलहाल स्थिति पूरी तरह वैश्विक तनाव और तेल सप्लाई की स्थिरता पर निर्भर मानी जा रही है।
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