Media24Media.com: टाइगर रिजर्व में ‘मौत का सिस्टम’! तड़पता रहा लकड़बग्घा, सोता रहा विभाग… एक महीने में दूसरी मौत

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टाइगर रिजर्व में ‘मौत का सिस्टम’! तड़पता रहा लकड़बग्घा, सोता रहा विभाग… एक महीने में दूसरी मौत

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 सूरजपुर। छत्तीसगढ़ के गुरु घासीदास नेशनल पार्क से एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना सामने आई है। यहां एक बीमार और घायल लकड़बग्घे की इलाज के अभाव में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि समय पर उपचार और रेस्क्यू की व्यवस्था नहीं होने के कारण यह दर्दनाक घटना हुई।


यह मामला बिहारपुर क्षेत्र के मकराद्वारी जंगल का है। जानकारी के अनुसार, जंगल में आग से प्रभावित होकर अपना प्राकृतिक आवास छोड़कर बाहर निकला लकड़बग्घा गंभीर रूप से बीमार और कमजोर था। स्थानीय ग्रामीणों ने उसकी हालत बिगड़ती देख वन विभाग को सूचना दी, लेकिन समय पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

सूत्रों के मुताबिक, उस समय पार्क का वन्यजीव चिकित्सक अवकाश पर था। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने बड़े संरक्षित क्षेत्र में आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था का अभाव क्यों है। वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण वन्यजीव को उपचार नहीं मिल सका और उसकी मौत हो गई।

एक महीने में दूसरी घटना, बढ़ी चिंता

यह कोई पहली घटना नहीं है। लगभग एक महीने पहले इसी क्षेत्र में एक तेंदुआ कुएं में गिर गया था। रेस्क्यू ऑपरेशन में देरी और बाद में उपचार में कथित लापरवाही के चलते उसकी भी मौत हो गई थी। लगातार हो रही इन घटनाओं ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

संरक्षण के दावों पर उठे सवाल

गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व

गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व, जो राज्य का सबसे बड़ा संरक्षित वन क्षेत्र माना जाता है, बाघ, तेंदुआ, भालू और लकड़बग्घा जैसे कई महत्वपूर्ण वन्यजीवों का आवास है। बावजूद इसके, लगातार हो रही घटनाएं यह संकेत देती हैं कि जमीनी स्तर पर संरक्षण व्यवस्था में खामियां हैं।

स्थानीय लोगों में आक्रो

घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों में नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि यदि समय पर उपचार और रेस्क्यू की व्यवस्था होती, तो लकड़बग्घे की जान बचाई जा सकती थी। उन्होंने वन विभाग की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

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