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मौसम भवन में मनाया गया 12वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस, ‘स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग’ थीम पर दिया गया जोर

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नई दिल्ली- पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने आज मौसम भवन, नई दिल्ली में 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन किया। “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” (Yoga for Healthy Aging) थीम पर आयोजित इस कार्यक्रम में मंत्रालय और विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा योग के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य और कल्याण का संदेश दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग दिवस संबोधन के लाइव प्रसारण के साथ हुई। इसके बाद विशेषज्ञ योग प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में कॉमन योग प्रोटोकॉल का अभ्यास कराया गया, जिसमें विभिन्न योगासन और प्राणायाम तकनीकों का प्रदर्शन एवं अभ्यास शामिल था।

इस अवसर पर भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने अपने संबोधन में योग को केवल परंपरा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि योग को नियमित दिनचर्या में शामिल कर हम स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी सकते हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ समाज और स्वस्थ समाज से स्वस्थ राष्ट्र तथा विश्व का निर्माण संभव है।

वहीं, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्रीनिवास राव गंगी रेड्डी ने योग के वैज्ञानिक और दार्शनिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में अत्यधिक जानकारी और निरंतर विचलनों के बीच मनुष्य को सजगता (माइंडफुलनेस) और स्पष्ट सोच की आवश्यकता है। योग व्यक्ति को आत्मबोध, मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन प्रदान करता है, जिससे कार्यक्षमता और पारस्परिक संबंधों में सुधार होता है।

श्रीनिवास राव गंगी रेड्डी ने भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग और राजयोग जैसे पारंपरिक योग मार्गों का उल्लेख करते हुए जीवन में संतुलन और अनुशासन अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के समापन पर मंत्रालय और आईएमडी के अधिकारियों ने योग प्रशिक्षकों को सम्मानित किया तथा स्वास्थ्य और कल्याण के क्षेत्र में उनके योगदान की सराहना की।

यह आयोजन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और भारत मौसम विज्ञान विभाग की उस प्रतिबद्धता का प्रतीक रहा, जिसके तहत योग की प्राचीन परंपरा को अपनाकर एक स्वस्थ, एकाग्र और अधिक उत्पादक कार्यस्थल के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

IITM पुणे में WISE-2026 के तहत मौसम और जलवायु स्टार्टअप्स के लिए इन्क्यूबेशन सेंटर का शुभारंभ

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भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के अंतर्गत आता है, ने आज मौसम और जलवायु से संबंधित स्टार्टअप्स के लिए अपना समर्पित इन्क्यूबेशन सेंटर औपचारिक रूप से शुरू किया। इस ऐतिहासिक अवसर को एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन “Weather and Climate Innovation Meet for Startups and Entrepreneurs (WISE-2026)” के साथ मनाया गया, जो भारत में मौसम सेवाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी के एक नए युग की शुरुआत का संकेत देता है।

इस केंद्र का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. शैलेश नाइक (निदेशक, NIAS एवं पूर्व सचिव, MoES), डॉ. सूर्यचंद्र राव (निदेशक, IITM) तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। यह इन्क्यूबेशन सेंटर “नेशनल एंटरप्राइज फॉर एटमॉस्फेरिक टेक्नोलॉजी (NEAT)” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो “मिशन मौसम” के अंतर्गत एक महत्वाकांक्षी पहल है और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से तकनीकी विकास को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है।

मौसम और जलवायु चुनौतियों से निपटने में सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. एम. रविचंद्रन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की जटिलता बढ़ रही है, इसलिए पारंपरिक शोध से आगे बढ़कर एक समावेशी और बहु-हितधारक प्रणाली विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि “मिशन मौसम” एक मौसम-स्मार्ट और जलवायु-स्मार्ट राष्ट्र बनाने की दिशा में एक आधारभूत कदम है, जिसमें उन्नत अवलोकन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडलिंग और स्थानीय स्तर पर जानकारी के प्रसार को शामिल किया गया है।

उन्होंने कहा—

“विभिन्न क्षेत्रों के युवा उद्यमियों को अन्य हितधारकों की जरूरतों की बेहतर समझ होती है, इसलिए हमें मिलकर काम करना होगा। यह सहयोग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि जीवन और आजीविका बचाने के लिए भी आवश्यक है।”

प्रगति के चार स्तंभ: सचिव ने मौसम विज्ञान प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए चार मुख्य आधार बताए—

  1. अवलोकन (Observations)

  2. मॉडलिंग (Modeling)

  3. उपयोगकर्ता-विशिष्ट अनुप्रयोग (User-specific Applications)

  4. सूचना प्रसार (Dissemination)

मिशन मौसम: इसे पाँच वर्षों की एक योजना के रूप में लागू किया जाएगा, जिसका उद्देश्य मौसम पूर्वानुमान और जलवायु विश्लेषण को विभिन्न मंत्रालयों और स्टार्टअप्स के सहयोग से एक “स्वास्थ्य प्रणाली दृष्टिकोण” के रूप में विकसित करना है।

उन्होंने नवाचारकर्ताओं को मंत्रालय के मुक्त डेटा संसाधनों—जैसे रिमोट सेंसिंग और रिऐनालिसिस डेटा—का उपयोग करने के लिए आमंत्रित किया, ताकि कृषि, विमानन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सटीक और स्थानीय समाधान विकसित किए जा सकें।

कार्यक्रम के दौरान एक उच्च स्तरीय पैनल चर्चा भी हुई, जिसमें यह बताया गया कि मौसम और जलवायु विज्ञान अब शोध से आगे बढ़कर स्टार्टअप-आधारित व्यावहारिक समाधानों की ओर बढ़ रहा है। इसमें कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया।

इस अवसर पर यह भी कहा गया कि “मौसम की जानकारी ही आर्थिक जानकारी है”, और वैज्ञानिक डेटा को वास्तविक जीवन के उपयोगी उपकरणों में बदलना आवश्यक है।

WISE 2026 कार्यक्रम में लगभग 400 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें 100 स्टार्टअप संस्थापक शामिल थे। इस कार्यक्रम में NCMRWF, IMD, NCPOR, ICRISAT, IISER पुणे तथा IIT दिल्ली, IIT बॉम्बे और IIT गांधीनगर सहित कई प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञ और शोधकर्ता शामिल हुए।

यह पहल भारत में जलवायु तकनीक (Climate Tech) को बढ़ावा देने और एक मजबूत, स्मार्ट एवं लचीली मौसम प्रणाली विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भारत AI इम्पैक्ट समिट 2026 में “भविष्य के महासागरों के लिए AI” पर उच्चस्तरीय चर्चा

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पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES), भारत सरकार ने 16–20 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित India AI Impact Summit 2026 के तहत “AI for Our Oceans of Tomorrow: Data, Models and Governance” विषय पर एक उच्चस्तरीय पैनल चर्चा का आयोजन किया।

विशेषज्ञों ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भारत में महासागर शासन, आपदा प्रबंधन, समुद्री आजीविका और ब्लू इकॉनॉमी (Blue Economy) के विकास में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है। इस सत्र में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि, वैज्ञानिक, उद्योग जगत के नेता, स्टार्टअप और वित्तीय विशेषज्ञ शामिल हुए।

महासागरों की भूमिका और AI का महत्व

मुख्य भाषण देते हुए भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक डॉ. एम. मोहापात्रा ने बताया कि महासागर जलवायु नियंत्रण, आपदा जोखिम कम करने, खाद्य सुरक्षा और आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के पास महासागर अवलोकन, चक्रवात पूर्वानुमान, समुद्री डेटा सिस्टम और शुरुआती चेतावनी सेवाओं में मजबूत राष्ट्रीय क्षमताएं हैं, जिससे चरम मौसम घटनाओं में जान-माल के नुकसान में काफी कमी आई है।

उन्होंने यह भी बताया कि डेटा-आधारित और AI-सक्षम मॉडल जलवायु परिवर्तन के प्रभावों (जैसे महासागर तापमान वृद्धि, अम्लीकरण और समुद्र स्तर वृद्धि) को समझने में पारंपरिक भौतिक मॉडलों के पूरक हो सकते हैं।
उन्होंने डीप ओशन मिशन को एक प्रमुख राष्ट्रीय पहल बताया, जो गहरे समुद्र की खोज, अपतटीय ऊर्जा, जैव विविधता संरक्षण और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग पर केंद्रित है।

भारत-नॉर्वे सहयोग और डिजिटल महासागर ढांचा

भारत में नॉर्वे की राजदूत मे-एलिन स्टेनर ने महासागरों और ब्लू इकॉनमी में भारत-नॉर्वे सहयोग को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि AI मछली पालन, शिपिंग, बंदरगाह संचालन और तटीय लचीलापन बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में नेतृत्व भारत को खुले डेटा, साझा मानकों और जिम्मेदार डिजिटल शासन पर आधारित एक वैश्विक डिजिटल महासागर ढांचा विकसित करने में सक्षम बनाता है, जिससे पूरी दुनिया को लाभ होगा।

डिजिटल ओशन इंफ्रास्ट्रक्चर और ब्लू इकॉनॉमी

पैनल चर्चा में सरकारी, अकादमिक, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हुए।
विशेषज्ञों ने कहा कि भारत ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करते हुए एक डिजिटल ओशन इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर सकता है, जो खुले डेटा, AI आधारित इंटेलिजेंस और मजबूत शासन ढांचे को एकीकृत करेगा।

AI समुद्री आजीविका बढ़ाने, लागत घटाने और ब्लू इकॉनॉमी क्षेत्रों में डेटा-आधारित निर्णय लेने के लिए आवश्यक होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि महासागर अभी भी डेटा की कमी वाला और जटिल क्षेत्र हैं, इसलिए भौतिक विज्ञान आधारित AI (Physics-informed AI) और फिजिकल इंटेलिजेंस की जरूरत है।

नीतिगत समर्थन, डेटा उपलब्धता, वित्तीय सहयोग और जोखिम साझा करने के साथ ब्लू इकॉनॉमी भारत और ग्लोबल साउथ के लिए दीर्घकालिक विकास का बड़ा इंजन बन सकती है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार और निवेश के अवसर पैदा होंगे।

समापन टिप्पणी

सत्र का समापन डॉ. (कमांडर) पी. के. श्रीवास्तव, वैज्ञानिक G और सलाहकार, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने किया। उन्होंने महासागर कार्यक्रमों में AI के एकीकरण के लिए संरचित रोडमैप बनाने की मंत्रालय की प्रतिबद्धता दोहराई।


पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने SCDPM 5.0 के तहत लंबित मामलों के निपटान और स्वच्छता में महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की

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पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) ने Special Campaign for Disposal of Pending Matters (SCDPM) 5.0 के तहत महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है। SCDPM, जो 2025 में अपनी पांचवीं श्रृंखला में है, पूरे भारत सरकार के कार्यालयों में स्वच्छता, रिकॉर्ड प्रबंधन सुधार और लंबित मामलों के समय पर निपटान पर केंद्रित है। SCDPM 5.0 को इस वर्ष 2 अक्टूबर को पूरे देश में लॉन्च किया गया था और यह अक्टूबर माह भर सक्रिय रहेगा, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। इस प्रमुख अभियान का उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और जन सेवा वितरण को बढ़ाना है और इसे प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा संचालित किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत’ दृष्टिकोण के अनुरूप, MoES ने SCDPM 5.0 के तहत अब तक निम्नलिखित गतिविधियाँ की हैं:

  • 54 प्रभावशाली स्वच्छता अभियान आयोजित किए।

  • 500 से अधिक फाइलों और रिकॉर्ड की विस्तृत समीक्षा के बाद 192 फाइलों का निपटान किया।

  • 3 पीएमओ संदर्भ, 3 राज्य सरकार के संदर्भ, 2 सांसदों के संदर्भ और 9 जन शिकायतों का समाधान किया।

  • स्क्रैप (ई-वेस्ट सहित) का उचित निपटान किया, जिससे 33.23 लाख रुपये से अधिक की आय हुई और लगभग 8,750 वर्ग फीट स्थान मुक्त हुआ।

  • नियमों और प्रक्रियाओं को सरल बनाने के प्रयास भी किए गए।

SCDPM 5.0 की गतिविधियों की समीक्षा MoES संस्थानों, क्षेत्रीय केंद्रों और फील्ड यूनिट्स में जॉइंट सेक्रेटरी, MoES, डी. सेनथिल पांडियन के नेतृत्व में की जा रही है। नियमित बैठकें प्रगति की निगरानी और चुनौतियों के समाधान के लिए आयोजित की जा रही हैं। SCDPM 5.0 के लिए नामित अधिकारी दैनिक रिपोर्टिंग और समय पर अपडेट सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल संचार माध्यम, सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप्स समूह और DARPG के SCDPM पोर्टल का उपयोग कर रहे हैं।

डी. सेनथिल पांडियन ने कहा,

“SCDPM केवल एक अभियान नहीं है। यह शासन को आधुनिक बनाने और तेज़, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ जन सेवा प्रदान करने का एक अवसर है। हमें MoES संस्थानों को प्रशासनिक उत्कृष्टता के मॉडल बनाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता पर केंद्रित रहना चाहिए।”

आगे बढ़ते हुए, MoES अधिक स्वच्छता अभियान, प्रभावी कार्यालय स्थान और कार्यप्रवाह, और लंबित मामलों के निपटान को सुनिश्चित करते हुए सरकार के पारदर्शिता, सुशासन और जन सेवा के दृष्टिकोण के अनुरूप प्रयास जारी रखेगा।

भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल 2025 का उद्घाटन: युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण और ज्ञान संवर्धन

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भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल – 2025 का MoES सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन द्वारा उद्घाटन

आज पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन ने भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल – 2025 का उद्घाटन किया। अपने उद्घाटन भाषण में, डॉ. रवीचंद्रन ने प्रशिक्षण स्कूल में भाग ले रहे युवा शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे नमूना तैयारी और आधुनिक उपकरणों में अपनी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करें, साथ ही केवल डेटा उत्पादन तक सीमित न रहकर वैज्ञानिक निष्कर्षों और अर्थपूर्ण व्याख्याओं की ओर ध्यान दें। उन्होंने जोर दिया कि भारत में पृथ्वी विज्ञान का भविष्य राष्ट्रीय विकासात्मक लक्ष्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें विकसित भारत 2047 की दृष्टि भी शामिल है। इस संदर्भ में, उन्होंने स्वदेशी सुविधाओं, विधियों और डेटा सेट्स के उपयोग के माध्यम से आत्मनिर्भरता बढ़ाने का आह्वान किया, साथ ही सहयोग और सहकर्मी शिक्षण के जरिए राष्ट्रीय ज्ञान आधार का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. रवीचंद्रन ने प्रशिक्षण स्कूलों के गुणन प्रभाव (multiplier effect) पर भी जोर दिया और कहा कि युवा शोधकर्ताओं को शिक्षक की भूमिका निभानी चाहिए और अपने संस्थानों में अपनी सीख साझा करनी चाहिए, जिससे राष्ट्रीय ज्ञान आधार मजबूत हो। उन्होंने आश्वस्त किया कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भू-कालक्रमिकी और संबंधित क्षेत्रों को आगे बढ़ाने वाले पहलों का समर्थन करता रहेगा, और भारत को वैश्विक पृथ्वी विज्ञान अनुसंधान में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करेगा।

उन्होंने रेखांकित किया कि भू-कालक्रमिकी पृथ्वी के इतिहास को समझने, प्राकृतिक संसाधनों का मानचित्रण करने और पर्यावरणीय चुनौतियों, जैसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है।

डॉ. रवीचंद्रन ने अंटार्कटिका पर किए गए अध्ययनों का उल्लेख करते हुए भू-कालक्रमिकी की केंद्रीय भूमिका को उजागर किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अध्ययन वैज्ञानिकों को दीर्घकालीन भूवैज्ञानिक परिवर्तनों को वर्तमान चुनौतियों जैसे प्राकृतिक आपदाओं, संसाधन प्रबंधन और जलवायु लचीलापन से जोड़ने में सक्षम बनाते हैं।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. एन. खरे, सलाहकार एवं कार्यक्रम प्रमुख, SAGE, MoES, ने IUC की विशेष भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि IUC न केवल उन्नत विश्लेषणात्मक सुविधाएँ प्रदान करता है बल्कि युवा शोधकर्ताओं को हाथों-हाथ प्रशिक्षण भी देता है। उन्होंने याद दिलाया कि मंत्रालय की दृष्टि, जो पहले पंचवर्षीय योजना काल से चली आ रही थी, भू-प्रौद्योगिकी और भू-कालक्रमिकी में राष्ट्रीय सुविधाओं की स्थापना थी, और IUC की देखरेख में यह क्षेत्र फल-फूल रहा है। डॉ. खरे ने उल्लेख किया कि अब तक 9,000 से अधिक नमूनों का AMS डेटिंग और अन्य उपकरणों द्वारा विश्लेषण किया जा चुका है, और यह सुविधा पृथ्वी की गतिशीलता, महाद्वीपीय विकास और भू-विज्ञान के अनुप्रयुक्त पहलुओं को समझने में आधारशिला बन गई है।

सचिव ने समानता, न्याय, विविधता और समावेशिता के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि ये मूल्य यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि भू-विज्ञान अनुसंधान के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचें। उन्होंने युवा प्रतिभागियों को IUAC और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय से संपर्क बनाए रखने और अपने अकादमिक एवं पेशेवर प्रयासों में निरंतर समर्थन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

उद्घाटन सत्र में प्रो. ए.सी. पांडेय, निदेशक, IUAC; डॉ. पंकज कुमार, IUAC; और चैत्य असवाल, IUAC ने भी संबोधन दिया। देशभर से फैकल्टी, वैज्ञानिक और युवा शोधकर्ता इस सप्ताह भर चलने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं।


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