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बस्तर पंडुम 2026 का भव्य आगाज़, राष्ट्रपति बोलीं- छत्तीसगढ़ मेरा अपना घर

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 रायपुर/जगदलपुर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज जगदलपुर के लाल बाग मैदान में आयोजित बस्तर पंडुम 2026 का भव्य शुभारंभ किया। राष्ट्रपति सुबह करीब साढ़े 10 बजे जगदलपुर पहुंचीं और बस्तर अंचल के इस महापर्व का उद्घाटन किया।


जनजातीय कला, संस्कृति और परंपरा को समर्पित इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ आना उन्हें अपने घर आने जैसा महसूस होता है। उन्होंने बस्तर और छत्तीसगढ़ की संस्कृति, वीरता और प्राकृतिक सौंदर्य की सराहना करते हुए कहा कि यह क्षेत्र देश की सांस्कृतिक विरासत का अमूल्य हिस्सा है।


‘बस्तर पंडुम केवल आयोजन नहीं, एक जीवंत उत्सव’

अपने संबोधन में राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि छत्तीसगढ़ वीरों की धरती है, जहां के लोगों ने देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।
उन्होंने कहा कि बस्तर की संस्कृति प्राचीन होने के साथ-साथ अत्यंत मधुर और समृद्ध है।

राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम को सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बस्तर की जीवंत संस्कृति और परंपराओं का उत्सव बताते हुए कहा कि यह महोत्सव जनजातीय समाज की पहचान और गौरव का प्रतीक है।

नक्सलवाद पर बोलीं राष्ट्रपति—बस्तर तेजी से बदल रहा है

राष्ट्रपति ने नक्सलवाद के मुद्दे पर भी स्पष्ट रूप से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दशकों तक नक्सलवाद के कारण आदिवासी समाज को भारी नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन अब बस्तर नक्सलमुक्त होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोग हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं, जो सकारात्मक बदलाव का संकेत है।
आज बस्तर के गांव-गांव तक स्कूल, सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही हैं और विकास की नई तस्वीर उभर रही है।

जनसेवा करने वालों को दी बधाई

अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए चिकित्सक दंपती, डॉ. बुधरी ताती समेत जनसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सभी लोगों को बधाई दी और उनके कार्यों की प्रशंसा की।

प्रदर्शनी स्टॉलों का किया निरीक्षण

राष्ट्रपति मुर्मू ने जगदलपुर पहुंचने के बाद महोत्सव स्थल पर लगाए गए प्रदर्शनी स्टॉलों का निरीक्षण भी किया। यहां बस्तर की पारंपरिक हस्तशिल्प कला, जनजातीय वेशभूषा, लोक संगीत, नृत्य और स्थानीय उत्पादों की आकर्षक झलक देखने को मिली।

आदिवासी संस्कृति की पहचान है बस्तर पंडुम

बस्तर पंडुम आदिवासी समाज की जीवंत परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को प्रस्तुत करने वाला महोत्सव है। इसमें लोक कला, पारंपरिक खान-पान, गीत-संगीत और नृत्य का समावेश होता है।
यह आयोजन पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही जनजातीय विरासत को संरक्षित रखने का एक प्रभावी माध्यम माना जा रहा है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया जा रहा है।

तीन स्तरों पर हो रहा आयोजन

इस वर्ष बस्तर पंडुम का आयोजन तीन चरणों में किया जा रहा है—

  • ग्राम पंचायत स्तर
  • जिला स्तर
  • संभाग/राज्य स्तर

कार्यक्रम में 12 पारंपरिक विधाओं की प्रस्तुतियां शामिल हैं, जिनमें लोक नृत्य, लोकगीत, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनें और जनजातीय संस्कृति की विविध झलकियां देखने को मिल रही हैं।

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