Media24Media.com: महासमुंद का ‘संजय दत्त’ बुलू नहीं रहे, दुनिया से हटकर जीने का था जुनून

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महासमुंद का ‘संजय दत्त’ बुलू नहीं रहे, दुनिया से हटकर जीने का था जुनून

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महासमुंद- शहर के कुर्मी पारा क्षेत्र की एक अलग पहचान रखने वाली शख्सियत अब हमारे बीच नहीं रही। अपने पहनावे, चाल-ढाल और फिल्म अभिनेता Sanjay Dutt की शैली से प्रेरित अंदाज़ के कारण वे शहर में खास पहचान रखते थे। फिल्मी रंग में ढली उनकी जिंदगी ने लोगों के दिलों में जगह बनाई थी। नाम था बुलू उर्फ चिंतामणि चंद्राकर (45 वर्ष)। नाम भले ही चिंतामणि था, लेकिन स्वभाव से वे बेफिक्र बादशाह थे। बिंदास जिंदगी, हर मौसम में चेहरे पर मुस्कान, बढ़े हुए बाल और संगीत की दीवानगी उनकी पहचान बन गई थी। उनके निधन की खबर से महासमुंद सहित आसपास के इलाके में शोक का माहौल है।

अलग और आकर्षक व्यक्तित्व 

बुलू चंद्राकर का व्यक्तित्व बेहद अलग और आकर्षक था। लंबे कद, मेहंदी से रंगे लंबे बाल और दाढ़ी, ढीले-ढाले स्टाइलिश कपड़े, ऊंची हील वाले भारी जूते और आत्मविश्वास से भरी चाल—ये सब उन्हें भीड़ से अलग बनाते थे। वे जहां भी खड़े होते, लोग एक नजर जरूर देखते। बच्चे हों या बड़े, उनके चाहने वालों की कमी नहीं थी।

हीरो बनने मुंबई तक का सफर 

बचपन से ही उनका सपना हीरो बनने का था। 90 के दशक में वे बड़े अरमानों के साथ मुंबई गए थे। स्थानीय लोगों ने उत्साह के साथ उन्हें विदा किया था। उनका सपना था फिल्मी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना।

हालांकि किस्मत ने साथ नहीं दिया। संघर्ष के दौरान उनका सामान और पैसों से भरा बैग चोरी हो गया। कुछ समय तक प्रयास करने के बाद परिस्थितियों ने उन्हें महासमुंद लौटने पर मजबूर कर दिया।

वापस आकर उन्होंने कुछ दिनों तक आइसक्रीम का ठेला चलाया। खास बात यह थी कि वे ठेला भी पूरे शौक और स्टाइल से चलाते थे। उनका अंदाज किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं लगता था।

अनुशासित दिनचर्या और सादगी 

बाद में उन्होंने ठेला चलाना बंद कर दिया। इसके बाद वे प्रतिदिन कुर्मी पारा से बीटीआई रोड स्थित गुरु गोविंद सिंह उद्यान तक पैदल जाया करते थे। दिनभर  पैदल चलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।

वे अपने व्यक्तित्व को लेकर सजग रहते थे। बड़ों को नमस्कार और छोटों को हाथ हिलाकर अभिवादन करना उनकी आदत थी।

त्योहारों में संगीत का रंग 

बुलू चंद्राकर को संगीत से विशेष लगाव था। होली, दिवाली, रक्षाबंधन जैसे पर्वों पर वे अपने टेप रिकॉर्डर और साउंड सिस्टम जेब में लेकर चलते थे। इसके जरिए माहौल को जीवंत बना देते थे। पर्व के अनुरूप गीत बजाकर लोगों को आकर्षित करना उनका अलग अंदाज था।

 निजी जीवन का आघात 

लगभग एक वर्ष पहले उनकी पत्नी का हृदयाघात से निधन हो गया । इस गहरे सदमे के बावजूद वे सामान्य जीवन जीने का प्रयास कर रहे थे। अब उनके अचानक निधन से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

शादी समारोह में गए थे, वहीं हुआ निधन

जानकारी के अनुसार, महासमुंद से करीब 10 किमी दूर खट्टी गांव में वे एक परिचित के विवाह समारोह में शामिल होने गए थे। वहां देर रात तक नृत्य किया। बताया जाता है कि वे गांव की एक दुकान के सामने सो गए थे। दोपहर तक जब वे नहीं उठे, तब लोगों ने पास जाकर देखा। उनकी सांसें थम चुकी थीं। सूचना पर पुलिस पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। मृत्यु के वास्तविक कारण का खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही हो सकेगा।

बुलू चंद्राकर भले ही बड़े पर्दे के सितारे नहीं बन पाए, लेकिन महासमुंद की गलियों में वे अपने अंदाज के ‘हीरो’ जरूर थे। उनकी मुस्कान, चाल और अलग स्टाइल लोगों की यादों में हमेशा जीवित रहेगी।

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