Media24Media.com: IGNCA में ‘Stars Shine in Ads’ प्रदर्शनी का आयोजन: भारतीय विज्ञापन और सिनेमा के सांस्कृतिक सफर की झलक

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IGNCA में ‘Stars Shine in Ads’ प्रदर्शनी का आयोजन: भारतीय विज्ञापन और सिनेमा के सांस्कृतिक सफर की झलक

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संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन स्वायत्त संस्था इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के मीडिया सेंटर ने समवेत ऑडिटोरियम में ‘Stars Shine in Ads: an Unique Ad Exhibition’ शीर्षक से एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन रमा पांडे (फिल्म एवं थिएटर निर्देशक व लेखिका), डॉ. सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिव, IGNCA) और सुशील पंडित (संचार रणनीतिकार) ने किया। उद्घाटन भाषण अनुराग पुनेथा, नियंत्रक, मीडिया सेंटर, IGNCA ने दिया। प्रदर्शनी का क्यूरेशन मीडिया सेंटर, IGNCA के इक़बाल रिज़वी द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत विषय पर एक पैनल चर्चा का भी आयोजन हुआ।

सिनेमा की दुनिया से आगे बढ़ते हुए, यह प्रदर्शनी इस बात पर प्रकाश डालती है कि किस प्रकार विज्ञापन ने फिल्मी हस्तियों को आम जनजीवन के ताने-बाने का हिस्सा बनाया। फिल्म सितारों ने जन-रुचि, फैशन और आकांक्षाओं को आकार दिया, और उनके प्रति जनता के विश्वास ने उन्हें भारतीय विज्ञापन के विकास में केंद्रीय भूमिका दी। उत्पादों के साथ उनका जुड़ाव भारत के दृश्य और सांस्कृतिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण चरण को दर्शाता है, जिससे यह समझ आता है कि लोकप्रिय छवियों और व्यावसायिक संचार ने मिलकर सामाजिक स्मृति और उपभोक्ता संस्कृति को कैसे प्रभावित किया। इस अवसर पर महान विज्ञापन जगत के दिग्गज स्वर्गीय पियूष पांडे को श्रद्धांजलि अर्पित करना भी उपयुक्त है, जिनके योगदान ने भारतीय संचार की भाषा, कल्पनाशीलता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को नई दिशा दी।

इस अवसर पर रमा पांडे ने कहा, “विज्ञापन की दुनिया को केवल भावनाओं या बाजार की भाषा तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। यह अपने आप में साहित्य का एक नया, जीवंत और समकालीन रूप है।” जैसे कविता कुछ शब्दों में गहरी भावनाएँ व्यक्त करती है, कहानियाँ साधारण जीवन को अर्थ देती हैं और नाटक संवाद के माध्यम से मनुष्यों को जोड़ता है—वैसे ही विज्ञापन भी कुछ पंक्तियों, दृश्य संकेतों और क्षणिक पलों के जरिए समाज से संवाद करता है।

विज्ञापन का उद्देश्य केवल उत्पाद बेचना नहीं होता; यह उपभोक्ताओं के मन में विश्वास, अपनापन और संबंधों का निर्माण करता है। जब विज्ञापन आम आदमी की भाषा में, उसके अनुभवों, स्मृतियों और जीवन से जुड़कर प्रस्तुत होता है, तो वह बाजार की सीमाओं से ऊपर उठकर एक सांस्कृतिक दस्तावेज बन जाता है। यही कारण है कि अनेक विज्ञापन वर्षों तक हमारी स्मृतियों में बसे रहते हैं—वे हमें मुस्कुराते हैं, सोचने पर मजबूर करते हैं और अक्सर अपने समय की आत्मा को परिभाषित करते हैं।

आज जब माध्यम तेज़ी से बदल रहे हैं—रेडियो से टेलीविजन, प्रिंट से डिजिटल और मोबाइल स्क्रीन तक—विज्ञापन की चुनौतियाँ और जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में विज्ञापन की यात्रा को संरक्षित करना, उसका अभिलेखीकरण और समझ विकसित करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह न केवल ब्रांड्स का इतिहास है, बल्कि समाज की बदलती प्रकृति, आकांक्षाओं और सांस्कृतिक ताने-बाने का भी दर्पण है। यह प्रदर्शनी विज्ञापन को एक रचनात्मक और बौद्धिक कला-रूप के रूप में देखने का अवसर देती है—एक ऐसा माध्यम जो भावनाओं से जन्म लेता है, भाषा से आकार पाता है और साहित्य की तरह समय के साथ अपनी प्रासंगिकता स्थापित करता है।

इस अवसर पर सुशील पंडित ने कहा, “जब मैं वर्षों पहले इंडियन एक्सप्रेस और बाद में द टेलीग्राफ के लिए लिख रहा था, तब मैंने गहराई से महसूस किया कि विज्ञापन केवल उत्पाद बेचने का माध्यम नहीं है—यह अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों का प्रतिबिंब रहा है।” उन्होंने बताया कि एक समय अखबार एक या डेढ़ रुपये में बिकते थे और यह कीमत छपाई की लागत भी पूरी नहीं कर पाती थी। ऐसे में प्रिंट मीडिया को सहारा देने वाली वास्तविक शक्ति विज्ञापन ही था। पत्रकारों की स्वतंत्रता, लेखन की निरंतरता और समाचार पत्रों व पत्रिकाओं का अस्तित्व इसी पर निर्भर था। विज्ञापन ने न केवल समाचार उद्योग को समर्थन दिया, बल्कि साहित्य, कविता और सांस्कृतिक विमर्श को भी पोषित किया। रेडियो और समाचार पत्रों के युग से लेकर टेलीविजन के आगमन तक, विज्ञापन दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनते चले गए और सामूहिक स्मृति में रच-बस गए।

पंडित ने रेखांकित किया कि “पियूष पांडे का सबसे बड़ा योगदान विज्ञापन की भाषा को औपचारिकता से निकालकर सरल, आत्मीय और रोज़मर्रा की बातचीत में बदलना था—ऐसी भाषा जो मित्रों के संवाद जैसी हो और उपभोक्ताओं से समानता के भाव से बात करे।” उन्होंने आगे कहा, “तकनीक, उत्पाद और सुविधाएँ समय के साथ बदल सकती हैं और उनकी नकल भी हो सकती है, लेकिन ब्रांड और उपभोक्ता के बीच का भावनात्मक रिश्ता अमूर्त होता है—उसे दोहराया नहीं जा सकता। विज्ञापन की वास्तविक शक्ति इसी रिश्ते के निर्माण में निहित है, जो आवश्यकता से आगे बढ़कर इच्छा, निष्ठा और विश्वास पैदा करता है।” डिजिटल युग पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि आज विज्ञापन के माध्यम बदल गए हैं और संचार अधिक लक्षित हो गया है, लेकिन चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। नई पीढ़ी की भाषा, आकांक्षाएँ और दृष्टिकोण अलग हैं; उनसे जुड़ने के लिए यह समझना आवश्यक है कि संचार केवल क्या कहा जाता है, यह नहीं, बल्कि कैसे कहा जाता है—यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अपने वक्तव्य के समापन में पंडित ने कहा, “यह प्रदर्शनी भारतीय विज्ञापन की लंबी यात्रा को समझने का अवसर देती है, जिसने उपभोक्ता संस्कृति, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक व्यवहार को आकार दिया है। आयोजकों को इस प्रयास के लिए बधाई, क्योंकि अतीत को समझे बिना भविष्य की दिशा तय करना कठिन है।”

उद्घाटन संबोधन में अनुराग पुनेथा ने कहा कि IGNCA की विज्ञापन अभिलेखीकरण पहल इस महत्वपूर्ण दृश्य धरोहर को समृद्ध और विस्तारित करने के लिए समर्पित है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से न केवल विज्ञापनों का संरक्षण किया जा रहा है, बल्कि भारत की रचनात्मक विपणन यात्रा—उसकी सौंदर्यबोध, भाषा, हास्य, सामाजिक प्रभाव और नॉस्टैल्जिया—का एक सुव्यवस्थित अभिलेख भी तैयार किया जा रहा है। इस अवसर पर विज्ञापन के विद्यार्थी, शोधकर्ता, उत्साही दर्शक और आम जनता उपस्थित रहे।

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