Media24Media.com: बाबरी विध्वंस: 5 घंटे में गिराया था विवादित ढांचा, अतित भूल अब भविष्य देख रही अयोध्या

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बाबरी विध्वंस: 5 घंटे में गिराया था विवादित ढांचा, अतित भूल अब भविष्य देख रही अयोध्या

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6 दिसंबर 1992 की वो शाम शायद ही कोई भारतीय भूल पाएगा। जब लाखों की संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे और महज 5 घंटे में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया था। धर्म और राजनीति की इस लड़ाई में आज ही के दिन कई लोगों ने खून बहाए थे। राम का नाम लेकर कारसेवकों ने विवादित ढांचे पर चढ़ाई शुरू कर दी थी और देखते ही देखते पूरा ढाचा जमीन में समा गया था।









इसके बाद से पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे सुलगने लगे थे. 2 हजार से ज्यादा परिवारों ने अपनों को खोया था। आज बाबरी विध्वंस की 28वीं बरसी है। राम जन्मभूमि को लेकर दशकों तक चले विवाद पर भले ही अब विराम लग गया हो और भव्य राम मंदिर बनने जा रहा हो, लेकिन विवादास्पद ढांचा ढहाने की घटना इतिहास में दर्ज है।





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जानिए बाबरी विध्वंस से जुड़ी अहम बातें-





  • 6 दिसंबर, 1992 को होने वाली कारसेवा के लिए उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया था कि देश के समस्त लोग इस कारसेवा में हिस्सा ले सकते हैं। कोर्ट की ओर से संख्या का निर्धारण नहीं किया गया था।
  • कारसेवा के समय कुछ असामाजिक तत्वों के कारण वहां का माहौल अस्त-व्यस्त हो गया और बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया गया।
  • मामले की पहली एफआईआर 6 बजकर 15 मिनट पर राम जन्मभूमि थाने में दर्ज हुई थी, जिसमें लाखों अज्ञात कारसेवकों को आरोपी बनाया गया था लेकिन कोई भी नामजद नहीं था।
  • ठीक 10 मिनट बाद 6 बजकर 25 मिनट पर दूसरी एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसे गंगा प्रसाद तिवारी ने दर्ज कराया था। वह तत्कालीन राम जन्मभूमि चौकी इंचार्ज थे, उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी सहित उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, चंपत राय, कमलेश त्रिपाठी जैसे भाजपा और विहिप के नेता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी।
  • दूसरी एफआईआर की विवेचना स्थानीय पुलिस को दी गई और इसके दूसरे दिन सीबीसीआईडी को केस ट्रांसफर कर दिया गया।
  •  तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया था।
  • 49 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र कोर्ट में दाखिल किया। इसके बाद यह मुकदमा दो हिस्सों में चला।एक रायबरेली और दूसरा लखनऊ में, जितने बड़े नेता थे, उनसे संबंधित मुकदमा रायबरेली में चल रहा था, जबकि लखनऊ में अन्य लोगों से संबंधित मुकदमा चलाया गया।
  • साल 1996 में यूपी सरकार ने दोनों केस को एक साथ चलाए जाने को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया। इसके बाद लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने दोनों मुकदमे में आपराधिक षड्यंत्र का मामला जोड़ा, जिसे आडवाणी सहित अन्य आरोपियों ने चुनौती दी।
  • 23 मई, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लालकृष्ण आडवाणी सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र का चार्ज हटा लिया और सीबीआई 2012 में सुप्रीम कोर्ट गई। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक षड्यंत्र को एक बार फिर बहाल करके तेजी से ट्रायल करने का निर्देश दिया।
  • 21 मई, 2017 से प्रतिदिन इस केस की सुनवाई शुरू हुई, उसके बाद कोर्ट में सभी आरोपियों के बयान दर्ज हुए।
  • 8 मई, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त तक सुनवाई पूरी करने के आदेश दिए लेकिन कोरोना महामारी की वजह से इसकी तारीख आगे बढ़ाई गई, जो 30 सितंबर तक है।
  • सीबीआई की विशेष अदालत के जज सुरेंद्र यादव ने सभी पक्षों की दलील, गवाही और जिरह सुनने के बाद 1 सितंबर 2020 को मामले की सुनवाई पूरी कर ली और दो सितंबर से केस का फैसला लिखना शुरू कर दिया।
  • 16 सितंबर को जज सुरेंद्र यादव ने इस ऐतिहासिक केस में फैसले की तारीख 30 सितंबर घोषित कर दी। 30 सितंबर के दिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे प्रकरण से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाया।कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए इसमें सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

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