Media24Media.com: जनजातीय गौरव दिवस

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अंतर्राज्यीय आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव का हुआ समापन

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रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में दो दिवसीय जनजातीय गौरव दिवस एवं अंतर्राज्यीय आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव के समापन समारोह में शामिल हुए। मुख्यमंत्री की उपस्थिति में विभिन्न राज्यों के लोक नर्तक दलों ने अपनी-अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों में उत्साह भर दिया। इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, उत्तराखंड समेत छत्तीसगढ़ के जनजातीय एवं लोक कलाकारों ने प्रस्तुति दी।

त्रिपुरा से आए ब्रू रियांग जनजाति समुदाय के नर्तक दल ने परंपरागत लोकनृत्य होजागिरी की प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।  इस नृत्य में ब्रू रियांग जनजाति समुदाय की युवतियों ने सिर के ऊपर बोतल को संभालते हुए अद्भुत सामंजस्य के साथ प्रस्तुति दी। नृत्य के दौरान नर्तकों के कलात्मक प्रदर्शन को भी दर्शकों की खूब सराहना मिली।

इसके पूर्व हिमाचल प्रदेश के लोक कलाकारों ने मनमोहक कायांग नृत्य की प्रस्तुति दी, जो हिमाचल प्रदेश के सबसे लोकप्रिय नृत्यों में से एक है। इस नृत्य में नर्तक दल एक दूसरे की भुजाओं को बुनकर माला जैसा पैटर्न बनाया, धीर-धीरे कदमताल करते हुए प्रतीकात्मक रूप से माला की मोती जैसे बिखरते हुए फिर जुड़ते हुए पारंपरिक कपड़े पहने और गहनों से सुसज्जित नृत्य प्रस्तुत किया।

इसके बाद मेघालय के गारो नृत्य की प्रस्तुति हुई। गारो समुदाय के लोग इस नृत्य में फसल कटाई के बाद देवता मिसी सालजोंग की आराधना कर उन्हें धन, धान्य के लिए अपनी आस्था और निष्ठा व्यक्त करते हैं। इस नृत्य में लोक वाद्य के प्रयोग से उत्पन्न ध्वनि ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

इसी क्रम में मिजोरम के मिजो और चरमा जनजाति समुदाय ने युद्ध कौशल, शौर्य, पराक्रम और युद्ध विजय के प्रतीक नृत्य मिजो प्रस्तुत किया। इस नृत्य के जरिए समुदाय ने वीर गाथा का जीवंत प्रदर्शन किया जिसमें यह बताया गया कि युद्ध के दौरान किस तरह समुदाय के वीर योद्धा ने गांव की रक्षा, जिसके बाद ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक उनका सम्मान किया। इसी तरह उत्तराखंड के जनजाति समुदाय ने हारुल नृत्य का प्रस्तुत किया जोकि  हाटी जनजाति का पारंपरिक नृत्य और लोकगीत की एक खास शैली है। हारुल नृत्य  जौनसार-बावर और चकराता क्षेत्र में किया जाता है। हारुल नृत्य में वीर पांडवों के साहस और वीरता, देवी-देवताओं की कहानियां, देवभूमि के इतिहास और जनजाति की संस्कृति से जुड़ी घटनाओं को बड़े ही रोचक ढंग से पेश किया गया। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों से आए लोक कलाकारों ने भी छत्तीसगढ़ के प्रचलित लोकनृत्यों की प्रस्तुति दी।

उल्लेखनीय है कि महोत्सव के पहले दिन सिक्किम लिंबू जनजाति समुदाय द्वारा चाकोस तांगनाम नृत्य, गुजरात के लोक नर्तक दल ने सिद्धि गोमा नृत्य, अरुणाचल प्रदेश के कलाकारों ने गेह पदम ए ना न्यी, मध्यप्रदेश डिंडोरी के गोंड जनजाति ने सैला रीना, जम्मू कश्मीर से गुज्जर समुदाय ने गोजरी लोक नृत्य, छत्तीसगढ़ के माड़िया जनजाति ने गौर माड़िया नृत्य, उत्तराखंड के जनजातीय समुदाय द्वारा दिया बाती नृत्य, तेलंगाना के द्वारा मथुरी नृत्य, उत्तर प्रदेश के द्वारा कर्मा नृत्य, कर्नाटक के द्वारा सुगाली नृत्य, आंध्र प्रदेश के द्वारा ढीमसा नृत्य, दमन दीव द्वारा तारपा नृत्य तथा राजस्थान के जनजातीय कलाकारों द्वारा चकरी नृत्य की प्रस्तुति दी गई थी। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के सभी जिलों के जनजातीय कलाकारों द्वारा अलग-अलग तीज त्यौहारों के लोक नृत्यों की प्रस्तुति दी गई।

 

 

मोदी सरकार के अथक प्रयास, जनजातीय समुदाय का हो रहा विकास

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 देश आज शुक्रवार को चौथा जनजातीय गौरव दिवस मना रहा है। भावी पीढ़ियों को आदिवासी और उनके नायकों के बलिदान को लेकर जागरूक करने के लिए 2021 में बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया गया। 2011 की जनगणना के मुताबिक अनुसूचित जनजाति (एसटी) की आबादी 10.45 करोड़ या कुल आबादी का लगभग 8.6% है। ये समुदाय, जिनमें 705 से अधिक अलग-अलग समूह शामिल हैं, देश दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में रहते हैं। भारत सरकार ने इन आदिवासी समुदायों की सहायता और समर्थन करने के लिए सतत विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान देने के साथ उनके उत्थान के उद्देश्य से विभिन्न योजनाएं और नीतियां शुरू की हैं। पिछले 10 सालों में प्रधानमंत्री मोदी के “सबका साथ – सबका विकास” की नीतियों पर चलते हुए भारत सरकार ने जनजातीय समुदाय को देश की मुख्यधारा में जोड़ने और उनका विकास करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।


जनजातीय विकास के लिए 41 मंत्रालयों द्वारा 214 योजनाएं

वर्तमान में भारत सरकार के 41 मंत्रालय/विभागों के द्वारा जनजातीय विकास के लिए 214 योजनाएं चलाई जा रही है जो अपने आप में सरकार की इस समुदाय के विकास के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

6 साल में 5 लाख करोड़ से अधिक का आवंटन

केंद्र सरकार ने जनजातीय विकास को सुनिश्चित करने के लिए पिछले 6 सालों के दौरान यानी 2019 – 20 से 2024 – 25 के बजट आवंटन में एसटीसी निधि के तहत 5,17,000 करोड़ रूपये से कई अधिक का आवंटन किया गया।
10 वर्षों में जनजातीय कार्य मंत्रालय के लिए आवंटित बजट

2015 – 16 = 4495 करोड़
2016 – 17 = 4822 करोड़
2017 – 18 = 5318 करोड़
2018 – 19 = 5995 करोड़
2019 – 20 = 7328 करोड़
2020 – 21 = 5495 करोड़
2021 – 22 = 6174 करोड़
2022 – 23 = 7301 करोड़ (आरई)
2023 – 24 = 12462 करोड़ (बीई)
2024 – 25 = 13000 करोड़ (यूबी)

10 वर्षों में 18000 करोड़ से अधिक की छात्रवृति

मोदी सरकार में 30 लाख से अधिक आदिवासी छात्रों को हर साल मंत्रालय के तहत विभिन्न छात्रवृत्तियां मिलती हैं। 2014 से मार्च 2024 तक 10 वर्षों में मंत्रालय के तहत 18,000 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति वितरित की गई हैं। जनजातीय समुदाय के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत 2019- 20 से 2023-24 के तहत 12000 करोड़ से अधिक राशि जारी की गई है।

एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय योजना के बजट आवंटन में 22 गुना बढ़ोतरी

केन्द्र में एनडीए सरकार बनने के बाद से एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) योजना का बजट आवंटन पिछले 10 वर्षों में 22 गुना उछाल के साथ 2024 – 25 के बजट के तहत 6399 करोड़ रूपये हो गया है। पिछले 10 वर्षों में भारत सरकार के कुछ अन्य कदम जिनसे जनजातीय विकास सुनिश्चित हुआ।

1. 85 से अधिक लघु वन उत्पादों को न्यूनतम उचित मूल्य (एमएफपी) में शामिल किया गया है।

2. वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत कुल भूमि कवरेज 2023-24 तक तीन गुना बढ़कर 181 लाख एकड़ हो गई है, जबकि 2013-14 में यह 55 लाख एकड़ थी।

3. पीएम आदि आदर्श ग्राम योजना के तहत 14,000 से अधिक स्वीकृत ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए 2216 करोड़ रुपये से अधिक पिछले 3 वर्षों में जारी किए गए हैं।

4. पिछले दशक में स्वच्छ भारत मिशन के तहत आदिवासी बहुल क्षेत्रों में 148 लाख से अधिक शौचालय बनाए गए और 2.55 लाख आंगनबाड़ी स्थापित की गईं।

5. सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत 1 करोड़ से अधिक आदिवासियों की जांच की गई। अगले तीन वर्षों में इस बीमारी की अधिकता वाले क्षेत्रों में 7 करोड़ आदिवासियों की जांच का लक्ष्य रखा गया है।

6. पिछले 10 वर्षों में, आदिवासी परिवारों को 23 लाख से अधिक पट्टे जारी किए गए हैं।

पिछले कुछ वर्षों में जनजातीय विकास के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गए मुख्य कार्य

2024

1. पीएम मोदी ने 2 अक्टूबर 2024 को ₹79,150 करोड़ से अधिक का धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान शुरू किया।

2. प्रधानमंत्री ने 40 एकलव्य विद्यालयों का उद्घाटन किया और 25 नए ईएमआरएस की आधारशिला रखी, जिनकी लागत लगभग 2,834 करोड़ रुपये होगी।

3. जनजातीय कार्य मंत्रालय का बजट परिव्यय 2023-24 के संशोधित अनुमान की तुलना में 73.60 प्रतिशत बढ़कर लगभग 13,000 करोड़ रुपये हुआ

2023

1. प्रधानमंत्री ने जनजातीय गौरव दिवस पर लगभग 24,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ पीएम जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान पीएम-जनमन का शुभारंभ किया।

2. प्रधानमंत्री ने 2047 तक देश से सिकल सेल एनीमिया बीमारी को खत्म करने के उद्देश्य से नेशनल सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया।

3. पीएम मोदी ने नई दिल्ली में मेजर ध्यान चंद नेशनल स्टेडियम में आदी महोत्सव का उद्घाटन किया; 9 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 29 पीवीटीजी शामिल हुए; महोत्सव में 3 करोड़ रुपये से अधिक के आदिवासी उत्पादों की बिक्री हुई।

4. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 1 अप्रैल, 2023 से 27 दिसंबर, 2023 तक 32.22 लाख आदिवासी छात्रों को डीबीटी के जरिए छात्रवृत्ति प्रदान किए।

2022

1. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2022 से 31 दिसंबर 2022 तक डीबीटी के माध्यम से 26.37 लाख जनजातीय छात्रों को छात्रवृत्ति संवितरित की।

2. नई दिल्ली में राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान का उद्घाटन।

3. प्रधानमंत्री आदि आदर्श ग्राम योजना ( पीएमएएजीवाई ) में समेकित विकास के लिए 16554 जनजातीय गांवों को कवर किया गया।

2021

1. मंत्रिमंडल ने 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित करने की मंजूरी दी।

2. प्रधानमंत्री द्वारा झारखंड में भगवान बिरसा मुंडा संग्रहालय का उद्घाटन।

3. आजादी का अमृत महोत्सव के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर 50 नए एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों की आधारशिला रखी।

2020

1. 2020 के दौरान लघु वनोपज (एमएफपी) के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की योजना का विस्तार और मौजूदा वस्तुओं के एमएसपी में वृद्धि।

2. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने फेसबुक के साथ साझेदारी में पूरे भारत में जनजातीय युवाओं के डिजिटल कौशल विकास के लिए ‘गोल’ कार्यक्रम शुरू किया।

3. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जनजातीय स्वास्थ्य एवं पोषण पोर्टल – ‘स्वास्थ्य’ लॉन्च किया।

4. भुवनेश्वर में ‘अनुसूचित जनजाति पीआरआई प्रतिनिधियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम’ और ‘1000 स्प्रिंग्स पहल’ का शुभारंभ।

2019

1. प्रधानमंत्री वन-धन योजना के अंतर्गत 676 वन-धन केन्‍द्र स्‍थापित करने के लिए लगभग 100 करोड़ रुपये की मंजूरी।

2. एमएसपी तथा एमएफपी के लिए मूल्‍य श्रृंखला के माध्‍यम से छोटे वन उत्‍पाद की संख्‍या 23 से 49 की गई।

3. एमएसपी तथा एमएफपी के लिए मूल्‍य श्रृंखला के माध्‍यम से छोटे वन उत्‍पाद की संख्‍या 23 से 49 की गई।

4. जनजातीय कार्य मंत्रालय मैट्रिक पश्‍चात् छात्रवृत्ति के लिए डीबीटी पोर्टल विकसित करने वाला पहला मंत्रालय बना।

2018

1. लगभग 5 करोड़ आदिवासी लोगों की आय और आजीविका में सुधार के लिए प्रधानमंत्री द्वारा वन धन योजना का शुभारंभ।

2. सरकार ने ईएमआरएस स्थापित करने की योजना को नया रूप देने और विस्तार देने के लिए महत्वपूर्ण उपायों की घोषणा की।

जनजातीय गौरव दिवस-2024 : स्वस्थ मानसिकता से होगा जनजातीय समाज की भावी-पीढ़ी का समुचित विकास

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रायपुर। रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में दो दिवसीय जनजातीय गौरव दिवस 2024 एवं अंतर्राज्यीय आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन केवल आदिवासी लोक नृत्य तक ही सम्बन्धित नहीं है, बल्कि साइंस कॉलेज मैदान में आदिवासियों से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों से जुड़े कार्यक्रम भी यहां आयोजित किए गए हैं। आज पहले दिन जनजातीय समुदायों के युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियांविषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया।

इस संगोष्ठी-परिचर्चा के प्रमुख वक्ता छत्तीसगढ़ राज्य कौशल विकास प्राधिकरण के सीईओ एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के एमडी विजय दयाराम के. ने कहा कि जनजातीय समुदाय के भावी पीढ़ियों के युवाओं के मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए बस्तर के कलेक्टर के रूप में जनजातीय क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए मनोबस्तरकार्यक्रम की शुरुआत की। उनके इस अभियान का मूल उद्देश्य था जनजातीय लोगों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए न केवल मनोबस्तर पर काम करना बल्कि छत्तीसगढ़ के सभी जनजातीय समाज के साथ जुड़कर उन सभी युवाओं से संपर्क करना है जो अपनी बातों को किसी दूसरे तक पहुंचा नहीं पाते हैं। श्री विजय दयाराम के, ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार अपने देश के युवाओं के मेंटल हेल्थ को लेकर बेहद चिंतित है और अपनी नई नीतियों से सभी राज्यों के युवाओं के मेंटल हेल्थ पर ध्यान केंदित करने जा रही है।

दूसरे वक्ता के रूप में डॉ. सचिन बर्बड़े ने सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ जनजातीय क्षेत्रों में सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य में अपने 10 वर्षों के अनुभव के आधार पर कहा कि आदिवासी समुदाय के युवाओं के मानसिक स्वास्थ को लेकर उनकी टीम सुखू दुखूनाम से एक ऐसी योजना का संचालन करती है जिसमें आदिवासी युवक-युवती अपने सुख-दुख को अपने हमउम्र के लोगों के साथ बांट सकते हैं।

तीसरे वक्ता के रूप में एमएचआई की सीईओ सुश्री प्रीति श्रीधर मारीवाला ने जनजातीय समुदाय के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर अपने 25 वर्षों के अनुभव के आधार पर कहा कि जनजातीय युवक-युवतियों के मानसिक स्वास्थ को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि उनकी स्थानीय भाषा में उनसे जुड़ा जाए और उनके साथ बातचीत कर उनकी मनःस्थिति को समझा जाए।

चौथी एवं अंतिम वक्ता बस्तर विश्वविद्यालय में बी.एससी. जूलॉजी की छात्रा मनीषा नाग मनोबस्तर कार्यक्रम में स्वयंसेवक हैं। मनीषा अपने समुदाय के जनजातीय युवाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और सहायता का कार्य अनुभव को साझा करते हुए कहा कि जनजातीय समुदाय के युवक-युवतियों के मानसिक स्वास्थ्य को समझने के साथ-साथ उनके विकास को लेकर भी हमें गम्भीर होना होगा और हमें जमीनी स्तर पर जनजातीय समुदाय के लोगों के साथ जुड़ना होगा, तभी हम उनके विकास में सहभागी बन पाएंगे।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव ने किया जनजातीय गौरव दिवस और अंतरराज्यीय आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव का शुभारंभ

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 रायपुर : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जनजातीय गौरव दिवस एवं अंतरराज्यीय आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव का शुभारंभ किया। रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में यह आज से दो दिवसीय जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।


बता दें कि, आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव में 21 राज्यों के 28 दल प्रस्तुति देंगे।अपने-अपने राज्यों की आदिवासी संस्कृतियों की छटा बिखेरेंगे। कार्यक्रम में डिप्टी CM अरुण साव, कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम , केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू , कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप , विधायक पुरंदर मिश्रा मौजूद हैं।

पीएम नरेन्द्र मोदी जनजातीय गौरव दिवस पर 15 नवंबर को वर्चुअली छत्तीसगढ़ के कार्यक्रम में होंगे शामिल

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रायपुर। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती-जनजातीय गौरव दिवस पर राजधानी रायपुर स्थित साइंस कॉलेज मैदान में 14 और 15 नवंबर को दो दिवसीय राज्य स्तरीय भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मौके पर जमुई बिहार से छत्तीसगढ़ के कार्यक्रम में वर्चुअली रूप से जुडे़गे। मोदी इस इस दौरान  पीएम जनमन योजना के तहत् लाभान्वित हितग्राहीयों कि चर्चा भी करेंगे।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय 15 नवंबर को दोपहर 10.30 बजे से शुरू हो रहे कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे। आदिमजाति तथा अनुसूचित जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे।

विशिष्ट अतिथि के रूप में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत विधायकगण सर्व राजेश मूणत, पुरन्दर मिश्रा, मोतीलाल साहू, अनुज शर्मा, और इन्द्रकुमार साहू सहित सभी सांसदगण, विधायकगण, निगम मण्डल एवं आयोग तथा जिला पंचायत के अध्यक्ष शामिल होंगे।

 

राजधानी में दो दिनों तक बिखरेगी आदिवासी लोक नृत्यों की छटा

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रायपुर। राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में दो दिवसीय जनजातीय गौरव दिवस के भव्य आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों के साथ पूर्वोत्तर राज्यों के कलाकार भी अपनी संस्कृति की झलक बिखेरेंगे। 14-15 नवम्बर को आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुति देने पूर्वोत्तर भारत के पांच राज्यों मेघालय, मिजोरम, असम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के कलाकार रायपुर पहुंच चुके हैं। रायपुर रेलवे स्टेशन पर कलाकारों का पुष्पाहार और तिलक लगाकर स्वागत किया गया। पूर्वोत्तर राज्यों से आए ये कलाकार वांगला-रुंगला, रेट-किनॉन्ग, गेह पदम ए ना-न्यी ई, सोलकिया जैसे लोक नृत्यों की प्रस्तुति से अपनी संस्कृति के विविध रंग बिखेरेंगे। 

फसल कटाई के बाद गारो आदिवासी करते हैं वांगला-रुंगला नृत्य, देवता मिस्सी सालजोंग का करते हैं धन्यवाद

जनजातीय गौरव दिवस पर प्रस्तुति देने मेघालय से 20 सदस्यों की टीम रायपुर आई है। यह दल गारो जनजाति द्वारा फसल कटाई के बाद किया जाने वाला वांगला-रुंगला लोक नृत्य प्रस्तुत करेगी। इसके कलाकार मेघालय की राजधानी शिलांग से करीब 200 किलोमीटर दूर नॉर्थ कर्व हिल्स (North Curve Hills) से आए हैं। दल का नेतृत्व कर रहे श्री मानसेन मोमिन ने बताया कि वांगला गारो जनजाति का लोकप्रिय त्योहार है। यह जनजाति कृषि अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। फसल कटाई के बाद उर्वरता (Fertility) के देवता मिसी सालजोंग को धन्यवाद देने के लिए वे यह नृत्य करते हैं। वे फसल उपलब्ध कराने के लिए भगवान को धन्यवाद देते हैं, उनकी पूजा कर नाच-गाकर प्रार्थना करते हैं और नई फसल का भोग लगाते हैं। देवता मिसी सालजोंग को धन्यवाद देने से पहले किसी भी कृषि उत्पाद का उपयोग नहीं किया जाता है।


 वांगला-रुंगला आदिवासी लोक नृत्य में महिला और पुरुष दोनों हिस्सेदारी करते हैं। पुरुष नर्तक अपना परंपरागत ढोल लेकर नृत्य करते हैं जिसे दामा कहा जाता है। वांगला-रुंगला लोक नृत्य में नर्तकों का नेतृत्व करने वाले को ग्रिकगिपा या तोरेगिपा कहा जाता है। इसमें महिलाएं संगीत की धुन पर अपने हाथ हिलाती हैं, जबकि पुरुष अपने परंपरागत ढोल को बजाकर नृत्य करते हैं।

दुश्मनों पर जीत के जश्न का नृत्य है सोलकिया, मंत्रोच्चार जैसे स्वर संगीत के साथ होता है नृत्य

मिजोरम की राजधानी आईजोल से रायपुर पहुंची लोक नृत्य दल यहां सोलकिया नृत्य की प्रस्तुति देगी। इसके 20 सदस्यों के दल में 11 पुरूष और नौ महिलाएं शामिल हैं। यह नृत्य मुख्यतः मिजोरम की मारा जनजाति द्वारा किया जाता है। सोलकियाका अर्थ दुश्मन के कटे हुए सिर से है। सोलकिया नृत्य मूल रूप से दुश्मनों पर जीत का जश्न मनाने के लिए किया जाता था। खासकर उस मौके पर जब विजेता द्वारा दुश्मन का सिर ट्रॉफी के रूप में घर लाया जाता था। लेकिन अब यह सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर मिजो समुदायों के पुरुषों और महिलाओं द्वारा किया जाता है।

मिजोरम के कलाकारों के दल का नेतृत्व कर रहे जोथमजामा ने बताया कि सोलकिया नृत्य की शुरुआत पिवी और लाखेर समुदायों द्वारा की गई थी। इस लोक नृत्य के साथ आने वाला स्वर संगीत गायन की तुलना में मंत्रोच्चार के अधिक निकट है। ताल संगीत एक जोड़ी घडि़यों द्वारा प्रदान किया जाता है, जो एक दूसरे से बड़े होते हैं, जिन्हें डार्कहुआंग कहा जाता है। संगीत को बेहतर बनाने के लिए कई जोड़ी झांझ भी बजाए जाते हैं।

जोथमजामा ने इस नृत्य को करने वाली मारा जनजाति के बारे में बताया कि यह एक कुकी जनजाति है जो मिजोरम की लुशाई पहाड़ियों और म्यांमार की चिन पहाड़ियों में रहती है। इन्हें लाखेर, शेंदु, मारिंग, ज़ु, त्लोसाई और खोंगज़ई नामों से भी जाना जाता है।

 


जनजातीय गौरव दिवस पर प्रस्तुति देने अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, तेलंगाना, राजस्थान और सिक्किम के आदिवासी नर्तक दल रायपुर पहुँचे

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रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में 14 एवं 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती जनजातीय गौरव दिवस पर राज्य स्तरीय भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा। दो दिवसीय कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सहित 17 राज्यों के आदिवासी नर्तक दल मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे।

जनजातीय गौरव दिवस पर अपने नृत्य की प्रस्तुति देने नर्तक दलों छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं। आज अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, तेलंगाना, राजस्थान और सिक्किम के आदिवासी नर्तक दल रायपुर पहुंच चुके हैं।

अरूणाचल प्रदेश के नर्तक दल आदिलोक नृत्य नाटिका, उत्तराखंड के नर्तक दल झींझी, होली, हन्ना और दिया नृत्य, तेलंगाना के नर्तक दल माथुरी जनजाति नृत्य, राजस्थान के नर्तक दल वालर गरासिया गैर नृत्य और सिक्किम के नृतक दल सुब्बा लोक नृत्य नाटिका की प्रस्तुति देंगे।

उल्लेखनीय है कि 14 नवंबर एवं 15 नवंबर को साइंस कॉलेज मैदान में संध्या 3 बजे से अंतर्राज्यीय लोक नर्तक दलों के सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति के साथ-साथ जनजातीय गौरव से संबंधित विषयों पर संगोष्ठी का आयोजन तथा जनजातीय जीवन शैली पर चित्रकला का प्रदर्शन भी होगा।

जनजातीय गौरव दिवस : प्रस्तुति देने अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, तेलंगाना, राजस्थान और सिक्किम के आदिवासी नर्तक दल रायपुर पहुँचे

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 रायपुर : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में 14 एवं 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती जनजातीय गौरव दिवस पर राज्य स्तरीय भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा। दो दिवसीय कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सहित 17 राज्यों के आदिवासी नर्तक दल मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे।


जनजातीय गौरव दिवस पर अपने नृत्य की प्रस्तुति देने नर्तक दलों छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं। आज अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, तेलंगाना, राजस्थान और सिक्किम के आदिवासी नर्तक दल रायपुर पहुंच चुके हैं।

अरूणाचल प्रदेश के नर्तक दल आदिलोक नृत्य नाटिका, उत्तराखंड के नर्तक दल झींझी, होली, हन्ना और दिया नृत्य, तेलंगाना के नर्तक दल माथुरी जनजाति नृत्य, राजस्थान के नर्तक दल वालर गरासिया गैर नृत्य और सिक्किम के नृतक दल सुब्बा लोक नृत्य नाटिका की प्रस्तुति देंगे।

उल्लेखनीय है कि 14 नवंबर एवं 15 नवंबर को साइंस कॉलेज मैदान में संध्या 3 बजे से अंतर्राज्यीय लोक नर्तक दलों के सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति के साथ-साथ जनजातीय गौरव से संबंधित विषयों पर संगोष्ठी का आयोजन तथा जनजातीय जीवन शैली पर चित्रकला का प्रदर्शन भी होगा।

जनजातीय गौरव दिवस : 17 राज्यों के आदिवासी नर्तक दलों का दिखेगा राजधानी रायपुर में हुनर

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 रायपुर । मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में 14 एवं 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती-जनजातीय गौरव दिवस पर राज्य स्तरीय भव्य आयोजन किया जायेगा। दो दिवसीय आयोजित इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सहित 17 राज्यों के आदिवासी नर्तक दल मनमोहक प्रस्तुतियां देंगे। इनमें अरूणाचल प्रदेश के आदि लोक नृत्य नाटिका, मध्यप्रदेश के भील भगोरिया नृत्य, मेघालय के गारो लोक नृत्य और नागालैण्ड के आओ नागा लोक नृत्य सहित विभिन्न आकर्षक प्रस्तुतियां होगी।


गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 15 नवंबर को जमुई (बिहार) से जनजातीय गौरव दिवस का शुभारंभ करेंगे। वे छत्तीसगढ़ में आयोजित कार्यक्रमों में वर्चंुअली शामिल होंगे और पीएम जनमन योजना में शामिल जिलों के हितग्राहियों से चर्चा भी करेंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की पहल पर राज्य के सभी जिला मुख्यालयों में भी एक दिवसीय गौरव दिवस का आयोजन किया जायेगा।

आदिम जाति विभाग द्वारा इसकी तैयारियां की जा रही हैं। साइंस कॉलेज मैदान में जनजातीय गौरव दिवस के दौरान 14 एवं 15 नवंबर को पूर्वान्ह 11 बजे से लेकर रात्रि 8 बजे तक जनजातीय गौरव पर आधारित विविध कार्यक्रमों का आयोजन होगा, जिसमें विषय विशेषज्ञ सहित कई राज्यों के आदिवासी कलाकार, आदिवासी कला संस्कृति के मर्मज्ञ शामिल होंगे।

दो दिवसीय राज्य स्तरीय जनजातीय गौरव दिवस के आयोजन को भव्य एवं यादगार बनाने के लिए आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा देश के विभिन्न राज्यों से आदिवासी नर्तक दलों एवं कलाकारों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जा रहा है। अब तक 18 राज्यों के 22 आदिवासी नर्तक दलों ने इस दो दिवसीय आयोजन में शामिल होने के लिए अपनी सहमति दी है, जिसमें अरूणांचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैण्ड, मेघालय, आसाम, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान सहित अन्य राज्यों के आदिवासी नर्तक दल शामिल हैं। इनमें पुरूष एवं महिला कलाकारों की संख्या लगभग 425 है।

प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि 14 नवंबर एवं 15 नवंबर को साइंस कॉलेज मैदान में संध्या 3 बजे से अंतर्राज्यीय लोक नर्तक दलों के सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति के साथ-साथ जनजातीय गौरव से संबंधित विषयों पर संगोष्ठी का आयोजन तथा जनजातीय जीवन शैली पर चित्रकला का प्रदर्शन भी होगा।

डॉ. मनसुख मांडविया छत्तीसगढ़ में जनजातीय गौरव दिवस समारोह के भाग के रूप में पदयात्रा करेंगे

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रायपुर। केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेल तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया 13 नवंबर 2024 को छत्तीसगढ़ के जशपुर में जनजातीय गौरव दिवस पर माई भारत यूथ वालंटियर्स के साथ पदयात्रा करेंगे। इस पदयात्रा में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के साथ राज्य के अन्य मंत्री भी शामिल होंगे। यह कार्यक्रम भगवान बिरसा मुंडा की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में उनकी विरासत और देश के विकास में आदिवासी समुदायों के महत्वपूर्ण योगदान के सम्मान में मनाया जाएगा।

इस विशेष कार्यक्रम में आदिवासी विरासत को याद करने, समावेशिता को बढ़ावा देने और आदिवासी समुदायों को लाभ पहुंचाने वाली सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 10,000 से अधिक माई भारत यूथ वालंटियर्स भाग लेंगे। ये वालंटियर्स आदिवासी संस्कृति, विरासत और विरासत की रक्षा और संरक्षण की भावना को बढ़ावा देंगे।

पदयात्रा कोमड़ो गांव से शुरू होगी और लगभग 7 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए रणजीत स्टेडियम में समाप्त होगी। यह पदयात्रा युवाओं, आदिवासी नेताओं और समुदाय के सदस्यों को आदिवासी विरासत और भावना के जीवंत उत्सव में एकजुट करेगी।


इस कार्यक्रम की शुरुआत भारत की स्वतंत्रता में आदिवासी नेताओं के योगदान को दर्शाने वाले सांस्कृतिक अभिनय और आदिवासी विरासत की प्रचुरता को दर्शाने वाले नृत्यों से होगी। इस पदयात्रा की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक पेड़ माँ के नामपहल के अनुरूप वृक्षारोपण से होगी।

इस पदयात्रा के दौरान, एक प्रदर्शनी स्थल पर ऐतिहासिक आदिवासी आंदोलनों, आदिवासी नायकों को श्रद्धांजलि और भारत के आदिवासी समुदायों की अनूठी कलात्मकता और शिल्प कौशल का प्रदर्शन किया जाएगा। इस पदयात्रा के मार्ग के ठहराव स्थलों पर आदिवासी संस्कृति, सुंदर रंगोली कलाकृतियां, पेंटिंग और पारंपरिक आदिवासी कला का उत्सव मनाने वाले नाटकों का प्रदर्शन किया जाएगा। सीधी प्रसारित कार्यशालाएं उपस्थित लोगों को आदिवासी नृत्य, संगीत और साहित्य के साथ एक परस्पर अनुभव प्रदान करेंगी जबकि आदिवासी खाद्य पदार्थों का चयन उनके स्वास्थ्य लाभों के बारे में बताएगा।

पदयात्रा के मुख्य आकर्षण में शामिल हैं:

सांस्कृतिक कार्यक्रम: सांस्कृतिक समृद्धि का उत्‍सव मनाते आदिवासी नृत्य और संगीत। आदिवासी आंदोलनों और कलाओं पर प्रदर्शनी: नाटकों और झांकियों द्वारा ऐतिहासिक आदिवासी आंदोलनों, वीरता और शिल्प कौशल का प्रदर्शन।

जागरूकता कियोस्क: सरकारी योजनाओं और महिला लाभार्थियों के बारे में जानकारी। कलात्मक कार्यक्रम: रंगोली, पेंटिंग और आदिवासी कला और साहित्य को बढ़ावा देने वाली कार्यशालाएं।

युवाओं के योगदान का उत्सव:

माय भारत पोर्टल और एनवायकेएस उपलब्धियां दर्शाना। आदिवासी नेताओं को श्रद्धांजलि: प्रतिभागी प्रमुख आदिवासी हस्तियों की वेशभूषा में होंगे। 

आदिवासी उत्कृष्टता को सम्मान: 

द्म पुरस्कार विजेताओं का अभिनंदन और पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना। 

आदिवासी भोजन:  

स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रकार के आदिवासी खाद्य पदार्थ परोसना।

मंत्रालय इस आयोजन के माध्यम से आदिवासी विरासत और संस्कृति की गहन समझ को बढ़ावा देना चाहता है साथ ही सरकारी कल्याणकारी पहलों में आदिवासी समुदाय को सक्रिय रूप से शामिल करना चाहता है। इस उत्सव का उद्देश्य युवाओं को भारत की आदिवासी विरासत की समृद्ध विरासत से जुड़ने, उसे समझने और उसका सम्मान करने के लिए एक मंच प्रदान करना है।

युवा कार्यक्रम विभाग देश भर के युवाओं को www.mybharat.gov.in पर माय भारत पोर्टल पर पंजीकरण करके और आदिवासी विरासत की अपनी समझ को गहरा करने और अपनी आदिवासी विरासत का सम्मान करने के लिए इस पदयात्रा में शामिल होने के लिए आमंत्रित करता है।

संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक साल तक चलने वाले उत्सव में युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय के अंतर्गत माय भारत, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को अपनाने और प्रदर्शित करने के लिए पूरे भारत में पदयात्राओं का आयोजन करेगा।

आजादी के आंदोलन में छत्तीसगढ़ के जनजातीय योद्धाओं की भी रही है अहम भूमिका

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शगुफ्ता शीरीन 

एक ओर जहां देश में जहां पहली बार जनजातीय गौरव दिवस मनाया जा रहा है। वहीं, छत्तीसगढ़ में भी ऐसे अनेक आदिवासी जननायक हुए हैं, जिन्होंने आजादी के लिए ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ संघर्ष में प्राणों की आहुति दी है। इन आदिवासी योद्धाओं ने जल, जंगल, जमीन, आदिवासी अस्मिता की रक्षा और देश की आजादी के लिए अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई है। यूं तो छत्तीसगढ़ में बस्तर क्षेत्र में भूमकाल आंदोलन अंग्रेजों को झकझोंरने में महत्वपूर्ण रहा। वहीं, इसके पूर्व भी जनजातीय योद्धाओं ने शोषण के खिलाफ अपनी आवाज़ मुखर की और अंग्रेजों का पूरजोर विरोध किया। ये सभी आंदोलन इतिहास में दर्ज हैं, जिनसे युवा पीढ़ी सदैव प्रेरणा लेती रहेगी। 

छत्तीसगढ़ में पहला जनजातीय आंदोलन 1774 ई. में अजमेर सिंह के नेतृत्व में किया गया। नारायणपुर तहसील के परलकोट के जमीदार गेंदसिंह ने अंग्रेजों और मराठों के विरूद्ध विद्रोह किया। तत्कालीन बस्तर रियासत की राजधानी जगदलपुर में डोंगर को उप राजधानी बनाकर वहां के राजा अपने पुत्रों को गवर्नर नियुक्त करते थे। बस्तर के राजा दलपत सिंह ने अपने पुत्र अजमेर सिंह को डोंगर का गवर्नर बनाया। दलपत सिंह के बाद जब दरियादेव सन् 1774 में बस्तर का राजा बना, तो उसने डोंगर क्षेत्र की उपेक्षा की। 

शासकों की अधीनता स्वीकार 

हल्बा विद्रोहियों ने दरियादेव के खिलाफ विद्रोह किया। इस विद्रोह में डोंगर क्षेत्र मराठों के अधीन चले गया। इस बीच, क्षेत्र में अकाल पड़ा और अराजकता फैल गई। कांकेर की सेना और दरियादेव के बीच हुए संघर्ष में दरियादेव परास्त हुआ। वह ब्रिटिश कंपनी और मराठों के साथ मिल गया। उसने दुबारा अजमेर सिंह से युद्ध किया। इस विद्रोह में अजमेर सिंह मारा गया। हल्बा विद्रोह के बाद दरियादेव ने 1778 में एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर मराठी शासकों की अधीनता स्वीकार की। 

साल 1825 में हुआ था तीसरा विद्रोह

 छत्तीसगढ़ में भोपाल-पट्टनम संघर्ष 1795 ई. में हुआ, जो दूसरा विद्रोह माना जाता है। यह सीमित संघर्ष था। वर्ष 1795 ई. में ब्रिटिश यात्री कैप्टन जे.टी. ब्लंट बस्तर की सीमा पर पहुंचे, तब आदिवासी समाज के लोगों ने उनका विरोध किया और उन्हें वापस लौटना पड़ा। इसी तरह, सन् 1825 ई. में तीसरा विद्रोह जनजातीय समुदाय के योद्धाओं ने गेंद सिंह के नेतृत्व किया। गेंदसिंह अबूझमाड़ क्षेत्र के वीर आदिवासी थे। उनके साथी बाण, कुल्हाड़ी से लैस होकर शोषण करने वाले ब्रिटिश सैनिकों पर हमला करते थे। उन्होंने युद्ध का छापामार तरीका अपनाया था। ये जनजातीय योद्धा अपने क्षेत्र में गैर आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे। 

ब्रिटिश सैनिकों ने किया था गिरफ्तार

इस युद्ध में अबूझमाड़ की सेना परंपरागत तरीके से विरोध कर रही थी। जबकि ब्रिटिश सैनिक आधुनिक हथियारों से लैस थे। इस विद्रोह में गेंदसिंह के पास संसाधनों की कमी हुई और उन्हें ब्रिटिश सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया। गेंदसिंह को महल के सामने ही फांसी दे दी गई। आदिवासी क्षेत्रों में ब्रिटिश साम्राज्य के बढ़ते प्रभाव से जंगल में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोग काफी विचलित हुए। वे अपनी संस्कृति में विदेशी दखल सहन नहीं कर सकें और लगातार विरोध करते रहे। इसी बीच मराठा शासक ने तारापुर परगना में किसानों से कर वृद्धि में बढ़ोतरी कर दी। इसका विरोध तारापुर के गवर्नर दलगंजन सिंह ने किया। 

आत्मसमर्पण के लिए मजबूर

ब्रिटिश और मराठा रियासतें इन इलाकों में अपना वर्चस्व बढ़ा रही थी। वहीं, आदिवासी किसानों ने बढ़े हुए कर देने से इंकार कर दिया और 1842 से 1854 ई. के बीच चौथा विद्रोह शुरू हुआ, जिसे तारापुर विद्रोह के नाम से जाना जाता है। इस विद्रोह में ब्रिटिश सैनिकों ने दलगंजन सिंह को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया। इतना ही नहीं उन्हें नागपुर जेल में 6 माह की सजा भी दी गई। 

ब्रिटिश सेना ने खत्म किया आंदोलन

आदिवासी इलाकों में जनजातीय समाज के लोग अपनी जमीन, जंगल, परंपराओं और संस्कृति पर विदेशी हुकुमतों के बढ़ता वर्चस्व के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन करते रहे। दंतेवाड़ा जिले में मेरिया आदिवासी अपनी परंपरा के खिलाफ दंतेवाड़ा मंदिर में विदेशी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने विद्रोह कर दिया। हिड़मा मांझी के नेतृत्व में 1842 को हुआ यह विद्रोह छापामार शैली में था। मेरिया आदिवासी ब्रिटिश सैनिकों पर पत्थर फेंकते थे। इनके विद्रोह को कुचलने के लिए अतिरिक्त ब्रिटिश सैनिक बुलाए गए और अन्ततः ये आंदोलन भी ब्रिटिश सेना ने खत्म कर दिया। 

धुर्वाराव को फांसी 

बस्तर के चिंतलनार में 03 मार्च, 1856 ई. में अंग्रेजी सैनिकों और धुर्वाराव के सैनिकों के बीच संघर्ष हुआ। धुर्वाराव तालुकदार थे। इस विद्रोह में 05 मार्च 1856 ई. में उन्हें अंग्रेजों ने फांसी दे दी। धुर्वाराव को फांसी देने के बाद अंग्रेजों ने उनके तालुका को भोपालपट्टनम के जमीदार के हवाले कर दिया, क्योंकि इस जमीदार के अंग्रेजों से मिलने के कारण ही धुर्वाराव को युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था। जनजातीय इलाके में 1859 ई. में अंग्रेजी हुकुमत ने दक्षिण बस्तर क्षेत्र में जंगलों को काटने का ठेका हैदराबाद के एक व्यापारी को दे दिया था। 

जंगलों को काटने का प्रयास

जब ब्रिटिश ठेकेदार बस्तर पहुंचा और जंगलों को काटने का प्रयास करने लगा, तब बस्तर के जमीदारों ने इसका सामूहिक रूप से विरोध किया। ठेकेदार हरिदास भगवान दास के खिलाफ जनजातीय जमीदारों ने साल वृक्षों से चिपककर पेड़ बचाने का अभियान चलाया। इस विरोध का नेतृत्व जुग्गा, जुम्मा, राजू, दोरा और पामभोई आदि योद्धाओं ने किया। उन्होंने एक नारा ‘‘एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर‘‘ दिया। इस संघर्ष के कारण अंग्रेजी ठेकेदार को वहां से भागने के लिए विवश होना पड़ा। 

 मुंशी को पद छोड़ने के लिए किया विवश 

सन् 1876 ई. में ही बस्तर इलाके में अंग्रेजों के दमनकारी नीति के विरोध में मुरिया विद्रोह हुआ। यह दीवान गोपीनाथ और मुुंशी आदिल प्रसाद के खिलाफ किया गया। मुरिया आदिवासी बस्तर के राजा भैरमदेव को दिल्ली जाने से मना कर रहे थे। उन्होंने मरेंगा गांव में राजा का घेराव कर दिया, जिससे वे दिल्ली जाकर प्रिंस ऑफ वेल्स के सम्मान कार्यक्रम में शामिल न हो सके। मगर इस बीच राजा के मुंशी ने आदिवासियों पर गोली चलवा दी और कई आदिवासी मारे गए और कुछ गिरफ्तार कर लिए गए। मुरिया विद्रोह का नेतृत्व झाडा सिरहा ने किया। 02 मार्च, 1876 को विद्रोह तेज कर दिया गया और दीवान गोपीनाथ और मुंशी को पद छोड़ने के लिए विवश किया गया। 

बैजनाथ का विरोध

एक अन्य विद्रोह 1878 ई. में रानी चेरीस ने अपने पति भैरमदेव के गलत कार्यों को रोकने के लिए किया। इसके पीछे भी अंग्रेजी हुकुमत का षड़यंत्र था। इन सब आंदोलनों के साथ ही 1910 ई. में भूमकाल आंदोलन हुआ। भूमकाल अर्थात् भूमि का कंपन। 1910 में बस्तर में हुआ यह आंदोलन काफी बड़ा था। इस आंदोलन के नायक गुण्डाधूर थे। भूमकाल आंदोलन के कारण तत्कालीन राजा रूद्र प्रताप देव के चाचा कालेंन्द्र सिंह को दीवान पद से हटाकर पंडा बैजनाथ को बस्तर का प्रशासन सौंपा गया। बैजनाथ का विरोध आदिवासी कर रहे थे। उन्होंने जल, जंगल और जमीन के लिए शोषक वर्ग के खिलाफ जंग छोड़ दी।

10 फरवरी को मनाया जाता है भूमकाल दिवस 

1910 में हजारों की संख्या में लोग इंद्रावती नदी के तट पर एकत्रित हुए और नेतानार गांव के रहने वाले गुण्डाधूर को विद्रोह का नेता चुना। अंग्रेजों से वे संषर्घ में हजारों आदिवासियों ने इस युद्ध में भाग लिया और अनेक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस विद्रोह में मूरत सिंह बख्शी, बाला प्रसाद नाजिर, वीर सिंह बंदार और लाल कालिन्द्री सिंह के साथ विद्रोह किया गया, जिसमें विद्रोही मिर्ची और आम की डाली का उपयोग लोगों को संदेश देने के लिए करते थे। गुण्डाधूर ने अपने साथियों के साथ्ज्ञ ग्राम अलनार में अंग्रेजों से मुकाबला किया। मगर बाद में वे अंग्रेजों से घिर गए। उनकी याद में हर साल 10 फरवरी को भूमकाल दिवस मनाया जाता है। 

व्यापारी माखन का तोड़वा दिया था गोदाम 

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के जनजातीय शहीदों में वीरनारायण सिंह का नाम सर्वाधिक प्रेरणास्पद है। उनका जन्म 1795 में सोनाखान के जमीदार परिवार में हुआ था। इनके पिता रामसाय अंग्रेजों के खिलाफ संषर्घ में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। बिंझवार आदिवासी समुदाय के रामसाय के दबदबा समाज में काफी था। पिता की मृत्यु के बाद 1830 में वीरानारायण सिंह जमीदार बने। वे परोपकारी, न्यायप्रिय और कर्मठ थे। 1854 में जब अंग्रेजी ने किसानों से कर वसूली में वृद्धि की, तो वीरनारायण सिंह ने उनका विरोध किया। 1856 में जब छत्तीसगढ़ में लोग सूखे के कारण दाने-दाने तरसने लगे तब उन्होंने कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम तोड़वा दिया और वहां से अन्न लोगों को बांट दिया। 

वीरनारायण सिंह राज्य सम्मान स्थापित 

व्यापारी की शिकायत पर अंग्रेज अधिकारी इलियट ने उनके खिलाफ वारंट जारी कर दिया। 24 अक्टूबर 1856 को उन्हें संबलपुर से गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जेल में डाल दिया। 28 अगस्त, 1857 को वे अपने तीन साथियों के साथ जेल से छूटकर सोनाखान पहुंचे और 500 बंदूकधारियों की सेना बनाकर अंग्रेजो के खिलाफ संषर्घ किया। उन्हें कैदकर मुकदमा चलाया गया और 10 दिसंबर, 1857 को उन्हें रायपुर स्थित जयस्तंभ चौक में फांसी दे दी गई। इस आदिवासी योद्धा की स्मृति में राज्य सरकार ने वीरनारायण सिंह राज्य सम्मान स्थापित किया है और अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम भी उनके नाम पर है। 

आजादी के अमृत महोत्सव 

इन योद्धओं के अलावा भी जनजातीय क्षेत्रों में अनेक ऐसे योद्धा हुए हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में संघर्ष कर प्राणों की आहुति दी। आजादी के 75 साल के उपलक्ष्य में मनाए जा रहे आजादी के अमृत महोत्सव के तहत इन्हीं वीरसपूतों को स्मरण कर उनके कार्यों को याद करना और युवा पीढ़ी को उनके बलिदान से अवगत कराना जरूरी है। 

  (वरिष्‍ठ पत्रकार शगुफ्ता शिरीन रायपुर की कलम से। ये लेखक के अपने विचार हैं)

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