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Charcha Chaurahe Par : कौन बनेगा सीएम-करोड़ों का सवाल, कांग्रेस को कांग्रेसियों ने हराया, आम आदमी से 'खास' बनने का सफर, किस्मत के धनी और 'किस्मत' खराब

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चर्चा चौराहे पर-11

कौन बनेगा सीएम, करोड़ों का सवाल

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हो गया है। अब मुख्यमंत्री का चयन होना है। भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है। भाजपा नेताओं के नाम पर अब करोड़ों का सवाल लग रहा है। कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर, 'कौन बनेगा मुख्यमंत्री' का खेला चल रहा है।


 सट्टाबाजार में सर्वाधिक भाव 'साव' को मिल रहा है। चौराहे पर चर्चा हो रही थी-'ओपी' हो सकते हैं सीएम। युवा हैं, ऊर्जावान हैं। उन्हें 'बड़ा आदमी' बनाने शाही आश्वासन मिला है। एक राजनीतिक पंडित ने टिप्पणी की- बड़ा बनने के लिए तजुर्बा भी कोई चीज है ? फिर 'साव, साय, सिंह, सरोज' जैसे कई नामों की चर्चाओं ने जोर पकड़ा। आखिरी में "कोनो बने हमन ला काय करना हे"(कोई भी बनें, हमें क्या?) के साथ चर्चा पर विराम लग गया। दाँव लगाने के शौकीन अब भी 'दावों' पर दाँव लगा रहे हैं। आप बता सकते हैं-कौन बनेंगे छत्तीसगढ़ का चौथा सीएम? क्योंकि, सवाल करोड़ों का है।

कांग्रेस को कांग्रेसियों ने हराया, भाजपाइयों में...


 "हमें तो अपनों ने लूटा,
      गैरों में कहाँ दम था।
         मेरी कश्ती डूबी वहाँ, 
           जहाँ पानी कम था।।"
की तर्ज पर इन दिनों राजनीतिक गलियारे में चर्चा है- 

" हमें तो कांग्रेसियों ने हराया,
      भाजपाइयों में कहाँ दम था।
            हमारी सत्ता गई वहाँ से, 
              जहाँ 'डीसीएम' का दमखम था।।"

चौराहे पर चार लोग चर्चा कर रहे थे। कांग्रेस की हार का कारण क्या है? निष्कर्ष निकाला गया-'सीएम' की कुर्सी की लड़ाई। सीएम 'सीएम' के दावेदारों को निपटाने में लगे थे। तभी तो अभेद्य गढ़ में भी 'बाबा' को सन्यास का संदेश मिला। छत्तीसगढ़ की जनता भोली है, मूर्ख नहीं। धान-धान कहकर खुद 'धनवान' बने। छत्तीसगढ़ी वाद कहकर 'जातिवाद' का बीज बोए। ढाई-ढाई कहकर 'पांच साल' बीता दिए। रुष्ट जनता और कार्यकर्ताओं ने धान की जगह 'धनिया' बो दिया। अब राग अलाप रहे हैं-'गैरों में कहाँ दम था?'

आम आदमी से 'खास' बनने का सफर


राजनीति में कब किसकी किस्मत चमक जाए, कह नहीं सकते हैं। न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता में प्रवेश के लिए 'विशिष्ट योग्यता' और 'गुणों' की आवश्यकता होती है। राजनीति में सबकुछ 'गुणाभाग' पर निर्भर होता है। आम आदमी कब खास बन जाए, कह नहीं सकते। यही तो भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है। 'ईश्वर' साक्षी हैं, कल तक जिनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं था। वह आम आदमी आज 'खास' हैं। इधर, कल तक जिनकी तूती बोलती थी, उनकी पत्नी ने भी सुनना बंद कर दिया है। चौराहे पर चर्चा हो रही थी, पार्टियों ने महिलाओं को भी इस बार 'खास' मौका दिया। कुछ महिलाओं के पतियों के कारनामें ऐसे थे कि 'बेचारी' आम से खास नहीं बन सकीं। डर है कि बाहरी दुनिया की राजनीति कहीं घर में 'राजनीतिक रंग' न ले ले। करोड़ों रुपये फूंककर हारे हुए जुआड़ी की भांति हाथ मल रहे हैं उम्मीदवार। वे ही इसका दर्द महसूस कर सकते हैं।

 किस्मत के धनी और 'किस्मत' खराब


छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए चुनाव हो गया। जो "जीते, किस्मत के धनी। हारे, उनका किस्मत खराब।" दिलासा दिलाने का क्रम ऐसे ही चल रहा है। इस बीच चौराहे पर चर्चा हो रही है कि 'वह' किस्मत का धनी था। पाँच साल सत्ता सुख भोगा। दोनों हाथों से जमकर बटोरा। चुनाव आया तो टिकट कट गई। जनता, हराने की ठान कर बैठी थी। चुनाव मैदान में नहीं उतरने से करोड़ों रुपये बचा लिया। वहीं 'किस्मत' की तो किस्मत ही खराब है। क्षेत्र में हल्ला मचा-'किस्मत' खराब है। हल्ला सुनकर लोग चौके। किस्मत बदलने का उपाय किया। फिर क्या था, किस्मत का लेख कभी मिटा है? जो मिट जाएगा। किस्मत साथ लेकर कूद गए मैदान में। जमानत जब्त करा बैठे। अब लोग चुटकी ले रहे हैं- इनका तो 'किस्मत ही खराब' है। चतुराई के आगे किसी की नहीं चली। राजनीति में 'चतुराई' जरूरी है।
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