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ई-बिल सिस्टम का शुभारंभ: उर्वरक सब्सिडी के डिजिटल और पारदर्शी भुगतान की दिशा में बड़ा कदम

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माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया विजन और विकसित भारत @ 2047 के लक्ष्य के अनुरूप, उर्वरक विभाग ने डिजिटल शासन और वित्तीय सुधारों को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। माननीय केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में ई-बिल सिस्टम का उद्घाटन किया। इस प्रणाली के माध्यम से सरकार लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के उर्वरक सब्सिडी भुगतान को डिजिटल रूप से संसाधित कर सकेगी।

समारोह में संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह ऑनलाइन प्रणाली पारदर्शी, कुशल और तकनीक-संचालित शासन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उर्वरक विभाग के सचिव राजत कुमार मिश्रा ने कहा कि इस लॉन्च के साथ विभाग के वित्तीय संचालन को आधुनिक बनाने में एक बड़ी मील का पत्थर स्थापित हुआ है। यह नई प्रणाली मैन्युअल और कागजी प्रक्रियाओं से पूरी तरह डिजिटल, सिस्टम-टू-सिस्टम वर्कफ़्लो में परिवर्तन का प्रतीक है, जिससे बिलों के भौतिक आदान-प्रदान की आवश्यकता समाप्त हो गई है।

यह पहल उर्वरक विभाग के iFMS (Integrated Financial Management System) और वित्त मंत्रालय के CGA के PFMS के बीच अनोखी तकनीकी साझेदारी का परिणाम है।

CCA संतोष कुमार ने कहा कि इस परिवर्तन से पारदर्शिता और जवाबदेही काफी हद तक बढ़ेगी, क्योंकि यह सभी वित्तीय लेन-देन का केन्द्रीयकृत और छेड़छाड़-रहित डिजिटल ऑडिट ट्रेल बनाएगा, जिससे निगरानी और ऑडिटिंग आसान हो जाएगी। इस प्रणाली के तहत वरिष्ठ अधिकारियों को रियल-टाइम खर्च की निगरानी और मजबूत वित्तीय नियंत्रण मिलेगा, क्योंकि सभी भुगतान केंद्रीयकृत प्रणाली में ट्रैक और रिपोर्ट किए जाएंगे।

JS (F&A) मनोज सेठी ने कहा कि यह प्रणाली एंड-टू-एंड डिजिटल बिल प्रोसेसिंग सक्षम करती है, जिससे भुगतान की समय-सीमा में तेजी आएगी, विशेषकर साप्ताहिक उर्वरक सब्सिडी भुगतान के समय पर वितरण में। साथ ही, ई-बिल प्लेटफ़ॉर्म उपयोगकर्ताओं की सुविधा बढ़ाता है क्योंकि उर्वरक कंपनियां ऑनलाइन दावा जमा कर सकती हैं और भुगतान की स्थिति रियल-टाइम में ट्रैक कर सकती हैं, जिससे भौतिक यात्रा और मैन्युअल फॉलो-अप की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

यह प्रणाली विभाग में मानक इलेक्ट्रॉनिक वर्कफ़्लो (जैसे फर्स्ट-इन-फर्स्ट-आउट बिल प्रोसेसिंग) को लागू करती है, जिससे बिल हैंडलिंग में समानता, निष्पक्षता और वित्तीय नियमों का पालन सुनिश्चित होता है। इसके अलावा, सिस्टम एकीकरण से आईटी सिस्टम साइलो कम, सिस्टम मेंटेनेंस सरल और रियल-टाइम वित्तीय जानकारी का व्यापक आधार तैयार होता है, जो नीति निर्माण और बजट प्रबंधन में सहायक है।

इस कार्यक्रम में AS अनीता सी. मेश्राम, AS अपर्णा शर्मा, JS KK पाठक, JS अनुराग रोहतगी और डायरेक्टर लबोनी दास दत्ता उपस्थित थे।

असेम गुप्ता, वरिष्ठ तकनीकी निदेशक, NIC ने समाधान की तकनीकी उत्कृष्टता और सहज आर्किटेक्चर समझाया। NIC टीम, जिसमें जॉइंट डायरेक्टर आशुतोष तिवारी और डेवलपर हरेकृष्ण तिवारी शामिल थे, ने प्लेटफ़ॉर्म के कार्यान्वयन और डेमो का समर्थन किया। NIC के प्रयासों की व्यापक सराहना की गई।

संगठित ई-बिल प्रणाली वित्तीय शासन को सशक्त बनाती है, जिसमें पूर्वनिर्धारित मानदंडों के खिलाफ भुगतान की पुष्टि, ऑडिट उद्देश्यों के लिए हर क्रिया का लॉग और धोखाधड़ी या दुरुपयोग के जोखिम को कम करना शामिल है। यह पहल सरकार की पारदर्शी, कुशल और तकनीक-संचालित प्रशासन के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।

विधि कार्य विभाग ने LIMBS और PFMS के एकीकरण से अधिवक्ता शुल्क भुगतान प्रक्रिया को किया पूर्णतः डिजिटल

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भारत सरकार की विशेष अभियान 5.0 के तहत दक्षता, पारदर्शिता और डिजिटल प्रशासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग (Department of Legal Affairs – DLA) ने प्रक्रियागत सरलीकरण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। विभाग ने लीगल इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट एंड ब्रीफिंग सिस्टम (LIMBS) को पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) से एकीकृत कर दिया है। यह सुधार अधिवक्ताओं के शुल्क के वितरण की प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल बना रहा है, जो ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और डिजिटल इंडिया जैसी सरकार की प्रमुख पहलों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पहले अधिवक्ताओं को फीस का भुगतान करने की प्रक्रिया भौतिक दस्तावेजों पर निर्भर थी — जिसमें मैन्युअल सत्यापन और कागज़ी फाइलों को पे एंड अकाउंट्स ऑफिस तक भेजने की लंबी प्रक्रिया शामिल थी। इससे भुगतान में विलंब होता था और प्रणाली पेपर-इंटेंसिव बनी रहती थी। अब, e-Bill मॉड्यूल के उन्नत संस्करण के माध्यम से अधिवक्ताओं और विधि अधिकारियों को फीस का भुगतान पूरी तरह से डिजिटल और एंड-टू-एंड इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली के माध्यम से किया जा रहा है। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि भुगतान समयबद्ध और कुशलता से हो रहा है।

अब LIMBS पर तैयार किए गए बिल सीधे PFMS से जुड़े हुए हैं, जिससे उनका डिजिटल सत्यापन, स्वीकृति और भुगतान स्वतः हो जाता है। यह एक पेपरलेस सिस्टम है, जो रीयल-टाइम ट्रैकिंग, कम प्रसंस्करण समय और मानवीय त्रुटियों को समाप्त करता है। प्रत्येक दावे के लिए एक क्लेम रेफरेंस नंबर (CRN) उत्पन्न होता है, जिससे विभागीय इकाइयां भुगतान की स्थिति को वास्तविक समय में देख सकती हैं। भुगतान की स्वीकृति के बाद राशि सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में PFMS के माध्यम से स्थानांतरित हो जाती है।

केंद्रीय एजेंसी अनुभाग (CAS) ने फरवरी 2025 में LIMBS के माध्यम से पैनल अधिवक्ताओं के भुगतान के लिए e-Bill मॉड्यूल लागू किया था, और अब इसे अन्य मुकदमेबाजी इकाइयों, जैसे दिल्ली उच्च न्यायालय में भी विस्तारित करने की तैयारी है। इसके अलावा, विधि अधिकारियों के रिटेनर शुल्क के लिए एक अलग मॉड्यूल विकसित करने पर भी विचार किया जा रहा है।

यह एकीकरण डिजिटल प्रशासन को सशक्त करता है, पारदर्शिता, दक्षता और जवाबदेही को बढ़ावा देता है और पर्यावरणीय स्थिरता को भी प्रोत्साहित करता है। इस एकीकृत प्लेटफ़ॉर्म से विधिक शुल्क भुगतान प्रक्रियाओं में समानता और मानकीकरण सुनिश्चित हुआ है।

विशेष अभियान 5.0 के उद्देश्यों के अनुरूप यह पहल सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाती है, डिजिटल परिवर्तन को गति देती है और नागरिक-केंद्रित सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है। मैन्युअल प्रक्रियाओं को समाप्त करके और कार्यप्रवाह को मानकीकृत करके, विधि कार्य विभाग इस सुधार को अन्य कानूनी भुगतान श्रेणियों तक विस्तारित कर रहा है, जिससे विकसित भारत @2047 की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक ठोस कदम उठाया गया है।

खरीफ विपणन वर्ष 2025-26: छत्तीसगढ़ में पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुदृढ़ धान खरीदी व्यवस्था शुरू

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प्रदेश के हर अन्नदाता को उसके परिश्रम का पूरा मूल्य मिले, यही हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता - मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ शासन ने खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 के लिए समर्थन मूल्य पर धान उपार्जन की विस्तृत नीति घोषित की है। यह निर्णय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में किसानों के हितों और पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

खाद्य विभाग की सचिव रीना कंगाले ने जानकारी दी कि धान की खरीदी 3100 प्रति क्विंटल की दर पर की जाएगी। धान उपार्जन का कार्य 15 नवंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक किया जाएगा। इस वर्ष भी प्रति एकड़ अधिकतम 21 क्विंटल धान खरीदा जाएगा।

धान खरीदी का सम्पूर्ण कार्य छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ (MARKFED) के माध्यम से किया जाएगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु चावल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की नोडल एजेंसी छत्तीसगढ़ स्टेट सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन लिमिटेड होगी। धान खरीदी केवल उन्हीं प्राथमिक कृषि साख समितियों और लेम्पस के माध्यम से होगी जो मार्कफेड के कम्प्यूटरीकरण कार्यक्रम से जुड़ी होंगी।

प्रदेश के सभी जिलों में विगत वर्ष संचालित 2739 खरीदी केन्द्रों और नए स्वीकृत केन्द्रों के माध्यम से खरीदी होगी। इसके साथ ही 55 मंडियों और 78 उपमंडियों का उपयोग धान उपार्जन केन्द्र के रूप में किया जाएगा।

धान खरीदी के लिए आवश्यक साख-सीमा की व्यवस्था मार्कफेड द्वारा राज्य शासन के निर्देशानुसार की जाएगी, ताकि किसानों को समय पर भुगतान में कोई विलंब न हो।

प्रदेश में धान उपार्जन प्रक्रिया पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत एवं पारदर्शी होगी। किसान अपने निकटस्थ समितियों में पंजीकरण कर एग्रीस्टेक पोर्टल के माध्यम से धान विक्रय कर सकेंगे। पोर्टल पर ऋण पुस्तिका आधारित फार्म आईडी से खरीदी की अनुमति दी जाएगी।

भारत सरकार कृषि मंत्रालय के एग्रीस्टैक पंजीयन आईडी के आधार पर एकीकृत किसान पंजीयन पोर्टल में कराए पंजीयन फार्मर आईडी से होगा किसान लिंकिंग खरीदी एवं समिति में एग्रीस्टैक पंजीयन होने से समिति में ऋण पुस्तिका लाने की आवश्यकता नहीं होगी।

धान खरीदी प्रक्रिया में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को जारी रखा गया है, जिससे पारदर्शिता और वास्तविक किसान की पहचान सुनिश्चित की जा सके। केवल किसान स्वयं, या उनके माता-पिता, पति/पत्नी, या पुत्र/पुत्री ही धान विक्रय कर सकेंगे। विशेष परिस्थितियों में एसडीएम द्वारा प्रमाणित “विश्वसनीय व्यक्ति” को अधिकृत किया जा सकेगा।

धान खरीदी के लिए किसानों को टोकन जारी कर नियंत्रित और व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जाएगी। सीमांत व लघु किसानों को दो टोकन और दीर्घ किसानों को तीन टोकन दिए जाएंगे। अंतिम दिन नई पर्ची जारी नहीं होगी और शाम 5 बजे तक पहुँचे धान की खरीदी उसी दिन की जाएगी।

धान की खरीदी 50:50 अनुपात में नये और पुराने जूट बोरे (Gunny Bags) में की जाएगी। नये जूट बोरे मार्कफेड द्वारा जूट कमिश्नर, कोलकाता से क्रय किए जाएंगे। पुराने बारदानों को उपयोग योग्य बनाकर नीले रंग में “Used Bag allowed for KMS 2025-26” का स्टेंसिल लगाया जाएगा।

सभी उपार्जन केन्द्रों में कांटे-बांट का विधिक सत्यापन अनिवार्य किया गया है। किसानों को पारदर्शी प्रक्रिया का भरोसा दिलाने के लिए सत्यापन प्रमाणपत्र खरीदी केन्द्रों पर प्रदर्शित किए जाएंगे। धान की नमी 17% से अधिक नहीं होनी चाहिए। हर केन्द्र पर आर्द्रतामापी यंत्र उपलब्ध रहेंगे।

धान के संग्रहण हेतु ऐसे केन्द्र चुने जाएंगे जो ऊँचे एवं जलभराव-रहित हों। सभी केन्द्रों में पॉलिथीन कवर, सीमेंट ब्लॉक, और ड्रेनेज सुविधा अनिवार्य रूप से होगी ताकि बारिश में धान सुरक्षित रहे।

किसानों के खाते में भुगतान पीएफएमएस सिस्टम के माध्यम से सीधे किया जाएगा। यह सुनिश्चित किया गया है कि राशि केवल किसान के खाते में ही अंतरण हो; किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भुगतान नहीं किया जाएगा।

हर उपार्जन केन्द्र में कम्प्यूटर, प्रिंटर, यूपीएस, और नेटवर्क सुविधा सुनिश्चित की जाएगी। डाटा-एंट्री ऑपरेटरों का नियोजन 6 माह के लिए ₹18,420 प्रतिमाह के मानदेय पर किया जाएगा। सभी खरीदी केन्द्रों के डाटा का अपलोडिंग 72 घंटे के भीतर अनिवार्य किया गया है। धान खरीदी प्रारंभ होने से पूर्व सभी केन्द्रों का निरीक्षण, उपकरणों की जांच और सॉफ्टवेयर ट्रायल रन 31 अक्तूबर तक पूरा किया जाएगा। एनआईसी और मार्कफेड की टीम द्वारा यह तैयारी सुनिश्चित की जाएगी।


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