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वैज्ञानिकों ने विकसित किया दिमाग की तरह काम करने वाला ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’, नमी के अनुसार करेगा प्रतिक्रिया

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नई दिल्ली- भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अत्याधुनिक ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’ विकसित किया है, जो मानव मस्तिष्क की तरह पर्यावरणीय बदलाव—विशेष रूप से नमी (ह्यूमिडिटी)—के प्रति प्रतिक्रिया दे सकता है। यह सेंसर एक ही डिवाइस में जानकारी को महसूस (sensing), प्रोसेस (processing) और संग्रहित (storage) करने में सक्षम है, जिससे पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तुलना में ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की जरूरत काफी कम हो सकती है।

आज के समय में बढ़ती ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की चुनौतियों के कारण न्यूरोमॉर्फिक इलेक्ट्रॉनिक्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एज कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में।

जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, के शोधकर्ताओं ने यह अनोखा सेंसर विकसित किया है। यह सेंसर 1D सुप्रामॉलिक्यूलर नैनोफाइबर्स पर आधारित है और एक ही प्लेटफॉर्म पर सेंसिंग तथा ‘सिनैप्स’ जैसी सूचना प्रोसेसिंग को एकीकृत करता है।

इस शोध की प्रेरणा मेंढक—विशेष रूप से क्रिकेट फ्रॉग—के व्यवहार से ली गई है, जो नमी और प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। इसी तरह यह सेंसर भी नमी के स्तर में बदलाव के अनुसार प्रतिक्रिया देता है और पहले के संकेतों को “याद” भी रख सकता है।

शोधकर्ताओं तेजस्विनी एस. राव और सुकन्या बरुआह ने विशेष नैनोफाइबर्स विकसित कर इस डिवाइस को तैयार किया। इसे एक नियंत्रित नमी वाले वातावरण में परीक्षण किया गया, जहां विभिन्न स्तरों की नमी पर इसके व्यवहार का अध्ययन किया गया। सेंसर ने ‘सिनैप्टिक’ प्रतिक्रियाएं जैसे फेसीलिटेशन, डिप्रेशन और मेटाप्लास्टिसिटी प्रदर्शित कीं, जो मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से मेल खाती हैं।

इस सेंसर की खास बात यह है कि यह नमी के बदलाव को महसूस करने के साथ-साथ उसी समय उसे प्रोसेस और स्टोर भी कर सकता है। यह विशेषता इसे पारंपरिक सेंसर से अलग बनाती है, जहां ये तीनों कार्य अलग-अलग घटकों में होते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, “यह पहली बार है जब किसी न्यूरोमॉर्फिक डिवाइस में नमी को मुख्य संकेत के रूप में इस्तेमाल कर सिनैप्टिक व्यवहार को प्रदर्शित किया गया है।”

भविष्य में यह तकनीक स्मार्ट पर्यावरण निगरानी प्रणालियों, हेल्थकेयर डिवाइसेस, पहनने योग्य सेंसर (wearables) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एज कंप्यूटिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह नवाचार ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण के अनुकूल अगली पीढ़ी की तकनीकों के विकास में भी मददगार साबित होगा।

दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

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दूरसंचार विभाग (DoT), संचार मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के सहयोग से नई दिल्ली में “दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देना: नीति और व्यवहार को सक्षम बनाना” शीर्षक से राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में नीति निर्माता, उद्योग विशेषज्ञ, प्रौद्योगिकी प्रदाता, अकादमिक, अंतरराष्ट्रीय संगठन और मूल्य-श्रृंखला के हितधारक शामिल हुए, जिन्होंने भारत के दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी प्रथाओं को तेज़ी से अपनाने के लिए विचार-विमर्श किया।

कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न हितधारकों के दृष्टिकोण को एकत्रित करना और दूरसंचार मूल्य-श्रृंखला में स्थायित्व और संसाधन दक्षता सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक उपायों की पहचान करना था। इसमें टिकाऊ उत्पाद डिजाइन, संसाधन की कुशल उपयोगिता, जीवनचक्र प्रबंधन, डिजिटल उपकरण और वित्तपोषण तंत्र पर चर्चा हुई।

प्रारंभिक सत्र की अध्यक्षता डॉ. शिल्पी कर्मकार, परियोजना प्रबंधक, UNDP ने की, जिन्होंने कार्यशाला के उद्देश्य बताए। स्वागत भाषण और सन्दर्भ प्रस्तुत डॉ. आशीष चतुर्वेदी, प्रमुख – ACE, UNDP ने किया। इसके बाद डॉ. अंगेला लुसिज़ी, रेज़िडेंट रिप्रेज़ेंटेटिव, UNDP ने बहु-हितधारक सहयोग के महत्व पर विशेष भाषण दिया।

मुख्य भाषण देते हुए आर. एन. पालाई, सदस्य (प्रौद्योगिकी), डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन और दूरसंचार विभाग के सचिव (ex-officio) ने कहा कि दूरसंचार में स्थायित्व और सर्कुलैरिटी अब वैकल्पिक नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि भारत का दूरसंचार क्षेत्र देश में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में केवल 2% योगदान देता है, लेकिन लगभग 1.2 बिलियन उपयोगकर्ताओं तक इसकी पहुँच इसे पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार प्रथाओं को अपनाने की जिम्मेदारी देती है।

पालाई ने सर्कुलर इकोनॉमी को केवल ऊर्जा दक्षता तक सीमित न रखते हुए दूरसंचार उत्पादों और अवसंरचना के पूरे जीवनचक्र में विस्तार देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने ई-कचरा प्रबंधन, राइट-टू-रिपेयर और टिकाऊ डिजाइन जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की बात कही।

डॉ. अंगेला लुसिज़ी ने UNDP के योगदान और दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी योजनाओं के निर्माण में सहयोग की जानकारी दी। उन्होंने कार्यशाला को एक समयबद्ध रोडमैप तैयार करने के लिए मंच के रूप में उपयोग करने का आह्वान किया।

कार्यशाला में अरुण अग्रवाल, DDG (सैटेलाइट), DoT ने भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी एक्शन प्लान प्रस्तुत किया, जिसमें स्थायी डिजाइन, जीवनचक्र प्रबंधन, ई-कचरा न्यूनीकरण, डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शी आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने के सुझाव दिए गए।

तकनीकी सत्रों में दो प्रमुख पैनल चर्चाएँ हुईं:

  1. “सर्कुलैरिटी और स्थायित्व के लिए दूरसंचार आपूर्ति श्रृंखला पर पुनर्विचार” – इस सत्र में नीति हस्तक्षेप, मूल्य-श्रृंखला के महत्वपूर्ण पहलू, स्थायी खरीद और उद्योग की मौजूदा प्रथाओं पर चर्चा हुई।

  2. “सर्कुलर इकोनॉमी की ओर डिजिटल उपकरण” – इसमें डिजिटल प्लेटफार्म, ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी, डेटा एनालिटिक्स, AI और IoT के उपयोग पर जोर दिया गया।

समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों ने भारत के दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर, टिकाऊ और लचीला ढांचा बनाने के लिए साझा प्रतिबद्धता व्यक्त की।

यह कार्यशाला दूरसंचार क्षेत्र में नीति, उद्योग और तकनीकी समाधानों के माध्यम से सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।

टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड ने स्वदेशी EV चार्जर्स के व्यावसायीकरण हेतु Electrowaves Electronics को दी वित्तीय सहायता

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टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार ने हिमाचल प्रदेश के परवाणू स्थित M/s Electrowaves Electronics Pvt. Ltd. को स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित ईवी चार्जर्स के व्यावसायीकरण के लिए वित्तीय सहायता स्वीकृत की है। यह कदम स्वच्छ गतिशीलता और आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य को सुदृढ़ करते हुए विदेशी आयात पर निर्भरता कम करेगा और देश में इलेक्ट्रिक परिवहन के प्रसार को गति देगा।

कंपनी द्वारा विकसित तकनीक में शामिल हैं:

  • 30–240 kW श्रेणी के DC फास्ट चार्जर्स

  • 15 kW और 30 kW पावर कनवर्टर मॉड्यूल (100–1000 VDC आउटपुट, 100A अधिकतम करंट)

  • PLC कम्युनिकेशन कंट्रोलर (DIN SPEC 70121 के अनुरूप, ISO 15118 के आंशिक अनुरूप)

  • OCPP कंट्रोलर (OCPP 1.6J एवं OCPP 2.0.1 के अनुरूप)

  • यूनिवर्सल DC चार्ज कंट्रोलर और पूर्ण HMI डिज़ाइन

  • घरेलू एवं सार्वजनिक उपयोग हेतु AC टाइप-2 चार्जर्स

TDB का यह सहयोग भारत में उच्च गुणवत्ता वाले स्वदेशी ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के उत्पादन को बढ़ावा देगा, जिससे स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और EV सेक्टर में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूती मिलेगी।

TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि कंपनी का यह प्रयास नवाचार-आधारित आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह परियोजना ऊर्जा सुरक्षा, सतत औद्योगिक विकास और स्वच्छ गतिशीलता की दिशा में देश के प्रयासों को गति प्रदान करेगी।

Electrowaves Electronics Pvt. Ltd. के प्रमोटर्स ने इस सहायता के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सहयोग उनकी निर्माण क्षमता को विस्तार देने और भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य में महत्वपूर्ण योगदान देने में मदद करेगा।

यह पहल मेकिन इंडिया को बढ़ावा देने, स्वदेशी तकनीकी विकास को प्रोत्साहित करने और अगली पीढ़ी की परिवहन प्रणालियों में घरेलू क्षमताओं को सुदृढ़ करने की TDB की निरंतर प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित करती है।

अब समुद्र से मिलेगा पीने का पानी!

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 नया साइफ़न-आधारित थर्मल डीसैलिनेशन सिस्टम : खारे समुद्र के पानी से सस्ता और तेज़ पीने का पानी

एक नया साइफ़न-आधारित थर्मल डीसैलिनेशन सिस्टम अब खारे समुद्री पानी को पीने योग्य मीठे पानी में बदल सकता है—मौजूदा तरीकों की तुलना में तेज़, सस्ता और अधिक भरोसेमंद।

पारंपरिक सोलर स्टिल्स जो प्रकृति के जलचक्र की नकल करते हैं, लंबे समय से जल शोधन के सरल उपकरण माने जाते रहे हैं। लेकिन इनमें दो प्रमुख चुनौतियाँ आती हैं:

  • नमक जमना – वाष्पीकरण सतह पर परत जम जाती है, जिससे जल प्रवाह रुक जाता है।

  • सीमा बाधाएँ – विकिंग (wicking) सामग्री पानी को केवल 10–15 सेमी तक ही खींच सकती है, जिससे उत्पादन सीमित रहता है।

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के शोधकर्ताओं ने इन दोनों चुनौतियों को एक सरल सिद्धांत—साइफ़न प्रक्रिया (siphonage)—से हल किया है।

कैसे काम करता है यह सिस्टम?

सिस्टम के केंद्र में है एक कंपोज़िट साइफ़न:

  • कपड़े की विक सतत रूप से खारे पानी को खींचती है।

  • गुरुत्वाकर्षण पानी को निरंतर प्रवाहित करता है।

  • नमक जमने से पहले ही बहकर निकल जाता है, जिससे सतह साफ़ रहती है।

खारा पानी एक गर्म धातु सतह पर पतली परत में फैलता है, वाष्पित होता है और पास ही ठंडी सतह पर (सिर्फ़ 2 मिमी की दूरी पर) संघनित होकर मीठे पानी में बदल जाता है। यह अत्यंत संकीर्ण एयर-गैप दक्षता को बढ़ाता है और सूर्य की रोशनी में प्रति वर्ग मीटर प्रति घंटे 6 लीटर से अधिक साफ़ पानी उपलब्ध कराता है—जो पारंपरिक सोलर स्टिल्स से कई गुना अधिक है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • बहु-स्तरीय डिज़ाइन: गर्मी का पुन: उपयोग करके अधिकतम उत्पादन।

  • कम लागत और टिकाऊ: केवल एल्युमिनियम और कपड़े जैसे साधारण पदार्थों से निर्मित।

  • ऊर्जा लचीला: सौर ऊर्जा या अपशिष्ट ऊष्मा से संचालित।

  • नमक प्रतिरोधी: 20% तक खारे पानी को भी बिना अवरुद्ध हुए शुद्ध कर सकता है।

संभावित उपयोग

  • दूरदराज़ और ऑफ-ग्रिड समुदाय

  • आपदा प्रभावित क्षेत्र

  • शुष्क तटीय इलाके

  • द्वीप देश

यह शोध पत्रिका Desalination में प्रकाशित हुआ है और भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा समर्थित है।

शोधकर्ताओं के शब्दों में, यह तकनीक है—“स्केलेबिलिटी, नमक-प्रतिरोध और सरलता”—एक प्यासे विश्व के लिए समाधान।


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