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आध्यात्मिक चिंतन : शब्द ऊँचे हों, आवाज नहीं-बी के ब्रम्हानंद

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 रायपुर- मनुष्य के जीवन में संवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हम अपने विचार, भावनाएँ और अनुभव शब्दों के माध्यम से ही प्रकट करते हैं। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनी बात मनवाने के लिए आवाज़ ऊँची कर लेते हैं। इस संदर्भ में कहा गया है – “हमारे शब्द ऊँचे हों, आवाज़ नहीं।” यह वाक्य न केवल व्यवहारिक बल्कि गहरे आध्यात्मिक अर्थ भी समेटे हुए है।


“हमारे शब्द ऊँचे हों, आवाज नहीं — क्योंकि फूल बरसाया जाता है, शोले नहीं।”

यह कथन केवल एक सूक्ति नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि है। आज जब समाज में संवाद की जगह शोर, तर्क की जगह आक्रोश, और भाषा की जगह भाषण लेता जा रहा है, तब यह विचार हमें आत्मचिंतन के लिए आमंत्रित करता है।

शब्द की शक्ति— सृष्टि और संवाद से श्राप तक

आदी सनातन दर्शन में कहा गया है — “वागर्थाविव संपृक्तौ” अर्थात शब्द और उसका अर्थ कभी अलग नहीं होते। वेदों की ऋचाएँ हों या शिव बाबा की मुरली (ईश्वरीय ज्ञान), सभी इस बात पर बल देती हैं कि शब्द न केवल संवाद का माध्यम हैं, बल्कि चेतना के संप्रेषण का सेतु भी है।

शब्द ब्रह्म हैं। उन्हीं से सृजन हुआ, उन्हीं से सृजन बचा है। जब हम शब्दों को संयम से, करुणा से, विनम्रता से प्रयोग करते हैं, तो वे आशीर्वाद बनते हैं। जब हम उन्हें गुस्से, तिरस्कार और क्रोध में बोलते हैं, तो वही शब्द श्राप बन जाते हैं।

 ऊँची आवाज़ नहीं, ऊँचे विचार चाहिए

गर्व, अहंकार और क्रोध में डूबी आवाज़ चाहे जितनी भी ऊँची हो, वह किसी को जीत नहीं सकती। लेकिन प्रेम, करुणा और सत्य से निकले शब्दों की ऊँचाई हर दिल को छू लेती है। सृष्टि पर जितने भी महात्मा हुए हैं, उनका जीवन ही उनका संदेश है। ब्रम्हा बाबा के मुख से साक्षात शिव दर्शन और साक्षात्कार होता है।

गौतम बुद्ध मौन में भी क्रांति कर देते थे। महावीर ने कठोर वाणी नहीं, अनुप्रास और अहिंसा के साथ प्रवचन दिए। संत कबीर ने कितनी अच्छी बात कही है —

"ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय,

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।"

आज जब बहसें कटुता में बदल जाती हैं, सोशल मीडिया से लेकर संसद तक शब्दों की मर्यादा टूट जाती है, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि वाणी वह दीपक है जिससे आत्मा उजियारी होती है।

 आत्मसंयम और माधुर्य

जब हम अपनी आवाज़ ऊँची करते हैं, तो दूसरे की आवाज़ और भी ऊँची हो जाती है। यह प्रतिस्पर्धा नहीं, संघर्ष बन जाती है। लेकिन जब हम अपने शब्दों को ऊँचा करते हैं, अर्थात उनमें अर्थ, संवेदना, करुणा और विवेक भरते हैं ,तो कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं रहती, केवल संवाद होता है। इस तरह से अभिमान (अहंकार) की ऊँची आवाज़ शोर करती है। स्वमान के ऊँचे शब्द शांति लाते हैं।

वाणी की साधना— एक आत्मिक अभ्यास

जैसे योग में प्राणायाम से मन को नियंत्रित किया जाता है, वैसे ही राजयोग में वाणी-संयम और मेडिटेशन से आत्मा को निर्मल किया जाता है। दुनिया भर में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय राजयोग से विश्व शांति, आनंद और प्रेम का संदेश दे रहे हैं। हम इस तरह आध्यात्मिक अभ्यास कर सकते हैं:

मौन का अभ्यास— हर दिन कुछ क्षण बिना बोले रहना, आत्मनिरीक्षण के लिए। जब वाणी निःशब्द हों, तब मन से मन की बात होनी चाहिए। यही मौन का सार्थक अभ्यास है।

विचारपूर्वक बोलना — “क्या यह सत्य है? क्या यह आवश्यक है? क्या यह शुभ है?” — इन तीन प्रश्नों के आधार पर शब्द चुनना, फिर बोलना।

कठोर शब्दों से बचना — भले ही सच बोलें, पर उसे माधुर्य से बोलें। कहा गया है- 'सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात' अर्थात सत्य वचन बोलिए, साथ ही सुनने वाले को प्रिय लगे ऐसा बोलिए। कठोर वचन नहीं।

शब्द से सेवा— परिवार और समाज में परिवार, समाज या राष्ट्र — सब जगह हमारी भाषा का प्रभाव पड़ता है। यदि हम बच्चों से डाँट के बजाय समझदारी से बात करें, यदि हम विवादों में चिल्लाने के बजाय शांति से अपनी बात रखें, तो संवाद अधिक सार्थक बनता है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे — "Talk to yourself once a day, otherwise you may miss meeting an excellent person." मतलब- " दिन में एकबार खुद से बात करें, वरना आप किसी बेहतरीन इंसान से मिलने से चूक सकते हैं। "

देह अभिमान से परे हर पल यह याद रहना चाहिए कि मैं अजर, अमर, अविनाशी आत्मा हूँ। इस तरह से जब यह संवाद आत्मा से हो, तो स्वाभाविक है कि बाहर की भाषा भी अधिक निर्मल, सुसंस्कृत और प्रभावी होगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी आवाज़ नहीं, अपने विचार, अपने शब्द, अपने भाव ऊँचे करें। ऊँचे शब्दों का अर्थ है — सत्य से जुड़ी बात, प्रेम से भरी भाषा, विवेक से युक्त दृष्टि और विनम्रता से सज्जित आत्मा।


 चिंतन कीजिए- 

"शब्द ही शस्त्र हैं, शब्द ही शांति है।

शब्द ही पूजा है, शब्द ही क्रांति है।

शब्द ऊँचे हों, तो आत्मा ऊँचाई को छूती है।

आवाज़ ऊँची हो, तो केवल दूरी ही बढ़ती है।"

आइए, हम सब अपने शब्दों को ऊँचा करें, अपनी वाणी में मधुरता लाएँ और अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊँचाई की ओर अग्रसर करें।



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