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साय सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत त्वरित कार्रवाई,दिवंगत आरक्षक के परिवार से 19 लाख की वसूली मामले में थाना प्रभारी गिरफ्तार

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एक करोड़ के बीमा दावे में कथित हेराफेरी का मामला

धमकी देकर आधी राशि मांगने का आरोप

रायपुर- छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के खिलाफ राज्य सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत नारायणपुर में एक गंभीर मामले में त्वरित कार्रवाई की गई है। सड़क दुर्घटना में दिवंगत डीएसएफ आरक्षक स्व.धनेश्वर नुरेटी की पत्नी को मिले एक करोड़ रुपये के दुर्घटना बीमा दावे में कथित अनियमितता और अवैध वसूली के आरोपों पर पुलिस ने तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेश चंद्र यादव को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है। मामले में एक अधिवक्ता पर भी गंभीर आरोप लगे हैं, जिसकी तलाश जारी है।

पुलिस के अनुसार डीएसएफ आरक्षक स्व.धनेश्वर नुरेटी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनकी पत्नी के बैंक खाते में भारतीय स्टेट बैंक के वेतन पैकेज के अंतर्गत एक करोड़ रुपये की दुर्घटना बीमा राशि प्राप्त हुई थी। आरोप है कि तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेश चंद्र यादव और अधिवक्ता कृष्ण कुमार वर्मा ने बीमा राशि दिलाने के नाम पर मृतक के परिजनों से 19 लाख रुपये ले लिए।

इतना ही नहीं आरोपियों ने कथित रूप से शेष बीमा राशि में भी 50 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग की। परिजनों द्वारा इसका विरोध करने पर उन्हें कोर्ट में मुकदमा दर्ज कराने, कानूनी कार्रवाई में फंसाने और लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की धमकी दी गई। आरोपियों की लगातार अतिरिक्त रकम की मांग से परेशान होकर मृतक आरक्षक के परिजनों ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय, नारायणपुर में शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत मिलते ही पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल जांच शुरू की। प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर थाना कोतवाली नारायणपुर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318, 308 एवं अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया। इसके बाद आरोपी सुरेश चंद्र यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जहां से उसे न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया। वहीं सह-आरोपी अधिवक्ता कृष्ण कुमार वर्मा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार दबिश दे रही है। प्रकरण में आगे की वैधानिक कार्रवाई जारी है।

वास्तव में आरोपियों के विरुद्ध यह कार्रवाई भ्रष्टाचार और कदाचार के विरुद्ध छत्तीसगढ़ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति का प्रमाण है। पुलिस प्रशासन का कहना है कि कानून का पालन कराने वाले तंत्र में यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अवैध वसूली, भ्रष्टाचार अथवा किसी भी प्रकार की अनियमितता में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।आम नागरिकों का विश्वास बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सिक्किम पुलिस को प्रदान किया ‘प्रेसिडेंट्स पुलिस कलर’

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गंगटोक- भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज गंगटोक में आयोजित एक समारोह में सिक्किम पुलिस को ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडियाज़ पुलिस कलर’ से सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्होंने सिक्किम पुलिस के सभी वर्तमान और पूर्व अधिकारियों एवं जवानों को बधाई दी।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 1897 में स्थापना के बाद से सिक्किम पुलिस ने राज्य में शांति, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारतीय पुलिस व्यवस्था पर लंबे औपनिवेशिक शासन की छाप रही है, जहां पुलिस का उद्देश्य जनता की सेवा करने के बजाय उन पर नियंत्रण रखना था। उन्होंने जोर देकर कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए इस औपनिवेशिक मानसिकता को पूरी तरह समाप्त करना आवश्यक है।

राष्ट्रपति ने कहा कि पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है। आम नागरिक बिना भय के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें, इसके लिए पुलिस तंत्र को अधिक जनहितैषी बनाया जाना चाहिए। साथ ही महिलाओं, बच्चों और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने पर भी उन्होंने बल दिया।

उन्होंने कहा कि पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि जनता की सहयोगी और मार्गदर्शक बनना चाहिए। इससे जनता और पुलिस के बीच विश्वास मजबूत होगा तथा समाज में सुरक्षा और कानून के प्रति सम्मान की भावना बढ़ेगी।

राष्ट्रपति ने सिक्किम पुलिस की सराहना करते हुए कहा कि उसने राज्य में शांति और सौहार्द बनाए रखने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अपने पेशेवर व्यवहार और नागरिकों के प्रति मित्रवत रवैये के कारण सिक्किम पुलिस ने लोगों का सम्मान और विश्वास अर्जित किया है।


प्रधानमंत्री मोदी 60वें DGs/IGs सम्मेलन में रायपुर, छत्तीसगढ़ में भाग लेंगे

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29-30 नवंबर, 2025 को छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) में भारत के पुलिस महानिदेशकों/अधीक्षक जनरल (DGs/IGs) की 60वीं अखिल भारतीय सम्मेलन में भाग लेंगे।

तीन दिवसीय सम्मेलन, जो 28 से 30 नवंबर तक आयोजित किया जा रहा है, का उद्देश्य अब तक पुलिसिंग में हासिल की गई प्रगति की समीक्षा करना और ‘सुरक्षित भारत’ के निर्माण के लिए भविष्य की रूपरेखा तैयार करना है, जो राष्ट्रीय दृष्टि ‘विकसित भारत’ के अनुरूप है।

‘विकसित भारत: सुरक्षा आयाम’ के मुख्य विषय के तहत सम्मेलन में वामपंथी उग्रवाद, आतंकवाद विरोधी उपाय, आपदा प्रबंधन, महिलाओं की सुरक्षा, और पुलिसिंग में फोरेंसिक विज्ञान तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श होगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति पुलिस पदक (President’s Police Medals) सेवा के लिए भी प्रदान करेंगे।

यह सम्मेलन देशभर के वरिष्ठ पुलिस नेताओं और सुरक्षा प्रशासकों के लिए एक महत्वपूर्ण इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, जहाँ वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विविध मुद्दों पर खुलकर और सार्थक आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसके साथ ही, यह सम्मेलन पुलिस बलों द्वारा सामना किए जा रहे संचालन, अवसंरचना और कल्याण संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करने, अपराध नियंत्रण, कानून व्यवस्था बनाए रखने और आंतरिक सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए पेशेवर अनुभव साझा करने का अवसर भी देता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस वार्षिक सम्मेलन में लगातार गहरी रुचि दिखाई है, खुली चर्चाओं को प्रोत्साहित किया है और ऐसा वातावरण बनाया है जहाँ पुलिसिंग पर नए विचार और नवाचार उभर सकें। व्यावसायिक सत्र, ब्रेक-आउट इंटरेक्शन और थीम आधारित डाइनिंग टेबल चर्चाएँ प्रतिभागियों को प्रधानमंत्री के साथ सीधे संवाद करने और आंतरिक सुरक्षा तथा नीति मामलों पर अपने विचार साझा करने का अवसर देती हैं।

2014 के बाद से, प्रधानमंत्री की मार्गदर्शन में इस सम्मेलन का प्रारूप लगातार उन्नत किया गया है और इसे देश के विविध स्थानों पर आयोजित किया गया है। इससे पहले सम्मेलन गुवाहाटी (असम), रण ऑफ कच्छ (गुजरात), हैदराबाद (तेलंगाना), टेकनपुर (ग्वालियर, मध्य प्रदेश), स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (केवड़िया, गुजरात), पुणे (महाराष्ट्र), लखनऊ (उत्तर प्रदेश), नई दिल्ली और जयपुर (राजस्थान), और भुवनेश्वर (ओड़िशा) में आयोजित हो चुका है। इसी परंपरा को जारी रखते हुए, इस वर्ष 60वां DGsP/IGsP सम्मेलन रायपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित किया जा रहा है।

सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, राज्य/संघ शासित प्रदेशों के गृह राज्य मंत्री, राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के DGPs और केंद्रीय पुलिस संगठनों के प्रमुख उपस्थित होंगे। नवोन्मेषी और ताज़ा विचार लाने के लिए इस वर्ष कुछ DIG और SP रैंक के उत्कृष्ट पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के गृह विभाग के प्रमुख भी शारीरिक रूप से भाग लेंगे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आईपीएस परिवीक्षाधीन अधिकारियों से की मुलाकात, कहा – “विकसित भारत के निर्माण में भविष्य-ready पुलिस बल की होगी अहम भूमिका”

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 भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के परिवीक्षाधीन अधिकारी, 77वीं आरआर (2024 बैच) ने आज (27 अक्टूबर, 2025) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से राष्ट्रपति भवन में मुलाकात की।

परिवीक्षाधीन अधिकारियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था है। हमारे आर्थिक विकास को बनाए रखने और उसे और अधिक गति देने के लिए सार्वजनिक और निजी निवेश में वृद्धि आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राज्य या क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिए कानून और व्यवस्था की स्थिति एक आवश्यक शर्त है। उन्होंने कहा कि निवेश और विकास को प्रोत्साहित करने में प्रभावी पुलिसिंग आर्थिक प्रोत्साहनों जितनी ही महत्वपूर्ण है। भविष्य के लिए तैयार पुलिस बल, जो युवा अधिकारियों के नेतृत्व में कार्य करेगा, विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि युवा अधिकारी शक्ति और अधिकार के पदों पर होते हैं, इसलिए उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि अधिकार के साथ जवाबदेही भी आती है। उन्होंने कहा कि उनके कार्य और आचरण हमेशा सार्वजनिक निगरानी में रहेंगे। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि हमेशा वही मार्ग चुनें जो नैतिक हो, न कि जो केवल सुविधाजनक लगे। उन्होंने कहा कि आपात स्थितियों से निपटते समय भी न्यायसंगत और निष्पक्ष प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति ने कहा कि जहाँ एक ओर अधिकारियों को कानून और व्यवस्था से कई प्रकार की शक्तियाँ मिलती हैं, वहीं उनका वास्तविक अधिकार उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर ईमानदारी से आता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नैतिक अधिकार ही उन्हें सबका सम्मान और विश्वास दिलाएगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि एक पुलिस अधिकारी का कार्य प्रायः अपराध और अपराधियों से जुड़ा होता है। इसका प्रभाव यह हो सकता है कि उनमें संवेदनहीनता आ जाए और उनकी मानवीयता कम हो जाए। उन्होंने अधिकारियों से आग्रह किया कि एक प्रभावी अधिकारी बनने की प्रक्रिया में वे अपने भीतर की करुणा और संवेदनशीलता को जीवित रखें।

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि तकनीक ने पुलिसिंग के क्षेत्र को मूल रूप से बदल दिया है। लगभग दस वर्ष पहले ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ जैसी अभिव्यक्ति की कल्पना भी कठिन थी, लेकिन आज यह नागरिकों के लिए सबसे भयावह खतरों में से एक है। भारत दुनिया के सबसे बड़े और तेज़ी से बढ़ते कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) उपयोगकर्ता देशों में से एक है, और इसका प्रभाव पुलिसिंग पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आईपीएस अधिकारियों को नई तकनीकों, विशेषकर एआई, को अपनाने में उन लोगों से कई कदम आगे रहना चाहिए जो इन तकनीकों का दुरुपयोग करना चाहते हैं।

नक्सलवाद के खिलाफ दशक: सुरक्षा, विकास और पुनर्वास के माध्यम से भारत में महत्वपूर्ण प्रगति

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मुख्य बातें

  • 2014 और 2024 के बीच नक्सल से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आयी ।
  • पिछले दस सालों में नक्सल प्रभावित इलाकों में 576 किले सदृश पुलिस स्टेशन निर्मित किये गए। इस दौरान नक्सल प्रभावित ज़िले 126 से घटकर 18 रह गए।
  • अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने सरेंडर किया और करीब 270 नक्सली मारे गए।
  • नक्सलियों से मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 73% की कमी आयी और दूसरी तरफ नक्सली हिंसा में मरने वाले आम नागरिकों की मौतें भी 70% कम हुईं।

 


परिचय

देते हुए नक्सलियो के कारगर नियंत्रण और उनके त्वरित खात्मे की प्रभावी शैली को दर्शाती है। केंद्र सरकार ने सुरक्षा, विकास और पुनर्वास की अपनी एक समन्वित शैली के ज़रिए देश की नक्सल विरोधी रणनीति में एक बुनियादी बदलाव लाया है। नक्सली हिंसा को लेकर पहले अपनाये जाने वाले ढुलमुल तौर तरीके को त्याग कर केंद्र सरकार ने अब बातचीत, सुरक्षा और समन्वय की एकीकृत नी ति अपनायी है, जिसका लक्ष्य मार्च 2026 तक देश के सभी नक्सल प्रभावित जिलों को नक्सल मुक्त बनाना है। यह तरीका कानून क्रियान्वन की कार्यदक्षता, क्षमता निर्माण और सामाजिक समन्वय पर बराबर ध्यान।

नक्सली हिंसा में गिरावट के एक दशक

पिछले एक दशक मेंसुरक्षा बलों की मिली-जुली कोशिशों और नक्सली इलाको में विकास कार्यों की वजह से नक्सली हिंसा में काफी कमी आई है। तुलनात्मक रूप से देखें तो वर्ष 2004-2014 और 2014-2024 के बीचनक्सली हिंसा की घटनायें 16,463 से घटकर 7,744 हो गई। जबकि इस दौरान मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या 1,851 से घटकर 509 रह गईंऔर आम नागरिकों की मौतें 4,766 से घटकर 1,495 हो गई। यह स्थिति नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति और शासन व्यवस्था बहाल होने का एक शानदार संकेत है।

अकेले वर्ष 2025 में सुरक्षा बलों ने 270 नक्सल उग्रवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया, 680 नक्सलियों को गिरफ्तार किया और करीब 1225 नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने के लिए बाध्य किया। सुरक्षा बलों की तरफ से ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियान और बीजापुर , छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में नक्सलियों द्वारा बड़े पैमाने पर किये गए आत्मसमर्पण से नक्सल उग्रवादियों को जीवन की मुख्यधारा में शामिल होने की महती प्रेरणा मिली है।

A diagram of a security progressAI-generated content may be incorrect.

सशक्त सुरक्षा ग्रिड और तकनीकी उन्नययन

नक्सल हिंसा की रोकथाम को लेकर इसके नियंत्रण की बुनियादी संरचना का निर्माण सरकार की तरफ से एक बेहद जरुरी कदम था। पिछले दस सालों में सरकार द्वारा नक्सली इलाकों में हर जरूरत से सुसज्जित 576 पुलिस स्टेशन बनाए गए। पिछले छह सालों में 336 नए सिक्योरिटी कैंप बनाए गए हैं। वर्ष 2014 में नक्सल प्रभावित ज़िलों की संख्या जो 126 हुआ करती थी वह 2024 में घटकर 18 रह गई हैऔर अब सिर्फ़ ज़िले ही सबसे ज़्यादा नक्सल प्रभावित कैटेगरी में हैं। इस दौरान 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड बनाए गए जिससे सुरक्षा बलों को अपने ऑपरेशन के दौरान कभी भी आने-जाने में आसानी हुई है और उनका रिस्पॉन्स टाइम भी बेहतर हुआ है।

सुरक्षा एजेंसियां अब नक्सली गतिविधियों की सटीक मॉनिटरिंग और उनके विश्लेषण के लिए अधुनातन तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों की लोकेशन ट्रैकिंगमोबाइल डेटा एनालिसिससाइंटिफिक कॉल लॉग जांच और सोशल मीडिया एनालिसिस जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर उनकी सभी हरकतों पर करीब से नज़र रखा जाता है। सुरक्षा बलों को अलग-अलग फोरेंसिक और टेक्निकल संस्थानों से मिले सपोर्ट से इंटेलिजेंस इकट्ठा करने और अपनी ऑपरेशनल दक्षता को और मज़बूत बनाने में मदद मिली है। इसके अलावा सुरक्षा बलों द्वारा मॉनिटरिंग और रणनीतिक प्लानिंग को बेहतर बनाने के लिए ड्रोन सर्विलांससैटेलाइट इमेजिंग और एआई -बेस्ड डेटा एनालिटिक्स का भी असरदार तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

नक्सलियों के फाइनेंस नेटवर्किंग के तोड़ की रणनीति

नक्सलवाद को सपोर्ट करने वाले फाइनेंशियल नेटवर्क को अब बड़े सुव्यवस्थित तरीके से खत्म कर दिया गया है। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानि एन आई ए के एक विशेष विंग ने नक्सलियों की ₹40 करोड़ से ज़्यादा की संपत्ति ज़ब्त की है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के ऑपरेशंस से इनकी करीब ₹12 करोड़ की ज़ब्ती हुई है। राज्यों ने भी नक्सलियों की ₹40 करोड़ की प्रॉपर्टी ज़ब्त की है। इसके अलावा, शहरी नक्सलियों को काफी नैतिक और मानसिक झटके लगे हैं, जिससे इनके इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर यानी सू चना युद्ध के लिए उनकी क्षमता में कमी आई है।

क्षमता निर्माण और राजकीय सहयोग

राज्यों के सुरक्षा बलों को मज़बूत बनाना सरकार की वामपंथी उग्रवाद के खात्मे की नीति का एक अहम हिस्सा रहा है। सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर यानी सुरक्षा सम्बंधित व्यय योजना के तहतपिछले 11 सालों में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों को ₹3,331 करोड़ रुपये जारी किए गएजो पिछले दशक की तुलना में 155 % ज़्यादा है। इसी तरह स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (SIS) ने राज्य की स्पेशल फोर्सस्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच और मज़बूत पुलिस स्टेशनों के निर्माण के लिए ₹991 करोड़ रुपये मंज़ूर किए।

2017-18 के बाद से इस क्रम में ₹1,741 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है जिसमे अब तक ₹445 करोड़ जारी किए गए हैं। विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए के तहत, ₹3,769 करोड़ की राशि वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में तमाम विकास परियोजनाओं के लिए आबंटित थीइस राशि में पूरक के रूप में शिविर अवसंरचना के लिए केंद्रीय एजेंसियों को सहायता के तहत ₹122.28 करोड़ और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए ₹12.56 करोड़ प्रदान की गयी।

बुनियादी सुविधाओं का विकास

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के विकास ने वहां सामाजिक और आर्थिक समावेश को गति दी है।

  • सड़क संपर्क: 2014 और 2025 के बीच कुल 17,589 किलोमीटर के निर्माण के लिए ₹20,815 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए जिसमें नक्सली इलाकों में 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण पूरा हुआ
  • मोबाइल कनेक्टिविटी: वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूईप्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी विस्तार को दो चरणों में लागू किया गया है। पहले चरण के तहत, ₹4,080 करोड़ की लागत से 2,343 2जी टावर बनाए गए। दूसरे चरण मेंसितंबर-अक्टूबर 2022 में ₹2,210 करोड़ के निवेश के साथ 2,542 4जी टावर स्वीकृत किए गएजिनमें से 1,139 चालू हो गए हैं। इसके अतिरिक्तनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए 8,527 4जी टावरों को मंजूरी दी गई है। आकांक्षी जिला योजना के तहत स्वीकृत 4,281 टावरों में से 2,556 कार्यरत हैंजबकि 4जी संतृप्ति योजना के तहत, 4,246 टावरों में से 2,602 चालू हैं।
  • वित्तीय समावेशन और पहुंच: नक्सल प्रभावित इलाकों में 1007 बैंक शाखाएं, 937 एटीएम और 37,850 बैंकिंग संवाददाताओं की स्थापना की गई है। अब नक्सल प्रभावित 90 जिलों में 5,899 डाकघर काम करते हैंजिससे प्रत्येक किमी पर नागरिकों को डाक और वित्तीय सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित हुई है।
  • शिक्षा और कौशल विकास: कौशल विकास योजना के तहत, 48 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआईऔर 48 जिलों में 61 कौशल विकास केंद्र (एसडीसीस्थापित करने के लिए ₹495 करोड़ स्वीकृत किए गएजिनमें से 46 आईटीआई और 49 एसडीसी संचालित हैं। ये संस्थान संघर्ष से विकास की ओर बढ़ रहे युवाओं को आजीविका के नए अवसर प्रदान कर रहे हैं।
  • सुरक्षा और प्रवर्तन: कुल 108 मामलों की जांच की गई हैजिसके परिणामस्वरूप अब तक 87 आरोप पत्र दाखिल किए गए हैं। बस्तरिया बटालियनजिसका गठन 2018 में हुआ थामें 1,143 रंगरूट शामिल हैंजिनमें बीजापुरसुकमा और दंतेवाड़ा जिलों के 400 युवा शामिल हैंजो सुरक्षा अभियानों में स्थानीय भागीदारी और उनके विश्वास-निर्माण की प्रतीक हैं।

 

नक्सल नेटवर्क को नेस्तनाबूद कर प्रभावित इलाकों की पुनर्वापसी और उनमे पुनर्वास का कार्य सुनिश्चित करना

अपने सतत सुरक्षा अभियानों और अपनी सटीक खुफिया-आधारित रणनीतियों के माध्यम से, सरकार ने करीब तीन दशक पुराने वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित कई क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया है। सरकार की इस सफलता के पीछे लिए "ट्रेस, टारगेट, न्यूट्रलाइज" यानी पहचान लक्ष्य और मिटा दो का दृष्टिकोण अहम् रहा है, जिससे सुरक्षा बलों को प्रमुख नक्सली नेताओं की पहचान कर उन्हें खत्म करने और उनकी कमान संरचना को बाधित करने में मदद मिली है। नक्सल इलाकों के सुदूर क्षेत्रों में सुरक्षा शिविरों की स्थापना तथा ऑक्टोपस, डबल बुल और चक्रबंध जैसे अभियानों से नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सुरक्षा बलों को उल्लेखनीय सफलता हासिल हुई है। इसके परिणामस्वरूपबुध पहाड़पारसनाथबरमशिया और चक्रबंधा जैसे क्षेत्र वामपंथी उग्रवाद से लगभग मुक्त हो गए हैं। सुरक्षा बलों ने नक्सल विद्रोहियों के अंतिम प्रमुख गढ़ अबूझमाड़ में सफलतापूर्वक प्रवेश किया है। इसके अलावा सुरक्षा बलों ने पीएलजीए (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मीको बीजापुर और सुकमा में अपने मूल क्षेत्रों को छोड़ने के लिए मजबूर करने में बड़ी सफलता पायी। गौरतलब है की वर्ष 2024 में सुरक्षा बलों के खिलाफ नक्सलियों ने एक जवाबी सामरिक हमला अभियान (टी सी ओ सी शुरू किया परन्तु हमारे सुरक्षा बलों ने अपने आक्रामक अभियानों के जरिये उनकी इस मंशा को विफल कर दिया।

वर्ष 2024 में हमारे सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ 26 बृहद मुठभेड़ों को अंजाम दिया जिसके परिणामस्वरूप कई शीर्ष नक्सली कैडरों को ढेर कर दिए गया। इनमे शामिल हैं:

  • 1 आंचलिक समिति सदस्य (जेडसीएम)
  • 5 उप-आंचलिक समिति सदस्य (एसजेडसीएम)
  • 2 राज्य समिति सदस्य (एससीएम)
  • 31 मंडलीय समिति सदस्य (डीवीसीएम)
  • 59 क्षेत्र समिति सदस्य (एसीएम)

सुरक्षा बलों की इस सुव्यवस्थित कार्रवाई ने नक्सलियों के कई मुख्य समूहों को भंग कर दिया है और कई नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति और शासन बहाल कर दिया है। सुरक्षा प्रयासों के साथ-साथसरकार की समर्पण और पुनर्वास नीतिआजीविका और सामाजिक सहायता प्रदान करने की नीति ने कई नक्सल कैडरों को समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया है।
वर्ष 2025 मेंअब तक 521 वामपंथी उग्रवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है। और पिछले दो वर्षों मेंछत्तीसगढ़ में 1,053 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किए हैं। इसके अलावापुनर्वासित कैडरों को ₹5 लाख (उच्च-रैंक), ₹2.5 लाख (मध्य/निम्न-रैंककी वित्तीय सहायता और 36 महीनों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए ₹10,000 का मासिक वजीफा मिलता हैजिससे वे गरिमा और स्थिरता के साथ अपना जीवन फिर से बना सके ।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में,भारत में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षाविकास और सामाजिक न्याय के त्रिकोण पर आधारित एक व्यापक अभियान में दृष्टिगोचर हुई है। मजबूत बुनियादी ढांचेअत्याधुनिक प्रौद्योगिकीलक्षित प्रवर्तन और ममता व करुणा केंद्रित पुनर्वास के माध्यम सेसरकार ने कभी संघर्षरत रहे क्षेत्रों को अब अवसर के केंद्रों में बदल दिया है।

भारत अभी केंद्र और राज्यों के बीच सतत सक्रिय सहयोग के जरिये मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की राह पर अग्रसर है। यह एक निर्णायक सरकार और उसकी शांति और विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के एक दशक का प्रमाण है।

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