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मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना: पालघर, महाराष्ट्र में दूसरी पर्वतीय सुरंग का ब्रेकथ्रू

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केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण, और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के तहत महाराष्ट्र के पालघर में दूसरी पर्वतीय सुरंग (Mountain Tunnel) के ब्रेकथ्रू की महत्वपूर्ण उपलब्धि की घोषणा की।

यह सुरंग MT-6 कुल 454 मीटर लंबी और 14.4 मीटर चौड़ी है, जिसमें दोनों दिशाओं के ट्रैक (अप और डाउन) बनाए जाएंगे। यह पालघर जिले में पिछले एक महीने में दूसरी पर्वतीय सुरंग का ब्रेकथ्रू है, पहली MT-5 सफ़पले के पास 2 जनवरी 2026 को प्राप्त हुआ था।

इस सुरंग का उत्खनन New Austrian Tunnelling Method (NATM) द्वारा दोनों सिरों से किया गया। NATM एक अत्याधुनिक ड्रिल और नियंत्रित विस्फोट विधि है। सुरंग का उत्खनन 12 महीनों में पूरा किया गया। पर्वतीय सुरंग का ब्रेकथ्रू तब मानी जाती है जब सुरंग के विपरीत सिरों से उत्खनन कर रहे दल अंततः बीच में मिलते हैं, जिससे पहाड़ के भीतर सतत मार्ग बन जाता है।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने उच्च गति रेल टीम को उनके अद्वितीय प्रगति के लिए बधाई दी और कहा कि जिस गति से टीम काम कर रही है, उसने देश में नई उम्मीद और विश्वास पैदा किया है। उन्होंने कहा कि परियोजना में प्रयुक्त कई उन्नत निर्माण तकनीक और बड़ी मशीनें भारत में निर्मित की जा रही हैं।

मंत्री ने बताया कि बुलेट ट्रेन परियोजना का गुजरात सेक्शन अगले साल व्यावसायिक संचालन शुरू करने की संभावना है, जबकि हाई-स्पीड रेल संचालन 2028 तक ठाणे और 2029 तक मुंबई तक पहुंचने की उम्मीद है।

इस अवसर पर लोकसभा सदस्य डॉ. हेमंत विष्णु सवारा (पालघर निर्वाचन क्षेत्र) भी उपस्थित थे। उन्होंने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का धन्यवाद किया और जिले में उच्च गति रेल कॉरिडोर, समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर (DFC) और आगामी वाधवन पोर्ट जैसे प्रमुख रेलवे परियोजनाओं के माध्यम से विकास को उजागर किया। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद महाराष्ट्र में रेलवे निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे परियोजनाओं की तेजी से पूर्णता और बेहतर सेवाएँ सुनिश्चित हुई हैं।

NATM विधि जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और असमान सुरंग आकार के लिए अनुकूल है, जहाँ पारंपरिक सुरंग खोदने वाली मशीनें (TBM) उपयुक्त नहीं होतीं। इस प्रक्रिया में बहुत भारी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होती और यह रीयल-टाइम अनुकूलन की अनुमति देती है, जैसे कि शॉटक्रीटिंग, रॉक बोल्ट और लैटिस गार्डर का उपयोग।

सुरंग के भीतर श्रमिकों की सुरक्षा भू-तकनीकी उपकरणों, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, प्रभावी अग्नि सुरक्षा, उचित वेंटिलेशन और नियंत्रित प्रवेश व्यवस्था के माध्यम से सुनिश्चित की गई।

महाराष्ट्र में निर्माण कार्य कई मोर्चों पर तेजी से प्रगति कर रहा है। वैतरना नदी पर परियोजना का सबसे लंबा पुल पियर स्तर तक पहुँच चुका है, जबकि उल्हास और जगनी जैसी अन्य प्रमुख नदियों पर नींव कार्य जारी है। सभी चार स्टेशनों, राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के बड़े क्रॉसिंग, लंबे स्पैन वाले स्टील ब्रिज और बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स से शिलफाटा तक 21 किमी लंबी सुरंग पर काम तेजी से चल रहा है। पालघर जिले में कुल 7 पर्वतीय सुरंगों का निर्माण कार्य प्रगति पर है।

सर्वेक्षण तालिका – पालघर पर्वतीय सुरंगें (Palghar Mountain Tunnels – MAHSR Project)

  • Sr. No.
  • Mountain Tunnel no.
  • Length (km)
  • % Completion
  • Remarks
  • 1
  • MT-1
  • 0.820
  • 16%
  • 2
  • MT-2
  • 0.228
  • तैयारी कार्य प्रगति में
  • 3
  • MT-3
  • 1.403
  • 41%
  • 4
  • MT-4
  • 1.260
  • 32%
  • 5
  • MT-5
  • 1.480
  • 57%
  • ब्रेकथ्रू 02 जनवरी 2026
  • 6
  • MT-6
  • 0.454
  • 47%
  • ब्रेकथ्रू आज प्राप्त
  • 7
  • MT-7
  • 0.417
  • 29%

MAHSR परियोजना लगभग 508 किलोमीटर लंबी है, जिसमें 352 किमी गुजरात और दादरा एवं नगर हवेली, और 156 किमी महाराष्ट्र में फैली हुई है। यह परियोजना आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित, ज्ञान हस्तांतरण को बढ़ावा और नए औद्योगिक व आईटी हब के विकास में योगदान करेगी। इस कॉरिडोर से प्रमुख शहर जैसे सबरमती, अहमदाबाद, आनंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, बिलिमोरा, वापी, बोईसर, विरार, ठाणे और मुंबई जुड़ेंगे, जो भारत के परिवहन बुनियादी ढांचे में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दर्शाता है।

27 जनवरी 2026 तक, लगभग 334 किमी वायडकट, 17 नदी पुल और 12 प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग/रेलवे क्रॉसिंग पूरे हो चुके हैं। गुजरात सेक्शन में ट्रैक बिछाने और विद्युतकरण का काम तेजी से जारी है।


डॉ. जितेंद्र सिंह ने AIM SUMVAAD में भारत के स्टार्टअप और नवाचार पर जोर दिया

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आज अटल इनोवेशन मिशन (AIM) वार्षिक इन्क्यूबेटर कॉन्क्लेव "AIM SUMVAAD" में संबोधित करते हुए, केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान विभाग, और प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन विभाग के मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने “अटल इनोवेशन मिशन” को मोदी सरकार की नवाचार-आधारित विकास और स्केलेबल स्टार्टअप नीति से जोड़ा। उन्होंने इस अवसर पर संघीय बजट 2026 में “Ease of Doing Business” पर भी ध्यान आकर्षित किया।

मंत्री ने कहा कि संघीय बजट 2026–27 भारत के स्टार्टअप और उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती प्रदान करता है, जिसमें विशेष रूप से इन्क्यूबेशन, नवाचार और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी पर जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप, बायोमैन्युफैक्चरिंग और महिलाओं में Self-Help Entrepreneurs (SHE) की अवधारणा जैसे नए सक्षम फ्रेमवर्क इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार समावेशी और सतत आर्थिक विकास की दिशा में कदम बढ़ा रही है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने AIM SUMVAAD में मुख्य भाषण दिया, जो Bhim Auditorium, Dr. Ambedkar International Centre, नई दिल्ली में आयोजित किया गया। यह कॉन्क्लेव अटल इनोवेशन मिशन का प्रमुख वार्षिक मंच है, जिसमें 150+ अटल इन्क्यूबेशन सेंटर और अटल कम्युनिटी इनोवेशन सेंटर देशभर से शामिल होते हैं। साथ ही इसमें नीति निर्माता, उद्योग के नेता, CSR प्रमुख, मेंटर्स और पारिस्थितिकी तंत्र के अन्य हितधारक भी भाग लेते हैं।

उद्घाटन सत्र में सुमन बेरी (उपाध्यक्ष, नीति आयोग), प्रो. अजय सूद (प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार), बी. वी. आर. सुब्रह्मण्यम (सीईओ, नीति आयोग), डॉ. राजेश एस. गोखले (सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग),  एंजेला लुसिजी (निवासी प्रतिनिधि, UNDP India), दीपक बागला (मिशन डायरेक्टर, AIM) सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

मंत्री ने कहा कि भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का विचार 2014 के बाद निर्णायक राजनीतिक समर्थन प्राप्त हुआ, जिससे बड़े पैमाने पर अटल टिंकरिंग लैब्स और स्टार्टअप-केंद्रित नीति हस्तक्षेप संभव हुए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में लगभग 50,000 अटल टिंकरिंग लैब्स संचालित हो रही हैं, जो छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों सहित सभी जिलों में नवाचार तक व्यापक पहुँच सुनिश्चित करती हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत का स्टार्टअप सफर एक दशक पहले कुछ सैकड़ों स्टार्टअप से बढ़कर अब दो लाख से अधिक स्टार्टअप तक पहुँच गया है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित हुआ और पारंपरिक वेतनभोगी करियर के विकल्प उपलब्ध हुए। इस बदलाव ने युवाओं को उद्यमिता को एक भरोसेमंद और प्रेरणादायक करियर विकल्प के रूप में देखने में मदद की है।

संघीय बजट 2026–27 का हवाला देते हुए मंत्री ने कहा कि बायोमैन्युफैक्चरिंग शक्ति मिशन भारत की बायोटेक्नोलॉजी, बायोफार्मा, प्राकृतिक संसाधन और मानव संसाधन में ताकत के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही बायोमैन्युफैक्चरिंग में वैश्विक अग्रणी देशों में शामिल है, और भविष्य में डीप-सी रिसोर्सेज, ओशन इकॉनमी और हिमालयी बायो-रिसोर्सेज जैसे क्षेत्रों पर ध्यान नवाचार के अवसर और बढ़ाएगा।

मंत्री ने नेशनल इन्क्यूबेटर असेसमेंट फ्रेमवर्क का भी उल्लेख किया, जिसे एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के रूप में डिज़ाइन किया गया है। यह देश भर के इन्क्यूबेटर के डेटा और प्रदर्शन इनसाइट्स को एकत्र करता है, और राष्ट्रीय स्तर पर बेंचमार्किंग, सहयोग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और क्षमता निर्माण के लिए मंच प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि AIM SUMVAAD जैसे प्लेटफ़ॉर्म स्टार्टअप, इन्क्यूबेटर, मेंटर्स, उद्योग और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग, नेटवर्किंग और दीर्घकालिक साझेदारी के अवसर प्रदान करते हैं, जिनमें स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

डॉ. सिंह ने बताया कि स्टार्टअप, इन्क्यूबेशन और महिला-केंद्रित आर्थिक पहल का एकीकृत दृष्टिकोण, जैसे लखपति दीदी और Self-Help Groups से Self-Help Entrepreneurs (SHE) तक का विकास, सरकार की समावेशी उद्यमिता और नवाचार-आधारित विकास में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।


असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क में एक सींग वाले गैंडे के निवास और पर्यावरणीय इतिहास पर पेलियोइकोलॉजिकल अध्ययन

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असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क (KNP) के आर्द्रभूमि के नीचे की मिट्टी से यह कहानी सामने आई है कि कैसे एक सींग वाले भारतीय गैंडे का निवास जलवायु परिवर्तन, वनस्पति में बदलाव, विदेशी प्रजातियों का आक्रमण और शाकाहारी गतिविधियों के प्रभाव से विकसित हुआ।

तेजी से बढ़ती शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और वनों की कटाई, साथ ही प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप और भूस्खलन, वैश्विक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा रहे हैं और जैव विविधता की हानि को तेज कर रहे हैं। उत्तर-पूर्व भारत, जो इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है, में कई संकटग्रस्त प्रजातियाँ निवास करती हैं, जो विलुप्ति के जोखिम में हैं। लेट क्वाटर्नरी मेगाफॉना का विलुप्त होना आज भी एक वैश्विक चिंता का विषय है, और इसके कारणों पर बहस जारी है। वर्तमान में, दुनिया भर में लगभग 60% बड़े शाकाहारी प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं, और दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे अधिक जोखिम वाली प्रजातियाँ पाई जाती हैं। काज़ीरंगा नेशनल पार्क, जो यूनिस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है, मेगाहर्बिवोर्स का मुख्य केंद्र है, विशेष रूप से भारतीय एक-सिंग वाला गैंडा।

बिरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पेलियोसाइंसेज (BSIP), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, के वैज्ञानिकों ने KNP की आर्द्रभूमि की मिट्टी में पाए गए परागकणों का उपयोग करते हुए KNP में पेलियोहर्बिवरी (प्राचीन शाकाहारी गतिविधियों) से संबंधित पहले लंबे समय तक के पेलियोइकोलॉजिकल रिकॉर्ड का पता लगाया।

वैज्ञानिकों ने Sohola Swamp, काज़ीरंगा नेशनल पार्क से लगभग एक मीटर लंबा सेडिमेंट कोर निकाला। यह मिट्टी की परत-परत संरचना एक प्राकृतिक अभिलेखागार की तरह कार्य करती है, जिसमें अतीत के सूक्ष्म अवशेष संरक्षित रहते हैं। इन अवशेषों में पौधों के परागकण और प्राणी मल पर उगने वाले फंगी के स्पोर्स शामिल हैं।अध्ययन (Catena, Elsevier में प्रकाशित) से पता चलता है कि काज़ीरंगा का वर्तमान परिदृश्य अतीत से काफी अलग है। यह अध्ययन क्षेत्रीय मेगाहर्बिवोर्स, विशेषकर भारतीय गैंडे की उत्तरी-पश्चिमी भारत में विलुप्ति के कारणों को भी दर्शाता है, जो मुख्य रूप से लेट होलोसीन के दौरान जलवायु सुधार, लिटिल आइस एज और बढ़ती मानव गतिविधियों से संबंधित हैं। इसके विपरीत, उत्तर-पूर्व भारत अपेक्षाकृत जलवायु स्थिर रहा, जिससे गैंडे का पूर्व की ओर प्रवासन और अंततः काज़ीरंगा में उनका एकत्रीकरण संभव हुआ।

अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि फॉसिल साक्ष्यों के आधार पर, भारतीय एक-सिंग वाला गैंडा कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से वितरित था, लेकिन होलोसीन काल के बाद इस वितरण में भारी कमी आई। पिछले लगभग 3300 वर्षों में, उत्तर-पूर्व भारत अपेक्षाकृत जलवायु स्थिर और मानव दबाव कम होने के कारण सुरक्षित रहा, जबकि उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्रों में आवास ह्रास, जलवायु बिगड़ना और अधिक शिकार ने गैंडे को पूर्व की ओर प्रवास करने और अंततः काज़ीरंगा में केंद्रित होने के लिए मजबूर किया।

यह अध्ययन दर्शाता है कि दीर्घकालिक वनस्पति और जलवायु परिवर्तन ने वन्यजीवन के सुरक्षा, प्रवासन और विलुप्ति को कैसे आकार दिया। यह दीर्घकालिक पारिस्थितिक ज्ञान भविष्य में संरक्षण और वन्यजीवन प्रबंधन के लिए मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है, विशेषकर वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में।

DST और IIT हैदराबाद सहयोग से विकसित हुआ पर्यावरण-हितैषी, सीसा-रहित सेल्फ-पावर्ड फोटोडिटेक्टर

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उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक निगरानी, सुरक्षा प्रणालियों और बायोमेडिकल इमेजिंग के लिए एक नवीन, सीसा-रहित और पर्यावरण-हितैषी फोटोडिटेक्टर जो स्वयं-संचालित (Self-Powered) है और मजबूत व स्थिर प्रदर्शन प्रदान करता है, अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

आधुनिक कैमरे, पर्यावरण संवेदक और स्मार्ट वियरेबल्स फोटोडिटेक्टरों पर निर्भर करते हैं, जो प्रकाश को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करते हैं। वर्तमान में उच्च प्रदर्शन वाले कई फोटोडिटेक्टर सीसा आधारित पेरोव्स्काइट का उपयोग करते हैं, जिनमें विषाक्तता की समस्याएँ होती हैं और ये वास्तविक दुनिया की परिस्थितियों में आसानी से degrade हो जाते हैं।

इस चुनौती का समाधान करते हुए अंतर्राष्ट्रीय उन्नत अनुसंधान केंद्र फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मटीरियल्स (ARCI, हैदराबाद), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, ने IIT हैदराबाद के सहयोग से डबल पेरोव्स्काइट Cs₂AgBiBr₆ आधारित एक सीसा-रहित, पर्यावरण-हितैषी फोटोडिटेक्टर विकसित किया है, जो मजबूत और स्थिर प्रदर्शन प्रदान करता है।

पारंपरिक डिज़ाइन में अक्सर महंगे धातु संपर्क और अतिरिक्त होल-ट्रांसपोर्ट लेयर (HTL) की आवश्यकता होती है, जिन्हें ग्लोवबॉक्स या वैक्यूम निर्माण उपकरण की मदद से बनाना पड़ता है। इसके विपरीत, यह डिवाइस HTM-फ्री है, कम लागत वाले कार्बन इलेक्ट्रोड का उपयोग करता है और सिर्फ एक चरण वाले कोटिंग मेथड से कमरे के तापमान पर निर्मित किया जाता है। डिवाइस संरचना स्वाभाविक रूप से प्रभावी चार्ज पृथक्करण का समर्थन करती है, जिससे बाहरी वोल्टेज के बिना ही सेल्फ-पावर्ड संचालन संभव होता है।

Cs₂AgBiBr₆ फोटोडिटेक्टर दृश्य प्रकाश के प्रति मजबूत प्रतिक्रिया दिखाता है और वास्तविक संचालन परिस्थितियों में उत्कृष्ट विश्वसनीयता प्रदर्शित करता है। उपकरण 60 दिनों तक संग्रहण के बाद भी अपने प्रदर्शन का 90% से अधिक बनाए रखता है। इन मापों को सामान्य कमरे की स्थितियों (25-35°C और 35-50% सापेक्ष आर्द्रता) में किया गया। प्रदर्शन वक्रों का 60 दिनों बाद भी लगभग समान रहना इसकी दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता की पुष्टि करता है।

सीसा-रहित सामग्री प्रणाली, सरल पर्यावरण-प्रक्रिया निर्माण, कम लागत वाले घटक और मजबूत संचालन स्थिरता का संयोजन इस तकनीक को उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक निगरानी, सुरक्षा प्रणाली और बायोमेडिकल इमेजिंग के लिए अत्यंत आकर्षक बनाता है। यह भारत के सतत सामग्री विकास, ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग और अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों के साथ भी संरेखित है।

इस काम का समर्थन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने किया है, और यह Solar Energy (Elsevier) में प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है:
“Ambient-processed lead-free Cs2AgBiBr6 photodetector with long-term environmental stability and self-powered operation.”


डॉ. मनसुख मंडाविया ने छह प्रमुख खेल अवसंरचना परियोजनाओं की आधारशिला रखी और दो एथलीट सपोर्ट सुविधाओं का उद्घाटन किया

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माननीय खेल एवं युवा मामले मंत्री, डॉ. मनसुख मंडाविया ने आज वर्चुअल माध्यम से छह प्रमुख खेल अवसंरचना परियोजनाओं की आधारशिला रखी और दो एथलीट सपोर्ट सुविधाओं का उद्घाटन किया, जिनमें कुल निवेश ₹120 करोड़ शामिल है।

यह पहल भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और देशभर में विश्व-स्तरीय, एथलीट-केंद्रित अवसंरचना विकसित करने के लिए केंद्रीय सरकार की प्रतिबद्धता को पुनः प्रदर्शित करती है।

छह आधारशिला परियोजनाओं की कुल लागत ₹82 करोड़ है, जो खेलो इंडिया योजना के तहत और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के अतिरिक्त सहयोग से लागू की जा रही हैं।

ये परियोजनाएँ देशभर में भौगोलिक रूप से वितरित हैं, जिनमें उत्तर-पूर्व और पूर्वी क्षेत्र भी शामिल हैं, ताकि खेल अवसंरचना का संतुलित और समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सके।

इन परियोजनाओं में शामिल हैं:

  • बैंगलोर में सिंथेटिक हॉकी टर्फ का उन्नयन

  • पटियाला में बहुउद्देशीय हॉल का निर्माण

  • भोपाल, गुवाहाटी और जलपाईगुड़ी में सिंथेटिक एथलेटिक ट्रैक का निर्माण

  • भोपाल में बहुउद्देशीय जूडो हॉल का निर्माण

आधारशिला समारोह के साथ-साथ माननीय मंत्री ने NS NIS, पटियाला में दो पूर्ण हो चुकी एथलीट सपोर्ट सुविधाओं का उद्घाटन भी किया, जिनमें कुल निवेश ₹38 करोड़ है।

इसमें शामिल हैं:

  • सेंट्रलाइज्ड किचन और फूड कोर्ट-कम-डाइनिंग हॉल, जो एथलीट पोषण सेवाओं को मजबूत करेगा

  • अत्याधुनिक इंटीग्रेटेड स्पोर्ट्स साइंस सेंटर और कंडीशनिंग हॉल, जो एलीट एथलीटों के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण, प्रदर्शन विश्लेषण, पुनर्वास और रिकवरी को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगा

माननीय मंत्री ने सभी संबंधित हितधारकों के प्रयासों की सराहना करते हुए और SAI की संपत्ति प्रबंधन जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कहा:

“देशभर में कई खेल अवसंरचना परियोजनाएँ विकसित की जा रही हैं, लेकिन SAI के अधीन आने वाली सुविधाएँ हमारी सीधे जिम्मेदारी हैं। इन संपत्तियों का उचित रखरखाव, अधिकतम उपयोग और जहाँ संभव हो, व्यावसायिक रूप से लाभ उठाना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक निवेश दीर्घकालिक मूल्य पैदा करता रहे।”

डॉ. मंडाविया ने जवाबदेही और समयबद्धता पर बल देते हुए कहा कि इन अवसंरचना परियोजनाओं की लगातार निगरानी की जाएगी। उन्होंने बताया कि मासिक समीक्षा SAI स्तर पर और त्रैमासिक समीक्षा स्वयं उनके द्वारा की जाएगी, ताकि परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा किया जा सके और बनाए गए ढांचे का एथलीटों के लाभ के लिए अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो।

खेल क्षेत्र की व्यापक नीतिगत रूपरेखा का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा खेलो इंडिया मिशन की घोषणा की गई है, जिसमें भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और अवसंरचना विकास को बढ़ावा देने के प्रमुख पहलुओं को रेखांकित किया गया है।

डॉ. मंडाविया ने कहा:

“हमें माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिए, जिसमें 2036 तक भारत को शीर्ष 10 खेल राष्ट्रों में और स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक शीर्ष 5 में स्थान दिलाना शामिल है।”

उन्होंने यह भी बताया कि खेल सामग्री निर्माण के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो न केवल घरेलू निर्माण क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि आत्मनिर्भर और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी खेल पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में भी मदद करेगा।

डॉ. मंडाविया ने खेल के बदलते स्वरूप पर जोर देते हुए कहा:

“आज खेल एक पेशा बन चुका है। इसलिए प्रतिभा की पहचान और पोषण प्रणाली को मजबूत करना आवश्यक है। सरकार को एक कदम आगे रहकर ऐसे अवसर और प्रणाली बनानी होगी, जो युवा प्रतिभाओं को ग्रासरूट स्तर से एलीट स्तर तक विकसित होने का अवसर दें।”

उन्होंने आगे कहा कि खेल अवसंरचना विकास से पूरे देश के एथलीटों को प्रेरणा मिलेगी, भारत के हाई-परफॉर्मेंस स्पोर्ट्स ईकोसिस्टम को मजबूत करने में मदद मिलेगी और राष्ट्र के दीर्घकालिक खेल लक्ष्यों में महत्वपूर्ण योगदान होगा।



दिवाकर जयंत, INAS ने नौसेना आयुध महानिदेशक (DGONA) का कार्यभार संभाला

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दिवाकर जयंत, INAS ने 02 फरवरी, 2026 को नौसेना मुख्यालय, रक्षा मंत्रालय में नौसेना आयुध महानिदेशक (DGONA) के पद का कार्यभार संभाला। वे पी. उपाध्याय का उत्तराधिकारी बने, जिनका सेवा निवृत्ति दिवस 31 जनवरी, 2026 था।

दिवाकर जयंत 1991 बैच के भारतीय नौसेना आयुध सेवा (INAS) के अधिकारी हैं। उन्होंने 28 दिसंबर, 1992 को भारतीय नौसेना के नौसेना आयुध संगठन में सेवा प्रारंभ की और 33 वर्षों की सेवा में मुंबई, विशाखापट्टनम और अल्वे में नौसेना आयुध डिपो तथा NHQ/MoD में विभिन्न वरिष्ठ पदों पर कार्यभार संभाला। इनमें चीफ जनरल मैनेजर और जनरल मैनेजर/प्रिंसिपल डायरेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं।

आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक, दिवाकर जयंत टॉरपीडो के जीवन-चक्र प्रबंधन में विशेषज्ञ हैं और विस्फोटक अवसंरचना परियोजनाओं की योजना बनाने में दक्ष हैं। इसके साथ ही उनके पास मानव संसाधन और प्रशासन का व्यापक ज्ञान भी है। अधिकारी ने प्रतिष्ठित APPPA कोर्स (2017–18) भी पूरा किया है।


डीआरडीओ ने सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 03 फरवरी, 2026 को लगभग 10:45 बजे ओडिशा तट के पास चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल प्रदर्शन किया। इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध है। यह तकनीक लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के विकास में सक्षम बनाती है, जिससे भारत को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्राप्त होगी।

इस परीक्षण के दौरान सभी उप-प्रणालियों ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया। ग्राउंड बूस्टर मोटर द्वारा प्रणाली को वांछित मैक संख्या तक पहुँचाने के बाद नोज़ल-रहित बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर तथा फ्यूल फ्लो कंट्रोलर ने सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रणाली के प्रदर्शन की पुष्टि उड़ान के दौरान प्राप्त डेटा के माध्यम से की गई, जिसे बंगाल की खाड़ी के तट पर चांदीपुर ITR द्वारा तैनात अनेक ट्रैकिंग उपकरणों ने रिकॉर्ड किया।

इस प्रक्षेपण की निगरानी डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं के वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा की गई, जिनमें डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL), हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) तथा ITR, चांदीपुर शामिल हैं।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने SFDR तकनीक के सफल प्रदर्शन पर डीआरडीओ और उद्योग जगत को बधाई दी।
वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल उड़ान परीक्षण में शामिल सभी टीमों को शुभकामनाएँ दीं।


खाद्य तेल क्षेत्र में नियामक निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए सरकार के सख्त कदम

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भारत सरकार ने वनस्पति तेल उत्पाद, उत्पादन एवं उपलब्धता (नियमन) संशोधन आदेश, 2025 (VOPPA आदेश, 2025) के माध्यम से खाद्य तेल मूल्य श्रृंखला में नियामक निगरानी को और अधिक मजबूत किया है। संशोधित आदेश के तहत सभी खाद्य तेल निर्माताओं, प्रसंस्करणकर्ताओं, ब्लेंडरों एवं री-पैकर्स के लिए राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) तथा VOPPA पोर्टल (https://www.edibleoilindia.in) पर अनिवार्य पंजीकरण और उत्पादन, भंडारण एवं उपलब्धता से संबंधित विस्तृत मासिक विवरण प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया है।

संशोधित VOPPA आदेश, 2025 के अंतर्गत सभी पंजीकृत इकाइयों को कच्चे एवं परिष्कृत वनस्पति तेल, सॉल्वेंट-एक्सट्रैक्टेड तेल, मिश्रित तेल, वनस्पति घी, मार्जरीन तथा अन्य अधिसूचित उत्पादों के उत्पादन, भंडार, आयात, प्रेषण, बिक्री और उपभोग से संबंधित मासिक विवरण अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। इस ढांचे का उद्देश्य पारदर्शिता को बढ़ावा देना, डेटा-आधारित नीतिगत निर्णयों को सक्षम बनाना तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।

देशव्यापी अनुपालन अभियान के तहत खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) द्वारा हरियाणा के करनाल और राजस्थान के जयपुर सहित विभिन्न स्थानों पर निरीक्षण अभियान चलाए गए। इन अभियानों के दौरान NSWS/VOPPA पंजीकरण की पुष्टि, मासिक विवरणों की समयबद्धता एवं शुद्धता का आकलन किया गया तथा खाद्य तेल उद्योग से जुड़े हितधारकों के साथ संवाद कर अनुपालन को प्रोत्साहित किया गया। यह पहल खाद्य तेल क्षेत्र की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

प्रवर्तन के साथ-साथ विभाग द्वारा अनुपालन को सुगम बनाने के लिए क्षमता निर्माण गतिविधियाँ भी की जा रही हैं। इस क्रम में 30 जनवरी 2026 को RIC, जयपुर में एक कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें सटीक डेटा रिपोर्टिंग, NSWS पंजीकरण, VOPPA पोर्टल के उपयोग और समय पर मासिक विवरण दाखिल करने पर जोर दिया गया। इसी प्रकार की कार्यशालाएँ अन्य प्रमुख राज्यों में भी आयोजित की जाएंगी। इस पहल को आगे बढ़ाते हुए 16 फरवरी 2026 को राजकोट, गुजरात में तीसरी जागरूकता कार्यशाला आयोजित करने का प्रस्ताव है, क्योंकि इस क्षेत्र में खाद्य तेल प्रसंस्करण इकाइयों की संख्या अधिक है।

निरीक्षणों और उसके बाद की समीक्षाओं के आधार पर, विभाग ने कुछ बड़ी खाद्य तेल कंपनियों को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notices) जारी किए हैं, जिन्होंने ईमेल और टेलीफोन के माध्यम से बार-बार स्मरण कराने के बावजूद अनिवार्य मासिक उत्पादन विवरण प्रस्तुत नहीं किए। इस प्रकार की चूक आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के अंतर्गत जारी VOPPA आदेश, 2025 का उल्लंघन है।

संबंधित इकाइयों को सूचित किया गया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 6A के अंतर्गत उल्लंघन की स्थिति में निरीक्षण एवं जब्ती जैसी कार्रवाई की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, धारा 6B के अनुसार, किसी भी जब्ती आदेश से पूर्व संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना अनिवार्य है। इसी क्रम में, संबंधित इकाइयों को यह बताने के लिए सात दिन का समय दिया गया है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए।

विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि VOPPA ढांचे के अंतर्गत पंजीकरण न कराने वाली अथवा अनिवार्य विवरण दाखिल न करने वाली सभी इकाइयों को इसी प्रकार के कारण बताओ नोटिस जारी किए जाएंगे, ताकि पूरे क्षेत्र में समान और एकरूप अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके। खाद्य तेल प्रसंस्करण इकाइयों में आवश्यकता के आधार पर निरीक्षण अभियान आगे भी जारी रहेंगे।

सरकार ने प्रभावी नीतिगत निर्माण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के हित में खाद्य तेल क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और कड़े अनुपालन को सुनिश्चित करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।


एयर इंडिया की उड़ान AI-132 (लंदन–बेंगलुरु) से संबंधित ईंधन नियंत्रण स्विच की जांच पर स्पष्टीकरण

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दिनांक 01.02.2026 को एयर इंडिया का B787-8 विमान (VT-ANX) उड़ान संख्या AI-132 (लंदन–बेंगलुरु) का संचालन कर रहा था। लंदन में इंजन स्टार्ट के दौरान, दो अवसरों पर चालक दल ने यह देखा कि फ्यूल कंट्रोल स्विच हल्का ऊर्ध्वाधर दबाव डालने पर “RUN” स्थिति में मजबूती से लॉक (positively latched) नहीं रह रहा था। तीसरे प्रयास में स्विच “RUN” स्थिति में सही ढंग से लॉक हो गया और उसके बाद स्थिर बना रहा।

आगे की प्रक्रिया जारी रखने से पहले, चालक दल द्वारा भौतिक रूप से यह सुनिश्चित किया गया कि स्विच पूरी तरह और मजबूती से “RUN” स्थिति में लॉक है। इंजन स्टार्ट के दौरान या उसके बाद किसी भी समय कोई असामान्य इंजन पैरामीटर, चेतावनी, सावधानी संकेत या संबंधित सिस्टम संदेश नहीं पाया गया। इस अवलोकन की जानकारी ड्यूटी पर मौजूद चालक दल के सदस्य को दी गई, स्विच के अनावश्यक संपर्क से बचा गया तथा शेष उड़ान के दौरान इंजन संकेतों और अलर्टिंग सिस्टम की कड़ी निगरानी की गई। उड़ान सुरक्षित रूप से बिना किसी घटना के पूरी की गई।

बेंगलुरु में लैंडिंग के बाद, चालक दल ने इस दोष को PDR (Pilot Defect Report) में दर्ज किया। एयर इंडिया ने इस विषय को आगे मार्गदर्शन के लिए एम/एस बोइंग के संज्ञान में लाया। बोइंग द्वारा सुझाई गई जांचों के आधार पर, ईंधन नियंत्रण स्विच की सेवा-योग्यता स्थापित करने हेतु एयर इंडिया इंजीनियरिंग द्वारा निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गए:

“बाएँ और दाएँ दोनों स्विचों की जांच की गई और उन्हें संतोषजनक पाया गया। लॉकिंग टूथ/पॉल पूरी तरह से बैठा हुआ था और RUN से CUTOFF की ओर फिसल नहीं रहा था। बेस प्लेट के समानांतर पूर्ण बल लगाने पर स्विच सुरक्षित बना रहा। हालांकि, यदि बाहरी बल गलत दिशा में लगाया गया, तो कोणीय बेस प्लेट के कारण स्विच RUN से CUTOFF की ओर आसानी से सरक गया, विशेषकर जब उंगली या अंगूठे से अनुचित ढंग से दबाव डाला गया।”

इसके अतिरिक्त, बोइंग के संचार के आधार पर, अनुशंसित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित फ्यूल कट-ऑफ स्विच, स्थापित किए जाने वाले फ्यूल कंट्रोल यूनिट तथा एक अन्य विमान के फ्यूल कट-ऑफ स्विच पर पुल-टू-अनलॉक फोर्स की जांच की गई। सभी मामलों में यह बल निर्धारित सीमाओं के भीतर पाया गया। ये सभी निरीक्षण DGCA अधिकारियों की उपस्थिति में किए गए।

सोशल मीडिया पर वर्तमान में प्रसारित वीडियो का भी बोइंग द्वारा अनुशंसित प्रक्रियाओं के संदर्भ में विश्लेषण किया गया। विश्लेषण में यह पाया गया कि वीडियो में दर्शाई गई प्रक्रिया गलत है और बोइंग द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

इस परिप्रेक्ष्य में, एयरलाइन को सलाह दी जा रही है कि वह फ्यूल CUT OFF स्विच के संचालन से संबंधित बोइंग द्वारा अनुशंसित प्रक्रिया को अपने सभी चालक दल सदस्यों के बीच प्रसारित करे, ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी से बचा जा सके।


विकास भी, विरासत भी के मंत्र से त्रिपुरा ने विकास की तेज़ रफ्तार पकड़ी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को आत्मसात करने से त्रिपुरा ने अपने विकास सफर में तेज़ रफ्तार हासिल की है और राज्य निरंतर नई उपलब्धियाँ दर्ज कर रहा है।

प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किए गए एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे, जिसमें उन्होंने त्रिपुरा के अपने हालिया दौरे के अनुभव साझा किए थे।मंत्री सिंधिया ने अपने आलेख में राज्य की बदलती तस्वीर, तेज़ी से उभरती विकास क्षमता और अपार संभावनाओं को विस्तार से रेखांकित किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि त्रिपुरा आज न केवल आधुनिक अवसंरचना, औद्योगिक विकास और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, बल्कि साथ-साथ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और पहचान को भी सहेजते हुए आगे बढ़ रहा है। यह संतुलित दृष्टिकोण राज्य के समग्र और सतत विकास को नई दिशा दे रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा:

“‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को आत्मसात करते हुए त्रिपुरा विकास की तेज़ रफ्तार पकड़ चुका है और हर दिन नई-नई उपलब्धियाँ दर्ज कर रहा है। केंद्रीय मंत्री @JM_Scindia जी ने त्रिपुरा प्रवास के अपने अनुभवों को साझा करते हुए राज्य की बदलती तस्वीर और अपार संभावनाओं के बारे में विस्तार से बताया है। पढ़िए उनका यह आलेख…”

प्रधानमंत्री का यह संदेश इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण को साथ लेकर चलने की नीति से त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्य देश के विकास मानचित्र पर नई पहचान बना रहे हैं।


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित किया, नए ऑडिटोरियम का उद्घाटन किया

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (3 फरवरी, 2026) ओडिशा के बालासोर में फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की शोभा बढ़ाई तथा विश्वविद्यालय के नए सभागार (ऑडिटोरियम) का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि अपने छात्र जीवन के दौरान वे उनकी कालजयी कहानी ‘रेवती’ से गहराई से प्रभावित हुई थीं और यह प्रभाव आज भी उनके मन में अंकित है। उन्होंने कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी में एक बालिका का शिक्षा प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प उसकी अदम्य भावना का प्रमाण है। राष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने स्वयं एक दूरस्थ आदिवासी गाँव में अध्ययन किया और अपने संकल्प के बल पर भुवनेश्वर जाकर हाई स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पूरी की। इस प्रकार फकीर मोहन जी उनके लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि फकीर मोहन जी को अपनी मातृभाषा से गहरा प्रेम था। उन्होंने लिखा था— “मेरी मातृभाषा मुझे सर्वोपरि है।” राष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने से विद्यार्थी अपने परिवेश, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक वातावरण को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। इससे वे अपने सभ्यतागत मूल्यों और जीवन पद्धति से परिचित होते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा के महत्व पर विशेष बल देती है और विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का मार्गदर्शन करती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध है। हमारे शास्त्र और पांडुलिपियाँ ज्ञान और विवेक से परिपूर्ण हैं। काव्य और साहित्य के अतिरिक्त इनमें विज्ञान, चिकित्सा, खगोल विज्ञान और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों का भी गहन ज्ञान निहित है। युवा विद्यार्थी इस प्राचीन ज्ञान परंपरा में अनुसंधान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अतीत को समझकर और वर्तमान को आत्मसात कर विद्यार्थी न केवल अपना भविष्य बल्कि देश का भविष्य भी संवार सकते हैं।

राष्ट्रपति ने स्नातक हो रहे विद्यार्थियों को बधाई दी और कहा कि ज्ञान, उत्साह और प्रतिबद्धता की शक्ति से वे समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ भी जाएँ और जो भी करें, हर प्रयास में सफलता की कुंजी समर्पण है। उन्होंने कहा कि सफल जीवन और सार्थक जीवन एक समान नहीं होते। सफल जीवन अच्छा है, लेकिन जीवन को सार्थक बनाना उससे भी बेहतर है। उन्होंने कहा कि यश, प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करना आवश्यक है, लेकिन साथ ही दूसरों के लिए कुछ करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे उन लोगों की सहायता करें जो विकास की यात्रा में पीछे रह गए हैं, क्योंकि समाज का विकास तभी संभव है जब सभी का विकास हो।

राष्ट्रपति को यह जानकर प्रसन्नता हुई कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय शैक्षणिक अध्ययन के साथ-साथ अनुसंधान और आउटरीच कार्यक्रमों को भी महत्व देता है। उन्होंने कहा कि बालासोर-भद्रक क्षेत्र धान, पान और मछली के लिए प्रसिद्ध है और विश्वविद्यालय द्वारा इन क्षेत्रों में किए जा रहे अनुसंधान एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम सराहनीय हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय की ‘बैक टू स्कूल’, ‘अर्न व्हाइल लर्न’, ‘ईच वन टीच वन’, पर्यावरण जागरूकता और समुद्र तट स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बालासोर और भद्रक के समुद्र तटों पर नीले केकड़े (ब्लू क्रैब) प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं और ऐसे में ब्लू क्रैब या हॉर्सशू क्रैब पर अनुसंधान केंद्र की स्थापना विश्वविद्यालय की दूरदर्शिता को दर्शाती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि समाज के सभी वर्गों की वृद्धि, सुरक्षा और तकनीकी विकास से देश की प्रगति को गति मिलेगी। इस दिशा में देश के सभी विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्वविद्यालयों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे समावेशी विकास, नवाचार और सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनें। आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक नेतृत्व और स्थानीय व वैश्विक चुनौतियों से जुड़ा अनुसंधान विकसित कर उच्च शिक्षण संस्थान एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो सतत, न्यायसंगत और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक दृष्टि और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से इस दिशा में परिवर्तनकारी भूमिका निभाएगा।




सांसद बृजमोहन अग्रवाल के प्रयास रंग लाए, नवा रायपुर में खुला छत्तीसगढ़ का पहला अंतरिक्ष केंद्र

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 नई दिल्ली/ रायपुर : नवा रायपुर में छत्तीसगढ़ के पहले अंतरिक्ष केंद्र के शुभारंभ को प्रदेश के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए सांसद एवं वरिष्ठ भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि यह केंद्र छत्तीसगढ़ के युवाओं के सपनों को नया आकाश देने वाला मील का पत्थर सिद्ध होगा। उन्होंने इसे राज्य को भविष्य का स्पेस टेक्नोलॉजी हब बनाने की दिशा में मजबूत और दूरदर्शी कदम बताया।


अग्रवाल ने कहा कि यह छत्तीसगढ़ के उज्ज्वल भविष्य की ठोस नींव है। इस अंतरिक्ष केंद्र के माध्यम से राज्य के छात्र और युवा वैज्ञानिक स्पेस रिसर्च, नवाचार, सिम्युलेशन और अत्याधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण के अवसर प्राप्त करेंगे, जिससे वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकेंगे।

अग्रवाल ने कहा कि आज नवा रायपुर में इस सपने का साकार होना पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय है। यह सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की दूरदर्शी सोच, विज्ञान एवं नवाचार को बढ़ावा देने वाली नीतियों और राज्य के समग्र विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिणाम है। इसके लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ की जनता की ओर से प्रधानमंत्री का हृदय से आभार व्यक्त किया।

बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि यह अंतरिक्ष केंद्र नई पीढ़ी की उड़ान की शुरुआत है, जो छत्तीसगढ़ को अंतरिक्ष विज्ञान के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर नई पहचान दिलाएगा और राज्य के युवाओं के लिए अनंत संभावनाओं के द्वार खोलेगा। अब छत्तीसगढ़ के युवा भी इसरो, नासा सहित वैश्विक मंचों पर राज्य का नाम रोशन करेंगे।

अगस्त 2025 में आंध्र प्रदेश प्रवास के दौरान सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र का भ्रमण किया था, जहां से उन्हें छत्तीसगढ़ में भी ऐसी ही अत्याधुनिक सुविधा स्थापित करने की प्रेरणा मिली थी। इसी क्रम में 08/09/2025 को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी तथा अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष एवं अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. वी. नारायणन जी को पत्र लिखकर छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्ष में रायपुर में स्पेस लैब एवं सिम्युलेटर स्थापित करने का आग्रह किया था। साथ ही लोकसभा में नियम 377 के तहत इस महत्वपूर्ण विषय को उठाकर केंद्र सरकार का ध्यान आकृष्ट किया।

जिसके बाद 18 नवंबर 2025 को अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. वी. नारायणन ने सांसद बृजमोहन अग्रवाल को पत्र के माध्यम से रायपुर में सिम्युलेटर सहित एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान करने की जानकारी दी थी।

छत्तीसगढ़ कैबिनेट की बैठक कल, जानिए समय और स्थान

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 Cabinet Meeting : छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की एक और अहम बैठक आयोजित होने जा रही है। यह बैठक कल 04 फरवरी 2026 को सुबह 11:30 बजे मंत्रालय महानदी भवन स्थित मंत्रिपरिषद कक्ष में होगी।


सूत्रों के अनुसार, इस कैबिनेट बैठक में राज्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों और बड़े फैसलों पर चर्चा कर उन्हें मंजूरी दी जा सकती है। बैठक समाप्त होने के बाद कैबिनेट मंत्रियों द्वारा लिए गए निर्णयों की आधिकारिक जानकारी मीडिया को दी जाएगी।

राज्य की प्रशासनिक, विकासात्मक और जनहित से जुड़ी नीतियों को लेकर इस बैठक पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

रायपुर में CM साय ने ‘प्रोजेक्ट अंतरिक्ष संगवारी’ का किया शुभारंभ

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 रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने नवा रायपुर में ‘प्रोजेक्ट अंतरिक्ष संगवारी’ का शुभारंभ किया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के माध्यम से छात्रों को सैटेलाइट निर्माण, टेस्टिंग और ट्रैकिंग की पूरी प्रक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य केवल तकनीकी शिक्षा देना नहीं, बल्कि छात्रों को वास्तविक अंतरिक्ष अनुसंधान से जोड़ना भी है।


मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यह परियोजना राज्य के युवाओं के लिए स्पेस टेक्नोलॉजी में करियर बनाने की दिशा में पहला मजबूत कदम साबित होगी। इससे छत्तीसगढ़ के छात्र अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकेंगे।

अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस केंद्र

इस केंद्र में अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं, जहां छात्रों को वर्कशॉप, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और लाइव प्रोजेक्ट्स पर काम करने का अवसर मिलेगा। इसके माध्यम से युवा वैज्ञानिक अंतरिक्ष तकनीक की बारीकियों को समझ सकेंगे और अपने करियर के लिए मजबूत आधार तैयार कर पाएंगे।

सैटेलाइट से लेकर मिशन प्लानिंग तक प्रशिक्षण

प्रोजेक्ट अंतरिक्ष संगवारी के तहत छात्र सैटेलाइट डिजाइन, टेस्टिंग, मिशन प्लानिंग, डेटा एनालिसिस और ट्रैकिंग सिस्टम की भी विस्तृत जानकारी हासिल करेंगे। प्रशिक्षण का उद्देश्य छात्रों को सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना है, ताकि वे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान और तकनीकी नवाचार में सक्रिय भूमिका निभा सकें।

युवाओं को वैज्ञानिक सोच की प्रेरणा

मुख्यमंत्री साय ने छात्रों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि इस तरह की पहल से युवाओं में वैज्ञानिक सोच, जिज्ञासा और नवाचार की भावना विकसित होगी। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षक और युवा वैज्ञानिक उपस्थित रहे, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को सीखने और अनुभव प्राप्त करने का एक अनूठा अवसर बताया।

भारत में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट क्षेत्र को बढ़ावा: बजट 2026–27 और आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक कदम

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प्रमुख बिंदु (Key Takeaways)

  • केंद्रीय बजट 2026–27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर्स की घोषणा – खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) के निर्माण के लिए

  • नवंबर 2025 में ₹7,280 करोड़ की REPM निर्माण योजना को मंज़ूरी

  • 6,000 MTPA की एकीकृत REPM उत्पादन क्षमता विकसित की जाएगी

  • पाँच वर्षों में ₹6,450 करोड़ के बिक्री-आधारित प्रोत्साहन

  • उन्नत सुविधाओं के लिए ₹750 करोड़ की पूंजीगत सब्सिडी

  • भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) द्वारा 482.6 मिलियन टन रेयर-अर्थ अयस्क संसाधनों की पहचान

परिचय

भारत महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है। इसके तहत रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) के लिए एक घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा रहा है। REPMs उच्च-प्रदर्शन मैग्नेट होते हैं, जिनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन ऊर्जा टर्बाइनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से किया जाता है।

इस लक्ष्य को समर्थन देने के लिए सरकार ने नवंबर 2025 में ₹7,280 करोड़ की योजना को मंज़ूरी दी, जिसके अंतर्गत रेयर अर्थ ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक की पूरी वैल्यू चेन को कवर करते हुए 6,000 MTPA की एकीकृत निर्माण क्षमता विकसित की जाएगी।

इसके पूरक के रूप में, केंद्रीय बजट 2026–27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर्स की घोषणा की गई है। ये पहल आत्मनिर्भर भारत, नेट ज़ीरो 2070 और विकसित भारत @2047 के राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप हैं तथा भारत को वैश्विक उन्नत सामग्री मूल्य श्रृंखलाओं में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थापित करती हैं।

भारत में REPM का रणनीतिक महत्व और संसाधन क्षमता

रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट अपनी अत्यधिक चुंबकीय शक्ति और स्थिरता के लिए जाने जाते हैं। इनका कॉम्पैक्ट आकार और उच्च प्रदर्शन इन्हें इलेक्ट्रिक वाहन मोटर्स, पवन टर्बाइन जनरेटर, उपभोक्ता एवं औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस प्रणालियों, रक्षा उपकरणों और प्रिसिजन सेंसर्स के लिए अनिवार्य बनाता है।

जैसे-जैसे भारत स्वच्छ ऊर्जा, उन्नत मोबिलिटी और रणनीतिक क्षेत्रों में अपने विनिर्माण आधार का विस्तार कर रहा है, REPM की विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति अत्यंत आवश्यक है। इससे न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी बल्कि वैश्विक उन्नत सामग्री मूल्य श्रृंखलाओं में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी मज़बूत होगी।

भारत का संसाधन आधार

भारत के पास रेयर अर्थ खनिजों का विशाल भंडार है, जो REPM जैसे डाउनस्ट्रीम उद्योगों के लिए मज़बूत आधार प्रदान करता है:

  • मोनाज़ाइट भंडार: भारत में 13.15 मिलियन टन मोनाज़ाइट उपलब्ध है, जिसमें लगभग 7.23 मिलियन टन रेयर अर्थ ऑक्साइड (REO) निहित है

  • भौगोलिक विस्तार: ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और झारखंड में तटीय रेत, टेरी/लाल रेत और आंतरिक जलोढ़ क्षेत्रों में जमा

  • अतिरिक्त संसाधन: गुजरात और राजस्थान में हार्ड-रॉक क्षेत्रों में 1.29 मिलियन टन इन-सिटू REO संसाधनों की पहचान

  • अन्वेषण प्रयास: GSI द्वारा 34 परियोजनाओं के तहत 482.6 मिलियन टन रेयर-अर्थ अयस्क संसाधनों की पहचान

ये सभी भंडार भारत में एक एकीकृत REPM विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करने की मज़बूत क्षमता को दर्शाते हैं।

निवेश और विस्तार की आवश्यकता

हालाँकि भारत के पास प्रचुर संसाधन हैं, फिर भी स्थायी मैग्नेट का घरेलू उत्पादन अभी प्रारंभिक अवस्था में है। 2022–25 के दौरान लगभग 60–80% मूल्य और 85–90% मात्रा के हिसाब से आयात (मुख्यतः चीन से) पर निर्भरता रही है।

2030 तक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्रों में तेज़ वृद्धि के कारण REPM की मांग दोगुनी होने की संभावना है। ऐसे में आयात निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए घरेलू क्षमता का विस्तार अनिवार्य है।

केंद्रीय बजट 2026–27: REPM और रेयर अर्थ कॉरिडोर्स

REPM निर्माण योजना (नवंबर 2025)

  • कुल परिव्यय: ₹7,280 करोड़

  • क्षमता: 6,000 MTPA एकीकृत सिण्टर्ड REPM उत्पादन

  • लाभार्थी: वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से अधिकतम पाँच

  • प्रोत्साहन: पाँच वर्षों में ₹6,450 करोड़ (बिक्री-आधारित)

  • पूंजी सब्सिडी: ₹750 करोड़

  • उद्देश्य: रेयर अर्थ ऑक्साइड से तैयार मैग्नेट तक संपूर्ण वैल्यू चेन विकसित करना

डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर्स

बजट 2026–27 में घोषित ये कॉरिडोर्स खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण को बढ़ावा देंगे। ये पहल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करेगी, अनुसंधान एवं विकास को गति देगी और भारत को वैश्विक उन्नत सामग्री मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ेगी।

IREL (इंडिया) लिमिटेड की भूमिका

IREL (इंडिया) लिमिटेड, जो 1963 से परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन कार्यरत है, ओडिशा और केरल में रेयर अर्थ निष्कर्षण और परिशोधन इकाइयाँ संचालित कर रही है। इसके मौजूदा ढांचे को नए कॉरिडोर्स से जोड़कर घरेलू क्षमता और उन्नत विनिर्माण को तेज़ी दी जाएगी।

राष्ट्रीय लक्ष्यों से संरेखण

  • आत्मनिर्भर भारत: आयात निर्भरता में कमी

  • स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण: EV और पवन ऊर्जा के लिए आवश्यक मैग्नेट की घरेलू आपूर्ति

  • राष्ट्रीय सुरक्षा: रक्षा और एयरोस्पेस के लिए सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला

  • नीतिगत सुधार: MMDR अधिनियम (2023 संशोधन) और राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन (2025) के अनुरूप

वैश्विक साझेदारियाँ

भारत ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, ज़ाम्बिया, मोज़ाम्बिक, पेरू, ज़िम्बाब्वे, मलावी और कोट डी’आईवोर जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते कर रहा है। इसके अतिरिक्त, Minerals Security Partnership (MSP) और IPEF जैसे बहुपक्षीय मंचों में भी सक्रिय भागीदारी है।

KABIL (NALCO, HCL और MECL का संयुक्त उपक्रम) विदेशों में खनिज परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के माध्यम से भारत की आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत कर रहा है।

निष्कर्ष

₹7,280 करोड़ की REPM निर्माण योजना और बजट 2026–27 में घोषित डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर्स मिलकर भारत के लिए खनन से लेकर विनिर्माण तक एक एकीकृत ढांचा तैयार करते हैं। ये पहल आयात निर्भरता घटाने, स्वच्छ ऊर्जा एवं रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं को मज़बूत करने और आत्मनिर्भर भारत, नेट ज़ीरो 2070 तथा विकसित भारत @2047 के लक्ष्यों को साकार करने में सहायक होंगी। घरेलू प्रयासों और वैश्विक साझेदारियों के संयोजन से भारत उन्नत सामग्री क्षेत्र में एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी शक्ति के रूप में उभर रहा है।


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