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सावन: शिव भक्ति, हरियाली और भारतीय संस्कृति का उत्सव

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"रिमझिम बरसती फुहारें, मिट्टी की सौंधी खुशबू, पेड़ों पर झूलों की मस्ती और 'हर-हर महादेव' के जयघोष..." यही है सावन की पहचान। श्रावण मास केवल हिंदू धर्म का एक पवित्र महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन का जीवंत उत्सव है।


बरसात की पहली बूंद जब धरती को स्पर्श करती है, तो सूखी वसुंधरा हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। खेतों में नई फसल की उम्मीद अंकुरित होती है, नदियां और तालाब जीवन से भर उठते हैं और प्रकृति अपनी अनुपम छटा बिखेर देती है। यही कारण है कि सावन को नवजीवन, समृद्धि और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। तब से सावन का महीना भगवान भोलेनाथ की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। श्रद्धालु शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना करते हैं। सावन के सोमवार और कांवड़ यात्रा इस आस्था को और अधिक प्रगाढ़ बनाते हैं।

सावन भारतीय लोक संस्कृति का भी सबसे रंगीन अध्याय है। गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, महिलाएं और युवतियां हरे परिधानों में सजकर कजरी और सावनी गीत गाती हैं। हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन जैसे पर्व सामाजिक सौहार्द, पारिवारिक प्रेम और सांस्कृतिक परंपराओं को नई ऊर्जा देते हैं। यह महीना रिश्तों में अपनापन और जीवन में सकारात्मकता का संदेश लेकर आता है।

आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, तब सावन हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। हरियाली तभी बचेगी, जब हम पेड़ लगाएंगे, जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। भगवान शिव स्वयं प्रकृति के देवता माने जाते हैं, इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना भी उनकी सच्ची आराधना है।

सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का महीना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, सेवा, प्रेम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। आइए, इस पावन मास में भगवान शिव से यही प्रार्थना करें कि हमारे जीवन में शांति, समाज में सद्भाव और प्रकृति में सदैव हरियाली बनी रहे।

हर-हर महादेव! जय भोलेनाथ!

गुरु पूर्णिमा: ज्ञान, संस्कार और कृतज्ञता का पावन पर्व

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"गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥"

भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक होता है। इसी गुरु-शिष्य परंपरा के सम्मान और कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी है। इस दिन उनका जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की तथा अनेक पुराणों की रचना कर भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनाया। उनके अतुलनीय योगदान के कारण उन्हें 'आदि गुरु' के रूप में सम्मानित किया जाता है।

भारतीय परंपरा में गुरु का अर्थ केवल विद्यालय के शिक्षक तक सीमित नहीं है। माता-पिता, आचार्य, संत, आध्यात्मिक गुरु और वे सभी लोग, जो हमें जीवन में सही मार्ग दिखाते हैं, गुरु के समान हैं। गुरु हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने, ज्ञान का प्रकाश फैलाने और जीवन के अंधकार को दूर करने का कार्य करते हैं।

आज के आधुनिक और डिजिटल युग में जानकारी प्राप्त करना आसान हो गया है, लेकिन सही ज्ञान, विवेक और नैतिक मूल्यों का मार्गदर्शन आज भी गुरु ही प्रदान करते हैं। तकनीक हमें सूचना दे सकती है, परंतु जीवन जीने की कला, सही निर्णय लेने की क्षमता और मानवीय मूल्यों का बोध गुरु ही कराते हैं।

गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। यह दिन हमें अपने जीवन में उन सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है, जिन्होंने हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि सच्चा ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसके साथ विनम्रता, अनुशासन और सेवा की भावना जुड़ी हो।

आज के समय में जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब गुरु के बताए आदर्श—सत्य, ईमानदारी, करुणा, संयम और सदाचार—पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने गुरु से मिले संस्कारों को जीवन में उतारे, तो एक सशक्त, शिक्षित और नैतिक समाज का निर्माण संभव है।

निष्कर्ष

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की अमूल्य गुरु-शिष्य परंपरा का उत्सव है। यह पर्व हमें अपने गुरुओं के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी गुरुओं को नमन करें और उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ज्ञान, संस्कार और मानवता से परिपूर्ण जीवन जीने का संकल्प लें।

"गुरु का सम्मान केवल एक दिन का नहीं, बल्कि जीवनभर की साधना और कृतज्ञता का प्रतीक है।"

आज देवशयनी एकादशी: चातुर्मास का शुभारंभ, भगवान विष्णु की आराधना में लीन हुए श्रद्धालु

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नई दिल्ली- आज देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ देवशयनी एकादशी का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी के साथ चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होता है।

मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। भक्त भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर व्रत रख रहे हैं तथा सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण की कामना कर रहे हैं। कई स्थानों पर विशेष भजन-कीर्तन, धार्मिक अनुष्ठान और सत्संग का आयोजन भी किया जा रहा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु के देवउठनी एकादशी पर जागृत होने के साथ ही शुभ एवं मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।

धर्माचार्यों ने श्रद्धालुओं से विधि-विधान के साथ व्रत और पूजा करने तथा जरूरतमंदों की सहायता एवं दान-पुण्य करने का भी आह्वान किया है।

मानवता, सेवा और संवेदना का जीवंत केंद्र है सोठी आश्रम : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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मुख्यमंत्री साय ने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ आश्रम में सेवा, स्वास्थ्य एवं पुनर्वास कार्यों का किया अवलोकन

सिद्धि विनायक मंदिर में पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना की

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज जांजगीर-चांपा जिले के एक दिवसीय प्रवास के दौरान सोठी स्थित भारतीय कुष्ठ निवारक संघ आश्रम पहुँचे। आश्रम आगमन पर संस्था के पदाधिकारियों एवं आश्रमवासियों ने उनका आत्मीय स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने आश्रम प्रमुख सुधीर देव से संस्था की सेवा गतिविधियों, चिकित्सा सुविधाओं तथा पुनर्वास कार्यों की विस्तृत जानकारी प्राप्त की तथा आश्रम द्वारा किए जा रहे सेवा कार्यों की सराहना की।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि भारतीय कुष्ठ निवारक संघ आश्रम केवल एक सेवा संस्थान नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और समर्पण का जीवंत केंद्र है। यहाँ वर्षों से समाज के उपेक्षित और जरूरतमंद लोगों की गरिमा के साथ सेवा की जा रही है, जो भारतीय संस्कृति के 'नर सेवा ही नारायण सेवा' के आदर्श को साकार करती है। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थान समाज में संवेदनशीलता, सेवा और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने का प्रेरणादायी कार्य कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने आश्रम परिसर स्थित सिद्धि विनायक मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना एवं आरती कर प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की। उन्होंने संस्था के संस्थापक स्वर्गीय सदाशिव गोविंद कात्रे के छायाचित्र पर दीप प्रज्ज्वलित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए तथा उनके सेवा भाव को नमन किया।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने आश्रम के लिए नई एम्बुलेंस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि यह एम्बुलेंस आश्रमवासियों एवं जरूरतमंद मरीजों को समय पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

मुख्यमंत्री साय ने आश्रम परिसर का भ्रमण कर सेवा, स्वास्थ्य एवं पुनर्वास से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों का अवलोकन किया। उन्होंने आश्रमवासियों से आत्मीय भेंट कर उनका कुशलक्षेम जाना तथा उन्हें उपहार भी भेंट किए। इस दौरान उन्होंने गौशाला में गौमाता की पूजा-अर्चना कर हरा चारा अर्पित किया और गौसेवा का संदेश दिया।

मुख्यमंत्री ने आश्रम परिसर स्थित संत गुरु घासीदास चिकित्सालय का निरीक्षण कर ओपीडी, पैथोलॉजी लैब, बिलिंग कक्ष, एक्स-रे कक्ष, आईसीयू तथा ऑपरेशन थियेटर सहित विभिन्न इकाइयों में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं की जानकारी ली। उन्होंने चिकित्सालय में उपचाररत मरीजों के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं की भी समीक्षा की तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करने पर बल दिया।

इस दौरान मुख्यमंत्री ने धनवंतरी जनकल्याण समिति सोसायटी, रायपुर द्वारा संचालित निःशुल्क कैंसर स्क्रीनिंग इनिशिएटिव वाहन का भी अवलोकन किया। उन्होंने वाहन के माध्यम से ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में पहुँचाई जा रही कैंसर जांच सेवाओं की जानकारी लेते हुए कहा कि समय पर जांच और उपचार गंभीर बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है तथा ऐसी पहल जनस्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब,सांसद कमलेश देवी जांगड़े, विधायक जगदलपुर किरण सिंह देव, छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह, छत्तीसगढ़ राज्य हथकरघा विकास एवं विपणन सहकारी संघ के अध्यक्ष भोजराज देवांगन, आश्रम के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित थे।

विकसित भारत 2047 के लिए आध्यात्मिकता और सामाजिक समरसता जरूरी: राष्ट्रपति मुर्मु

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (18 जून 2026) मध्य प्रदेश के बैतूल में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा आयोजित ‘आध्यात्मिक जागृति द्वारा जनजातीय समाज का सशक्तिकरण’ कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

सभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि उपभोक्तावादी संस्कृति से प्रेरित आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में आध्यात्मिक शुद्धता समाज के हर वर्ग के लिए अत्यंत आवश्यक हो गई है। इसी आधार पर समानतापूर्ण आचरण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशील जीवनशैली विकसित की जा सकती है, जो दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ हो। उन्होंने कहा कि तनाव और संघर्ष से ग्रस्त वर्तमान विश्व में इसकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ऐसे समय में ‘आध्यात्मिक जागृति द्वारा जनजातीय समाज का सशक्तिकरण’ जैसे सम्मेलन और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों की जीवनशैली स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिकता की मूल प्रेरणाओं के अनुरूप है। प्राकृतिक संसाधनों के साथ उनका गहरा जुड़ाव उनकी एक ऐसी शक्ति है, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सार्वभौमिक कल्याण के प्रति समर्पित सोच और जीवनशैली को बढ़ावा देती है। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि ब्रह्माकुमारी संस्था इसी दृष्टिकोण के साथ लंबे समय से देश के विभिन्न भागों में जनजातीय समुदायों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय जीवन-मूल्यों के अनुरूप कार्य करने वाले किसी भी संगठन को यह ध्यान रखना चाहिए कि समाज के किसी भी वर्ग का सशक्तिकरण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं हो सकता। वास्तविक सशक्तिकरण तब होता है जब व्यक्ति आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और जागरूकता के साथ कार्य करे तथा अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी सजग रहे। आध्यात्मिक जागृति व्यक्ति को उसकी आंतरिक शक्तियों का बोध कराती है और उसे सकारात्मक सोच तथा जीवन के उच्च उद्देश्यों से जोड़ती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि विकास और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन ही एक मजबूत और समृद्ध समाज की आधारशिला है। सार्थक विकास वही है जो हमारी जड़ों और मूल जीवन-मूल्यों से शक्ति प्राप्त करे तथा उन्हें और अधिक सुदृढ़ बनाए। उन्होंने कहा कि जब हम इस समग्र दृष्टिकोण के साथ कार्य करेंगे, तभी समाज में समरसता और समानता की सशक्त धारा प्रवाहित होगी तथा समावेशी विकास के नए मानदंड स्थापित किए जा सकेंगे।

राष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से विकसित भारत 2047 के निर्माण के लिए और अधिक प्रतिबद्धता के साथ कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण को समावेशी विकास के आधार स्तंभ बनाकर ही विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।


सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का सशक्त संगम है शिव पुराण: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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प्रधानमंत्री की माताश्री हीराबेन मोदी की पुण्य स्मृति में आयोजित शिव महापुराण कथा में शामिल हुए मुख्यमंत्री

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा है कि सनातन परंपरा और आध्यात्मिक आयोजनों से समाज में नैतिकता, संस्कार और सामाजिक समरसता को बल मिलता है। वे आज रायगढ़ जिले के बरगढ़ खोला अंचल के ग्राम-खम्हार में आयोजित शिव महापुराण कथा में को सम्बोधित कर रहे थे।  

गौरतलब है कि इस कथा का आयोजन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की माताश्री हीराबेन मोदी की पुण्य स्मृति में श्रद्धांजलि स्वरूप किया जा रहा है। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने विधिवत पूजा-अर्चना कर भगवान शिव से प्रदेश की जनता के लिए सुख, समृद्धि के लिए कामना की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बाल कथा व्यास कृष्णा दुबे महाराज से भेंटकर उनका आशीर्वाद लिया।

मुख्यमंत्री साय ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वही भूमि है जहां प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास काल का अधिकांश समय व्यतीत किया। माता शबरी के जूठे बेरों की महिमा आज भी जीवंत है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर छत्तीसगढ़ के सुगंधित चावल से बना प्रसाद अर्पित किया गया, जो राज्य के लिए गर्व का विषय है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा संचालित रामलला दर्शन योजना के तहत अब तक दो वर्षों में 40 हजार से अधिक श्रद्धालु अयोध्या दर्शन कर चुके हैं। वहीं मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना के अंतर्गत 19 चिन्हित तीर्थ स्थलों की यात्रा कराते हुए अब तक 5 हजार से अधिक वरिष्ठ नागरिकों को लाभान्वित किया गया है। कार्यक्रम को वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने भी संबोधित किया। 

शिव महापुराण कथा का वाचन अकोला (महाराष्ट्र) से पधारे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बाल कथा व्यास कृष्णा दुबे महाराज द्वारा संगीतमय शैली में किया जा रहा है, जिसमें भगवान शिव, माता पार्वती सहित संपूर्ण शिव चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया जा रहा है।

कार्यक्रम में लोकसभा सांसद राधेश्याम राठिया और कमलेश जांगड़े राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष शिखा गबेल, रायगढ़ के महापौर जीवर्धन चौहान, नगर पालिका अध्यक्ष खरसिया कमल गर्ग सहित अनेक जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित थे।

“प्रधानमंत्री मोदी ने दूरदर्शन के सुप्रभातम् कार्यक्रम में संस्कृत की प्रासंगिकता पर जोर दिया”

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में संस्कृत की प्रासंगिकता को रेखांकित किया, और ध्यान दिलाया कि यह दूरदर्शन के सुप्रभातम् कार्यक्रम में प्रतिदिन मौजूद रहती है।

प्रधानमंत्री ने देखा कि प्रत्येक सुबह इस कार्यक्रम में संस्कृत का एक सुभाषित (सत्परामर्शयुक्त कथन) प्रस्तुत किया जाता है, जो मूल्यों और संस्कृति को सहज रूप से जोड़ता है।

X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट में मोदी ने लिखा:

“दूरदर्शनस्य सुप्रभातम् कार्यक्रमे प्रतिदिनं संस्कृतस्य एकं सुभाषितम् अपि भवति। एतस्मिन् संस्कारतः संस्कृतिपर्यन्तम् अन्यान्य-विषयाणां समावेशः क्रियते। एतद् अस्ति अद्यतनं सुभाषितम्....”


उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने आचार्य हंसरत्न सुरिश्वरजी महाराज के 180 उपवास पारणा समारोह में शिरकत की

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज विज्ञान भवन, नई दिल्ली में जैन आचार्य हंसरत्न सुरिश्वरजी महाराज जी के अष्टम 180 उपवास पारणा समारोह में शिरकत की।

सभा को संबोधित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने दिव्य तपस्वी आचार्य हंसरत्न सुरिश्वरजी महाराज के पवित्र महापरना में भाग लेने पर अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त की।

जैन धर्म, जो दुनिया के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है, के महत्वपूर्ण योगदान को उजागर करते हुए, राधाकृष्णन ने कहा कि इसके उपदेश — अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और अनेकांतवाद — ने भारत और विश्व पर स्थायी प्रभाव डाला है। उन्होंने कहा कि अहिंसा, जिसे महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपनाया, आज भी वैश्विक शांति आंदोलनों को प्रेरित करता है। उपराष्ट्रपति ने यह भी बताया कि जैन धर्म का शाकाहार, प्राणियों के प्रति करुणा और सतत जीवन जीने का तरीका विश्वभर में पर्यावरणीय जिम्मेदारी का आदर्श माना जाता है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए, राधाकृष्णन ने कहा कि उन्होंने 25 साल पहले काशी यात्रा के दौरान शाकाहार अपनाया, और यह उन्हें विनम्रता, परिपक्वता और सभी प्राणियों के प्रति प्रेम का भाव विकसित करने में मदद करता है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के प्रयासों की सराहना की, जिनके तहत प्राकृत भाषा को ‘क्लासिकल भाषा’ का दर्जा दिया गया और ज्ञान भारत मिशन जैसी पहलों के माध्यम से जैन पांडुलिपियों का संरक्षण किया गया।

उपराष्ट्रपति ने तमिलनाडु में जैन धर्म के ऐतिहासिक प्रसार और तमिल संस्कृति पर इसके व्यापक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म ने संगम और पोस्ट-संगम काल में तमिल साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसमें इलंगो अदिगल का सिलप्पाधिकरम और कोंगु वेलिर का पेरुंगथाई जैसी कृतियाँ शामिल हैं, जो अहिंसा, सत्य और त्याग के दार्शनिक और नैतिक आदर्शों को दर्शाती हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि तिरुक्कुरल और संगम साहित्य पर जैन धर्म का प्रभाव दिखाई देता है।राधाकृष्णन ने तमिलनाडु में कई जैन मठों की उपस्थिति का भी उल्लेख किया, जो ऐतिहासिक रूप से शिक्षा के केंद्र रहे हैं।

राधाकृष्णन ने आचार्य हंसरत्न सुरिश्वरजी महाराज की प्रशंसा की, जिन्होंने दिखाया कि सच्ची शक्ति धन या पद में नहीं, बल्कि संयम, करुणा और अनुशासन में निहित है। उन्होंने आचार्य जी के “संस्कृति बचाओ, परिवार बचाओ, राष्ट्र बनाओ” अभियान की सराहना की, जो समाज को मूल्य बनाए रखने, परिवार मजबूत करने और राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए प्रेरित करता है।

आचार्य हंसरत्न सुरिश्वरजी महाराज एक सम्मानित जैन साधु हैं, जो अपने आध्यात्मिक अनुशासन और दीर्घकालिक तपस्या के लिए जाने जाते हैं। महापरना उनके 180 दिन के उपवास के औपचारिक समापन का प्रतीक है, जिसे उन्होंने आठवीं बार किया है। यह उनके समर्पण, अनुशासन और जैन धर्म तथा नैतिक मूल्यों के प्रचार के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह आयोजन श्रद्धालुओं और व्यापक समुदाय के लिए विश्वास, आत्मसंयम और प्रेरणा का प्रतीक है।



माँ दुर्गा की भक्ति से गूंजा केन्द्रीय जेल रायपुर, 802 बंदियों ने रखा व्रत

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रायपुर-नवरात्रि के पावन अवसर पर केन्द्रीय जेल रायपुर का वातावरण श्रद्धा, भक्ति और उत्साह से सराबोर हो गया। जेल परिसर में मूर्तिकार बंदियों द्वारा मिट्टी से माँ दुर्गा की तीन भव्य प्रतिमाएं तैयार की गईं है। इनमें से एक प्रतिमा महिला प्रकोष्ठ में और दो प्रतिमाएं पुरुष प्रकोष्ठ में स्थापित कर विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

माँ दुर्गा की उपासना के लिए रायपुर जेल के 802 बंदियों ने व्रत भी रखा है। इनमें महिला प्रकोष्ठ की 31 बंदियों ने तीन दिन और 49 बंदियों ने नौ दिन का व्रत रखा है। वहीं पुरुष प्रकोष्ठ में 722 बंदियों ने नौ दिन का व्रत संकल्पपूर्वक आरंभ किया है।

बंदियों की सुविधा के लिए जेल प्रशासन ने पूजन सामग्री और फलाहार की विशेष व्यवस्था की है, जिसमें दूध, केला, फल्ली दाना और गुड़ शामिल हैं। सामूहिक व्रत और भक्ति से पूरे जेल परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक माहौल का संचार हो रहा है। पूजा पंडाल को फूलों, रंगोली और दीपों से सजाया गया है। प्रतिदिन माँ दुर्गा की स्तुति में भजन-कीर्तन, दुर्गा सप्तशती का पाठ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां की जा रही हैं।

जेल अधीक्षक योगेश सिंह क्षत्री ने बताया कि इस प्रकार के धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन बंदियों को मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। नवरात्रि का पर्व केन्द्रीय जेल रायपुर में आस्था, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम बन गया है।


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