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राष्ट्रपति भवन के विशेष अतिथि बने बस्तर के मांझी-चालकी : बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं और जनजातीय प्रतिनिधियों का हुआ विशेष सम्मान

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बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है : राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मु

राष्ट्रपति भवन में पहली बार बस्तर की जनजातीय संस्कृति का ऐसा वैभव देखने को मिला : केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह

राष्ट्रपति ने स्वयं अतिथियों को भोजन परोसकर किया उनका सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जताई बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में शामिल होने की इच्छा

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में पहुँचा 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल, राष्ट्रपति को भेंट की 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' की अनुपम कलाकृति

रायपुर- बस्तर की लोकसंस्कृति, जनजातीय परंपराओं और सामाजिक नेतृत्व की गौरवशाली विरासत ने आज राष्ट्रपति भवन में इतिहास रच दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर पंडुम-2026 के विजेता प्रतिभागियों, परंपरागत जनजातीय नेतृत्व व्यवस्था के प्रतिनिधियों, पद्मश्री सम्मानित विभूतियों एवं विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों सहित 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का राष्ट्रपति भवन में आत्मीय स्वागत किया गया।


इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं, परगना मांझी, मांझी, चालकी तथा पद्मश्री सम्मानित विभूतियों के सम्मान में विशेष भोज का आयोजन किया। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में अत्यंत दुर्लभ और आत्मीय दृश्य तब देखने को मिला, जब राष्ट्रपति ने स्वयं सभी अतिथियों को भोजन परोसकर उनका सम्मान किया। राष्ट्रपति की इस सहज आत्मीयता ने पूरे प्रतिनिधिमंडल को भावविभोर कर दिया।

प्रतिनिधिमंडल में उप मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल, बस्तर के पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व के प्रतिनिधि, बस्तर पंडुम-2026 के विजेता कलाकार, पद्मश्री सम्मानित विभूतियाँ, जनप्रतिनिधि तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल रहे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से आत्मीय संवाद करते हुए बस्तर की जनजातीय संस्कृति, लोककला, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, मांझी-चालकी प्रणाली तथा बस्तर पंडुम के आयोजन के बारे में विस्तार से जानकारी ली। उन्होंने कलाकारों और जनजातीय प्रतिनिधियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत भारत की अमूल्य धरोहर है और उसका संरक्षण पूरे देश का दायित्व है।

राष्ट्रपति ने जताई बस्तर आने की इच्छा

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आग्रह पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भविष्य में बस्तर दशहरा एवं बस्तर पंडुम में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा उनके हृदय को विशेष रूप से स्पर्श करता है। राष्ट्रपति ने भगवान जगन्नाथ की काष्ठ निर्मित प्रतिमा तथा बस्तर दशहरा की अद्वितीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका बस्तर दशहरा से विशेष आत्मीय संबंध रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि मांझी उनके परिवार का हिस्सा हैं और उनके पिता भी मांझी थे। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की परंपरागत नेतृत्व व्यवस्था सामाजिक एकता, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक संरक्षण की सशक्त आधारशिला है।

बस्तर पंडुम ने संस्कृति को दिलाई नई पहचान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि बस्तर पंडुम  छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय परंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन ने बस्तर की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ पर्यटन, स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति प्रदान करते हैं। 

राष्ट्रपति मुर्मु ने विश्वास व्यक्त किया कि बस्तर के कलाकार, शिल्पकार और युवा अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

बस्तर विकास और शांति की नई पहचान बन रहा है

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि सरकार के सतत प्रयासों और स्थानीय जनभागीदारी के परिणामस्वरूप बस्तर आज शांति, विकास और समृद्धि की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने शिक्षा, सड़क, बिजली, पेयजल तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर में आया यह सकारात्मक परिवर्तन पूरे देश के लिए प्रसन्नता और गर्व का विषय है।उन्होंने मांझी एवं चालकी की भूमिका की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि वे समाज और प्रशासन के बीच प्रभावी सेतु के रूप में कार्य करते हुए सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

पहली बार राष्ट्रपति भवन में दिखा बस्तर का ऐसा वैभव - केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह

इस अवसर पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि वे अनेक अवसरों पर राष्ट्रपति भवन आए हैं, किंतु पहली बार उन्होंने राष्ट्रपति भवन में बस्तर की पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में इतने बड़े प्रतिनिधिमंडल को एक साथ देखा है। उन्होंने कहा कि यह दृश्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय गौरव का अद्भुत प्रतीक है।

मुख्यमंत्री बोले – यह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से बस्तर के प्रतिनिधिमंडल की यह आत्मीय भेंट पूरे छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर अंचल के लिए अत्यंत गौरव और सम्मान का विषय है। उन्होंने कहा कि आज बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराएँ और सांस्कृतिक विरासत देश के सर्वोच्च संवैधानिक मंच पर सम्मानित हुई हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर आज शांति, विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई है तथा स्थानीय कलाकारों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को नया मंच प्रदान किया है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का जनजातीय समाज और उसकी संस्कृति से गहरा आत्मीय जुड़ाव है। उनके अनुभव, स्नेह और मार्गदर्शन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को बस्तर आने का निमंत्रण देते हुए कहा कि उनके आगमन से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक पहचान मिलेगी तथा जनजातीय समाज का उत्साह और बढ़ेगा।

प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति भवन का भ्रमण भी किया तथा भारत की लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक विरासत से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों और महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत हुआ।

राष्ट्रपति को भेंट की गई बस्तर की 300 वर्ष पुरानी 'झिटकू-मिटकी' की अनुपम कलाकृति

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को बस्तर की लगभग 300 वर्ष पुरानी लोकगाथा 'झिटकू-मिटकी' पर आधारित विशेष कलाकृति स्मृति-चिह्न स्वरूप भेंट की। यह कलाकृति बस्तर की जनजातीय संस्कृति, प्रेम, समर्पण, लोकआस्था और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है।

लोकमान्यता के अनुसार कठिन अकाल के समय झिटकू और मिटकी ने अपने प्रेम, त्याग और समर्पण की ऐसी अमिट मिसाल प्रस्तुत की कि उन्हें देवतुल्य सम्मान प्राप्त हुआ। आज भी बस्तर अंचल में झिटकू को 'खोड़िया राजा' तथा मिटकी को 'गप्पा देई' के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, सचिव राहुल भगत, विशेष सचिव रजत बंसल, संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. एस. भारतीदासन, बस्तर संभाग के आयुक्त डोमन सिंह, संस्कृति एवं राजभाषा विभाग के संचालक संजय कन्नौजे सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सशक्त बनाने के लिए 'भुवनेश्वर घोषणा' को अपनाया गया

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जनजातीय कार्य मंत्रालय और ओडिशा सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) को सशक्त बनाने' पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन भुवनेश्वर घोषणा (Bhubaneswar Declaration) को अपनाने के साथ हुआ। यह घोषणा प्रधानमंत्री के 'विकसित भारत@2047' के विजन को साकार करने की दिशा में जनजातीय ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देने वाले मजबूत संस्थानों के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

कार्यशाला में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों, राज्य जनजातीय कल्याण विभागों, शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों, प्रौद्योगिकी संगठनों, उद्योग, विकास सहयोगी संस्थाओं तथा नागरिक समाज के लगभग 200 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें भारत के जनजातीय अनुसंधान तंत्र के भविष्य पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

पहले दिन की प्रमुख चर्चाएं

पहले दिन चार विषयगत समूह चर्चाएं और विशेषज्ञ पैनल आयोजित किए गए। इनमें निम्नलिखित विषयों पर विशेष जोर दिया गया—

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को ज्ञान एवं सांस्कृतिक संसाधन केंद्रों के रूप में विकसित करना।

  • जनजातीय भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण एवं डिजिटल संरक्षण।

  • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के लिए मजबूत जनजातीय डेटा प्रणाली, आधारभूत सर्वेक्षण और उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान को बढ़ावा देना।

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तथा नवाचार आधारित तकनीकों के माध्यम से अनुसंधान, योजना, सेवा वितरण और निगरानी को सशक्त बनाना।

  • संस्थागत सुधार, सुशासन, मानव संसाधन विकास और रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से TRIs को पेशेवर एवं टिकाऊ संस्थानों के रूप में विकसित करना।

दूसरे दिन राष्ट्रीय रोडमैप पर सहमति

दूसरे दिन सभी कार्य समूहों ने अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिन पर विशेषज्ञों एवं जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ विस्तृत चर्चा हुई। इन सिफारिशों के आधार पर जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार किया गया।

सचिव रंजना चोपड़ा का वक्तव्य

जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव  रंजना चोपड़ा ने कहा कि—

"जनजातीय अनुसंधान संस्थान जनजातीय समुदायों की आवाज़ हैं। उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान और समुदाय की वास्तविक आवश्यकताओं पर आधारित विश्वस्तरीय उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्हें अधिक संस्थागत और वित्तीय स्वायत्तता मिलनी चाहिए तथा राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों और अन्य ज्ञान संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए। भुवनेश्वर घोषणा जनजातीय विकास को नई गति देने वाली महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता है।"

उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सात TRIs सम्मानित

जनजातीय अनुसंधान, दस्तावेजीकरण, ज्ञान सृजन एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान के लिए सात जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को प्रशंसा प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए—

  • जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, छत्तीसगढ़

  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, ओडिशा

  • जनजातीय अनुसंधान एवं सांस्कृतिक संस्थान, त्रिपुरा

  • जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, महाराष्ट्र

  • किर्टाड्स (KIRTADS), केरल

  • जनजातीय सांस्कृतिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, तेलंगाना

  • डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण अनुसंधान संस्थान, झारखंड

भुवनेश्वर घोषणा के प्रमुख संकल्प

घोषणा में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर सहमति बनी—

  • TRIs को उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) के रूप में विकसित करना।

  • सामुदायिक आवश्यकताओं पर आधारित अनुसंधान को प्राथमिकता देना।

  • राष्ट्रीय TRI अनुसंधान एजेंडा (2027–2032) तैयार करना।

  • Model TRI Framework 2030 को लागू करना।

  • सभी TRIs के लिए परिणाम एवं रैंकिंग प्रणाली विकसित करना।

  • जनजातीय भाषाओं, संस्कृति, संगीत, पारंपरिक ज्ञान एवं कला का संरक्षण करना।

  • अनुसंधान गुणवत्ता, डेटा प्रबंधन और नैतिक मानकों को मजबूत करना।

  • AI, डेटा एनालिटिक्स और साझा तकनीकी अवसंरचना का उपयोग बढ़ाना।

  • विश्वविद्यालयों, उद्योग और तकनीकी संस्थानों के साथ रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा देना।

  • जनजातीय युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।

समापन

कार्यशाला के समापन पर भुवनेश्वर घोषणा को औपचारिक रूप से अपनाया गया। यह घोषणा जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को अनुसंधान, ज्ञान सृजन, सांस्कृतिक संरक्षण और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के उत्कृष्ट केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का मार्गदर्शक दस्तावेज़ होगी। इसका उद्देश्य भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत का संरक्षण करते हुए 'विकसित भारत@2047' के लक्ष्य को साकार करने में जनजातीय समुदायों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना है।

विशेष लेख-सीएम विष्णु देव साय बस्तर में देंगे राज्य की सबसे बड़े ‘हेरिटेज मैराथन’ की सौगात

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‘बस्तर दौड़ेगा, देश जुड़ेगा’ की थीम पर 22 मार्च को होगा राज्य का सबसे बड़ा स्पोर्ट्स इवेंट

फिटनेस और विरासत का उत्सव- बस्तर को ग्लोबल टूरिज्म मैप पर लाने की बड़ी तैयारी

बस्तर को देश का प्रमुख टूरिज्म और स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन बनाना हमारा संकल्प- साय

रायपुर- छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में खेल, पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन 2026’ का आयोजन रविवार 22 मार्च को करने जा रही है। यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा रनिंग इवेंट होगा, जिसकी शुरुआत जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान से होगी और समापन विश्वप्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात पर होगा। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस रूट पर दौड़ते हुए प्रतिभागियों को बस्तर की अद्भुत वादियों और सांस्कृतिक पहचान का अनूठा अनुभव मिलेगा।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस आयोजन को छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय बताते हुए कहा कि बस्तर हेरिटेज मैराथन केवल खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि राज्य की समृद्ध परंपरा, प्राकृतिक संपदा और जनभागीदारी का उत्सव है। उन्होंने कहा कि ‘बस्तर दौड़ेगा, देश जुड़ेगा’ के संदेश के साथ यह आयोजन न केवल फिटनेस को बढ़ावा देगा, बल्कि बस्तर को राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित करेगा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को अवसर देना, रोजगार सृजन को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय विकास को गति देना है।

मैराथन में 42 किलोमीटर (फुल मैराथन), 21 किलोमीटर (हाफ मैराथन), 10 किलोमीटर और 5 किलोमीटर (फन रन) की श्रेणियां रखी गई हैं, ताकि हर आयु वर्ग और फिटनेस स्तर के लोग इसमें भाग ले सकें। प्रतिभागियों के लिए कुल 25 लाख रुपये की आकर्षक पुरस्कार राशि निर्धारित की गई है। पंजीकरण शुल्क मात्र 299 रुपये रखा गया है, जबकि बस्तर संभाग के सातों जिलों के प्रतिभागियों के लिए यह पूरी तरह निःशुल्क है, जिससे स्थानीय स्तर पर अधिकतम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

प्रतिभागियों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मैराथन मार्ग पर व्यापक व्यवस्थाएं की गई हैं। पूरे रूट पर नियमित अंतराल पर रिफ्रेशमेंट पॉइंट्स (आरपीएन) स्थापित किए जाएंगे, जहां एनर्जी ड्रिंक्स और पानी की उपलब्धता रहेगी। इसके अलावा मेडिकल सपोर्ट, इमरजेंसी सेवाएं और सुव्यवस्थित रूट मैनेजमेंट भी सुनिश्चित किया गया है ताकि प्रतिभागियों को सुरक्षित और सुगम अनुभव मिल सके। इस आयोजन को और यादगार बनाने के लिए प्रत्येक प्रतिभागी को फिनिशर मेडल, ई-सर्टिफिकेट और प्रोफेशनल रनिंग फोटोग्राफ्स प्रदान किए जाएंगे। साथ ही जुम्बा सेशन और लाइव डीजे जैसे आकर्षक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे, जिससे प्रतिभागियों में उत्साह और ऊर्जा बनी रहे।

‘रन फॉर नेचर, रन फॉर कल्चर’ (प्रकृति के लिए दौड़ो, संस्कृति के लिए दौड़ो) की थीम पर आधारित यह मैराथन बस्तर की प्राकृतिक धरोहर और जनजातीय संस्कृति को देशभर के सामने प्रस्तुत करने का एक सशक्त माध्यम बनेगी। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने देशभर के खिलाड़ियों, फिटनेस प्रेमियों और पर्यटकों से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेने की अपील करते हुए कहा कि यह अवसर न केवल दौड़ने का है, बल्कि बस्तर को करीब से जानने और उसकी विरासत को महसूस करने का भी है। इच्छुक प्रतिभागी https://www.bastarheritage. run/registration लिंक के माध्यम से या आधिकारिक पोस्टर में दिए गए क्यूआर कोड को स्कैन कर अपना पंजीकरण करा सकते हैं। 

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह आयोजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘फिट इंडिया’, ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ और देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के विजन से प्रेरित है। प्रधानमंत्री ने हमेशा भारत की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने पर जोर दिया है। बस्तर हेरिटेज मैराथन उसी सोच को आगे बढ़ाने का एक प्रयास है, जहां खेल, संस्कृति और प्रकृति एक साथ जुड़ते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार बस्तर को देश के प्रमुख पर्यटन और स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह के आयोजनों से न केवल युवाओं में फिटनेस के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। बस्तर के कारीगरों, कलाकारों और छोटे-छोटे व्यवसायों को भी इसकाप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।

मुख्यमंत्री साय ने देशभर के खिलाड़ियों, फिटनेस प्रेमियों और पर्यटकों से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि वह देश के हर कोने से युवाओं और नागरिकों को आमंत्रित करते हैं कि वे बस्तर आएं, यहां की प्रकृति, संस्कृति और ऊर्जा को महसूस करें और इस ऐतिहासिक मैराथन का हिस्सा बनें।

नवा रायपुर में परम्परा से पहचान तक ‘आदि परब-2026’ का भव्य आयोजन

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राज्य के चिन्हांकित 43 जनजातियों और उपजातियों की संस्कृति, परिधान और चित्रकला का प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ सहित मध्यप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड के जनजातीय कलाकार होंगे शामिल,सजेगा आदि रंग, परिधान और हाट

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की परिकल्पना और निर्देश पर 13 और 14 मार्च 2026 को नवा रायपुर स्थित आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में ’परम्परा से पहचान तक’ - आदि परब - 2026 का भव्य आयोजन किया जाएगा। छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को राष्ट्रीय मंच देने के उद्देश्य से ‘आदि परब-2026’ का भव्य आयोजन किया जा रहा है। 


भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के सहयोग से आदिम जाति विकास विभाग के अंतर्गत आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। उक्त आशय की जानकारी आज टीआरटीआई में आयोजित पत्रकारवार्ता के दौरान आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा और प्रशिक्षण संस्थान के संचालक श्रीमती हिना अनिमेष नेताम ने दी।

आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा और आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के संचालक हिना अनिमेष नेताम ने प्रेसवार्ता में बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की परिकल्पना और निर्देश पर ‘आदि परब-2026’ का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन में विभाग इस आयोजन को सफल बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि दो दिवसीय इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की 43 जनजातियों के साथ-साथ मध्यप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड के जनजातीय समुदाय भी शामिल होंगे l आयोजन का उद्देश्य जनजातीय पहचान, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा पारंपरिक ज्ञान के संवर्धन को बढ़ावा देना है।

पहली बार एक मंच पर दिखेंगी 43 जनजातियों की वेशभूषाएँ

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत “आदि-परिधान जनजातीय अटायर शो” का आयोजन 13 मार्च को सुबह 10.30 बजे से शाम 8 बजे तक और 14 मार्च को शाम 4 बजे से रात 8 बजे तक किया जाएगा। इस आयोजन में राज्य की 43 जनजातीय समुदायों की पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक विशेषताओं को पहली बार एक ही मंच पर प्रदर्शित किया जाएगा। प्राकृतिक रंगों, स्थानीय संसाधनों और हाथों से बने वस्त्रों से तैयार ये परिधान जनजातीय जीवन शैली और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देंगे। इसमें भाग लेने के लिए 120 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीयन कराया है। 

‘आदि रंग’ में चित्रकला के माध्यम से जल-जंगल-जमीन का संदेश

प्रमुख सचिव बोरा ने प्रेसवार्ता में बताया कि आदि परब के तहत “आदि रंग - जनजातीय चित्रकला महोत्सव” भी आयोजित होगा। इस महोत्सव में जनजातीय कलाकार अपनी पारंपरिक चित्रकला के माध्यम से जल, जंगल और जमीन के संरक्षण, जनजातीय जीवन दर्शन और पर्यावरणीय चुनौतियों को प्रस्तुत करेंगे। इस कार्यक्रम में 155 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीयन कराया है। चित्रकला प्रतियोगिता 18-30 वर्ष और 30 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की दो श्रेणियों में होगी।

दोनों श्रेणी में प्रथम पुरस्कार 20 हजार रुपये, द्वितीय पुरस्कार 15 हजार रुपये और तृतीय पुरस्कार 10 हजार रुपये दिए जाएंगे। साथ ही दोनों आयु वर्गों के 10-10 प्रतिभागियों को 2000 रुपये का सांत्वना पुरस्कार भी दिया जाएगा।

आदि-हाट में मिलेगा जनजातीय हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि आयोजन के दौरान “आदि-हाट जनजातीय शिल्प मेला” भी लगाया जाएगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के जनजातीय हस्तशिल्प, वनोपज और पारंपरिक उत्पादों का प्रदर्शन और विक्रय किया जाएगा। यहां 14 समूहों द्वारा हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों के स्टॉल लगाए जाएंगे, जहां आगंतुक प्रदेश के पारंपरिक स्वाद का आनंद ले सकेंगे।

यूपीएससी में चयनित जनजातीय युवाओं का होगा सम्मान

प्रमुख सचिव बोरा ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा 2025 में छत्तीसगढ़ से आदिम जाति विकास विभाग की योजनाओं के सहयोग से चयनित अनुसूचित जनजाति वर्ग के अभ्यर्थी डायमंड सिंह ध्रुव औरअंकित साकनी का सम्मान किया जाएगा। साथ ही इस मौके पर ‘प्रयास’ संस्थान के विद्यार्थियों को विभागीय योजनाओं के तहत लैपटॉप भी वितरित किए जाएंगे।

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 9वां अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन में शिरकत की

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दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल, 7 मार्च 2026 – भारत की राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मू  ने आज दार्जिलिंग में आयोजित 9वें अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन में शिरकत की।

राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि संताल समुदाय के लिए यह गर्व की बात है कि हमारे पूर्वज तिलका मांझी ने लगभग 240 साल पहले शोषण के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाया। उनके विद्रोह के लगभग 60 साल बाद, बहादुर भाइयों सिडो-कन्हू और चंद-भैरव, साथ ही बहादुर बहनों फूलो-झानो ने 1855 में संताल हुल का नेतृत्व किया।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2003 संताल समुदाय के इतिहास में सदैव याद किया जाएगा, क्योंकि उसी वर्ष संताल भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। पिछले वर्ष, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर संताल भाषा में लिखित संविधान, ओल चिकी लिपि में जारी किया गया।

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया। हाल ही में इस आविष्कार की शताब्दी समारोह के रूप में मनाई गई। उनके योगदान ने संताल भाषियों को अभिव्यक्ति के नए अवसर प्रदान किए। उन्होंने कई नाटकों की रचना की, जैसे “बिदु चंदन”, “खेड़वाल वीर”, “डालेगे धन” और “सिडो-कन्हू - संताल हुल”, जिनके माध्यम से उन्होंने संताल समुदाय में साहित्य और सामाजिक चेतना का प्रकाश फैलाया। राष्ट्रपति ने कहा कि संताल समुदाय के सदस्य अन्य भाषाओं और लिपियों का अध्ययन करें, लेकिन अपनी भाषा से जुड़े रहें।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों ने सदियों से अपनी लोक-संगीत, नृत्य और परंपराओं को संरक्षित किया है। उन्होंने प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशीलता को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक संरक्षण का पाठ भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि लोक परंपराओं और पर्यावरण को संरक्षित करने के साथ-साथ हमारे जनजातीय समुदायों को आधुनिक विकास को अपनाते हुए प्रगति की यात्रा पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संताल समुदाय सहित जनजातीय समुदाय प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्तमान समय की आवश्यकता शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित करना है। जनजातीय युवा शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आगे बढ़ें। लेकिन इन प्रयासों में वे अपनी जड़ों को नहीं भूलें। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति का संरक्षण, शिक्षा को प्राथमिकता देने और समाज में एकता और भाईचारे को बनाए रखने का संकल्प करना चाहिए। यह हमें सशक्त समाज और मजबूत भारत बनाने में मदद करेगा।

बस्तर पंडुम उत्सव पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी छत्तीसगढ़वासियों को बधाई

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रायपुर- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ में 7 से 9 फरवरी तक आयोजित हुए “बस्तर पंडुम” उत्सव के लिए प्रदेशवासियों को बधाई दी है। इस विशेष आयोजन में बस्तर की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और जनजातीय विरासत को भव्य रूप से प्रदर्शित किया गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन हमारी विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने इस प्रयास से जुड़े सभी लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले बस्तर का नाम सुनते ही माओवाद, हिंसा और विकास में पिछड़ेपन की तस्वीर सामने आती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आज बस्तर विकास के साथ-साथ स्थानीय लोगों के बढ़ते आत्मविश्वास के लिए जाना जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि उनकी यही कामना है कि बस्तर का भविष्य शांति, प्रगति और सांस्कृतिक गौरव की भावना से भरा हो।




गढ़बेंगाल घोटुल में गूंजी मांदर की थाप, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बस्तर की लोक-संस्कृति और स्थापत्य कला की सराहना की

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रायपुर-  मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने दो दिवसीय नारायणपुर प्रवास के दौरान आज ‘गढ़बेंगाल घोटुल‘ पहुंचकर बस्तर की गौरवशाली परंपराओं और लोक-संस्कृति के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की। इस मौके पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि और ग्रामीणों के आत्मीय स्वागत के बीच मुख्यमंत्री साय स्वयं लोक-रंग में रंगे नजर आए। 

मुख्यमंत्री साय ने घोटुल की अनूठी स्थापत्य कला का अवलोकन किया और बस्तर की विभूतियों से मुलाकात कर उनका उत्साहवर्धन किया। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि घोटुल प्राचीन काल से ही आदिवासी समाज के लिए शैक्षणिक एवं संस्कार केंद्र रहा है। चेंद्रु पार्क के समीप स्थित यह आधुनिक घोटुल न केवल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ेगा, बल्कि देश-दुनिया के पर्यटकों को भी आदिवासी जीवनशैली और सामाजिक व्यवस्था से परिचित कराने का सशक्त माध्यम बनेगा। गढ़बेंगाल का यह घोटुल हमारी गौरवशाली विरासत को सहेजने का प्रतीक है। हमारी सरकार बस्तर की इस अनूठी संस्कृति, परंपरा और ज्ञान को संरक्षित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

मुख्यमंत्री साय ने घोटुल परिसर के लेय्योर एवं लेयोस्क कुरमा: युवाओं और युवतियों के लिए निर्मित कक्षों के साथ ही बिडार कुरमा: पारंपरिक वेशभूषा, प्राचीन वाद्ययंत्र एवं सांस्कृतिक सामग्रियों का संग्रह का निरीक्षण किया। इस दौरान ग्रामीणों की आग्रह पर मुख्यमंत्री साय ने सगा कुरमा में बस्तर के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेकर क्षेत्र की खान-पान संस्कृति का सम्मान किया। इस दौरान मुख्यमंत्री के भोजन में विशेष रूप से भोजन गाटो-भात, कोदो-भात, उड़िद दार, हिरुवा दार, जीरा भाजी, कनकी पेज, भाजी घिरोल फुल, चाटी भाजी, कांदा भाजी, मुनगा भाजी, इमली आमट, मड़िया पेज, टमाटर चटनी, चिला रोटी, रागी कुरमा, रागी केक, रागी लट्टू, रागी जलेबी परोसा गया। 

इस दौरान वन मंत्री केदार कश्यप, राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा, छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष रूपसाय सलाम, जिला पंचायत अध्यक्ष नारायण मरकाम, पद्मश्री पंडीराम मंडावी, लोककलाकार बुटलू राम, वरिष्ठ जनप्रतिनिधि संध्या पवार ने साथ बैठकर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लिया।

बस्तर की विभूतियों से आत्मीय भेंट

मुख्यमंत्री ने इस प्रवास को केवल एक औपचारिक दौरा न रखते हुए इसे एक आत्मीय मिलन का रूप दिया। क्षेत्र की महान प्रतिभाओं - वैद्यराज पद्मश्री हेमचंद मांझी, पद्मश्री पंडीराम मंडावी और सुप्रसिद्ध लोक-कलाकार बुटलू राम से भेंट कर उनका सम्मान किया। उन्होंने टाइगर ब्वॉय चेंदरू के परिवारजनो से भी मुलाकात की। 

इको-फ्रेंडली घोटुल:

वन विभाग और पद्मश्री पंडीराम मंडावी के मार्गदर्शन में निर्मित यह घोटुल पूर्णतः इको-फ्रेंडली (लकड़ी, मिट्टी और बांस) सामग्री से बना है। मुख्यमंत्री ने घोटुल के खंभों पर की गई बारीक नक्काशी की मुक्तकंठ से प्रशंसा की, जिसे स्वयं पद्मश्री पंडीराम मंडावी ने उकेरा है। जिसमें नक्काशी, सांस्कृतिक जुड़ाव, विरासत का संरक्षण का प्रभावी प्रयास किया गया है।


मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बस्तर की कला, संस्कृति और परंपराओं को समर्पित बस्तर पंडुम 2026 के लोगो एवं थीम गीत का विमोचन

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बस्तर पंडुम हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोकपरंपराओं, कला और विरासत का जीवंत मंच - मुख्यमंत्री साय

बस्तर पंडुम 2026 बनेगा विश्व–स्तरीय सांस्कृतिक आयोजन

रायपुर- बस्तर अंचल की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, कला, लोकपरंपराओं और विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से ‘बस्तर पंडुम’ का आयोजन वर्ष 2026 में भी गत वर्ष की भांति भव्य एवं आकर्षक रूप में किया जाएगा। 

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दंतेवाड़ा में माँ दंतेश्वरी के आशीर्वाद के साथ मंदिर प्रांगण में बस्तर पंडुम का लोगो एवं थीम गीत का विमोचन किया। 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री साय ने नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि बस्तर पंडुम बस्तर की  सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने का  सशक्त मंच है। उन्होंने कहा कि आज माँ दंतेश्वरी के इस पावन प्रांगण से बस्तर पंडुम 2026 का शुभारंभ हो रहा है। यहाँ बस्तर पंडुम 2026 का लोगो और थीम गीत का विमोचन किया गया है। बस्तर पंडुम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा है। यह हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोकपरंपराओं, कला और विरासत का जीवंत मंच है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की असली पहचान हमारी आदिवासी परंपराओं में है। हम नृत्य, गीत, शिल्प, व्यंजन, वन-औषधि और देवगुडि़यों के माध्यम से इन परंपराओं और संस्कृति को जीते हैं। पिछले वर्ष हमने बस्तर पंडुम की शुरुआत की थी। समापन अवसर पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी हम सबके बीच आए थे। इस वर्ष हम राष्ट्रपति , केंद्रीय गृहमंत्री, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री तथा भारत में नियुक्त विभिन्न देशों के राजदूतों को भी आमंत्रित कर रहे हैं। पिछली बार बस्तर पंडुम को लेकर बस्तरवासियों का जो उत्साह और जोश देखने को मिला, वह अभूतपूर्व था। इस बार हम इसे और अधिक भव्य बना रहे हैं, ताकि यहाँ की धरोहर राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सके।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष बस्तर पंडुम की प्रतिस्पर्धाओं में विधाओं की संख्या सात से बढ़ाकर बारह कर दी गई है। इनमें जनजातीय नृत्य, गीत, नाट्य, वाद्ययंत्र, वेशभूषा, आभूषण, पूजा-पद्धति के साथ ही शिल्प, चित्रकला, पारंपरिक व्यंजन-पेय, आंचलिक साहित्य और वन-औषधि को भी शामिल किया गया है। इस बार बस्तर पंडुम प्रतियोगिता का आयोजन तीन चरणों में किया जाएगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि हमारी सरकार का संकल्प है कि बस्तर की संस्कृति को सहेजते हुए नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। बस्तर अब केवल संस्कृति का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि शांति, समृद्धि और पर्यटन के माध्यम से विकास का भी प्रतीक बनेगा।  उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार बस्तर को नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है। यह उत्सव बताता है कि बस्तर अब संघर्ष से नहीं, बल्कि सृजन और उत्सव से पहचाना जाएगा।

उन्होंने बस्तरवासियों एवं सभी कलाकार भाई-बहनों से आग्रह किया कि वे अपनी कला के माध्यम से बस्तर का गौरव बढ़ाएँ और अधिक से अधिक संख्या में बस्तर पंडुम के अंतर्गत आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लें। 

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि ‘पंडुम’ का अर्थ पर्व होता है। बस्तर में खुशियों को बढ़ाने के लिए समय-समय पर विभिन्न पर्व (पंडुम) मनाए जाते हैं। किसी भी पर्व की शुरुआत माता के आशीर्वाद से करने की परंपरा रही है। इसी तारतम्य में बस्तर पंडुम की शुरुआत माँ दंतेश्वरी के मंदिर परिसर से की जा रही है। बस्तर समृद्ध संस्कृति से परिपूर्ण है। यहाँ निवास करने वाली जनजातियों की कला, शिल्प, नृत्य, संगीत और खानपान को समाहित कर बस्तर पंडुम 2026 का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि  बस्तर में शांति स्थापना के प्रयास सफल हो रहे हैं। मार्च 2026 तक लाल आतंक समाप्त होकर रहेगा।

वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर की कला, संस्कृति और परंपरा गर्व का विषय है। इस समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का प्रयास बस्तर पंडुम के माध्यम से किया जा रहा है। पौराणिक काल में भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान दंडकारण्य क्षेत्र में समय व्यतीत किया था। ऐसे पावन क्षेत्र में सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने की पहल सरकार ने की है। 

संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध बस्तर क्षेत्र की विभिन्न विधाओं को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए सरकार लगातार दूसरे वर्ष बस्तर पंडुम का आयोजन कर रही है। इस वर्ष बारह विधाओं में प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री साय ने मंदिर प्रांगण में ही संभाग के वरिष्ठ मांझी, चालकी, गायता, पुजारी, आदिवासी समाज के प्रमुखजनों तथा पद्म सम्मान से अलंकृत कलाकारों के साथ संवाद किया। कार्यक्रम को बस्तर सांसद महेश कश्यप एवं दंतेवाड़ा विधायक चैतराम आटमी ने भी संबोधित किया। इस दौरान बस्तर के पारंपरिक नेतृत्वकर्ता मांझियों और समाज प्रमुखों ने भी बस्तर पंडुम के आयोजन के लिए सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया।

उल्लेखनीय है कि बस्तर पंडुम 2026 का आयोजन 10 जनवरी 2026 से 5 फरवरी 2026 तक तीन चरणों में प्रस्तावित है। इसके अंतर्गत बस्तर संभाग में 10 से 20 जनवरी तक जनपद स्तरीय कार्यक्रम, 24 से 29 जनवरी तक जिला स्तरीय कार्यक्रम तथा 2 से 6 फरवरी तक संभाग स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।  जिन विधाओं में प्रदर्शन एवं प्रतियोगिताएँ होंगी, उनमें बस्तर जनजातीय नृत्य, गीत, नाट्य, वाद्ययंत्र, वेशभूषा एवं आभूषण, पूजा-पद्धति, शिल्प, चित्रकला, जनजातीय पेय पदार्थ, पारंपरिक व्यंजन, आंचलिक साहित्य तथा वन-औषधि प्रमुख हैं।इस बार के बस्तर पंडुम में विशेष रूप से भारत में विभिन्न देशों में कार्यरत भारतीय राजदूतों को आमंत्रित किए जाने पर भी चर्चा हुई, ताकि उन्हें बस्तर की अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर, परंपराओं और जनजातीय जीवन से अवगत कराया जा सके। साथ ही बस्तर संभाग के निवासी उच्च पदस्थ अधिकारी, यूपीएससी एवं सीजीपीएससी में चयनित अधिकारी, चिकित्सक, अभियंता, वरिष्ठ जनप्रतिनिधि तथा देश के विभिन्न राज्यों के जनजातीय नृत्य दलों को आमंत्रित करने का भी निर्णय लिया गया है।

प्रतिभागियों के पंजीयन की व्यवस्था इस बार ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से करने का प्रस्ताव है, जिससे अधिकाधिक कलाकारों एवं समूहों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल की कला, शिल्प, त्योहार, खानपान, बोली-भाषा, आभूषण, पारंपरिक वाद्ययंत्र, नृत्य-गीत, नाट्य, आंचलिक साहित्य, वन-औषधि और देवगुडि़यों के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

इसके तहत बस्तर संभाग के सात जिलों की 1,885 ग्राम पंचायतों, 32 जनपद पंचायतों, 8 नगरपालिकाओं, 12 नगर पंचायतों और 1 नगर निगम क्षेत्र में तीन चरणों में आयोजन होगा। इस आयोजन के लिए संस्कृति एवं राजभाषा विभाग को नोडल विभाग के रूप में नामित किया गया है।

इस अवसर पर सांसद महेश कश्यप, दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी, बस्तर आईजी सुंदरराज पी., संस्कृति विभाग के सचिव रोहित यादव, डीआईजी कमलोचन कश्यप, कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव, पुलिस अधीक्षक गौरव राय सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने नागालैंड के हॉर्नबिल फेस्टिवल की सांस्कृतिक समृद्धि और आदिवासी विरासत का सम्मान किया

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नागालैंड के हॉर्नबिल फेस्टिवल की जीवंत ऊर्जा की सराहना की और इसे भारत की सांस्कृतिक समृद्धि और आदिवासी विरासत की स्थायी जीवंतता का सशक्त प्रतीक बताया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज उत्तरी पूर्व भारत नए, आत्मविश्वासी भारत का चेहरा प्रस्तुत करता है। नागालैंड की अनूठी सांस्कृतिक पहचान की प्रशंसा करते हुए मोदी ने कहा कि यह राज्य केवल त्योहारों का आयोजन नहीं करता, बल्कि स्वयं त्योहार का प्रतीक है, और इसलिए इसे “लैंड ऑफ फेस्टिवल्स” का गौरवपूर्ण खिताब प्राप्त है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया द्वारा X (पूर्व में ट्विटर) पर साझा की गई पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी और कहा:

“इस प्रेरक आलेख में, केंद्रीय मंत्री @JM_Scindia ने नागालैंड के हॉर्नबिल फेस्टिवल को मानव आत्मा का कैलेडोस्कोप और प्राचीन और आधुनिक का सशक्त संगम बताया है। उन्होंने दोहराया कि हमारा देश तभी आगे बढ़ेगा जब उत्तर-पूर्व चमकेगा।

उत्तर-पूर्व को नए, आत्मविश्वासी भारत का चेहरा बताते हुए मंत्री ने कहा कि नागालैंड केवल उत्सव मनाता ही नहीं है, बल्कि स्वयं उत्सव का प्रतीक है, और यही कारण है कि इसे “लैंड ऑफ फेस्टिवल्स” कहा जाता है।”

आंध्र प्रदेश में राष्ट्रीय ईएमआरएस सांस्कृतिक एवं साहित्यिक महोत्सव ‘उद्भव 2025’ सफलतापूर्वक संपन्न

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राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति छात्र शिक्षा समिति (NESTS), जनजातीय कार्य मंत्रालय ने, 3 से 5 दिसंबर 2025 तक आयोजित 6वीं राष्ट्रीय ईएमआरएस सांस्कृतिक एवं साहित्यिक महोत्सव तथा कला उत्सव – उद्भव 2025 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले के वड्देस्वरम स्थित केएल विश्वविद्यालय में सफलतापूर्वक संपन्न किया। यह महोत्सव NESTS द्वारा आयोजित और आंध्र प्रदेश जनजातीय कल्याण आवासीय शैक्षणिक संस्थान समिति (APTWREIS–Gurukulam) द्वारा मेज़बानी किया गया, जिसमें केएल विश्वविद्यालय का व्यापक संस्थागत सहयोग मिला।

समापन समारोह में आंध्र प्रदेश सरकार की माननीय जनजातीय कल्याण तथा महिला एवं बाल कल्याण मंत्री जी. संध्या रानी; माननीय सामाजिक कल्याण, दिव्यांग एवं वरिष्ठ नागरिक कल्याण, सचिवालय एवं गांव वॉलंटियर विभाग के मंत्री डॉ. डी. एस. स्वामी; तथा आंध्र प्रदेश के पर्यटन, संस्कृति, सिनेमाटोग्राफी एवं गुंटूर जिले के प्रभारी मंत्री कंदुला दुर्गेश उपस्थित रहे। आंध्र प्रदेश सरकार के सामाजिक कल्याण एवं जनजातीय कल्याण विभाग के सचिव एम. एम. नायक भी समारोह में उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई और प्रतिभागियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।

अपने संबोधन में माननीय अतिथियों ने जनजातीय छात्रों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों की जनजातीय शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उद्भव जैसे मंच न केवल भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत को प्रदर्शित करते हैं, बल्कि जनजातीय युवाओं में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा का अनुभव विकसित करते हैं।

महोत्सव का संचालन NESTS के कमिश्नर अजीत कुमार श्रीवास्तव (IRAS) तथा आंध्र प्रदेश के सामाजिक एवं जनजातीय कल्याण विभाग के सचिव एम. एम. नायक (IAS) के मार्गदर्शन में हुआ। आयोजन सचिव एम. गौथमी (IAS), सचिव APTWREIS (गुरुकुलम), ने अपनी टीमों और दोनों संस्थानों के अधिकारियों के साथ मिलकर कार्यक्रम की सुचारू रूप से व्यवस्था सुनिश्चित की।

कुल 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 1,558 छात्र–छात्राओं ने महोत्सव में भाग लिया, जिनमें 524 पुरुष और 1,024 महिला प्रतिभागी शामिल थे। इनके साथ 45 टीम लीडर, 178 एस्कॉर्ट, 22 कंटिंजेंट मैनेजर, 22 लायज़न अधिकारी, 10 अधिकारी, 19 NESTS अधिकारी एवं कर्मचारी, 137 उप-समिति सदस्य, 48 जूरी सदस्य और 60 राज्य अधिकारी/ APTWREIS अधिकारी भी जुड़े। तीन दिनों तक 49 सांस्कृतिक, साहित्यिक, रचनात्मक और प्रदर्शन कलाओं से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए—पहले दिन 18, दूसरे दिन 22 और तीसरे दिन 9—जिनमें भारत की विविध जनजातीय समुदायों की प्रतिभा, सांस्कृतिक गहराई और कलात्मक अभिव्यक्ति देखने को मिली।

समापन समारोह में विभिन्न प्रतियोगिताओं के परिणाम घोषित किए गए। कुल पदक तालिका में तेलंगाना प्रथम स्थान पर रहा, जिसके बाद झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश का स्थान रहा। कुल 105 प्रथम पुरस्कार, 105 द्वितीय पुरस्कार और 105 तृतीय पुरस्कार प्रदान किए गए, साथ ही सर्वश्रेष्ठ राज्य चैम्पियनशिप का पुरस्कार भी दिया गया। सभी प्रतिभागियों को उनके उत्साह और सहभागिता के सम्मान में प्रमाणपत्र प्रदान किए जाएंगे।

उद्भव 2025 के 12 चयनित वर्गों के विजेता अब यशदा, पुणे में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय कला उत्सव में ईएमआरएस का प्रतिनिधित्व करेंगे, जिसमें देशभर से टीमें भाग लेंगी। जनजातीय हस्तशिल्प, दृश्य कलाएँ, पारंपरिक प्रस्तुतियाँ और स्वदेशी रचनात्मक अभिव्यक्तियों ने इस महोत्सव में विशेष आकर्षण जोड़ा, जो जनजातीय समाज की सांस्कृतिक समृद्धि और कलात्मक परंपराओं को दर्शाता है।

उद्भव 2025 ने माननीय प्रधानमंत्री के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के दृष्टिकोण को साकार करते हुए जनजातीय छात्रों को राष्ट्रीय मंच, आत्मविश्वास और अपनी सांस्कृतिक पहचान का उत्सव मनाने का अवसर प्रदान किया। इस महोत्सव ने ईएमआरएस की परिवर्तनकारी भूमिका को भी रेखांकित किया, जो विकासात्मक अंतर को पाटने, शैक्षणिक और सांस्कृतिक क्षमताओं को मजबूत करने तथा जनजातीय युवाओं में नेतृत्व गुणों को विकसित करने में महत्वपूर्ण है।

छठे संस्करण की सफल पूर्णता के साथ, NESTS ने देशभर के जनजातीय छात्रों के लिए समग्र शिक्षा, सांस्कृतिक सशक्तिकरण और रचनात्मक अवसरों को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। संगठन स्वदेशी प्रतिभा को पहचान देने और सांस्कृतिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों में उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने वाले मंचों के विस्तार के लिए समर्पित है।


GI-टैग्ड जनजातीय कला को नई उड़ान: NESTS ने तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और प्रदर्शनी का शुभारंभ किया

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नेशनल एजुकेशन सोसाइटी फॉर ट्राइबल स्टूडेंट्स (NESTS), जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा तीन दिवसीय “GI Tagged Tribal Art Workshop & Exhibition – Cultural Extravaganza” का आज नई दिल्ली में शुभारंभ किया गया। 24–26 नवंबर 2025 तक आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (EMRS) के 139 चयनित विद्यार्थी, 34 कला एवं संगीत शिक्षक, तथा 10 मास्टर आर्टिसन शामिल हो रहे हैं। इस आयोजन का उद्देश्य भारत की GI-टैग्ड जनजातीय कला परंपराओं को संरक्षित, संवर्धित और बढ़ावा देना है।

उद्घाटन समारोह

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इसके पश्चात् स्वागत भाषण श्री विपिन कुमार, संयुक्त आयुक्त (प्रशासन), NESTS ने दिया।
प्रो. अनिल कुमार, प्रमुख, जनपद संपदा, IGNCA ने विशिष्ट संबोधन दिया, जिसमें उन्होंने जनजातीय कला रूपों के गहरे सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत महत्व पर प्रकाश डाला।

इसके बाद

  • बिपिन रतूड़ी, संयुक्त आयुक्त (सिविल), NESTS,

  •  प्रशांत मीणा, अतिरिक्त आयुक्त, NESTS,का संबोधन हुआ।

मुख्य उद्घाटन भाषण अजीत कुमार श्रीवास्तव, आयुक्त, NESTS द्वारा दिया गया, जिन्होंने औपचारिक रूप से कार्यशाला को उद्घाटित किया।
अंत में डॉ. रश्मि चौधरी, सहायक आयुक्त (शैक्षणिक), NESTS ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

EMRS छात्रों द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ

उद्घाटन सत्र में EMRS विद्यार्थियों ने विभिन्न राज्यों की समृद्ध जनजातीय कला और संस्कृति को प्रदर्शित करते हुए शानदार प्रस्तुतियाँ दीं, जिनमें शामिल थीं:

  • धीम्सा नृत्य (ओडिशा)

  • जौनसारी नृत्य (उत्तराखंड)

  • मिज़ो फोक डांस (मिज़ोरम)

  • फोक वोकल सोलो (दादरा एवं नगर हवेली)

  • देशभक्ति गीत (मध्य प्रदेश)

इन प्रस्तुतियों ने “एक भारत श्रेष्ठ भारत” की भावना को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।

GI-टैग्ड कला रूपों में प्रशिक्षण

प्रसिद्ध GI विशेषज्ञ श्वेता मेनन (Truly Tribal) ने GI-टैग्ड कला के महत्व पर लाइव सत्र लेकर विद्यार्थियों को अवगत कराया। तीन दिवसीय कार्यशाला में विद्यार्थियों को निम्न पारंपरिक GI-मान्यता प्राप्त कला रूपों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है:

  • गोंड

  • वारली

  • मधुबनी

  • पिथोरा

  • चेरियल

  • रोगन

  • कलमकारी

  • पिछवाई

  • ऐपन

  • रंगवाली पिचौरा

  • कांगड़ा

  • बासौली

  • मैसूर पेंटिंग

  • बस्तर ढोकड़ा

  • कच्छी कढ़ाई

इन कला रूपों का प्रशिक्षण मास्टर आर्टिसन के मार्गदर्शन में दिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के अनुरूप पहल

यह पहल माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण—कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा और सांस्कृतिक धरोहर को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने—से प्रेरित है।
इसके माध्यम से EMRS विद्यार्थी पारंपरिक कला में दक्ष होकर युवा जनजातीय कलाकार-उद्यमी के रूप में उभर सकते हैं, जिससे सांस्कृतिक गौरव और आजीविका के नए अवसर दोनों को बढ़ावा मिलता है।

जनजातीय बच्चों का सर्वांगीण सशक्तिकरण

EMRS विद्यालय केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक मुख्यधारा से जुड़ाव को भी मजबूत करते हैं। आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक कौशल की यह संयुक्त पहल जनजातीय युवाओं में अवसर, सम्मान और विकास की नई धारा स्थापित करती है।

जन सहभागिता

कार्यक्रम में

  • GI-टैग्ड छात्र कला प्रदर्शनी,

  • कला बिक्री,

  • और लाइव आर्ट वर्कशॉप
    का आयोजन किया जा रहा है।

यह प्रदर्शनी 24–26 नवंबर 2025 के दौरान प्रतिदिन सुबह 09:30 बजे से शाम 04:00 बजे तक आम जनता के लिए खुली है।
कला प्रेमियों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और नागरिकों को भारतीय जनजातीय कला को देखने और समर्थन करने के लिए आमंत्रित किया गया है।


राष्ट्रपति ने अंबिकापुर, छत्तीसगढ़ में 'जनजातीय गौरव दिवस' समारोह में गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई

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रायपुर-राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर, सरगुजा में आयोजित 'जनजातीय गौरव दिवस' समारोह में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।

इस अवसर पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों का योगदान भारत के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय है, जो लोकतंत्र की जननी है। इसके उदाहरण प्राचीन गणराज्यों के साथ-साथ कई जनजातीय परंपराओं में भी देखे जा सकते हैं, जैसे कि बस्तर में 'मुरिया दरबार' – जो आदिम लोगों की संसद है।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय विरासत की जड़ें छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में गहरी हैं। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि इस वर्ष छत्तीसगढ़ सरकार ने 1 नवंबर से 15 नवंबर तक जनजातीय गौरव पखवाड़े को बड़े स्तर पर मनाया।

राष्ट्रपति ने रेखांकित किया कि पिछले एक दशक में, जनजातीय समुदायों के विकास और कल्याण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजनाएँ विकसित और कार्यान्वित की गई हैं। पिछले वर्ष, गांधी जयंती के अवसर पर ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ शुरू किया गया था। इस अभियान का लाभ देश भर के 5 करोड़ से अधिक जनजातीय भाई-बहनों तक पहुँचेगा। वर्ष 2023 में, 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान (पीएम-जनमन अभियान) शुरू किया गया। ये सभी योजनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार जनजातीय समुदायों को कितनी प्राथमिकता देती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों के विकास प्रयासों को नई ऊर्जा देने के लिए, भारत सरकार ने भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के वर्ष के दौरान ‘आदि कर्मयोगी अभियान’ शुरू किया है। उन्होंने उल्लेख किया कि इस अभियान के तहत देश भर में लगभग 20 लाख स्वयंसेवकों का एक नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये स्वयंसेवक जमीनी स्तर पर काम करके जनजातीय समुदायों का विकास सुनिश्चित करेंगे।

राष्ट्रपति ने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि छत्तीसगढ़ सहित देश भर में लोग वामपंथी उग्रवाद का रास्ता छोड़कर विकास की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के सुविचारित और सुसंगठित प्रयासों से निकट भविष्य में वामपंथी उग्रवाद का उन्मूलन संभव हो पाएगा। उन्होंने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि हाल ही में आयोजित 'बस्तर ओलंपिक्स' में 1,65,000 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जनजातीय महापुरुषों के आदर्शों का पालन करते हुए, छत्तीसगढ़ के लोग एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में अमूल्य योगदान देंगे।


जनजातीय गौरव दिवस पर राष्ट्रपति मुर्मु का संबोधन: जनजातीय विरासत और विकास को नई दिशा

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भारत की राष्ट्रपति,द्रौपदी मुर्मु ने आज (20 नवंबर, 2025) छत्तीसगढ़ के सरगुजा, अंबिकापुर में, छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आयोजित जनजातीय गौरव दिवस समारोह में शामिल होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि भारत, जो लोकतंत्र की जननी है, उसके इतिहास में जनजातीय समुदायों का योगदान एक गौरवमयी अध्याय है। इसके उदाहरण प्राचीन गणराज्यों में और असंख्य जनजातीय परंपराओं में दिखते हैं, जैसे कि बस्तर का ‘मुरिया दरबार’—जो कि आदिम जनजातीय जन-सभा के रूप में जाना जाता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय विरासत की गहरी जड़ें देश के विभिन्न हिस्सों—छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड—में विद्यमान हैं। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि इस वर्ष छत्तीसगढ़ सरकार ने 1 नवंबर से 15 नवंबर तक 'जनजातीय गौरव पखवाड़ा' बड़े स्तर पर मनाया।

राष्ट्रपति ने बताया कि पिछले एक दशक में जनजातीय समुदायों के विकास और कल्याण के लिए अनेक राष्ट्रीय स्तर की योजनाएँ बनाई और लागू की गई हैं। पिछले वर्ष गांधी जयंती के अवसर पर ‘धरती अबा जनजाति ग्राम उत्कर्ष अभियान’ शुरू किया गया था, जिसके लाभ देशभर के पाँच करोड़ से अधिक जनजातीय भाइयों और बहनों तक पहुँचेंगे। वर्ष 2023 में 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM-JANMAN) की शुरुआत की गई। ये सभी योजनाएँ जनजातीय समुदायों को दी जा रही सर्वोच्च प्राथमिकता को दर्शाती हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष पर केंद्र सरकार ने ‘आदि कर्मयोगी अभियान’ शुरू किया है, जिससे जनजातीय समुदायों के विकास प्रयासों को नई ऊर्जा मिलेगी। उन्होंने बताया कि इस अभियान में देशभर में लगभग 20 लाख स्वयंसेवकों का एक विस्तृत नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। राष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि ये स्वयंसेवक जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए जनजातीय समुदायों के विकास को सुनिश्चित करेंगे।

\राष्ट्रपति ने प्रसन्नता जताई कि देशभर में, विशेषकर छत्तीसगढ़ में लोग वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) के मार्ग को छोड़कर विकास की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के सुविचारित और संगठित प्रयासों से निकट भविष्य में वामपंथी उग्रवाद का उन्मूलन संभव होगा। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि हाल ही में आयोजित ‘बस्तर ओलंपिक’ में 1,65,000 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। उन्होंने विश्वास जताया कि जनजातीय नायकों के आदर्शों का पालन करते हुए छत्तीसगढ़ के लोग एक मजबूत, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में अमूल्य योगदान देंगे।



जंजातीय गौरव दिवस पर संसद में भगवान बिरसा मुंडा को राष्ट्र का नमन

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भारत की राष्ट्रपति,द्रौपदी मुर्मु; भारत के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति,सी. पी. राधाकृष्णन; लोकसभा अध्यक्ष,ओम बिड़ला; संसदीय कार्य मंत्री एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री,किरण रिजिजू; राज्यसभा के उपसभापति,हरिवंश; सांसदगण; पूर्व सांसद; तथा अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्तियों ने आज संसद परिसर स्थित प्रेरणा स्थल पर भगवान बिरसा मुंडा की जयंती—जंजातीय गौरव दिवस—के अवसर पर उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।

ओम बिड़ला ने इससे पहले ‘एक्स’ पर अपने संदेश में लिखा,

“अतुलनीय स्वतंत्रता सेनानी और जनजातीय अस्मिता व स्वाभिमान के शाश्वत प्रतीक धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि, तथा जंजातीय गौरव दिवस की सभी नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।

सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जल, जंगल और ज़मीन के अधिकारों के लिए जो साहसिक संघर्ष किया, वह विदेशी शासन के विरुद्ध धधकती क्रांति के रूप में उभरा और स्वतंत्रता की चेतना को पूरे देश में फैलाया। उत्पीड़ित, वंचित और जनजातीय समुदायों की आवाज़ बनकर, बिरसा मुंडा जी ने अपने अटल संकल्प, बलिदान और अद्वितीय नेतृत्व से अनगिनत युवाओं में राष्ट्रवाद, आत्मसम्मान और न्याय की भावना जगाई।

उनका जीवन राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में सदैव प्रेरणा स्रोत रहेगा और हमें कर्तव्य-पथ, सामाजिक न्याय तथा सांस्कृतिक गरिमा का मार्ग दिखाता रहेगा।”

भगवान बिरसा मुंडा, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उलगुलान (क्रांति) का नेतृत्व किया, प्रतिरोध के एक सशक्त प्रतीक बन गए। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने राष्ट्रीय चेतना को प्रज्वलित किया और उनकी विरासत आज भी पूरे देश के जनजातीय समुदायों द्वारा गहरी श्रद्धा से स्मरण की जाती है।

साल 2021 से, 15 नवंबर को जंजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है ताकि जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का सम्मान किया जा सके। भारत की स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों ने अनेक क्रांतिकारी आंदोलनों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह दिवस उनकी गौरवशाली संस्कृति, इतिहास और विरासत का उत्सव है। देशभर में आयोजित कार्यक्रमों का उद्देश्य एकता, गर्व और जनजातीय योगदानों की पहचान को सुदृढ़ करना है।

समारोहों के हिस्से के रूप में, संसद परिसर स्थित प्रेरणा स्थल पर विभिन्न राज्यों के जनजातीय लोक कलाकारों ने प्रदर्शन कर आगंतुकों का स्वागत किया।



जनजातीय गौरव दिवस पखवाड़ा: भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर विधि विभाग का श्रद्धांजलि समारोह

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विधि और न्याय मंत्रालय के विधि विभाग ने भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में जनजातीय गौरव दिवस पखवाड़ा मनाया। बिरसा मुंडा—एक महान स्वतंत्रता सेनानी, जननायक और आदिवासी समुदाय के प्रेरणास्रोत—की विरासत भारत की न्याय, गरिमा और सांस्कृतिक विविधता के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता को सशक्त करती है।

कानून सचिव डॉ. अंजू राठी राणा के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में भारत के राष्ट्र-निर्माण में आदिवासी समुदायों के योगदान और उनके ऐतिहासिक महत्व पर विचार किया गया। बिरसा मुंडा के असाधारण साहस, उनके नेतृत्व और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए उनके संघर्ष को कार्यक्रम का केंद्र बनाया गया।

“बिरसा मुंडा का जीवन और योगदान” विषय पर एक लघु वीडियो भी प्रदर्शित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों और विभागीय कर्मचारियों को भारत की जनजातीय परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और संघर्षशीलता की झलक देखने को मिली। यह प्रस्तुति बिरसा मुंडा के ऐतिहासिक योगदान और उनकी अमर विरासत को उजागर करती है।

इस अवसर पर “राष्ट्रीय इतिहास और संस्कृति में जनजातीय समुदायों का योगदान” विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को प्रमाण पत्र भी प्रदान किए गए। विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर देश की जनजातीय धरोहर के प्रति सम्मान और जागरूकता का संदेश दिया।

कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि जनजातीय समुदायों का भारत की पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक विविधता में विशिष्ट और अमूल्य योगदान है। जनजातीय गौरव दिवस पखवाड़ा मनाना इस प्रतिबद्धता को मजबूत करता है कि भारत अपने आदिवासी समाज की विरासत को सम्मान, समझ और गर्व के साथ आगे बढ़ाता रहेगा।





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