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मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, CSAM और डीपफेक सामग्री पर जताया खेद

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नई दिल्ली- मेटा (Meta) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार के समक्ष कंपनी के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री (Child Sexual Abuse Material - CSAM), डीपफेक कंटेंट तथा कुछ परिचालन संबंधी त्रुटियों को लेकर खेद व्यक्त करते हुए माफी मांगी है।

यह माफी ऐसे समय में आई है, जब भारत सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अवैध और हानिकारक सामग्री के खिलाफ कड़ा रुख अपना रही है। सरकार ने हाल ही में मेटा से इंस्टाग्राम पर प्रसारित CSAM से संबंधित सामग्री और विज्ञापनों को तत्काल हटाने तथा इस संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण देने को कहा था।

मेटा ने दोहराया कि उसकी CSAM के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' नीति है और कंपनी ऐसे कंटेंट की पहचान कर उसे हटाने के लिए अपनी तकनीकी प्रणालियों और सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत कर रही है।

इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही (Platform Accountability), डीपफेक और अन्य हानिकारक सामग्री पर नियंत्रण तथा 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) प्रावधानों को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार ने संकेत दिया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारतीय कानूनों और उपयोगकर्ता सुरक्षा से जुड़े मानकों का सख्ती से पालन करना होगा।

आरबीआई ने रेपो रेट में नहीं किया कोई बदलाव, नीतिगत ब्याज दरें यथावत

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नई दिल्ली- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी ताज़ा समीक्षा बैठक में रेपो रेट सहित सभी प्रमुख नीतिगत ब्याज दरों को यथावत रखने का निर्णय लिया है।

आरबीआई के इस फैसले के बाद शेयर बाजार में सकारात्मक रुख देखने को मिला और प्रमुख सूचकांक मामूली बढ़त के साथ बंद हुए।

आरबीआई ने कहा कि देश में महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने के प्रयास जारी हैं, हालांकि ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव अभी भी मुद्रास्फीति के लिए एक प्रमुख जोखिम बना हुआ है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया कि भविष्य की मौद्रिक नीति के निर्णय आर्थिक वृद्धि, महंगाई के रुझान और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करने के बाद ही लिए जाएंगे।

पाकल दुल जलविद्युत परियोजना में श्रमिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान, 210 श्रमिकों को ₹1.12 करोड़ से अधिक के वैधानिक लाभ

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नई दिल्ली- श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) कार्यालय के अधीन क्षेत्रीय श्रम आयुक्त (केंद्रीय), जम्मू के सतत सुलह प्रयासों से जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ स्थित पाकल दुल जलविद्युत परियोजना में एलएंडटी कंस्ट्रक्शन (L&T Construction) द्वारा उप-ठेकेदारों के माध्यम से नियोजित श्रमिकों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण औद्योगिक विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया है।

प्रबंधन और श्रमिक प्रतिनिधियों के बीच कई चरणों में हुई सुलह वार्ताओं एवं रचनात्मक संवाद के बाद 13 जुलाई 2026 को समझौता हुआ। इसके साथ ही किसान मजदूर यूनियन, नागसेनी द्वारा घोषित हड़ताल समाप्त हो गई और परियोजना स्थल पर औद्योगिक शांति एवं सौहार्द बहाल हो गया।

इस समझौते से 210 श्रमिकों को लाभ मिला। समझौते के परिणामस्वरूप 30 जुलाई 2026 को श्रमिकों को कुल ₹1,12,70,560 (एक करोड़ बारह लाख सत्तर हजार पांच सौ साठ रुपये) के वैधानिक देयकों का भुगतान किया गया।

प्रदत्त राशि में निम्नलिखित लाभ शामिल हैं:

  • छंटनी (Retrenchment) मुआवजा

  • बोनस

  • अर्जित अवकाश का नकदीकरण (Leave Encashment)

  • नोटिस वेतन (Notice Pay)

  • अन्य वैधानिक अंतिम सेवा लाभ

यह भुगतान लागू श्रम कानूनों के अनुरूप किया गया, जिससे श्रमिकों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हुई।

सुलह प्रक्रिया के दौरान प्रबंधन को श्रमिक कल्याण, निष्पक्ष सेवा शर्तों तथा श्रम कानूनों के पालन से संबंधित वैधानिक दायित्वों के प्रति जागरूक किया गया। साथ ही रचनात्मक संवाद के माध्यम से सौहार्दपूर्ण औद्योगिक संबंध बनाए रखने तथा श्रमिक कल्याण संबंधी उपायों को समयबद्ध ढंग से लागू करने के महत्व पर बल दिया गया।

प्रबंधन ने आश्वासन दिया कि वह भविष्य में भी श्रमिकों के कल्याण तथा सभी वैधानिक प्रावधानों के अनुपालन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेगा।

यह समझौता एलएंडटी कंस्ट्रक्शन के प्रबंधन, किसान मजदूर यूनियन, नागसेनी के महासचिव एवं श्रमिक प्रतिनिधियों के सक्रिय सहयोग तथा क्षेत्रीय श्रम आयुक्त (केंद्रीय), जम्मू के मार्गदर्शन एवं मध्यस्थता से संभव हो सका।

यह सफल सुलह श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा, वैधानिक लाभों के समयबद्ध भुगतान, निष्पक्ष श्रम प्रथाओं को बढ़ावा देने तथा प्रभावी सुलह और रचनात्मक संवाद के माध्यम से सौहार्दपूर्ण औद्योगिक संबंध स्थापित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग को WHO-SEARN का फार्माकोविजिलेंस में क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र और गुणवत्ता के तकनीकी केंद्र का दर्जा

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नई दिल्ली- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) ने 4–5 अगस्त 2026 को नेपाल के काठमांडू में आयोजित दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क (SEARN) की 10वीं वर्षगांठ बैठक में भाग लिया। इस बैठक में दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरणों (NRAs), फार्माकोपिया संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य चिकित्सा उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना था।

SEARN विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय (SEARO) द्वारा वर्ष 2016 में स्थापित एक सहयोगात्मक मंच है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों की नियामक प्रणालियों को ज्ञान साझा करने, नियामकीय समन्वय, क्षमता निर्माण तथा सहयोगात्मक तंत्र के माध्यम से सुदृढ़ बनाना है। यह नेटवर्क गुणवत्ता आश्वासन, फार्माकोविजिलेंस, क्लीनिकल ट्रायल निगरानी, नियामकीय तैयारी और चिकित्सा उपकरणों के विनियमन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कार्य करता है।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल में डॉ. वी. कलैसेलवन (सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक), डॉ. जय प्रकाश (वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी), डॉ. रॉबिन कुमार (वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी) तथा अरविंद कुमार शर्मा (वैज्ञानिक अधिकारी) शामिल थे।

बैठक के दौरान IPC ने भारत की मजबूत दवा नियामक प्रणाली तथा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय फार्माकोपिया, इंडियन फार्माकोपिया रेफरेंस सब्स्टेंस (IPRS), इम्प्योरिटी रेफरेंस स्टैंडर्ड्स (IMPRS), फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (PvPI), मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI), क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोगात्मक पहलों की जानकारी साझा की।

बैठक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) को WHO-SEARN का फार्माकोविजिलेंस में क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र (Regional Centre of Excellence in Pharmacovigilance) तथा गुणवत्ता के तकनीकी केंद्र (Technical Centre in Quality) के रूप में मान्यता मिलना रही।

यह प्रतिष्ठित मान्यता फार्माकोविजिलेंस प्रणाली को मजबूत करने, दवा गुणवत्ता मानकों को आगे बढ़ाने तथा WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में नियामकीय क्षमता निर्माण में IPC के निरंतर योगदान की पुष्टि करती है। यह सम्मान फार्माकोपिया विज्ञान एवं मानकों के क्षेत्र में IPC की अग्रणी भूमिका तथा सदस्य देशों के बीच सहयोग, ज्ञान साझा करने और मानकों के सामंजस्य को बढ़ावा देने की उसकी प्रतिबद्धता को भी मजबूत करता है।

बैठक के दौरान प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक ज्ञान, नियामकीय अनुभवों और दवा नियमन से जुड़ी उभरती चुनौतियों—जैसे गुणवत्ता आश्वासन, दवा सुरक्षा, नियामकीय सहयोग, डिजिटल परिवर्तन और क्षेत्रीय समन्वय—पर विस्तृत चर्चा की।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग ने पुनः दोहराया कि वह WHO-SEARN की पहलों का समर्थन जारी रखेगा तथा दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में सुरक्षित, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नियामकीय उत्कृष्टता और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।

रक्षा कार्यालय परिसर, अफ्रीका एवेन्यू में अत्याधुनिक मल्टी-लेवल कार पार्किंग सुविधा का उद्घाटन

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नई दिल्ली- रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने आज नई दिल्ली के अफ्रीका एवेन्यू स्थित रक्षा कार्यालय परिसर में नवनिर्मित मल्टी-लेवल कार पार्किंग सुविधा का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि सरकार का संकल्प शहरी अवसंरचना का विकास एवं उन्नयन कर नागरिकों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

उन्होंने कहा कि यह परियोजना कार्यालय परिसर में पार्किंग की समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। महानगरों में भूमि की कमी को देखते हुए आधुनिक तकनीकों का उपयोग ही अवसंरचनात्मक चुनौतियों का प्रभावी समाधान है। ऐसी पहलें न केवल कार्यस्थल की दक्षता बढ़ाती हैं, बल्कि पारंपरिक व्यवस्था से आधुनिक और उन्नत तकनीकों की ओर संक्रमण को भी प्रोत्साहित करती हैं।

रक्षा राज्य मंत्री ने परियोजना को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के लिए केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) की सराहना की। उन्होंने सीपीडब्ल्यूडी द्वारा निर्मित एमपी फ्लैट्स, कर्तव्य भवन और एग्जीक्यूटिव एन्क्लेव जैसी इमारतों की गुणवत्ता, सुविधा और आकर्षक डिजाइन की भी प्रशंसा की।

यह 14 मंजिला मल्टी-लेवल कार पार्किंग अत्याधुनिक पूरी तरह स्वचालित रोबोटिक (डॉली) तकनीक से सुसज्जित है। इसका उद्देश्य उपलब्ध भूमि का अधिकतम उपयोग करते हुए अधिक से अधिक पार्किंग क्षमता विकसित करना है।

इस परियोजना की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पूरी तरह स्वचालित रोबोटिक (डॉली) आधारित पार्किंग प्रणाली।

  • पारंपरिक पार्किंग की तुलना में 60 प्रतिशत अधिक स्थान उपयोग दक्षता।

  • परियोजना की कुल लागत 45 करोड़ रुपये।

  • सीसीटीवी निगरानी एवं आधुनिक अग्नि सुरक्षा प्रणाली से सुसज्जित।

  • लिफ्ट लॉबी में वाहन प्रवेश के बाद न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप।

  • पार्किंग प्रक्रिया के दौरान वाहनों से शून्य उत्सर्जन (Zero Vehicle Emissions) सुनिश्चित।

इस अवसर पर रक्षा राज्य मंत्री ने कहा कि आधुनिक तकनीक आधारित ऐसी परियोजनाएं शहरी अवसंरचना को अधिक सक्षम, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

ईज ऑफ डुईंग बिजनेस : निवेशकर्ताओं के लिए छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहल

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छत्तीसगढ़ में बदलाव की एक नई हवा बह रही है। राज्य सरकार ने उद्योगों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। राज्य में व्यापार करना अब पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। इसे ही अंग्रेजी में 'ईज ऑफ डुईंग बिजनेस' कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो इसका अर्थ है व्यापार करने की सुगमता।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन में ​छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्योग लगाने की प्रक्रियाओं को बेहद सरल बना दिया है। पहले किसी व्यापारी को नया उद्योग लगाने के लिए दर्जनों दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। अब वह दौर बीत चुका है।

राज्य सरकार ने लालफीताशाही और पुरानी जटिल व्यवस्थाओं को खत्म कर दिया है। आज छत्तीसगढ़ में नया बिजनेस शुरू करना बहुत आसान हो गया है।

​राज्य सरकार की नीतियां सीधे तौर पर निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं। छत्तीसगढ़ अब केवल खनिजों की भूमि नहीं रहा, बल्कि यह देश का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन चुका है।

सिंगल विंडो सिस्टम: एक ही छत के नीचे सारी सुविधाएं।

​उद्योगपतियों और छोटे व्यापारियों की सबसे बड़ी समस्या होती थी - सरकारी मंजूरियां। पहले एक लाइसेंस पाने के लिए महीनों का इंतजार करना पड़ता था। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस परेशानी को समझा और 'सिंगल विंडो सिस्टम' लागू किया।

​ एक ही पोर्टल पर सब कुछ: निवेशकों को अब अलग-अलग विभागों के पास जाने की जरूरत नहीं है।

ऑनलाइन आवेदन: व्यापार से जुड़ी सभी मंजूरियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) अब ऑनलाइन ही मिल जाते हैं।

​ पारदर्शिता और गति: इससे समय की बचत होती है और काम में पारदर्शिता आती है।

​ समय सीमा तय: सरकार ने तय कर दिया है कि हर मंजूरी एक निश्चित समय में देनी ही होगी।

निवेश प्रोत्साहन और नई औद्योगिक नीति 

​छत्तीसगढ़ की नई औद्योगिक नीति को विशेष रूप से निवेशकों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। राज्य सरकार छोटे, मध्यम और बड़े - सभी प्रकार के उद्योगों को सहायता दे रही है।

विशेष आर्थिक छूट: राज्य में नए उद्योग लगाने पर करों और शुल्कों में राहत दी जा रही है।

सस्ती भूमि और बिजली: निवेशकों को रियायती दरों पर भूमि आवंटन किया जा रहा है और 24 घंटे निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जा रही है।

स्थानीय रोजगार पर जोर: उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले।

महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन: महिला कारोबारियों के लिए विशेष छूट और रियायतों का प्रावधान किया गया है।

लघु एवं कुटीर उद्योगों को नया जीवन 

​ईज ऑफ डुईंग बिजनेस केवल बड़े उद्योगपतियों के लिए नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के छोटे व्यापारियों, हस्तशिल्पियों और ग्रामीण उद्योगों को भी इससे जोड़ा है।

स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग: 'छत्तीसगढ़ हर्बल्स' और 'ढोकरा आर्ट' जैसे स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा रहा है।

आसान लोन सुविधा: स्वरोजगार शुरू करने वाले युवाओं को बिना किसी परेशानी के बैंक लोन उपलब्ध कराया जा रहा है।

आधारभूत संरचना और बुनियादी ढांचा 

​व्यापार को बढ़ाने के लिए बेहतर सड़कों, रेल और हवाई सेवाओं की जरूरत होती है। छत्तीसगढ़ ने पिछले कुछ वर्षों में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में बड़ी सफलता हासिल की है।

​ सड़कों का जाल: राज्य के दूर-दराज इलाकों को मुख्य राजमार्गों से जोड़ा गया है।

​लॉजिस्टिक्स पार्क: सामान को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए आधुनिक लॉजिस्टिक्स हब बनाए गए हैं।

​सुरक्षित वातावरण: छत्तीसगढ़ को देश के सबसे शांत और सुरक्षित राज्यों में गिना जाता है, जो किसी भी निवेशक की पहली पसंद होती है।

छत्तीसगढ़ का बदलता परिदृश्य 

​छत्तीसगढ़ सरकार की यह ऐतिहासिक पहल अब रंग ला रही है। देश और दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगपति छत्तीसगढ़ में निवेश करने की इच्छा जता रहे हैं। इससे न केवल राज्य का राजस्व बढ़ रहा है, बल्कि लाखों युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।

​ईज ऑफ डुईंग बिजनेस के माध्यम से छत्तीसगढ़ ने विकास की एक नई इबारत लिखी है। यह पहल राज्य को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम साबित हो रही है।


छत्तीसगढ़ में निराश्रित मवेशियों के संरक्षण के लिए बड़ी पहल,प्रदेश में स्थापित होंगे 1460 गौधाम

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रायपुर- राज्य में घुमंतू और बेसहारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय देने, गौ-संरक्षण को बढ़ावा देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘गौधाम योजना’ को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। योजना के अंतर्गत पूरे प्रदेश में कुल 1,460 गौधामों की स्थापना करने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रदेश में स्थापित होंगे 1460 गौधाम

घुमन्तू एवं निराश्रित पशुधन के व्यवस्थापन हेतु शासन द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग रायपुर ने गौधाम योजना के तहत 1460 गौधामों की स्थापना की स्वीकृति प्रदान की गई। प्रत्येक विकासखंड में उत्कृष्ट 10 गौठानों का चयन कर गौधाम विकसित किए जाएंगे। 408 आवेदनों में से 151 आवेदनों को प्रशासकीय स्वीकृति दी जा चुकी है। 88 गौधामों का पंजीयन पूर्ण अब तक किए जा चुके हैं। वर्तमान में संचालित 42 गौधामों में लगभग 5 हजार 109 निराश्रित पशुओं को संरक्षण दिया जा रहा है।

राष्ट्रीय राजमार्गों के पास के गौठानों को प्राथमिकता

संयुक्त संचालक (पशु चिकित्सा सेवाएं) से मिली जानकारी के अनुसार, प्रथम चरण में ऐसे गौठानों का चयन किया गया है जो राष्ट्रीय राजमार्गों के समीप स्थित हैं और जहां सभी आवश्यक अधोसंरचनाएं पूर्ण हैं। गौधामों का संचालन स्वयंसेवी संस्थाओं, पंजीकृत गौशालाओं, एनजीओ, एफपीओ और ट्रस्ट के माध्यम से किया जाएगा। हाल ही में पशुधन विकास विभाग ने नियमों में संशोधन कर ग्राम पंचायतों को गौधाम संचालन में प्राथमिकता दी है। इसके अलावा शहरी गौठानों को भी इस योजना में शामिल किया गया है।

चयन और स्वीकृति की पारदर्शी प्रक्रिया

गौधाम स्थापना के लिए प्रक्रिया को काफी सख्त और पारदर्शी बनाया गया है। जिला स्तरीय समिति और कलेक्टर की अनुशंसा के बाद पंचायत से अनापत्ति प्रमाणपत्र लिया जाता है। भौतिक सत्यापन के बाद आवेदन छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग को भेजे जाते हैं। आयोग की क्रियान्वयन समिति हर 3 महीने में होने वाली बैठक में इन आवेदनों की विस्तृत समीक्षा करती है। समीक्षा के पश्चात आवेदनों को अंतिम प्रशासकीय स्वीकृति के लिए शासन को भेजा जाता है, जिसके बाद अनुबंध और पंजीयन की कार्यवाही पूरी की जाती है।

ग्रामीण व कृषि अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

सरकार का मानना है कि गोधन हमारी ग्रामीण संस्कृति और कृषि व्यवस्था का मुख्य आधार है। ग्राम पंचायतों को संचालन का अधिकार मिलने और शहरी गौठानों को योजना में जोड़ने से भविष्य में गौधामों की संख्या में और वृद्धि होगी। वर्तमान में विभिन्न जिलों से नए गौधामों की स्थापना हेतु लगातार आवेदन प्राप्त हो रहे हैं, जिन पर त्वरित कार्यवाही जारी है।

लोक कलाओं के संरक्षण और कलाकारों के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में संस्कृति विभाग की महत्वपूर्ण पहल

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मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना-2026 के लिए आवेदन आमंत्रित

चयनित कलाकारों को मिलेंगे प्रतिवर्ष 12 से 24 हजार रुपये तक प्रोत्साहन राशि

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और कलाकारों को आर्थिक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय द्वारा मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना-2026 के अंतर्गत प्रदेश के लोक कलाकारों से प्रविष्टियां आमंत्रित की गई हैं। योजना का उद्देश्य पारंपरिक लोक कलाओं को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करना, कलाकारों का सम्मान बढ़ाना तथा कला दलों के सतत विकास को नई गति प्रदान करना है।

योजना के अंतर्गत नृत्य-संगीत, लोक नाट्य, लोकगाथा, छत्तीसगढ़ी गीतकार, वाद्ययंत्र वादक, शिल्प कलाकार, छत्तीसगढ़ी पाक कला (पारंपरिक व्यंजन) तथा छत्तीसगढ़ी सौंदर्यकला (श्रृंगार) से जुड़े कलाकार आवेदन कर सकते हैं। आवेदन निर्धारित प्रारूप में पंजीकृत डाक के माध्यम से भेजे जाएंगे। आवेदन प्रपत्र विभाग की वेबसाइट www.cgculture.in पर उपलब्ध हैं तथा संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय, नया रायपुर स्थित कार्यालय से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

योजना के तहत पात्र कलाकारों का चिन्हारी पोर्टल में पंजीयन अनिवार्य होगा। चयनित कलाकारों को प्रतिवर्ष न्यूनतम 12 हजार रुपये से अधिकतम 24 हजार रुपये तक की प्रोत्साहन राशि ई-पेमेंट के माध्यम से प्रदान की जाएगी। यह राशि एक वित्तीय वर्ष में एक बार प्रदान की जाएगी।

योजना का लाभ केवल ऐसे कलाकारों को मिलेगा जिनकी सभी स्रोतों से वार्षिक आय 96 हजार रुपये से अधिक नहीं है। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी आय प्रमाण-पत्र संलग्न करना अनिवार्य होगा। आवेदन के साथ बैंक खाते का विवरण, आईएफएससी कोड तथा पैन कार्ड की छायाप्रति भी प्रस्तुत करनी होगी।

प्रविष्टियां भेजने का पता –

संचालक, संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय,

छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, व्यावसायिक परिसर,

द्वितीय तल, सेक्टर-27, नया रायपुर, अटल नगर (छत्तीसगढ़) – 492018

प्रविष्टियां प्राप्त होने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 निर्धारित की गई है। आवेदन भेजते समय लिफाफे पर "मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना-2026" स्पष्ट रूप से अंकित करना आवश्यक होगा। प्राप्त प्रविष्टियों का परीक्षण समिति द्वारा किया जाएगा तथा समिति का निर्णय अंतिम एवं मान्य होगा।

मुख्यमंत्री लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना प्रदेश की समृद्ध लोक कला परंपराओं के संरक्षण, कलाकारों के सम्मान और आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके माध्यम से लोक कलाकारों को न केवल आर्थिक सहयोग मिलेगा, बल्कि अपनी कला को व्यापक पहचान दिलाने और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी प्राप्त होगा।

सशक्त बचपन,समृद्ध छत्तीसगढ़-बच्चों के पोषण, संरक्षण और सर्वांगीण विकास का नया अध्याय

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पोषण पखवाड़ा में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर पहले स्थान पर

रायपुर-  किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति उसके बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा से मापी जाती है। छत्तीसगढ़ ने इसी सोच को आधार बनाकर बच्चों के सर्वांगीण विकास को शासन की सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की दूरदर्शी नीतियों और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के सक्रिय नेतृत्व में प्रदेश में बच्चों के पोषण, संरक्षण और भविष्य निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई हैं। आईसीडीएस, मिशन वात्सल्य, पोषण अभियान और बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन ने राज्य को बाल विकास के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई है।

आंगनबाड़ी केंद्र बन रहे बाल विकास के आधुनिक केंद्र

प्रदेश में 11 हजार 490 आंगनबाड़ी केंद्रों को सक्षम और आकर्षक बनाने का कार्य तेजी से जारी है। इन केंद्रों में बिल्डिंग एज़ लर्निंग एड (BaLA) पेंटिंग, पोषण वाटिका, खेल एवं शिक्षण आधारित गतिविधियों जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जिससे बच्चे सीखने के साथ आनंदमय वातावरण में विकसित हो सकें।

मनरेगा अभिसरण के माध्यम से 2 हजार 337 नए आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण को स्वीकृति मिली है। वहीं पीएम जनमन योजना के अंतर्गत 191 नए आंगनबाड़ी केंद्र संचालित किए जा चुके हैं। नियद नेल्ला नार 2.0 के तहत 10 जिलों में 12 हजार 964 आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं।

मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की संख्या 51 हजार 45 से बढ़कर 52 हजार 258 तथा सहायिकाओं की संख्या 44 हजार 826 से बढ़कर 51 हजार 548 हो गई है, जिससे सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में सुधार आया है।

कुपोषण पर प्रभावी प्रहार

छत्तीसगढ़ राज्य में बच्चों में कुपोषण कम करने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। पोषण ट्रैकर ऐप के आंकड़ों के अनुसार 0-5 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में स्टंटिंग में 7.82 प्रतिशत की कमी, वेट में 4.36 प्रतिशत की कमी, अंडरवेट में 2.76 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दिसंबर 2023 में जहां बौनापन की दर 30.27 प्रतिशत थी, वह जून 2026 तक घटकर 22.45 प्रतिशत रह गई। यह उपलब्धि पोषण प्रबंधन, नियमित मॉनिटरिंग, सामुदायिक सहभागिता और आंगनबाड़ी आधारित सेवाओं के प्रभावी संचालन का परिणाम है।

पोषण अभियान में राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन

राष्ट्रीय पोषण माह और पोषण पखवाड़ा के दौरान छत्तीसगढ़ ने देशभर में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वित्तीय वर्ष 2024-25 में छत्तीसगढ़ राज्य प्रति आंगनबाड़ी गतिविधियों में प्रथम स्थान पर रहा। अप्रैल 2025 के पोषण पखवाड़ा में भी छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान प्राप्त किया।

प्रदेश में सितंबर-अक्टूबर 2025 के पोषण माह के दौरान 71 हजार 887 गतिविधियां और अप्रैल 2026 के पोषण पखवाड़ा में 34 लाख 93 हजार 474 गतिविधियां आयोजित की गईं। साथ ही स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए रेडी टू ईट इकाइयों की स्थापना की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल शुरू हो चुकी है।

मिशन वात्सल्य से बच्चों को सुरक्षा और संबल

अनाथ, परित्यक्त और विशेष संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए मिशन वात्सल्य प्रभावी सुरक्षा कवच बनकर उभरा है। राज्य में बाल देखरेख संस्थाओं की संख्या बढ़कर 109 हो गई है।

मुख्यमंत्री बाल उदय योजना के माध्यम से सैकड़ों बच्चों को शिक्षा, देखभाल और पुनर्वास का लाभ मिला है। चाइल्ड हेल्पलाइन में प्राप्त 1 लाख 65 हजार 979 कॉलों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए हजारों मामलों का निराकरण किया गया।

बाल संरक्षण सेवाओं के विस्तार का प्रभाव दत्तक ग्रहण और स्पॉन्सरशिप योजनाओं में भी स्पष्ट दिखाई देता है। दत्तक ग्रहण से लाभान्वित बच्चे 42 से बढ़कर 234 और स्पॉन्सरशिप से लाभान्वित बच्चे 767 से बढ़कर 2 हजार 37 हो गए हैं। यह वृद्धि बच्चों को पारिवारिक वातावरण और बेहतर भविष्य उपलब्ध कराने की दिशा में राज्य सरकार की संवेदनशील प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ की ओर मजबूत कदम

राज्य सरकार द्वारा प्रारंभ किए गए बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान ने सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता दोनों को नई दिशा दी है। बाल विवाह प्रतिरोध अधिकारियों की संख्या बढ़कर 1 हजार 382 हो गई है। इसके परिणामस्वरूप रोके गए बाल विवाहों की संख्या 109 से बढ़कर 888 तक पहुंच गई है। यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि बेटियों के शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का संकेत है।

भविष्य की मजबूत नींव

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में संचालित ये प्रयास छत्तीसगढ़ के लाखों बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षा, शिक्षित और सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर कर रहे हैं।

आधुनिक आंगनबाड़ी व्यवस्था, पोषण सुधार, बाल संरक्षण सेवाओं का विस्तार और बाल विवाह उन्मूलन जैसे बहुआयामी प्रयासों ने छत्तीसगढ़ को बाल विकास के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी और आदर्श राज्य के रूप में स्थापित किया है।

सशक्त बचपन ही विकसित छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत नींव है और राज्य सरकार उसी नींव को और अधिक मजबूत बनाने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।

हर बेटी को मिले सुरक्षित और स्वच्छ माहौल- राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा

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डीएमएफ मद से तिल्दा ब्लॉक के 50 स्कूलों में 3.50 करोड़ से बनेंगे आधुनिक बालिका शौचालय

​रायपुर- छत्तीसगढ़ सरकार ने ग्रामीण अंचल की बेटियों को स्वच्छता, सम्मान और सुविधायुक्त शैक्षणिक माहौल प्रदान करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कदम उठाया है। राजस्व  मंत्री टंक राम वर्मा के विशेष प्रयासों के फलस्वरूप तिल्दा विकासखंड के 50 ग्राम पंचायतों के शासकीय विद्यालयों में बालिका शौचालयों के निर्माण के लिए 3 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि की वित्तीय एवं प्रशासकीय मंजूरी प्रदान की गई है। जिला खनिज संस्थान न्यास मद से स्वीकृत यह सौगात क्षेत्र में बालिका शिक्षा को नए आयाम देने के साथ ही स्वच्छता अभियान को धरातल पर और अधिक सशक्त बनाएगी।

डी एम एफ मद से स्वीकृत 7 लाख रुपये प्रति यूनिट की लागत से बनेगी आधुनिक बालिका शौचालय

इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा कि हमारी सरकार बेटियों के स्वाभिमान, बेहतर स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पूरी तरह संकल्पबद्ध है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव अक्सर बेटियों की पढ़ाई में रुकावट बनता था। तिल्दा ब्लॉक के 50 स्कूलों में डी एम एफ मद से स्वीकृत 7 लाख रुपये प्रति यूनिट की लागत से बनने वाले ये आधुनिक बालिका शौचालय केवल एक निर्माण कार्य नहीं हैं, बल्कि यह हमारी बेटियों के सम्मान और उनकी उज्ज्वल भविष्य की नींव हैं। विकास का यह प्रवाह अनवरत जारी रहेगा।

तिल्दा ब्लॉक की इन 50 गांवों को बनेगा शौचालय

प्रशासनिक स्वीकृति के अनुसार सभी 50 ग्राम पंचायतों के विद्यालयों में 01-01 बालिका शौचालय का निर्माण किया जाएगा। ​इस योजना के तहत तिल्दा जनपद क्षेत्र के जिन 50 गांवों के विद्यालयों का चयन किया गया है, उनमें छपोरा, कोहका, मोहरेंगा, खौना, आलेसुर, कोटा, बोईरझीटी, अल्दा, मानपुर, इल्दा, सतभावा, सरोरा, भिंभौरी के शासकीय विद्यालय में आधुनिक बालिका शौचालय का निर्माण कराया जाएगा। इसी प्रकार मोतिमपुर कला, सगुनी, खपरीडीह खुर्द (चिंगरिया), ओटगन, सरफोंगा, छतौद, जंजगीरा, रजिया, भड़हा, बुडेरा, खमरिया (कोनारी), चांपा, सिनोधा,भरुवाडीह कला, खैरखूट(बलोदीखुर्द), जलसो के शासकीय विद्यालय में आधुनिक बालिका शौचालय का निर्माण कराया जाएगा। सरारीडीह, छच्छानपैरी, किरना, तुलसी(अ), मुड़पार, नहरडीह, कुम्हारी, लखना खपरीकला, मूरा, ताराशिव, असौंदा, केशला, बुड़गहन(सुंदरा), भिलौनी, कठिया, बिठिया, घिवरा, धनसुली, तुलसी मानपुर और कुंदरू के शासकीय विद्यालय में आधुनिक बालिका शौचालय का निर्माण कराया जाएगा।

क्षेत्र में उत्साह की लहर

​एक साथ 50 गांवों के प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों में 3.50 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की मंजूरी से पूरे तिल्दा क्षेत्र के ग्रामीणों, स्कूली छात्राओं और अभिभावकों में भारी उत्साह है। जनप्रतिनिधियों ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा का आभार जताया है।मंत्री वर्मा ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता से कोई समझौता किए बिना इन्हें निर्धारित समयावधि के भीतर पूर्ण किया जाए।

विशेष लेख-नवजात का पहला सुरक्षा कवच- स्तनपान और इसका सामाजिक महत्व

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माँ का दूध नवजात शिशु की प्रतिरक्षा की पहली खुराक है 

अमृत तुल्य है माँ का पहला गाढ़ा पीला दूध                                             रायपुर- विश्व स्तनपान सप्ताह हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य शिशु के स्वास्थ्य के लिए माँ के दूध के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करना है। जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और शुरुआती छह महीने तक केवल माँ का दूध ही देना बच्चे के लिए सबसे जरूरी है। स्तनपान के दौरान त्वचा से त्वचा का संपर्क मां और बच्चे के बीच भावनात्मक बंधन को मजबूत करता है, जिससे आराम, गर्माहट और सुरक्षा की भावना मिलती है जो स्वस्थ भावनात्मक विकास में सहायक होती है।

स्तनपान शिशुओं को जानलेवा संक्रमणों से बचाती है

हर साल 1 अगस्त से 7 अगस्त तक दुनिया भर में विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य माताओं और समाज को शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के अनुसार, शिशु के जन्म के बाद पहला घंटा और शुरुआती छह महीने उसका पूरा जीवन संवारने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं।   स्तनपान करने वाले शिशुओं में दस्त, निमोनिया, कान के संक्रमण और कुछ श्वसन संबंधी संक्रमण जैसी आम बचपन की बीमारियों का खतरा कम होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, इष्टतम स्तनपान शिशुओं को जानलेवा संक्रमणों से बचाकर विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लाखों शिशु मृत्यु को रोकने की क्षमता रखता है। 

अमृत तुल्य है पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलस्ट्रम)

जन्म के पहले कुछ घंटों में, माँ का दूध सिर्फ़ भोजन नहीं होता, बल्कि यह नवजात शिशु की प्रतिरक्षा की पहली खुराक होती है, जो सीधे माँ के शरीर से बच्चे तक पहुँचती है। जन्म के बाद का पहला घंटा, जिसे अक्सर गोल्डन आवर कहा जाता है, स्तनपान शुरू करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान बच्चे स्वाभाविक रूप से सतर्क रहते हैं और सहज रूप से स्तन की तलाश करते हैं। त्वचा से त्वचा का शुरुआती संपर्क न केवल सफल स्तनपान की दर को बढ़ाता है, बल्कि बच्चे के तापमान, हृदय गति और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।

शिशु के जन्म के तुरंत बाद (एक घंटे के भीतर) मां का पहला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलस्ट्रम कहा जाता है, बच्चे का पहला प्राकृतिक टीका होता है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीबॉडीज, प्रोटीन और विटामिन होते हैं, जो नवजात शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती प्रदान करते हैं और उसे विभिन्न प्रकार के संक्रमणों से बचाते हैं।

शुरुआती 6 महीने केवल और केवल मां का दूध

चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की स्पष्ट सलाह है कि जन्म से लेकर 6 महीने की उम्र तक बच्चे को केवल मां का दूध ही देना चाहिए। इस अवधि के दौरान बच्चे को पानी, ऊपर का दूध या शहद जैसी चीजें देने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि मां के दूध में बच्चे की प्यास और भूख बुझाने के लिए सही अनुपात में पानी और सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। 6 महीने पूरे होने के बाद, स्तनपान जारी रखते हुए बच्चे को धीरे-धीरे ऊपरी पौष्टिक आहार देना शुरू किया जा सकता है, जिसे 2 साल या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।

स्तनपान के बहुआयामी लाभ

शिशु के लिए स्वास्थ्य वरदान है, स्तनपान कराने से बच्चों में दस्त, निमोनिया, कान के संक्रमण और कुपोषण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि स्तनपान करने वाले बच्चों का बौद्धिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य अन्य बच्चों की तुलना में बेहतर होता है। यह आगे चलकर बच्चों में मोटापा, डायबिटीज और अस्थामा जैसी क्रोनिक बीमारियों की संभावना को घटाता है।

मां के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद

स्तनपान कराने से माताओं में स्तन कैंसर और अंडाशय के कैंसर का जोखिम कम होता है। यह प्रसव के बाद वजन घटाने और गर्भाशय को पुनः सामान्य आकार में लाने में मदद करता है। मां और बच्चे के बीच एक भावनात्मक और अटूट संबंध  स्थापित होता है।

समाज और परिवार की जिम्मेदारीस्तनपान केवल एक मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज की साझी जिम्मेदारी है। अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव, सामाजिक रूढ़ियों, या कामकाजी माहौल में सुविधाओं की कमी के कारण महिलाएं समय पर स्तनपान नहीं करा पातीं। प्रसव के बाद मां को सही पोषण, मानसिक शांति और आराम मिलना आवश्यक है ताकि वह बिना किसी तनाव के बच्चे को स्तनपान करा सके। कामकाजी माताओं के लिए कार्यस्थलों में क्रैच सुविधा, मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) और ब्रेस्टफीडिंग ब्रेक जैसी सुविधाएं होना बेहद जरूरी है। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और मॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर माताओं के लिए सुरक्षित और स्वच्छ फीडिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए।

स्तनपान एक स्वस्थ और सशक्त पीढ़ी की नींव

विश्व स्तनपान सप्ताह हमें यह याद दिलाता है कि बच्चों को उनका मौलिक अधिकार मां का दूध दिलाने के लिए हम सभी को मिलकर एक अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। जब एक मां बिना किसी संकोच और बाधा के अपने बच्चे को स्तनपान करा सकेगी, तभी हम एक कुपोषण-मुक्त और स्वस्थ समाज की कल्पना साकार कर सकते हैं।

साय कैबिनेट के महत्वपूर्ण फैसले: AI मिशन से लेकर भारी उद्योग और वित्तीय सुधारों को मंजूरी

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 रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में आज कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने ब्यौरा देते हुए बताया कि राज्य में सुशासन, अत्याधुनिक तकनीक, कौशल विकास और डिजिटल अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व गति देने के लिए 5 वर्षों हेतु 500 करोड़ रुपये के बजट के साथ ‘छत्तीसगढ़ राज्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मिशन’ की शुरुआत को हरी झंडी दे दी है।


उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि भारत सरकार के IndiaAI Mission की तर्ज पर तैयार इस योजना के तहत प्रदेश भर में 100 AI डेटा लैब और 5 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए जाएंगे, साथ ही 300 से अधिक AI स्टार्टअप्स को सीधी वित्तीय व तकनीकी सहायता दी जाएगी। इस मिशन के माध्यम से राज्य के 6 लाख विद्यार्थियों और 1.5 लाख सरकारी कर्मचारियों को AI में प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि आम जनता के लिए 50 से अधिक AI-आधारित सुगम शासकीय सेवाएं विकसित की जा सकें।

उप मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य को देश के औद्योगिक मानचित्र पर नई पहचान दिलाते हुए कैबिनेट ने भारत सरकार के प्रतिष्ठित मिनीरत्न उपक्रम BEML (भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड) द्वारा ‘हैवी अर्थ मूविंग इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग प्लांट’ की स्थापना के लिए रियायती दर पर भूमि आवंटित करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है। यह छत्तीसगढ़ का पहला भारी मशीनरी निर्माण उद्योग होगा, जिससे राज्य में भारी पूंजी निवेश आएगा, विनिर्माण (Manufacturing) व MSME क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और गति लाने के उद्देश्य से लोक निर्माण विभाग (PWD) में C-DAC पुणे द्वारा विकसित ‘वर्क्स एण्ड एकाउंट मैनेजमेंट इंफर्मेशन सिस्टम’ (WAMIS) लागू करने के प्रथम चरण को मंजूरी दी गई है। इस प्रणाली के लागू होने से ई-प्राक्कलन, ई-प्रोक्योरमेंट, ई-मेज़रमेंट बुक (e-MB), बिल भुगतान और लेखा प्रबंधन जैसी सभी प्रक्रियाएं एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ जाएंगी, जिससे निर्माण कार्यों की रियल-टाइम निगरानी संभव होगी और भुगतान में लगने वाला समय घटेगा।

उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए ‘मुख्यमंत्री ग्राम सड़क एवं विकास योजना’ के दिशा-निर्देशों में बड़ा संशोधन किया गया है। अब ग्रामीण आंतरिक गलियों में CC सड़क व नाली निर्माण और सड़क निर्माण से पहले मनरेगा से मिट्टी कार्य की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है। साथ ही, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) की पात्रता से छूटे सभी ग्रामीण मार्गों को इसमें शामिल कर योजना का दायरा बढ़ा दिया गया है, जिसके लिए नाबार्ड ऋण, पर्यावरण व अधोसंरचना विकास मद तथा खनिज न्यास (DMFT) से संसाधन जुटाए जाएंगे।

उप मुख्यमंत्री ने बताया कि वित्तीय प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में एशियाई विकास बैंक (ADB) से “Anjor LIGHT” तकनीकी सहायता परियोजना के तहत 15 करोड़ रुपये का 100% पूर्ण अनुदान (Grant) प्राप्त करने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया है। 1 दिसंबर 2026 से 30 नवंबर 2029 तक चलने वाली इस 3 वर्षीय परियोजना से राज्य पर कोई वित्तीय भार नहीं पड़ेगा और इसके माध्यम से ‘छत्तीसगढ़ अंजोर विजन 2047’ के अनुरूप सार्वजनिक वित्त प्रबंधन, PPP इकोसिस्टम, ग्रीन फाइनेंस तथा जलवायु-अनुकूल परियोजनाओं के विकास के लिए ‘परियोजना प्रबंधन इकाई’ (PMU) का गठन किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि शासकीय धन के सदुपयोग और कड़े वित्तीय अनुशासन के लिए राज्य की सभी योजनाओं में State Single Nodal Agency लागू करने का निर्णय लिया गया है। इस नई व्यवस्था के तहत अब बजट राशि बैंकों में लंबे समय तक अकारण निष्क्रियों के रूप में पड़ी नहीं रहेगी, बल्कि एक केंद्रीयकृत मदर अकाउंट से आवश्यकता पड़ने पर सीधे हितग्राहियों या वेंडरों के खातों में हस्तांतरित होगी। इससे नकदी प्रबंधन में सुधार होगा और गबन, बैंकिंग धोखाधड़ी तथा अनावश्यक ब्याज के बोझ पर प्रभावी नियंत्रण लगेगा।

सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए तय किया है कि ऊर्जा अधोसंरचना को मजबूती प्रदान करने और आमजन व संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (CSPGCL) को 200 करोड़ रुपये तक के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD)/बॉन्ड जारी कर स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध (Listing) कराने की अनुमति दी गई है। इसके लिए राज्य सरकार मूलधन व ब्याज भुगतान पर अपनी गारंटी (Government Guarantee) प्रदान करेगी और प्रत्याभूति शुल्क में छूट देगी, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा और बिजली उत्पादन व वितरण प्रणाली को नई रफ्तार हासिल होगी।

चलती कार के सनरूफ से स्टंटबाजी पर हाईकोर्ट सख्त: SSP को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश

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 बिलासपुर। चलती कारों के सनरूफ से बाहर निकलकर स्टंट करने और सोशल मीडिया के लिए रील बनाने की बढ़ती खतरनाक प्रवृत्ति पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। नेशनल हाईवे पर युवतियों द्वारा चलती गाड़ी के सनरूफ से निकलकर स्टंट करने का वीडियो वायरल होने के बाद, अदालत ने मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने बिलासपुर एसएसपी रजनेश सिंह को व्यक्तिगत शपथपत्र (हलफनामा) पेश करने का आदेश दिया है।


कोनी-सेंदरी रोड का वीडियो बना आधार

यह पूरा मामला कोनी-सेंदरी मार्ग से जुड़ा है, जहां चलती कार का सनरूफ खोलकर युवक-युवतियों द्वारा स्टंट करने और रील बनाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वीडियो में यातायात नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए चलती कार से मोबाइल के जरिए शूटिंग की जा रही थी। मामले को बेहद गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन को नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया।

कोर्ट ने पुलिस से पूछे तीखे सवाल

  • हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि:
  • इस मामले में अब तक क्या-क्या दंडात्मक कार्रवाई की गई है?

भविष्य में इस प्रकार की जानलेवा घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस विभाग ने क्या ठोस और प्रभावी कदम उठाए हैं?

पुलिस की कार्रवाई और पहचान की कोशिश

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि पुलिस लगातार मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicle Act) के तहत कार्रवाई कर रही है। कोर्ट को बताया गया कि 4 अगस्त को सामने आए इस घटनाक्रम के बाद एसएसपी के निर्देश पर संबंधित वाहन और उसमें सवार लोगों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। फिलहाल पुलिस वाहन चालक और स्टंट में शामिल युवतियों की पहचान में जुटी है।

केवल मौखिक आश्वासन नहीं, ठोस रोडमैप चाहिए

हाईकोर्ट केवल पुलिस के मौखिक दावों और सामान्य कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत ने बिलासपुर एसएसपी को सख्त निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कार्ययोजना बनाई गई है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की बैठक में मानव–वन्यजीव संघर्ष पर विस्तृत चर्चा

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नई दिल्ली में आज पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की बैठक केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में आयोजित हुई। बैठक का मुख्य विषय मानव–वन्यजीव संघर्ष (Human–Wildlife Conflict - HWC) तथा इसकी रोकथाम, शमन और मानव एवं वन्यजीवों के बीच दीर्घकालिक सह-अस्तित्व को सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार-विमर्श था।

बैठक में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह, समिति के सदस्य सांसद, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCFs) और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (Chief Wildlife Wardens) उपस्थित रहे।

समिति को 18 दिसंबर 2025 को आयोजित पिछली बैठक में दिए गए निर्देशों पर हुई अनुवर्ती कार्रवाई की जानकारी दी गई। इसमें संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों के सांसदों के साथ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा किए गए परामर्श शामिल थे।

बैठक में बताया गया कि मानव–वन्यजीव संघर्ष का स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है। कई राज्यों में मानव–हाथी संघर्ष प्रमुख है, जबकि अन्य स्थानों पर बाघ, तेंदुआ, भालू, गैंडा, जंगली सूअर, गौर, बंदर तथा अन्य वन्यजीवों से जुड़े संघर्षों के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता है।

समिति को बताया गया कि प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सातवीं बैठक में घोषित मानव–वन्यजीव संघर्ष उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence on Human–Wildlife Conflict) की स्थापना तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित SACON, WII South Centre में की गई है। यह केंद्र वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, नीति निर्माण, क्षमता विकास तथा समुदाय-केंद्रित उपायों के माध्यम से मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रभावी प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय संस्थान के रूप में कार्य करेगा।

इसके अलावा, 10 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल शुरू किए जाने की जानकारी दी गई। यह पोर्टल संघर्ष की घटनाओं के रिकॉर्ड, डेटा प्रबंधन, ज्ञान साझा करने तथा निर्णय समर्थन के लिए एकीकृत डिजिटल मंच उपलब्ध कराएगा। साथ ही दक्षिण भारत के लिए हाथी संरक्षण क्षेत्रीय कार्ययोजना (Regional Action Plan on Elephant Conservation) को भी मंजूरी दिए जाने की जानकारी दी गई।

बैठक में असम, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने-अपने राज्यों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की स्थिति, अपनाए गए समाधान, सामुदायिक भागीदारी, तकनीकी नवाचार तथा भविष्य की रणनीतियों पर प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों में परिदृश्य आधारित योजना, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली, आवास सुधार, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक सहभागिता तथा अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया।

राज्यों की प्रमुख पहलें

1. असम

  • हाथी, बाघ, तेंदुआ, गैंडा, जंगली भैंसा और जंगली सूअर से जुड़े संघर्षों के लिए परिदृश्य आधारित रणनीति प्रस्तुत की।

  • क्षेत्रवार कार्ययोजनाओं के लिए जोनल मानव–वन्यजीव संघर्ष जोखिम न्यूनीकरण समितियों का गठन किया।

  • आवास पुनर्स्थापन, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और वैकल्पिक आजीविका पर विशेष ध्यान दिया।

2. कर्नाटक

  • इंजीनियरिंग उपायों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), कमांड सेंटर, त्वरित प्रतिक्रिया दल, सामुदायिक स्वयंसेवक नेटवर्क और e-Parihara डिजिटल मुआवजा प्रणाली पर आधारित छह-स्तंभीय मॉडल प्रस्तुत किया।

  • राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष मिशन, समान एसओपी (SOP), गलियारों की बहाली और अंतरराज्यीय समन्वय का सुझाव दिया।

3. केरल

  • मानव–वन्यजीव संघर्ष को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित करने, त्वरित प्रतिक्रिया दल, 273 संघर्ष प्रभावित पंचायतों की पहचान तथा जना जागरथा समितियों और SARPA स्वयंसेवी कार्यक्रम जैसी सामुदायिक पहलों की जानकारी दी।

  • वन्यजीव गलियारों की बहाली, आवास प्रबंधन, जिम्मेदार पर्यटन और तकनीक आधारित निगरानी पर जोर दिया।

4. मध्य प्रदेश

  • 'प्रिवेंशन फर्स्ट' मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें AI आधारित निगरानी, GPS ट्रैकिंग, ड्रोन, गजरक्षक, त्वरित प्रतिक्रिया दल, प्रजाति-विशिष्ट एसओपी, समयबद्ध मुआवजा तथा बाघ मित्र, हाथी मित्र और इको-डेवलपमेंट समितियों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी शामिल है।

  • संघर्षकारी वन्यजीवों के वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानांतरण (Translocation) पर भी प्रकाश डाला।

5. उत्तराखंड

  • एकीकृत कमांड एवं कंट्रोल सेंटर, 24×7 हेल्पलाइन 1926, ई-निगरानी, GPS ट्रैकिंग, जैविक बाड़, समयबद्ध मुआवजा तथा गांव-स्तरीय स्वयंसेवक नेटवर्क की जानकारी दी।

  • 'लिविंग विद लेपर्ड्स/टाइगर्स' पहल के तहत दीर्घकालिक सह-अस्तित्व रणनीति प्रस्तुत की।

6. उत्तर प्रदेश

  • बताया कि राज्य में अधिकांश मानव–वन्यजीव संघर्ष तेंदुओं से संबंधित हैं और तराई आर्क लैंडस्केप सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है।

  • त्वरित प्रतिक्रिया दल, चार बचाव केंद्र, सौर बाड़, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, स्वयंसेवी कार्यक्रम तथा वैज्ञानिक निगरानी पर आधारित रणनीति प्रस्तुत की।

बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि मानव–वन्यजीव संघर्ष का प्रभावी समाधान पारिस्थितिक संरक्षण, मानव जीवन और आजीविका की सुरक्षा को साथ लेकर चलने वाली समन्वित रणनीति से ही संभव है। आधुनिक तकनीकों जैसे GIS, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन, रेडियो टेलीमेट्री और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स के उपयोग के साथ-साथ वन कर्मियों की क्षमता बढ़ाने, मुआवजा व्यवस्था में सुधार, जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया।


बैठक के अंत में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने राज्यों द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष की चुनौती का समाधान वैज्ञानिक प्रबंधन, संस्थागत समन्वय, तकनीक आधारित निगरानी और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल और उत्कृष्टता केंद्र राज्यों को डेटा आधारित रणनीति बनाने, अनुभव साझा करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने में महत्वपूर्ण सहयोग देंगे।

बैठक की शुरुआत में पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सुझाव दिया कि विभिन्न आवास क्षेत्रों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र वन्यजीवों का कितना भार वहन कर सकता है। इससे संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने की रणनीति बनाने में सहायता मिलेगी।

बैठक का समापन सांसदों द्वारा मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने और भारत की समृद्ध वन्यजीव विरासत के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर आवश्यक उपायों पर विस्तृत चर्चा के साथ हुआ।

यदि चाहें, मैं इसका संक्षिप्त हिंदी प्रेस विज्ञप्ति, समाचार शैली या सरल हिंदी सारांश भी तैयार कर सकता हूँ।

डॉक्टर पति की हैवानियत: पत्नी को नशीला पदार्थ देकर बनाए अश्लील वीडियो, ब्लैकमेल कर वसूले 42.5 लाख

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 गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र से रिश्तों को तार-तार कर देने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहाँ एक पीड़िता महिला डॉक्टर ने अपने डॉक्टर पति, सास, ससुर और ननद के खिलाफ हत्या के प्रयास, ब्लैकमेलिंग, धोखाधड़ी और दहेज उत्पीड़न की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कराया है।


पीड़िता (35 वर्ष) का आरोप है कि उसका पति उसे नशीला पदार्थ देकर बेहोश कर देता था और उसकी अश्लील तस्वीरें व वीडियो बना लेता था। इन तस्वीरों को वायरल करने की धमकी देकर आरोपी ने अब तक पीड़िता से 42.50 लाख रुपये (फॉर्च्यूनर कार के नाम पर 32.50 लाख और अन्य 10 लाख रुपये) हड़प लिए।

50 लाख के खर्चे के बाद भी फॉर्च्यूनर की मांग

पीड़िता के अनुसार, उसकी शादी 29 नवंबर 2019 को छत्तीसगढ़ निवासी डॉक्टर से हुई थी। शादी में करीब 50 लाख रुपये खर्च किए गए थे। इसके बावजूद ससुराल वाले संतुष्ट नहीं थे और फॉर्च्यूनर कार की मांग को लेकर पीड़िता को शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगे।

दूसरी शादी और जान से मारने की कोशिश

इसी बीच पीड़िता को पता चला कि आरोपी पति का कई अन्य महिलाओं से संबंध है और उसने एक अन्य महिला डॉक्टर से बिना तलाक दिए दूसरी शादी कर ली है। विरोध करने पर आरोपी पति और ससुराल वालों ने पीड़िता के साथ मारपीट की तथा गले में रस्सी बांधकर पंखे से लटकाकर जान से मारने का प्रयास किया। किसी तरह जान बचाकर पीड़िता पुलिस के पास पहुंची।

पुलिस जांच शुरू

पीड़िता की तहरीर पर शाहपुर थाना पुलिस ने आरोपी डॉक्टर पति, सास, ससुर और ननद के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस का कहना है कि आरोपों की गंभीरता से जांच की जा रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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