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उपराष्ट्रपति ने नई दिल्ली में भारतीय भाषाओं पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली में भारतीय भाषाओं पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस सम्मेलन का आयोजन वैश्विक हिंदी परिवार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

विद्वानों, भाषाविदों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने भाषा को सभ्यता की अंतरात्मा बताया, जो पीढ़ियों के बीच सामूहिक स्मृति, ज्ञान प्रणालियों और मूल्यों को वहन करती है। प्राचीन शिलालेखों और ताड़पत्र पांडुलिपियों से लेकर आज की डिजिटल लिपियों तक, भाषाओं ने दर्शन, विज्ञान, काव्य और नैतिक परंपराओं को संरक्षित रखा है, जो मानवता को परिभाषित करती हैं।

चेन्नई में हाल ही में आयोजित सिद्ध दिवस समारोह में अपनी सहभागिता को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि वहां उन्होंने बड़ी संख्या में ताड़पत्र पांडुलिपियां देखीं, जो भारत की विशाल और बहुभाषी ज्ञान परंपराओं की स्थायी साक्षी हैं। उन्होंने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा ने दर्शन, चिकित्सा, विज्ञान, शासन और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में गहरा योगदान दिया है।

उपराष्ट्रपति ने रेखांकित किया कि भारत की अनेक भाषाओं ने कभी भी देश को विभाजित नहीं किया, बल्कि उन्होंने साझा सभ्यतागत चेतना और समान धर्म को संरक्षित एवं सुदृढ़ किया है।

राज्यसभा के सभापति के रूप में संसद के अपने प्रथम सत्र के अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि अब संसद सदस्य बढ़ती संख्या में अपनी मातृभाषाओं में बोल रहे हैं। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि हाल ही में भारत के संविधान का संथाली भाषा में अनुवादित संस्करण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा जारी किया गया, जिसे उन्होंने भाषाई समावेशन और सभी भाषाई समुदायों के प्रति लोकतांत्रिक सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत का संविधान और उसकी आठवीं अनुसूची भाषाई विविधता को मान्यता देकर और उसका उत्सव मनाकर भारत की प्राचीन बुद्धिमत्ता को प्रतिबिंबित करती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता समानता में नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान में निहित है, और लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब प्रत्येक नागरिक अपनी भाषा में अभिव्यक्ति कर सके।

समकालीन चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि विश्वभर में अनेक स्वदेशी भाषाएं संकटग्रस्त हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे भाषा सम्मेलन अनुसंधान को सुदृढ़ करने, अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने तथा विशेष रूप से संकटग्रस्त भाषाओं की प्राचीन लिपियों और पांडुलिपियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में की गई पहलों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को रेखांकित किया, जो बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करती है। उन्होंने भारतीय भाषाओं की पांडुलिपियों के संरक्षण और प्रसार के लिए ज्ञान भारतम मिशन की सराहना की और भारत की इस मान्यता को दोहराया कि ज्ञान पवित्र है और उसे साझा किया जाना चाहिए।

भाषा संरक्षण में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर बल देते हुए उपराष्ट्रपति ने डिजिटल अभिलेखागार, एआई-आधारित अनुवाद उपकरणों और बहुभाषी प्लेटफॉर्म के उपयोग का आह्वान किया, ताकि भारतीय भाषाएं वर्तमान में फलें-फूलें और भविष्य को आकार दें।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भाषाओं के संरक्षण से भारत अपनी सभ्यताओं का संरक्षण करता है; भाषाई विविधता के पोषण से लोकतंत्र सुदृढ़ होता है; और प्रत्येक भाषा का उत्सव मनाकर मानव गरिमा को सम्मान मिलता है।

इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्याम परांडे सहित देश-विदेश से आए विद्वान, शिक्षाविद, भाषाविद, शोधकर्ता और प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

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