Media24Media.com: डील करो या तबाही झेलो! अमेरिका का ईरान को 10–15 दिन का अल्टीमेटम, US सेना हाई अलर्ट पर

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डील करो या तबाही झेलो! अमेरिका का ईरान को 10–15 दिन का अल्टीमेटम, US सेना हाई अलर्ट पर

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 मध्य-पूर्व में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को परमाणु समझौते पर सहमत होने के लिए 10–15 दिन का अल्टीमेटम दिया है। ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान समझौते पर नहीं आता, तो उसके लिए स्थिति “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” हो सकती है।


US सैन्य तैयारी तेज

मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी तेजी से बढ़ाई गई है। दो एयरक्राफ्ट कैरियर समूहों सहित युद्धपोत और लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं। मेडिटेरेनियन क्षेत्र में USS Gerald R. Ford सहित कई अमेरिकी युद्धपोतों की गतिविधि बढ़ी है, जिससे संभावित कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है।

ब्रिटेन ने एयरबेस देने से किया इनकार

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की सरकार ने ईरान पर संभावित हमले के लिए अपने एयरबेस के उपयोग की अनुमति देने से इनकार कर दिया। ब्रिटेन का कहना है कि बिना स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय अनुमति के पहले से हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकता है।

 रूस के साथ ईरान का सैन्य अभ्यास

तनाव के बीच ईरान ने रूस के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया है। तेहरान ने साफ कहा है कि वह अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर दबाव में कोई समझौता नहीं करेगा।
ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि उस पर हमला हुआ तो पूरे क्षेत्र में व्यापक युद्ध भड़क सकता है।

 होर्मुज़ जलडमरूमध्य में लाइव-फायर ड्रिल

ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य में लाइव-फायर सैन्य अभ्यास शुरू किया है। यह वही मार्ग है, जहाँ से दुनिया के लगभग 20% तेल का व्यापार गुजरता है।

 अमेरिकी सेना स्टैंडबाय पर

अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिडिल ईस्ट में तैनात अमेरिकी सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है और संभावित कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा गया है। हालांकि अंतिम निर्णय राष्ट्रपति ट्रंप को ही लेना है।
इसी मुद्दे पर ट्रंप ने अपने शीर्ष सलाहकारों के साथ उच्च स्तरीय बैठक भी की।

क्षेत्रीय युद्ध का खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच सीधा संघर्ष शुरू होता है, तो इसमें इज़राइल, खाड़ी देश और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी शामिल हो सकते हैं। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति और विश्व अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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