Media24Media.com: फसल कटाई

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राजधानी में दो दिनों तक बिखरेगी आदिवासी लोक नृत्यों की छटा

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रायपुर :राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में दो दिवसीय जनजातीय गौरव दिवस के भव्य आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के साथ पूर्वोत्तर राज्यों के कलाकार भी अपनी संस्कृति की झलक बिखेरेंगे। 14-15 नवम्बर को आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुति देने पूर्वोत्तर भारत के पांच राज्यों मेघालय, मिजोरम, असम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के कलाकार रायपुर पहुंच चुके हैं। रायपुर रेलवे स्टेशन पर कलाकारों का पुष्पाहार और तिलक लगाकर स्वागत किया गया। पूर्वोत्तर राज्यों से आए ये कलाकार वांगला-रुंगला, रेट-किनॉन्ग, गेह पदम ए ना-न्यी ई, सोलकिया जैसे लोक नृत्यों की प्रस्तुति से अपनी संस्कृति के विविध रंग बिखेरेंगे।  


फसल कटाई के बाद गारो आदिवासी करते हैं वांगला-रुंगला नृत्य, देवता मिस्सी सालजोंग का करते हैं धन्यवाद

जनजातीय गौरव दिवस पर प्रस्तुति देने मेघालय से 20 सदस्यों की टीम रायपुर आई है। यह दल गारो जनजाति द्वारा फसल कटाई के बाद किया जाने वाला वांगला-रुंगला लोक नृत्य प्रस्तुत करेगी। इसके कलाकार मेघालय की राजधानी शिलांग से करीब 200 किलोमीटर दूर नॉर्थ कर्व हिल्स (North Curve Hills) से आए हैं। दल का नेतृत्व कर रहे श्री मानसेन मोमिन ने बताया कि वांगला गारो जनजाति का लोकप्रिय त्योहार है। यह जनजाति कृषि अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। फसल कटाई के बाद उर्वरता (Fertility) के देवता मिसी सालजोंग को धन्यवाद देने के लिए वे यह नृत्य करते हैं। वे फसल उपलब्ध कराने के लिए भगवान को धन्यवाद देते हैं, उनकी पूजा कर नाच-गाकर प्रार्थना करते हैं और नई फसल का भोग लगाते हैं। देवता मिसी सालजोंग को धन्यवाद देने से पहले किसी भी कृषि उत्पाद का उपयोग नहीं किया जाता है।  

वांगला-रुंगला आदिवासी लोक नृत्य में महिला और पुरुष दोनों हिस्सेदारी करते हैं। पुरुष नर्तक अपना परंपरागत ढोल लेकर नृत्य करते हैं जिसे दामा कहा जाता है। वांगला-रुंगला लोक नृत्य में नर्तकों का नेतृत्व करने वाले को ग्रिकगिपा या तोरेगिपा कहा जाता है। इसमें महिलाएं संगीत की धुन पर अपने हाथ हिलाती हैं, जबकि पुरुष अपने परंपरागत ढोल को बजाकर नृत्य करते हैं।

दुश्मनों पर जीत के जश्न का नृत्य है सोलकिया, मंत्रोच्चार जैसे स्वर संगीत के साथ होता है नृत्य

मिजोरम की राजधानी आईजोल से रायपुर पहुंची लोक नृत्य दल यहां सोलकिया नृत्य की प्रस्तुति देगी। इसके 20 सदस्यों के दल में 11 पुरूष और नौ महिलाएं शामिल हैं। यह नृत्य मुख्यतः मिजोरम की मारा जनजाति द्वारा किया जाता है। ‘सोलकिया’ का अर्थ दुश्मन के कटे हुए सिर से है। सोलकिया नृत्य मूल रूप से दुश्मनों पर जीत का जश्न मनाने के लिए किया जाता था। खासकर उस मौके पर जब विजेता द्वारा दुश्मन का सिर ट्रॉफी के रूप में घर लाया जाता था। लेकिन अब यह सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर मिजो समुदायों के पुरुषों और महिलाओं द्वारा किया जाता है।

मिजोरम के कलाकारों के दल का नेतृत्व कर रहे श्री जोथमजामा ने बताया कि सोलकिया नृत्य की शुरुआत पिवी और लाखेर समुदायों द्वारा की गई थी। इस लोक नृत्य के साथ आने वाला स्वर संगीत गायन की तुलना में मंत्रोच्चार के अधिक निकट है। ताल संगीत एक जोड़ी घडि़यों द्वारा प्रदान किया जाता है, जो एक दूसरे से बड़े होते हैं, जिन्हें डार्कहुआंग कहा जाता है। संगीत को बेहतर बनाने के लिए कई जोड़ी झांझ भी बजाए जाते हैं।

 जोथमजामा ने इस नृत्य को करने वाली मारा जनजाति के बारे में बताया कि यह एक कुकी जनजाति है जो मिजोरम की लुशाई पहाड़ियों और म्यांमार की चिन पहाड़ियों में रहती है। इन्हें लाखेर, शेंदु, मारिंग, ज़ु, त्लोसाई और खोंगज़ई नामों से भी जाना जाता है।

खेत में जलता पाया गया पराली, 3 पर अर्थदंड रोपित

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जांजगीर-चांपा। फसल कटाई के बाद खेतों में बचे हुए फसल अपशिष्ट (पराली) को जलाये जाने पर प्रतिबंध होने के बावजूद पेण्ड्री निवासी संजय पिता फूलचंद कश्यप, रामाधीन पिता स्व. कुसूराम कश्यप और किशन पिता राजू कश्यप द्वारा खेत में पराली जलाते हुए पाये जाने पर उक्त तीनों के विरूद्ध कार्यवाही की गई है। सभी के विरूद्ध प्रतिव्यक्ति 1-1 हजार रुपए का अर्थदंड रोपित किया गया है। कलेक्टर तारन प्रकाश सिन्हा द्वारा पराली न जलाने और पैरादान करने की अपील किये जाने के बावजूद खेत में पैरा जलाते पाए जाने पर नियमानुसार कार्यवाही की गई है।

एसडीएम जांजगीर श्रीमती कमलेश नंदिनी साहू से प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम पेण्ड्री तहसील जांजगीर निवासी संजय पिता फूलचंद कश्यप, रामाधीन पिता स्व. कुसूराम कश्यप और किशन पिता राजू कश्यप द्वारा खेत में पराली जलाया जा रहा था। नायब तहसीलदार प्रशांत पटेल द्वारा भ्रमण के दौरान खेतों में पराली जलते हुए देख जांच की गई। जांच में स्पष्ट होने के बाद उक्त तीनों के विरूद्ध अर्थदंड रोपित किया गया। इसके साथ ही तीनों को पैरादान हेतु प्रोत्साहित किया गया।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा फसल कटाई के पश्चात पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस संबध में जिले के कलेक्टर द्वारा भी लगातार पराली न जलाने और पैरा को गौठानों में दान करने की अपील जाती रही है। कलेक्टर द्वारा पराली जलाने वालों के विरूद्ध नियमानुसार कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं। इसी कड़ी में आज खेत में पराली जला रहे तीन लोगो के विरूद्ध अर्थदंड की कार्यवाही की गई है।

खेतों में न जलाए पैरा, करें पैरादान

कलेक्टर तारन प्रकाश सिन्हा ने किसानों से खेतों में पैरा न जलाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि खेतों में पैरा जलाने से पर्यावरण प्रदूषण होता है, साथ ही गायों को पैरा भी नहीं मिल पाता है। इसलिए सभी किसान खेतों से पैरा को गौठान में पहुंचाएं और पैरादान अभियान में अपनी हिस्सेदारी निभाएं।

आदिवासी नृत्य महोत्सव में 9 देशों के जनजातीय कलाकारों की होगी प्रस्तुति

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रायपुर। राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में आगामी एक से तीन नवंबर तक राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। महोत्सव में नौ देशों के जनजातीय कलाकारों सहित अट्ठाईस राज्यों और आठ केंद्रशासित प्रदेशों के डेढ़ हजार से अधिक कलाकार शामिल होंगे। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में इस बार दो थीम रखी गई है। पहली थीम है फसल कटाई पर होने वाले आदिवासी नृत्यऔर दूसरी आदिवासी परम्पराएं तथा रीति-रिवाज। विजेताओं को कुल बीस लाख रुपए के पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। आदिवासी नृत्य महोत्सव के माध्यम से न केवल राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय कलाकारों के बीच उनकी कलाओं की साझेदारी होगी।



बल्कि वे एक-दूसरे के खान-पान, रीति-रिवाज और शिल्प-शैली को भी देख तथा समझ सकेंगे। छत्तीसगढ़ की ओर से नौ देशों को आमंत्रण पत्र भेजा गया है। ये सभी देश पहली बार रायपुर में अपनी प्रस्तुति देंगे। इस महोत्सव में मोजांबिक, मंगोलिया, टोंगो, रशिया, इंडोनेशिया, मालदीव, सर्बिया, न्यूजीलैंड और इजिप्ट के जनजातीय कलाकार हिस्सा लेंगे।

 

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