Media24Media.com: #SanthalCommunity

Responsive Ad Slot


 

Showing posts with label #SanthalCommunity. Show all posts
Showing posts with label #SanthalCommunity. Show all posts

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 9वां अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन में शिरकत की

No comments Document Thumbnail

दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल, 7 मार्च 2026 – भारत की राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मू  ने आज दार्जिलिंग में आयोजित 9वें अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन में शिरकत की।

राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि संताल समुदाय के लिए यह गर्व की बात है कि हमारे पूर्वज तिलका मांझी ने लगभग 240 साल पहले शोषण के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाया। उनके विद्रोह के लगभग 60 साल बाद, बहादुर भाइयों सिडो-कन्हू और चंद-भैरव, साथ ही बहादुर बहनों फूलो-झानो ने 1855 में संताल हुल का नेतृत्व किया।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2003 संताल समुदाय के इतिहास में सदैव याद किया जाएगा, क्योंकि उसी वर्ष संताल भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। पिछले वर्ष, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर संताल भाषा में लिखित संविधान, ओल चिकी लिपि में जारी किया गया।

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया। हाल ही में इस आविष्कार की शताब्दी समारोह के रूप में मनाई गई। उनके योगदान ने संताल भाषियों को अभिव्यक्ति के नए अवसर प्रदान किए। उन्होंने कई नाटकों की रचना की, जैसे “बिदु चंदन”, “खेड़वाल वीर”, “डालेगे धन” और “सिडो-कन्हू - संताल हुल”, जिनके माध्यम से उन्होंने संताल समुदाय में साहित्य और सामाजिक चेतना का प्रकाश फैलाया। राष्ट्रपति ने कहा कि संताल समुदाय के सदस्य अन्य भाषाओं और लिपियों का अध्ययन करें, लेकिन अपनी भाषा से जुड़े रहें।

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों ने सदियों से अपनी लोक-संगीत, नृत्य और परंपराओं को संरक्षित किया है। उन्होंने प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशीलता को पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक संरक्षण का पाठ भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि लोक परंपराओं और पर्यावरण को संरक्षित करने के साथ-साथ हमारे जनजातीय समुदायों को आधुनिक विकास को अपनाते हुए प्रगति की यात्रा पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संताल समुदाय सहित जनजातीय समुदाय प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्तमान समय की आवश्यकता शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित करना है। जनजातीय युवा शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आगे बढ़ें। लेकिन इन प्रयासों में वे अपनी जड़ों को नहीं भूलें। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति का संरक्षण, शिक्षा को प्राथमिकता देने और समाज में एकता और भाईचारे को बनाए रखने का संकल्प करना चाहिए। यह हमें सशक्त समाज और मजबूत भारत बनाने में मदद करेगा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जमशेदपुर में 22वें पारसी महोत्सव एवं ओलचिकी शताब्दी समारोह के समापन समारोह को किया संबोधित

No comments Document Thumbnail

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (29 दिसंबर, 2025) झारखंड के जमशेदपुर में आयोजित 22वें पारसी महोत्सव (Parsi Maha) एवं ओलचिकी लिपि के शताब्दी समारोह के समापन समारोह में सहभागिता की और उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि संथाल समुदाय की अपनी विशिष्ट भाषा, साहित्य और संस्कृति है। हालांकि, लगभग एक सदी पहले संथाली भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं थी, जिसके कारण इसे रोमन, देवनागरी, ओड़िया और बांग्ला जैसी विभिन्न लिपियों में लिखा जाता था। इन लिपियों में कई संथाली शब्दों का सही उच्चारण संभव नहीं हो पाता था। वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु ने ओलचिकी लिपि का निर्माण किया। तब से यह लिपि संथाल पहचान का एक सशक्त प्रतीक बन गई है।

राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें 25 दिसंबर 2025 को, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर, ओलचिकी लिपि में लिखित संथाली भाषा में भारत के संविधान का विमोचन करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अब संथाली भाषी लोग अपनी मातृभाषा और ओलचिकी लिपि में लिखे संविधान को पढ़ और समझ सकेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि किसी अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ मातृभाषा संथाली को ओलचिकी लिपि में सीखना भी संथाल समुदाय के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि लेखक और भाषा प्रेमी संथाली भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

राष्ट्रपति ने लोगों से पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विकास के पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली संथाल समुदाय और अन्य जनजातीय समाजों से सीखी जा सकती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि संथाली साहित्य को संथाल समुदाय की मौखिक परंपराओं और गीतों से विशेष बल मिलता है। उन्होंने उल्लेख किया कि अनेक लेखक अपने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से संथाली साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदायों में जागरूकता लाना एक महत्वपूर्ण कार्य है और लेखकों से आग्रह किया कि वे अपनी लेखनी के माध्यम से इस दिशा में योगदान दें।

राष्ट्रपति ने कहा कि भाषा और साहित्य समुदायों को आपस में जोड़ते हैं। विभिन्न भाषाओं के बीच साहित्यिक आदान-प्रदान से भाषाएं और समुदाय दोनों समृद्ध होते हैं, और अनुवाद इस आदान-प्रदान को संभव बनाते हैं। इसलिए संथाली भाषा के विद्यार्थियों को अन्य भाषाओं से परिचित कराना आवश्यक है। इसी प्रकार, संथाली साहित्य को अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों के लिए भी सुलभ बनाने के प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अखिल भारतीय संथाली लेखक संघ इस महत्वपूर्ण दायित्व का प्रभावी ढंग से निर्वहन करेगा।


Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.