Media24Media.com: पर्यावरण संरक्षण : ग्रामीणों की अनोखी पहल, होलिका दहन में छः साल से नहीं जलाते है लकड़ी

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पर्यावरण संरक्षण : ग्रामीणों की अनोखी पहल, होलिका दहन में छः साल से नहीं जलाते है लकड़ी

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लाफिन कला में लकड़ियों की जगह गोबर के कंडों से जलती है होलिका

महासमुंद। जहां आधुनिकता के दौर में पर्यावरण को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, वहीं महासमुंद जिले से महज आठ किलोमीटर दूर ग्राम लाफिन कला एक अनुकरणीय मिसाल पेश कर रहा है। यहां पिछले छः वर्षों से होलिका दहन के लिए पेड़ों की लकड़ियों का नहीं, बल्कि गोबर के कंडों (उपलों) का उपयोग किया जा रहा है।इसी कड़ी में ग्रामीण सोमवार में घर-घर जाकर कंडे एकत्रित किए और समाज को प्रकृति बचाने का संदेश दिया।

इस मुहिम की कमान ग्राम के शिक्षक महेन्द्र कुमार पटेल और गोवर्धन साहू ने संभाल रखी है। बीते छ: साल से उनके द्वारा किया गया यह पहल अब गांव के लिए परंपरा बन रही है। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर इस वर्ष भी घर-घर से कंडे जुटाए। उनका कहना है कि प्रतिवर्ष होलिका दहन के नाम पर देश भर में लाखों टन लकड़ियां जला दी जाती हैं, जिससे न केवल प्रदूषण फैलता है, बल्कि बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ भी नष्ट हो जाते हैं। शिक्षक महेंद्र पटेल ने भावुक अपील करते हुए कहा कि यदि हम अपनी व्यस्त जीवनशैली में एक नया पेड़ लगा नहीं सकते, तो कम से कम होलिका दहन में कंडों का उपयोग कर पुराने पेड़ों को कटने से बचा तो सकते हैं। उन्होंने बताया कि गोबर के कंडे जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और प्रदूषण भी कम होता है। इस पहल से पेड़ों की रक्षा होती है। लाखों पेड़ों को कटने से बचाने का प्रयास है। लकड़ियों के धुएं की तुलना में गोबर के कंडे कम हानिकारक है। उन्होंने बताया कि गोबर की पवित्रता को उत्सव से जोड़ने की आवश्यकता है। पूरे गांव का एक साथ मिलकर कंडे दान करना है। लाफिन कला की यह पहल आज पूरे जिले और प्रदेश के लिए एक प्रेरणा है कि कैसे हम अपनी परंपराओं को निभाते हुए प्रकृति की रक्षा कर सकते हैं।

शास्त्रों में भी है गोबर की पवित्रता

हिंदू शास्त्रों में गोबर को अत्यंत पवित्र माना गया है। चाहे विवाह हो, गौरी-गणेश का निर्माण हो या कोई भी शुभ अनुष्ठान, गोबर का उपयोग अनिवार्य होता है। यहां तक कि जीवन के अंतिम संस्कार में भी गोबर का उपयोग शुचिता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में होलिका दहन में इसका उपयोग न केवल पर्यावरण बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी श्रेष्ठ है।

पहल को लेकर बच्चों और युवाओं में भी उत्साह

गांव के बच्चों और युवा नेतन पटेल ने बताया कि अब लाफिन कला में लकड़ियों की समस्या खत्म हो गई है। कंडों के उपयोग से होलिका दहन अब अधिक सुलभ और पर्यावरण के अनुकूल हो गया है। हर दृष्टि से यह पहल फायदेमंद साबित हो रही है। होलिका दहन के पहले गांव के घर-घर से बच्चे और जवान सियान सभी कंडे लेकर होलिका दहन स्थल में एकत्र करते है। 

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