Media24Media.com: देवताओं ने क्यों ठुकरा दिया था अधिक मास? जानिए पुरुषोत्तम मास का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

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देवताओं ने क्यों ठुकरा दिया था अधिक मास? जानिए पुरुषोत्तम मास का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

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 सनातन धर्म में समय को केवल दिनों और महीनों का क्रम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन का आधार माना गया है। इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस वर्ष अधिक मास 17 मई से 15 जून तक रहेगा। करीब 30 दिनों तक चलने वाले इस विशेष काल को अधिक ज्येष्ठ मास कहा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है, लेकिन पूजा-पाठ, जप, तप और भक्ति के लिए इसे सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है।


खगोल विज्ञान से जुड़ा है अधिक मास का आधार

हिंदू पंचांग सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति पर आधारित होता है। जहां सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, वहीं चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का माना जाता है। इस कारण हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर पैदा होता है। तीन वर्षों में यही अंतर करीब 33 दिनों तक पहुंच जाता है। पंचांग और ऋतु चक्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

क्यों पड़ा पुरुषोत्तम मास नाम

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब इस अतिरिक्त महीने का निर्माण हुआ तो किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। सभी महीनों के अपने-अपने अधिपति थे, लेकिन इस महीने का कोई स्वामी नहीं था। देवताओं द्वारा ठुकराए जाने के बाद यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुंचा।

भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम मास” दिया और कहा कि अब यह सबसे श्रेष्ठ महीना कहलाएगा। साथ ही उन्होंने आशीर्वाद दिया कि इस महीने में जो भी भक्त श्रद्धा से पूजा-पाठ और भक्ति करेगा, उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होगी। तभी से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाने लगा।

क्यों नहीं किए जाते शुभ कार्य

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास सांसारिक कार्यों की बजाय आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित माना गया है। इसलिए इस दौरान विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। बड़े शुभ आयोजन और नए कार्यों की शुरुआत भी इस माह में टाली जाती है।

मान्यता है कि इस अवधि में किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते। वहीं पूजा-पाठ, व्रत, दान, जप-तप और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व माना गया है।

100 गुना फल मिलने की मान्यता

स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु ने कहा था कि पुरुषोत्तम मास में किए गए दान, पूजा, व्रत और धार्मिक कार्यों का फल सामान्य दिनों की तुलना में 100 गुना अधिक मिलता है। यही कारण है कि इस महीने को आत्ममंथन, साधना और ईश्वर से जुड़ने का श्रेष्ठ समय माना जाता है।

 
 
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