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सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन राष्ट्र को समर्पित, पीएम मोदी बोले - “विकसित भारत का यह नया अध्याय”

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 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फरवरी को सेवा तीर्थ तथा कर्तव्य भवन 1 और 2 का उद्घाटन करते हुए इसे भारत के विकास पथ में एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि आज देश एक नए इतिहास का साक्षी बन रहा है और यह दिन विकसित भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में नई शुरुआत का प्रतीक है।


प्रधानमंत्री ने कहा कि जहां कभी साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतें ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक सोच को लागू करने के लिए बनी थीं, वहीं आज सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन भारत की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए समर्पित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यहां से लिए जाने वाले फैसले किसी महाराजा की सोच नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने का आधार बनेंगे।

बेहतर कार्यस्थल, बढ़ी उत्पादकता

प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी का पहला क्वार्टर पूरा हो चुका है और विकसित भारत की कल्पना केवल नीतियों में नहीं, बल्कि कार्यस्थलों और इमारतों में भी दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि पुराने भवनों में जगह और सुविधाओं की कमी थी। करीब 100 साल पुरानी ये इमारतें जर्जर हो रही थीं और प्रशासनिक कार्यों में व्यावहारिक कठिनाइयां थीं।

उन्होंने जानकारी दी कि दिल्ली में कई मंत्रालय 50 से अधिक अलग-अलग स्थानों से संचालित हो रहे थे, जिन पर प्रतिवर्ष लगभग 1500 करोड़ रुपये किराये के रूप में खर्च हो रहे थे। साथ ही रोजाना 8–10 हजार कर्मचारियों के आवागमन में अतिरिक्त समय और संसाधन लगते थे। सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के निर्माण से खर्च में कमी, समय की बचत और उत्पादकता में वृद्धि होगी।

गुलामी की मानसिकता से मुक्ति पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा में गुलामी की मानसिकता से मुक्ति अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भी कई प्रतीकों को ढोया जाता रहा, जिन्हें बदलने की आवश्यकता थी। इसी क्रम में नेशनल वॉर मेमोरियल और पुलिस स्मारक का निर्माण किया गया।

उन्होंने बताया कि रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया और राजपथ को विकसित कर कर्तव्य पथ के रूप में नई पहचान दी गई। उनके अनुसार यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता की सोच को सेवा की भावना से जोड़ने का प्रयास है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि इन सभी निर्णयों के पीछे एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य को राष्ट्रगौरव से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत की पहचान स्वतंत्र प्रतीकों से ही बनेगी और यही सोच सेवा तीर्थ तथा कर्तव्य भवन की स्थापना के पीछे भी निहित है।

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